Verses & Passages
17 itemsजाके हित में लाडिली, ताकौं विघन न कोई
जिसके पक्ष में स्वयं लाडिली जी (श्री राधा) हो जाती हैं, उसके मार्ग में फिर कोई बाधा या विघ्न शेष नहीं रहता। चाहे संपूर्ण संसार ही उसका शत्रु क्यों न ब...
हाथ हमारे सब कछू, दियौ बिहारिनी बाल
श्री कुंजबिहारिनी जू (श्री राधा) ने हमें सब कुछ प्रदान किया है। वे सदा हमारे अंग-संग रहती हैं और नित्य-विहार की सर्वोच्च केली का प्रेम-रस निरंतर प्रदा...
श्री हरिदास उपासना
स्वामी श्री हरिदास जी की अखंड नित्य-विहारमयी उपासना अत्यंत दुर्लभ है— लाखों में कोई एक ही उसे समझ और धारण कर पाता है। इस दिव्य रस-परंपरा को प्राप्त क...
जो कछू कियौ सो लाड़िली
जो कुछ करती हैं वह लाड़ली (श्री राधा) ही करती हैं एवं उनकी इच्छा से ही सब कुछ होता है। लाड़ली की कृपा से ही आगे भी सब कुछ होगा, अत: लाड़ली जी के शरणाग...
एक राधा ब्रज में बसै, एक राधा रास विलास
एक राधा ब्रज में ब्रजेश्वरी स्वरूप से निवास करती हैं, एक राधा रास-लीला में रासेश्वरी स्वरूप से विलास करती हैं, और तीसरी राधा नित्य निकुंज-विहारिणी स्व...
रसिक रीति अद्भुत कथी
श्री श्यामा कुंजबिहारी की दिव्य केली-रस में डूबे हुए रसिकों द्वारा अपनाई गई यह रस-रीति अत्यंत ही अद्भुत है। श्री रसिक देव जी कहते हैं कि श्री नरहरिदास...
रसिक बिहारी सौं बनी
मेरी रसिक बिहारी से ऐसी बनी हुई है कि वे पल भर को भी मेरा साथ नहीं छोड़ते, जिसे देखकर मुझे आश्चर्य होता है कि ये वन में रास रचाने कब जाते होंगे।
श्री स्वामी सन्मुख भये, महा अभै पद देत
जब कोई जीव ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी के शरणागत होता है, तो वह महा अभय पद को प्राप्त हो जाता है। स्वामीजी उसी क्षण उसे अपना बनाकर, नित्य विहार ...
उत्तम करे सो लाड़िली
श्रीराधा जो कुछ करती हैं, वह सदा परम उत्तम और कल्याणकारी होता है; जबकि हम सीमित बुद्धि वाले जीव केवल मध्यम या स्वार्थयुक्त कर्म ही कर पाते हैं। जो साध...
आचारी सौं ठाकुर डरैं
जो केवल नियम-आचार, विधि-निषेध एवं बाहरी रीति-रिवाज में फँसे होते हैं, उनसे ठाकुरजी (श्रीकृष्ण) दूर ही रहते हैं — उनके पास नहीं आते। परंतु सच्चे प्रेमी...
तन मन वचननि लाड़िली मेरी जीवन प्रान
मेरे तन, मन और वाणी में पूर्ण रूप से लाड़ली जी (श्री राधा) ही समाई हुई हैं, जो मेरे जीवन की प्राण स्वरूपा हैं। नित्य विहार की सुंदर केली-लीलाओं में सद...
मात तात जाके नहीं वृषभानु सुता नहिं नाम
स्वामी श्री हरिदास जी की अखंड नित्य विहार उपासना में श्री राधा एवं श्री कृष्ण को जन्मादि लीलाओं से पृथक सदा नित्य किशोर माना जाता है। श्री राधा का “वृ...
ललितप्रिये हरिदासि जू नित्य केलि सुख दानि
श्री ललिता सखी के अवतार, स्वामी श्री हरिदास जी महाराज, प्रिया-प्रियतम की नित्य-केली-रस के प्रदाता अनन्य रसिकाचार्य हैं। उनकी कृपा से साक्षात् रस की ख...
नित्त सरद नित्त तीज है
जहाँ नित्य ही शरद ऋतु है, नित्य ही तीज का उत्सव है और नित्य ही बसन्त तथा होली का आनंद है। जहाँ प्रतिक्षण युगल की नित्य नई-नई केलि-लीलाएँ होती रहती हैं...
सुल्लभ तें अति सुलभ है
सुलभ से भी अति सुलभ और दुर्लभ से भी अति दुर्लभ—ऐसी हैं मेरी कुंज विहारिणी, श्री लाड़िलीजी (श्री राधा), जो मेरे जीवन का आधार हैं।
एक अखंडित एकरस निरवधि रति जो होइ
जो अखंड, एकरस और अनंत होता है, जहाँ मिलन में भी व्याकुलता कम नहीं होती, अपितु निरंतर बढ़ती रहती है उसी को प्रेम कहा जाता है।
एक राधा ब्रज में बसै
एक राधा ब्रज में ब्रजेश्वरी स्वरूप से विराजमान हैं, एक राधा रास-लीला में रासेश्वरी स्वरूप से विलास करती हैं, और तीसरी राधा नित्य निकुंज-विहारिणी स्वरू...