श्री रूपरसिक देवाचार्य
जीवन चरित
श्री श्री रूपरसिक देवाचार्य वाणी संग्रह
आदि अंत जाको नहीं, माया कों न प्रवेश
जिसका न आदि है और न अंत, जहाँ माया का प्रवेश भी नहीं होता—वही श्री धाम वृन्दावन इस पृथ्वी पर प्रकट होकर विराजमान है।
कोटि कोटि वैकुंठ की, प्रभुताइ धौं कौन
करोड़ों-करोड़ों वैकुंठोंकी प्रभुता भी जिसके समक्ष हेय प्रतीत होती है, ऐसा श्री धाम वृन्दावन ही रसिकों का साक्षात् रस-स्वरूप निवास-स्थल है।
जो कदाचितन ना बसै, तौ निज मनहिं बसाय
यदि किसी कारणवश शरीर से (वृन्दावन में) वास न हो सके, तो अपने मन को ही वहाँ बसा लेना चाहिए। महान कवियों और संतों का कहना है कि इसमें लेशमात्र भी झूठ नह...
श्री वृंदावन माधुरी कैसे कैं कहि जाइ
श्री वृन्दावन की माधुरी का वर्णन किस प्रकार किया जाए? जिसका वर्णन करते-करते सहस्रमुखी शेषनाग भी थक गए और श्री ब्रह्मा जी भी उसका पार न पा सके।
कोटि कोटि सुकदेव से, कोटि कोटि जयदेव
करोड़ों श्री शुकदेव जी और करोड़ों श्री जयदेव जी जैसे महापुरुष भी यदि नित्य नवीन श्री धाम वृन्दावन के गुणों का वर्णन करें, तो भी वे उनके रहस्य (भेद) को...
चारि वेद षदशास्त्र, अष्टादश जु पुरान
चारों वेदों, छहों शास्त्रों और अठारहों पुराणों के समस्त सार का भी सार यदि कुछ है, तो वह श्री वृन्दावन का ध्यान ही है।
कोटिक तीरथ न्हाइप
चाहे कोटि-कोटि तीर्थों में स्नान करो और चाहे करोड़ों उपाय कर लो, परन्तु श्री राधा की सहचरी बनकर ही वृन्दावन का पूर्ण रस प्राप्त होता है।
वृंदावन यश सुनन की, जाकैं रुचि नहिं होइ
जिस व्यक्ति को वृंदावन की महिमा सुनने में रुचि नहीं होती, उसका संग तुरंत छोड़ देना चाहिए, क्योंकि ऐसे व्यक्ति का संग करना ही महत्त अपराध है जो आध्यात्...
वृंदावन को नाम सुनि, जिनकें हियैं हुलास
“श्री वृंदावन” का नाम सुनते ही जिनका हृदय प्रेम से उल्लसित हो जाता है, ऐसे महान रसिक संतों का संग करना ही सबसे उत्तम है।
शिव रमादि ब्रह्मादि के, ध्यानहिं मन ठहराई
जो आनंदकंद श्री कृष्ण शिव, रमा और ब्रह्मा आदि देवताओं के ध्यान का विषय हैं, वही श्री राधा रानी के प्रेम से पूर्णतः अधीन होकर सदा उनके चरणों की सेवा कर...
श्री वृंदावन महातम, समझि लेहु मन मित्त
हे मेरे मन-मित्र! तू श्री वृन्दावन के महात्म्य को भली-भाँति समझ ले। यह ऐसा मंगलमय धाम है कि स्वयं श्री हरि भी इसे मंगलरूप जानकर निरंतर इसकी वंदना करते...
वृंदावन में प्रेम को राज सदा भरपूर
परम पावन श्रीधाम वृंदावन में सदैव विशुद्ध और निष्काम प्रेम का ही एकाधिकार रहा है। यहाँ प्रेम-मार्ग में बाधक बनने वाले समस्त शुष्क नियमों और विधि-विधान...
ऐसौ वृंदाविपिन है, सर्वस रस को सार
यह श्री वृन्दावन ऐसा दिव्य और अनूठा धाम है, जहाँ समस्त रसों का सार—प्रिया-प्रियतम का नित्य विहार रस—हर क्षण बरसता रहता है।
सकल लोक चूड़ामणि
श्यामसुंदर यद्यपि समस्त लोकों के शिरोमणि और अत्यंत प्रवीण हैं, तथापि श्री राधिका के प्रेम के सामने वे भी दीन और अधीन हो जाते हैं। प्रेम की महिमा उन्हे...
मोहन को मन मधुप है, परयौ आनि इंहिं फंद
श्री कृष्ण का मन मानो श्री राधा के चरणारविंद का मधुप है, जो उनके चरणों के अमृतमय मकरंद का निरंतर आस्वादन करता है और उसी प्रेममय फंदे में आनंदपूर्वक बँ...
नित नव दूलह-दुलहिनी, सुंदर सहज सुदेश
मनोहर देश श्री वृंदावन धाम में नित्य नवीन दूल्हा दुल्हन विराजमान हैं जिनकी बदन ज्योति पर कोटि कोटि चंद्रमाओं को न्यौछावर कर देना चाहिए।
इनको सहज सुहाग सुख, वर्णनत बनत न बैंन
श्री प्रिया-प्रियतम का सहज दाम्पत्य-रस वाणी से वर्णित नहीं किया जा सकता। यदि इसका परिचय प्राप्त करना है, तो निष्काम रसमय भजन के नेत्रों से इसे निहारना...
जिन पायौ है प्रेम रस
जिस रसिक महानुभाव ने प्रेम रस का पान किया होता है, उसकी दशा निराली होती है। उसको शरीर एवं घर की तो सुधि होती नहीं, वे सदा प्रेम में उन्मत्त होकर प्रेम...
दोउ दोउन के प्रांन धन
श्री राधा कृष्ण एक दूसरे के प्राण धन हैं एवं दोनों एक दूसरे के जीय हैं। दोनों एक दूसरे की प्रेमिका भी हैं और प्रियतम भी हैं।
लाड़ली लाल दोउ, रस रगमगे अपार
नित्य विहार के अपार रस में रंगे, श्री लाड़ली लाल अपने तन और मन की सुधि को भुलाए हुए, उस महारस सिंधु में सदा मगन हैं।
जय जय जय वृन्दाविपिन जुगलकेलि-आगार
श्री वृंदावन धाम की जय हो जो युगल (श्री राधा कृष्ण) की केली लीलाओं का घर है जिसकी महिमा का वर्णन करने में हजारों वेद भी असमर्थ हैं।
लीला नित्य विहार की श्री वृंदावन मांहि
श्री नित्य विहार की लीला श्री धाम वृंदावन में ही संपन्न होती है जिसको श्री हरिप्रिया अर्थात् श्री राधा की कृपा के बिना कोई प्राप्त नहीं कर सकता।
श्री-वृंदावन महल सुख है सब रस को सार
निज महल रूपी श्री वृंदावन धाम का रस समस्त सारों का भी सार रस है। जो इस रस का आस्वादन करते हैं उन पर श्री राधा की अहेतुकी कृपा बरस रही है।
अवधादिक हरिधाम को फल वैकुंठ कहंत
अवध आदि श्री हरि के जितने भी धाम हैं, उनका फल वैकुंठ धाम की प्राप्ति है। ऐसे अनंत कोटि वैकुंठ धामों को श्री वृन्दावन धाम की रज के ऊपर वार देना चाहिए।
जो क्रीड़ा वृन्दावन कीनी राधे सुंदरश्याम
श्रीधाम वृन्दावन में जो युगल ने लीला की है, वही रसिकों का प्राण-जीवन और परम धन है। कहने को ये दो हैं—“राधे” और “श्याम”—परंतु वस्तुतः इनका प्राण एक ही ...
जय वृन्दावनधाम निज सकल लोक सिरताज
समस्त लोकों के मुकुटमणि, श्री वृंदावन निज धाम को कोटि-कोटि वंदन है, जहाँ नित्य किशोर युगल सरकार, श्री राधा-कृष्ण, सदा वास करते हैं।
देखो सुंदरता की सीवाँ
हे सखी! देखो तो सही, यह स्वरूप तो स्वयं सौंदर्य की पराकाष्ठा है। यमुना के तट पर, कदम्ब वृक्ष की शीतल छाया में श्री श्यामाश्याम गलबहियाँ डाले खड़े हैं...
दुर्लभ या संसार में रसभजनी रतिवान
वास्तविक रस में रमे भजनानंदी रसिक का मिलना इस संसार में परम दुर्लभ है। अधिकांश लोग रस की चर्चा तो करते हैं, परंतु केवल बाह्याचार में ही उलझे रहते हैं।...
नेक विलोकि री इकवार
एक बार उनको निहारो; यदि तुम प्रेम की सच्ची ग्राहक हो, तो जान लो मोहन वही हैं जो हर हृदय को रिझा लेते हैं। [1] श्रीराधा अतुल सौन्दर्य-सम्पदा की धनी है...
लोचन लालची महारी
मेरी आँखें ऐसी लालची हो गई हैं कि लोक-लाज और कुल-मान की परवाह छोड़कर केवल श्रीलालविहारी (श्री कृष्ण) के दर्शन में ही तल्लीन रहती हैं। [1] यह शरीर मान...
प्रीतम कै धन प्यारी ए, प्यारी कै धन पीय
निकुंजेश्वर श्रीकृष्ण का सर्वस्व श्री राधा हैं और निकुंजेश्वरी श्री राधा का सर्वस्व श्रीकृष्ण। एक-दूसरे के अतिरिक्त उन्हें कुछ भी प्रिय नहीं लगता; एक-...
कहनी करनी करन कौ
यहाँ कहनी एवं करनी का कोई काम नहीं है, जिस पर श्री हरिप्रिया जू [श्री राधा] कृपा करती हैं बस वही श्री धाम वृंदावन का वास करता है अन्य कोई नहीं।
उपमा वृंदाविपिन की, देवे को नहिं ओक
श्री वृन्दावन धाम, जहाँ श्री श्यामा-श्याम नित्य-विहार-परायण हैं, उस नित्य धाम की उपमा किसी से भी देना असम्भव है; जिसकी एक कण-मात्र की सुन्दरता से ही स...
ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि
श्री वृन्दावन-धाम की रज की ब्रह्मादिक भी वांछा करते हैं। श्री राधा-महारानी की कृपा के बिना, इस वृन्दावन की लीला का तनिक भी ध्यान-मात्र भी किसी के हृदय...
स्यामा-स्याम विहार निज, वृन्दाविपिन उदार
श्री श्यामा श्याम उदार निज वृंदावन धाम में नित्य विहार पारायण हैं, जो अरबों-खरबों वैकुंठ धामों के गर्व को भी मिटाने वाला है।
सोई रसिकअनन्य कहावै
वही वास्तविक रसिक अनन्य कहलाता है जिसके श्रवणेंद्रिय को युगल (श्री राधा कृष्ण) की रस लीलाओं के अतिरिक्त और कुछ भी सुनना अच्छा नहीं लगता। [1] जो युगल ...
रसिक शिरोमनि सांवरो गौरी अद्भुत रूप
रसिक-शिरोमणि श्यामसुन्दर और अद्भुत रूप-लावण्य से युक्त गौरवर्णा श्री राधा, श्रीधाम वृन्दावन के गहन कुंजों में युगल रूप से विविध रसपूर्ण लीलाओं में नित...
देखहु अद्भुत प्रेम की
श्री राधा के इस अद्भुत प्रेम की गति को देखो, जो वर्णनातीत है। सम्पूर्ण जग भगवान श्री कृष्ण के अधीन है, परंतु वे स्वयं श्री राधा के अधीन हैं।