ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
12 itemsराधा नामास्ति जिह्वाग्रे
जिसकी जिह्वा पर श्रीराधा-नाम आ गया, उसे किसी भी सुन्दर से सुन्दर साधन की आवश्यकता नहीं रहती; और यदि किसी को श्रीराधा-रस-सुधा का आस्वादन मिल गया तो उसक...
यस्याः स्फुरत्पदनखेन्दुततिच्छटाया
जिसके चमकते हुए श्रीचरण-नख-चन्द्रों की छवि की छटासे (क्षणभरमें) माधुर्य-सार-रसके करोड़ों महासमुद्रों की सृष्टि हो जाती है, वह श्रीराधा यदि कभी किसी जी...
अर्धोन्मीलितलोचनस्य पिबतो राधेति नामामृतम्
अधखुली आँखों से देखता, ‘श्रीराधे! श्रीराधे!!’ इस नाम-अमृत का पान करता, नेत्रों से प्रेम के आँसू बहाता, सारे अंगों से पुलकित होता, कहीं लड़खड़ाता, कहीं...
वृन्दावननिवासेऽपि तद्रसानुभवं विना
अरे मित्र! रस का पिपासु रसिक भक्त तो श्री वृंदावन में निवास हो जाने पर भी, जब तक उस रस का स्वयं अनुभव न कर ले, तब तक कभी संतोष नहीं पाता।
वस्तुतः प्रेयसी प्रेष्ठप्रेमामृतरसात्सकम्
वास्तव में प्रिया श्री राधा एवं प्रियतम श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण के पारस्परिक प्रेम का जो आंतरिक अमृतमय रस है, वही श्री वृंदावन का स्वरूप है। इसीलिए यह व...
योऽभूद् व्रजस्योज्ज्वलकामकेल्या
हे श्रीवनराज (श्री वृंदावन)! तुम्हारी रसरंगमयी भूमि में जो ब्रज की उज्जवल कामकेली का रास-रसोत्सव हुआ था, उस रस को श्री राधा और श्री कृष्ण तुम्हारे बिन...
तेनापि सहसा प्रोक्तं तत्र वासेऽतिदुष्कर
श्री वृंदावन में वास करना बहुत कठिन कार्य है क्योंकि धाम में रहने पर जो धाम अथवा धाम वासियों में दोष देखने लगते हैं वे पतित हो जाते हैं।
न विषय भोगो भाग्यं कीर्तिर्वा विस्तृता लोके
विषय-भोगों का बहुलता से सुलभ होना सौभाग्य नहीं है, संसार में कीर्ति का विस्तार हो जाए—यह भी सौभाग्य नहीं है। असली सौभाग्य है श्रीवृन्दावन वास प्राप्त ...
तादत्ते्ऽर्पितवस्तूनि राधासंकेतमन्तरा
श्रीकृष्ण को अर्पित की गई वस्तुओं को भी वे श्री राधा के संकेत के बिना स्वीकार नहीं करते। श्री राधा के बिना केवल श्रीकृष्ण की आराधना को दोषकारक माना ग...
पुज्यं तच्चरणं ब्रजेन्द्रविपिनं
वे चरण परम पूज्य हैं, जो श्रीव्रजेन्द्रनन्दन के क्रीड़ा-कानन श्रीवृन्दावन की यात्रा करते हैं। वह रसना धन्य है, जो इस रसमन्दिर वृन्दावन की स्तुति करती ...
यस्याः स्ववशगः कृष्णो
रसस्वरूप श्रीकृष्ण सदा श्रीराधारानी के अधीन रहकर उनके रस की वृद्धि करते रहते हैं, उनके नेत्रों के कटाक्ष और भृकुटि-विलास के अनुसार (भौंहों के संकेत पर...
निरञ्जनं निर्गुणमद्वितीयं वदन्ति
विद्वान् लोग परम तत्त्वको निरञ्जन, निर्गुण और अद्वितीय बताया करते है; उनके लिये वह तत्त्व वैसा ही हो। परंतु मैंने तो अपने लिये श्रीवृन्दावनको ही परम त...