श्री हित किशोरी लाल
जीवन चरित
श्री श्री हित किशोरी लाल वाणी संग्रह
जे नहि लोक वेद गति जानहिं
वे भाग्यशाली जन जो न तो संसार की मर्यादा, वेदों या कुलों को स्वीकार करना चाहते हैं। [1] न तो वे महान संतों के चरित्र को जानना चाहते हैं और न ही उनका ...
प्यारी तव पद टहल कौं, कमलादिक ललचाहिँ
हे प्यारी जू (श्री राधा)! आपके चरणों की सेवा और टहल प्राप्त करने के लिए लक्ष्मी जी (कमला) आदि देवियाँ भी निरंतर ललचाती रहती हैं। यहाँ तक कि श्री शुकदे...
गिनत बनै ना अघ अगनित अपार सोऊ
जो व्यक्ति एक बार भी मुख से “राधा” नाम का उच्चारण करता है, श्री श्यामसुंदर भगवान कृष्ण उसके अनंत पापों की गणना न करते हुए हृदय से अति उदार होकर यह विच...
कहौ कहा प्रयोजन मोय ऐसे शास्त्र बातन सौं
जिनमें प्रेम-मूर्ति श्रीराधा के चरणों का रस नहीं ऐसे शास्त्रों के समूह से मेरा क्या प्रयोजन ? [1] ऐसे साधुजन, उनके द्वारा गृहीत मार्ग-समूहों से भी हम...
एक बार हू लेहि मुख, राधा-राधा नाम
श्री राधा नाम की इतनी महिमा है कि केवल ‘राधा राधा’ कहने मात्र से ही श्री कृष्ण तुरंत उसे सुनते हैं और दौड़ कर उस भक्त से मिलने आते हैं।
राधिका के नाम हीसौं काम हमें रैन-दिन
अनुदिन श्रीराधा-नाम के भजन के प्राप्त होने पर कोटि कोटि श्रेष्ठ साधन भी परित्याज्य हो जाते हैं। [1] श्रीराधा-पद-कमल-सुधा पर कोटि-कोटि मोक्षादि पुरुष...
प्यारी तव पद टहल कौं
हे राधा प्यारी जू, आपके चरणों की सेवा के लिए लक्ष्मी आदि देवीयां भी लालायित रहती हैं। शुकदेव, नारद, आदि भागवतगण उसकी कामना करते हैं लेकिन प्राप्त नहीं...
जोई परा तत्व वृन्दावन में प्रकाश जाकौं
अहो जो परम तत्व, केवल श्रीवृन्दावन में ही दृष्टिगोचर होता है, अन्यत्र कहीं नहीं। जिसका वर्णन करने में श्रुति-शिरोभाग उपनिषद् भी समर्थ नहीं हैं। [1] ज...
रस औ लुनाई की सार है नवेली बाल
जो लावण्य एवं रस की सार हैं। जो करुणा एवं सुख की सार हैं। [1] जो मधुर छवि एवं रूप माधुरी की सार हैं। जो परम प्रवीण एवं चतुरता की सार हैं। [2] जो लाल...
जाकी दृगन कटाक्ष सर
जिनके नयन बाणों की चोट से श्री कृष्ण मूर्छित होकर धरती पर गिर जाते हैं और पुनः-पुनः व्याकुल और अधीर हो उठते हैं। [1] उनके हृदय में ऐसा भावावेश उत्पन्...
पवित्रा शोभित पाट पुनीत
शुद्ध रेशम का बना हुआ पवित्रा श्री श्यामाश्याम के गले में सुशोभित है। प्रिया के हृदय पर लाल और सोसनी (लाल रंग मिले हुये नीले रंग का) रंगों का पवित्रा...
धर्म अर्थ फल काम मोक्ष सब दूर विराजैं
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये उत्तम चार पुरुषार्थ यदि जगत में अत्यन्त उत्कृष्ट माने भी जाते हों, तो वे भले ही बने रहें। मुझे तो उनकी व्यर्थ चर्चा करने क...
कोटि कोटि नरकादिक तिनहूँ सौं निंद ऐसी
विषय तो दूर विषय की चर्चा भी मत करो क्योंकि वह करोड़ों नरकों से भी घृणित है। [1] मुक्ति आदि जो अनेक मार्ग वेदों एवं शास्त्रों ने गाए हैं उससे तो मुझे...
याही रस-मय नाम सौं राखत प्रेम अपार
जिसके प्रभाव के सामने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चारों पुरुषार्थ भी तुच्छ प्रतीत होते हैं, उस परम रसमय “राधा” नाम से श्रीकृष्ण अपार प्रेम रखते हैं।
नव निकुञ्ज वर नागरी
हे नित्य निकुंजेश्वरी श्री राधे! हे रस प्रदायिनी प्रिया जू! मुझे अपनी दासी जान अपनी महल की टहल (निज सेवा) दीजिए।
जग उपहासन सौं राखत न काज कछू
सृष्टि-रचना आदि की बात तो दूर रही, निकुंजेश्वर श्रीकृष्ण अपने नारद आदि भक्तों को भी नहीं पहचानते। [1] श्रीदामा आदि मित्रों से नहीं मिलते तथा अपने म...
लोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहि
मैंने लोक-परलोक, परिवार के सुख और अनन्त भौतिक कामनाओं को दूर से ही त्याग दिया है। इतना ही नहीं, जप, व्रत तथा परमार्थ सम्बन्धी समस्त श्रेष्ठ साधनों से ...