shri nagaridas (maharaj savnt sinh ) ki vani
Biography & History
shri nagaridas (maharaj savnt sinh ) ki vani Collected Verses
जुगल रूप ऐसो चितैं
प्रेम से रोमांचित होकर, अपने तन की सुधि भूलकर, युगल-रूप का ऐसा चिंतन कीजिए जिसमें वे नूपुरों की झंकार करते हुए यमुना-किनारे विहार कर रहे हों।
मुक्ति रहति द्वारें खरी
बरसाना धाम की जय हो, जहाँ मुक्ति भी साक्षात् द्वार पर कुछ सेवा प्राप्त करने के लिए हाथ जोड़कर खड़ी रहती है, और जहाँ दासी की दासी भी उस मुक्ति की ओर दृ...
घर घर टहल करत है लक्ष्मी
ब्रज में स्वयं लक्ष्मीजी एक घर से दूसरे घर विचरण करती रहती हैं और कभी भी ब्रज से दूर नहीं जातीं। ब्रज-वृन्दावन की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है, जहाँ ...
श्री वृषभानु कुल की भूषन जगत अभूत
श्री वृषभानु कुल में प्रकटी श्री राधा संपूर्ण विश्व में अनुपम मणि के रूप में चमक रही हैं। ऐसी पुत्री पर कोटि कोटि राजाओं के पुत्रों को न्यौछावर कर देन...
जो मन अरुझ्यो रूप हैं क्यों हू कहत बनैं न
श्यामा-श्याम के अनुपम रूप-सौंदर्य में अटके हुए मन की दशा को शब्दों में व्यक्त करना असंभव है, क्योंकि जीभ के पास वह मन नहीं है, और मन के पास वह जीभ नही...
हम तो वृन्दावन रस अटके
श्री नागरीदास कह रहे हैं "मैं तो श्री वृन्दावन रस में डूब चुका हूँ। [1] जब तक इस रस का परिचय नहीं हुआ तब तक संसार में बहुत भटकता रहा। [2] इस नीरस जग...