श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह )
जीवन चरित
श्री श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह ) वाणी संग्रह
अब तो जोई मित्र कहावैं
अब तो हमारा केवल वही मित्र है जो हमें श्री वृंदावन के वास को दृढ़ करता है। [1 & 2] अब वह व्यक्ति हमारे शत्रु के समान है जो वृंदावन वास के अतिरिक्त हमक...
जात के हैं हम तो व्रजबासी
हमारी असली पहचान यही है कि हम ब्रजवासी हैं; अब अन्य जाति-पांति की कोई बाधा शेष नहीं रही। [1] हमारा देश केवल ग्वालों का समूह (व्रज) है, हमें और किसी द...
इतनी है सब ठौर हमारी
हमारी ठौर [निवास स्थल] इतनी ही है: वृंदावन, यमुना, गोवर्धन, राधाकुंड इत्यादि जो हृदय को सुख देने वाली है। [1] नंदगाँव और बरसाना जहां श्री श्याम सुं...
कृष्ण कृपा आए दिन भले
श्री नागरीदास जी कह रहे हैं "आज तक मैं संसार के भ्रम मे बहुत भटकता रहा, परंतु अब श्री कृष्ण की अहेतु की कृपा हुई और अब मेरे भले दिन आ गए हैं क्यूँकि म...
गौर श्याम नित एक रस, नौतन नेह अछेह
श्री वृंदावन में नित्य विहार में विलीन श्री श्यामा-श्याम एकरस विलसते हैं—एक आयु, एक मन, एक प्राण, पर दो देह।
मोहन कृपा कटाक्ष निहारैंगे
श्री नागरीदास कह रहे हैं कि अब मोहन अवश्य मुझपर अपनी कृपा दृष्टि करेंगे। [1] मेरे समस्त औगुणों को भुला कर अपने कृपालु एवं पतित पावन नाम को ही विचारेंग...
सुनि व्यवहारिक नाम को ठाढे दूरि उदास
श्री नागरीदास जी वर्णन करते हैं कि जब वे वृन्दावन पहुँचे और लोग उन्हें किशनगढ़ के राजा के रूप में पहचानते थे, तब कोई विशेष स्वागत हेतु नहीं आया; पर जै...
मुरली की माला करी, नन्द लाला बस हेत
समुद्र मंथन के भारी श्रम के बाद ही समुद्र से श्री लक्ष्मी देवी निकली थी जिनकी छवि इस जग में प्रकाशित है। [1] समस्त जीव लक्ष्मीजी की कृपा (धन) को प्रा...
नागारिया नवनागरी
हे सखी, नित्य नवीन नागर एवं नागरी (श्री राधा कृष्ण) रास विलास खेल रहे हैं जिनकी छवि को निहार कर पल पल नागरीदास स्वयं को न्यौछवार कर रहे हैं।
अबैं कहा कहि हौं अहो राधा रूप रसाल
श्री राधा का रूप रस से भरपूर है जिसकी सुंदरता अद्वितीय है जिसके विषय में मैं क्या कहूँ? उनकी भौंहों की कुछ भंगिमा में ही, कामदेव को भी मोहित करने वाले...
उचित नहीं कहनी इती, रहस केली रस काम
यद्यपि यह प्रिया-प्रियतम के अद्भुत केलि-रस का वर्णन करना उचित नहीं है क्योंकि यह एक गोपनीय रहस्य है; परंतु इसमें मेरा दोष ही कहाँ है? क्योंकि इसके प्र...
हमारी अब सब बनी भली हैं
हमारी अब सब बात बन गयी है। [1] हमें अब कुंज महल की नित्य ही टहल मिल गयी है जहां नित्य ही नई नई रंगरली मनायी जाती है। [2] हमारे साहिब एक मात्र युगल सरक...
रहै दोऊ बदन निहार निहार
श्री नागरीदास कहते हैं, "रमणीक श्री वृन्दावन मे श्री श्यामसुंदर अपने सखाओं के संग पुष्प चयन कर रहे हैं एवं उसी समय वहाँ अति सुकुमार श्री श्यामा जू आ ग...
अब तो कृपा करो सब संत
श्री नागरीदास जी समस्त संतों से प्रार्थना कर रहे हैं की "हे समस्त संत जनों, इस शरीर और मन में अहम् बुद्धि के भ्रम से भटकते हुए अनंत जीवन बीत गए, अब तो...
अब तो कृपा करो व्रजवासी
हे ब्रज वासी जन, अब मुझपर कृपा कीजिए। आप सब तो जुगों जुगों से श्री श्यामसुंदर के सखा हो और उनकी लीला की उपासी हो। [1] मेरा अन्य किसी पवित्र स्थल से ...
धन-धन वृन्दावन यह नाउं
श्री वृंदावन धाम धन्य धन्य है। यह श्री वृंदावन धाम समस्त तत्वों का सार ही नहीं अपितु प्रेम रस का भी सार है। [1] जागृत, स्वप्न एवं सुषुप्ति की अवस्था म...
वृन्दाविपुन रसिक रजधानी
श्री वृन्दावन धाम (वृंदाविपिन) रसिकों की राजधानी है। [1] जहाँ के राजा भी श्री रसिकबिहारी जी तथा रानी भी श्री रसिक बिहारिणी जी (राधा रानी) हैं। [2] जहा...
श्री राधे कीजै कृपा
श्री नागरीदास जी कहते हैं—हे राधे! हे समस्त सुखों की राशि! मुझ पर कृपा कीजिए और किसी भी प्रकार मुझे अपने निज धाम वृन्दावन में वास दीजिए।
नित्य केली आनंद रस
मेरे हृदय में श्यामा-श्याम की वह युगल-जोड़ी नित्य निवास करती है, जो वृन्दावन के कुंजों के मध्य आनन्दरूप रस बरसा रही है और जो सदा नित्य-केलि में परायण...
कहा है परायो
सखी श्याम सुंदर से कहती है, यहाँ श्री ब्रज धाम में कुछ पराया कहाँ है? सब कुछ जो दिख रहा है, वह तो हमारी स्वामिनी श्री राधा जी का ही है। आपने बिना विचा...
हमारी बाँह गही वृन्दावन
वृंदावन ने मुझे मेरी बाँहों से पकड़ लिया है। मुझे अपनी शीतल छाया प्रदान कर, संसार के दुख-द्वंद्वों के तापों से सदा के लिए छुड़ा लिया है। [1] मेरे में...
कबै झुकत मो ओर कौं
ऐसा कब होगा जब श्री प्रिया लाल वृंदावन में यमुना तट पर लता पताओं के मध्य विहार करते हुए, एक दूसरे को गलबहियां दिए एवं एक दूसरे की ओर झुके हुए, अलमस्त ...