Verses & Passages
113 itemsवृन्दावन, रसिकन रजधानी
वृन्दावन, रसिकन रजधानी। [1] जा रजधानी की ठकुरानी, महरानी राधा-रानी। [2] जा रजधानी पनिहारिनि बनि, चारिहुँ मुक्ति भरति पानी। [3] जा रजधानी रज अज याचत,...
हम चाकर प्रीतम प्यारी के
हम केवल गौर - श्याम सरकार के ही दास हैं। वृन्दावन विहारी श्यामसुन्दर एवं बरसाने वाली किशोरी जी ही हमारी सर्वस्व हैं। [1] हम महाविष्णु एवं उनकी अर्धांग...
सरस किशोरी वयस कि थोरी
हे प्रेमरस-मयी किशोरी जी! हे किशोर-वय राधिके! हे प्रेमरस में सराबोर वृषभानुदुलारी! मुझ पर भी कृपा-दृष्टि कीजिए। [1] हे किशोरी जी! मैं समस्त साधनों से...
धरो मन, भानुलली को ध्यान
अरे मन ! तू निरन्तर ही वृषभानुनंदिनी राधिकाजी का ध्यान किया कर। [1] जिनका ध्यान साक्षात् ब्रह्म श्री श्यामसुन्दर भी निरंतर करते रहते हैं। [2] जिनके सि...
किशोरी मोरी, करहु कृपा की
हे किशोरी जी! मुझ पर कृपा दृष्टि करो। यह प्रबल माया मुझे अनेक प्रकार के नाच नचा रही है। [1] काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह ये बड़े-बड़े शत्रु चारों ओर से घे...
अनोखी, पिय प्यारी की बात
अरी सखी ! बात यह है कि जब मैं प्रियतम को देखती हूँ तब प्रियतम, प्यारी से भी अधिक सरस प्रतीत होते हैं, और जब प्यारी जी को देखती हूँ तब प्यारी, प्रियतम ...
हमारो, दोउ प्यारी प्यारो
प्रिया - प्रियतम दोनों ही हमारे सर्वस्व हैं। एक गौर वर्ण और एक नील वर्ण के हैं तथा दोनों ही मेरी आँखों के तारों के समान हैं। [1] एक नीलाम्बर धारण किय...
द्वार पतित इक आयो री किशोरी राधे
हे राधे ! तुम्हारे द्वार पर एक महान् पापी निष्काम-प्रेम की भिक्षा माँगने आया है, किन्तु साथ में शुद्ध अन्त:करण रूपी पात्र नहीं लाया है। [1] हे किशारी ...
अनोखी, वीणा वारी नारि
श्यामसुन्दर वीणा वाली नारी का भेष बनाये हुए हैं। [1] जिनके सोलहों श्रृंगार के माधुर्य को देखकर अनन्त कामदेव की स्त्रियाँ बलिहार जाती हैं। वह अनोखी व...
अहो पिय! जब तुम्हरी बनि
हे प्रियतम श्यामसुन्दर! मैं जब तुम्हारी बन जाऊंगी तब तुम्हारे मुखचन्द्र की रूप माधुरी को निरन्तर पीते हुए भी मेरे नेत्र रूपी चकोर थोड़ा भी तृप्त न हों...
हमरी ओर टुक हेरो री किशोरी राधे
हे वृषभानुनंदिनी राधे! थोड़ा इस अधम की ओर भी अपनी कृपा-कटाक्ष युक्त दृष्टि डालिए। यद्यपि मैं यह बात पूर्ण रूप से जानता हूँ कि तुम्हारे बिना मेरा कोई भी...
अपनी ओर टुक हेरो री
अपनी ओर टुक हेरो री, किशोरी राधे। [1] हौं तो कुटिल नीच सब दिन को, विश्व विदित अघ मेरो री किशोरी राधे। [2] पै 'बिनु हेतु पतितपावनि' यह, विरद दुर्यो कित...
डारो डारो री, रंग बनवारी पै
होली के अवसर पर एक सखी अन्य समस्त सखियों से कहती है कि चलो चलो सब लोग श्यामसुन्दर के ऊपर रंग डालो। लाल - लाल गुलाल उनके गालों में मल दो एवं अबीर उनके...
कबै हरि बनिहौं ब्रज को मोर
हे श्यामसुन्दर ! मैं तुम्हारे ब्रजधाम में मोर कब बनूँगा ? मोर बनकर काले बादलों के समान तुमको सचमुच ही काला बादल समझ कर कब प्रेम – विभोर होऊँगा ? [1] प...
किशोरी मोरी , अब न लगाओ बार
हे अलबेली राधिके ! अब देर न करो । मैं तुम्हारे द्वार पर खड़ा होकर तुम्हारी कृपा की भिक्षा माँग रहा हूँ । [1] रसिकों के मुख से सुना है कि तुम्हारे दर...
वृषभानु लली गुन गाइये
भावार्थ - अरे मन ! वृषभानुनन्दिनी के गुण गाओ । उनके ही चरण - कमलों का निरन्तर ध्यान करो । [1] उनके ही नाम का निरन्तर गान करते हए आँसुओं की धारा बहाओ ...
बलि जाउँ निकुंज विहार की
मानो यह जोड़ी शृंगार एवं रूप की मूर्ति ही साक्षात् श्री राधा-कृष्ण का स्वरूप धारण करके प्रेम के अन्तरंग रसों को बरसाने के लिए अवतरित हुयी है। प्रिया प...
मम स्वामिनि राधा नामिनी
मेरी स्वामिनी एकमात्र श्री राधिका जी ही हैं। सरस रतिरस तथा रास रस के लोलुप रसिक शिरोमणि श्यामसुन्दर भी जिनको अपनी स्वामिनी मानते हैं। [1] त्रैलोक्य क...
लखो रे मन, वृंदा विपिन-बहार
अरे मन दिव्य वृन्दावन की अलौकिक बहार देख, जहाँ पर प्रिया-प्रियतम नित्य ही विहार करते हैं। जहाँ जड़-चेतन समस्त जीव चिन्मय हैं, जहाँ की महारानी राधा ठकुर...
किशोरी जु कि, मधुर मधुर मुसकान
भावार्थ:-श्री किशोरी जी की मुस्कान अत्यन्त ही मीठी है। उनके नीलाम्बर की फहरान मुझे एक क्षण को भी नहीं भूलती। [1] मणियों से जड़े हुए उनके मुकुट के ऊपर च...
चलो मन ! श्री वृंदावन धाम
चलो मन ! श्री वृंदावन धाम। जहँ विहरत नागरि अरु नागर,कुंजनि आठों याम। भूख लगे तो रसिकन जूठनि, खाइ लहिय विश्राम। प्यास लगे तो तरणि-तनुजा,तट पिवु सलिल लल...
हमारी राधे, अति भोरी सरकार
हमारी स्वामिनी श्री वृषभानुनन्दिनी अत्यन्त ही भोली-भाली हैं। वे बरबस शरणागत दीनजनों को अपना बना लेती हैं, एवं उसे विशुद्ध-प्रेम-दान कर देती हैं। [1] ...
बलि जाऊं प्रेम-रस-सार की
श्री राधा-कृष्ण के प्रेम की मधुरता पर मैं बार-बार स्वयं को न्योंछावर करता हूँ। रसिकों के चूड़ामणि प्रिय श्री श्यामसुंदर एवं उनकी प्राण-प्यारी रस की खान...
पलक ढांपत राखत पुतरिन जो
"पलक ढांपत राखत पुतरिन जो, प्रणत भये इक बार" - जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा जो एक बार भी श्री राधारानी को आत्मसमर्पण कर देता है, उस...
श्री श्यामा जू को, ऐसो सरल सुभाय
श्री निकुंज-विहारिणी किशोरी जी का स्वभाव इतना सरल है जितना मैंने न कहीं देखा है और न सुना ही है, यह मैं प्रतिज्ञापूर्वक कह रहा हूँ। [1] जिन किशोरी जी...
हमारी अलबेली सरकार
“हमारी अलबेली सरकार। रसिक रंगीली, गुण गरबीली, रसिकन की रिझवार। " - जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा हमारी अलबेली सरकार, रसिकों की रं...
कुँवरि बिनु, अब तो रह्यो न जाय
( किशोरी जी के वियोग में प्रियतम श्यामसुन्दर का विलाप।) हाय ! हाय !! किशोरी जी के बिना अब तो किसी प्रकार भी रहा नहीं जाता। अरी सखियों ! जो कोई किशोरी ...
बार कत करति हमारिहिं बार
हे श्री राधे! हमारी ही बार इतनी देर क्यों कर रही हो? तुम तो अपने सरल-स्वभाव-वश ‘राधे’ नाम सुनते ही अति अधीर होकर पतितों के पास आ जाया करती हो। [1] ऐस...
सुनो मन यह अनन्य की रीत
हे मन! मैं तुमको अनन्य प्रेम का सिद्धांत समझाता हूँ, ध्यान देकर सुनो। श्यामा- श्याम का अनन्य प्रेमी केवल श्यामा-श्याम एवं उनके परिकर (सेवक) रसिक-जनों ...
बनि अलमस्त नाम गुन गाउँ
हम शरणागत के भय को दूर करने वाली लाड़लीजी के नाम एवं गुणों को गाते हुए मतवाले बने रहते हैं । ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि मैं तो नीलाम्बर धारण करने वाल...
रहो रे मन गौर चरन लव लाई
रे मन! तू भी वृषभानुनंदिनी श्री राधिका जू के उन कमल-कोमल-युगल-अरुण चरणों से प्रेम कर, जिन चरणों की चरण-धूलि का ब्रह्म-श्रीकृष्ण भी सेवन करते हैं। [1] ...
वृषभानु ललिहिं उर आनिये
श्री वृषभानुनन्दिनी (श्री राधा) को ही अपने हृदय में बसाओ। विकर्मों द्वारा नरक, सुकर्म द्वारा स्वर्ग एवं ज्ञान द्वारा मोक्षादि की व्यर्थ ही खाक क्यों छ...
मेरो मन गौर चरण अनुराग्यो
मेरा मन तो किशोरी जी के चरणों में अनुरक्त हो गया है। मैं अनादि काल से मोह की नींद में सो रहा था, रसिकों ने मुझे जगा दिया है। [1] जागते ही मेरा स्वप्न...
जाऊँ बलि, जोरी-युगल निहार
श्यामा-श्याम की जोड़ी को निहार कर मैं बलिहार जाता हूँ। वृषभानुनंदिनी का शरीर गौर वर्ण का है , वे मनमोहन के मन को मोहित करने वाली हैं एवं स्वभावतः भोली ...
हमारे मन बसे युगल सरकार
हमारे मन, बसे युगल सरकार। गौर वरनि वृषभानुनंदिनी, नील वरन रिझवार। गरबाहीं दीने दोउ ठाढ़े, मंजु निकुंज मझार। [1] उत पहिरे नीलांबर सोहति, इत पीतांबर धार।...
रहु श्री बरसाने गाम रे
अरे मन! चलकर श्री बरसाने ग्राम में निवास कर, जहाँ पूर्णब्रह्म घनश्याम भी अपने मुकुट से झाड़ू लगाया करते हैं। [1] जहाँ बड़े-बड़े योगीन्द्र, मुनीन्द्र व...
संत जन बारह मास बसंत
संत महात्माओं के पास बारहों महीने बसन्त का निवास रहता है। संत लोग बसन्तकालीन कोयल की कूक के समान अत्यन्त प्रेम भरी ध्वनि में निरन्तर ‘पिउ’ ‘पिउ’ ऐसा क...
श्री राधे जू को, अधाधुंध दरबार
श्री राधा जू के दरबार में अधाधुंध (बेहिसाब) कृपा बरसती है। जिन ब्रज की वनचारी स्त्रियों का आचरण संसार की दृष्टि में निंदनीय और व्यभिचारी कहा जाता है क...
हम भूखे ब्रज की गारी के
भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं कि हमें ब्रज की प्यार की गालियाँ अत्यंत ही अच्छी लगती हैं। 'दारी के' इस गाली को सुन-सुन कर मैं अपने बैकुण्ठ लोक के सुख को न...
श्री श्यामा जू को श्याम पलोटत पाम
श्री श्यामा जू (श्री राधा) के चरण कमलों को श्यामसुन्दर दबाया करते हैं। जिन्हें वेदों ने पूर्णकाम सच्चिदानंद ब्रह्म बताया है, वही ब्रह्म नन्दनन्दन बनकर...
कहो पिय किन तोहिं रसिक बनायो
एक सखी कहती है कि हे प्रियतम ! यह तो बताओकि तुमको रसिक बनाया किसने है? तुम पूर्व शूकरावतार में अपने सौन्दर्य के बल पर कब 'मदन मोहन' कहलाये थे? मत्स्या...
सखी सब, ह्वै गये लालहिं लाल
एक सखी वृन्दावन की होली के दृश्य का वर्णन करती हुई अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि अरी सखी ! युगल सरकार की होली में पिचकारियों से ऐसा रंग चला और ऐसा गु...
बलि जाउँ निकुंज लतान की
भावार्थ – मैं विविध प्रकार की लताओं के कुंजों की बार–बार बलैया लेता हूँ । मैं वृक्षों में लिपटी हुई लता एवं लताओं में फूले हुए विविध प्रकार के फूल तथ...
रंगीली राधा रसिकन प्रान
रंगीली राधा रसिकों को प्राण के समान प्रिय हैं। रसमयी किशोरी जी की प्रेम रस से सरोबार भोली सी मुस्कान अत्यन्त ही मधुर है। किशोरी जी की देह का रंग सुवर्...
हमारे, मन भायो ब्रजधाम
हमारे, मन भायो ब्रजधाम। जहँ ज्ञानिन - आराध्य मुक्तिहूँ, निशिदिन रहति गुलाम। [1] पानी भरति बनी पनिहारिनि, निदरतहूँ ब्रजभाम। गहवरवन निधिवन वृंदावन, लतन-...
हमें तो अली लली सौं काम
अरी सखी! मुझे तो एकमात्र किशोरी जी से ही काम है। जो रसिकों को रिझाने वाली गुणों की खान एवं रूप रस की सीमा हैं। [1] पूर्णकाम श्यामसुन्दर भी जिनकी दिन-र...
हमें नहिं काहू सों कछु काम
भावार्थ - हमारा किसी से कुछ प्रयोजन नहीं है । [1] हम तो एकमात्र स्वामिनी किशोरी जी के ही दास हैं । इन्हीं का निरन्तर स्मरण करते हैं। [2] जिनकी दासता स...
रास-रस रसिक रँगीली राधा
श्री किशोरी जी रास रस से विभोर रसिकों को रिझाने वाली हैं, जिनके चरण कमलों की नखमणि रूपी चन्द्रमा के प्रकाश को ब्रह्म जान कर योगीराज शम्भु सरीखे समाधि ...
युगलवर, निरतत कुंज मझार
युगलवर, निरतत कुंज मझार। देखति ललितादिक सखियन सब, पुनि–पुनि कहि बलिहार। आजु होड़ परि गई निरत महँ, युगल नवल सरकार। विविध अंग बहु भेद संग दोउ, हाव–भाव–वि...
श्याम हौं कब ह्वै हौं ब्रज धूरि
हे श्यामसुन्दर ! मैं कब ब्रज – धूलि बनूँगा ? ब्रज – धूलि बनकर, आनन्द विभोर होकर तुम्हारे अंग – अंग में कब लिपटूँगा ? [1] जिस ब्रज – धूलि को रसिक लोग ...
श्री राधे हमारी सरकार
जब किशोरी जी हमारी स्वामिनी हैं, तब मुझे किस बात की चिन्ता है? [1] जो पतितों के उद्धार के लिए ही अवतार लेती हैं और अकारण ही दीनों से प्रेम करती हैं—...
हमारो धन श्री राधे जू को नाम
हमारो धन, श्री राधे जू को नाम, राधे नाम प्रताप श्याम भये। रसिकन में सरनाम। राधे नाम सिद्ध कर मुरली, तानन मोह्यो बाम। [1] राधे नाम कृपा ते द्वापर, रास ...
वृषभानु ललहिं उर आनिये
वृषभानु ललहिं उर आनिये, अस उदार सरकार न मिलिहि, उन्हीं स्वामिनी मानिये। - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (44) हे अ...
रटो रे मन ! छिन छिन राधे नाम
हे मन ! क्षण-क्षण निरन्तर प्रेमपूर्वक राधे नाम का संकीर्तन कर। जिस राधे नाम को ब्रह्मा, विष्णु आदि की तो कौन कहे, स्वयं साक्षात् ब्रह्म श्रीकृष्ण भी...
चलो मन ! गहवर कुंज लतान
भावार्थ – अरे मन ! गहवर वन की लता कुंजों में चल, जहाँ वृषभानुनन्दिनी राधिका एवं नन्दनन्दन श्यामसुन्दर नित्य विहार करते हैं । [1] वे दोनों सहस्त्रों ब्...
रसिकन की, गति रसिकन जाने
एक रसिक कहता है कि रसिकों की अटपटी बातें रसिक ही समझ सकते हैं। [1] जिस प्रकार पाँच वर्ष के भोले बालक को कामयुक्त युवती के आलिंगन का सुख स्वप्न में भी ...
श्री राधेरानी प्रेम तत्व की सार
श्री वृषभानुनन्दिनी प्रेम तत्व की सार हैं। किशोरी जी वेदों और शास्त्रों से भी सर्वथा अगम्य होते हुए भी दीनजनों के लिए अत्यन्त सुगम हैं। [1] ब्रह्मा, व...
धरु उन स्वामिनी को ध्यान रे
अरे मन! तू उन वृषभानुनंदिनी स्वामिनी का ध्यान कर, जिनकी नखमणि चन्द्रिका का ध्यान स्वयं श्यामसुन्दर करते हैं। [1] जिनके नाम, रूप, गुण, लीलादिक रसिकों ...
मोहिं तो भरोसो है तिहारो री किशोरी राधे
हे रासेश्वरी राधे! मुझे तो एकमात्र तुम्हारा ही अवलम्ब है। मैं जिस कोटि का पतित हूँ, उसे तुम्हारे सिवा और कोई भी सांसारिक जीव नहीं जानता। [1] संसार क...
मोहिं तो भरोसो है तिहारो री किशोरी राधे
हे रासेश्वरी राधे ! मुझे तो एकमात्र तुम्हारा ही अवलम्ब है। मैं जिस कोटि का पतित हूँ, उसे तुम्हारे सिवा और कोई भी सांसारिक जीव नहीं जानता। [1] संसार ...
श्याम हौं कब ब्रज बसिहौं जाय
हे श्यामसुन्दर! वह दिन कब आएगा, जब मैं सदा के लिए ब्रज में जाकर निवास करूँगा? कब राधा-कृष्ण के विविध नामों और गुणों का गान करते हुए मेरी आँखों से निरन...
हमारो मन बसे युगल सरकार
“हमारो मन बसे युगल सरकार। गरबाहीं दिनें दोउ ठाड़े, मंजू निकुंज मझार। " - जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा श्री राधा कृष्ण हमारे हृदय में...
युगलवर निरतत कुंज मझार
“युगलवर निरतत कुंज मझार। देखति ललितादिक सखियन सब, पुनि पुनि बलि बलिहार” - जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा युगल वर कुञ्ज में विहार...
हम चाकर कुंज विहारिणि के
हम तो निकुञ्ज-विहारिणी स्वामिनी के ही दास हैं; रुक्मिणीवल्लभ श्यामसुन्दर तथा लक्ष्मी-अवतार श्री रुक्मिणी के भय से भी नहीं डरते। [1] संसार-सागर से ता...
प्रेम रस रूप अगाधा राधा
श्री किशोरी जी प्रेम – रस एवं रूप की अनंत राशि हैं। उनकी जो उपासना करता है वह सहज ही दिव्य रास – रस प्राप्त करता है। [1] इतना ही नहीं, वह किशोरी जी ...
हमरी ओर टुक हेरो री किशोरी राधे
भावार्थ - हे वृषभानुनंदिनी राधे! थोड़ा इस अधम की ओर भी अपनी कृपा - कटाक्ष युक्त दृष्टि डालिए। यद्यपि मैं यह बात पूर्ण रूप से जानता हूँ कि तुम्हारे बिना...
श्री राधे हमारी सरकार फिकिर मोहे काहे की
"श्री राधे हमारी सरकार फिकिर मोहे काहे की ।" - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा जब श्री राधा रानी हमारी गुरु और स्वामिनी हैं, तो हमें ...
जब रस की बतियन महँ झगरैं
श्री राधे, मेरी एक इच्छा को पूर्ण करें जब भी आपके और प्रिय श्याम सुंदर के बीच प्रेम से झगड़ा होता हो, तो दिव्य प्रेम और रस में, मैं एक मात्र आपका पक्...
हम चाकर प्रीतम प्यारी के
हम चाकर प्रीतम प्यारी के । पास न फटकत महाविष्णु के, अरु उनकी घरवारी के । चिन्मय दिव्य धाम वृंदावन, विहरत संग बिहारी के । । - जगद्गुरु श्री कृपालु जी...
बलि जाउँ लाड़ली लाल की
मैं राधा – कृष्ण पर बार – बार बलि - बलि जाता हूँ । राधाकृष्ण परस्पर गले में हाथ डाले हुए तमाल लता की कुंजों में विहार कर रहे हैं, इधर तो कीर्ति – कुमा...
बताओ राधे ! जाऊँ काके द्वार
बताओ राधे ! जाऊँ काके द्वार ?। साधनहीन दीन अपनावत, ऐसो कौन उदार । ( प्रेम रस मदिरा दैन्य – माधुरी ) जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज हे मोहन मोहिनी राध...
मोहिं स्वामिनि! अपनी मान रे
हे किशोरी जी! मुझे अपनी दासी बना लीजिए। हम केवल तुम्हारे चरण–कमलों का ध्यान करते हैं एवं तुम्हारे ही गुणों को गाते हैं। [1] हम भुक्ति मुक्ति आदि कुछ ...
हमारी अलबेली सरकार
हमारी स्वामिनी रसिकता की सीमा स्वरूपिणी हैं। वे रसिकों को सुख देने वाली, रिझाने वाली तथा समस्त गुणों की खान हैं। इनके दरबार में वेद के विधि निषेध की म...
रसिकन की गति रसिकन जाने | कह कृपालु यह दिव्य विषय किमी
रसिक संत की गति केवल रसिक ही जानते हैं। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं कि रसिक संतों की बातें, आचरण दिव्य होते हैं, साधारण जीव जो विषय भोग कर...
हमारी अलबेली सरकार
हमारी स्वामिनी, अलबेली सरकार, श्री राधारानी दिव्य प्रेम-आनंद की अंतिम सीमा है। रसिकों के लिए आनंद का एक स्रोत, वह सभी महान गुणों का भंडार है और जिनसे ...
धरो मन ! युगल माधुरी ध्यान
अरे मन ! तू प्रिया-प्रियतम की रूपमाधुरी का निरंतर ही ध्यान किया कर । रसिकों के सिद्धांत के अनुसार लीला-विलास के क्षेत्र में श्यामसुन्दर दास हैं, तथा न...
नित्य विहार करति वृन्दावन, कुंजनि प्रेम अगाधा।
नित्य विहार करति वृन्दावन, कुंजनि प्रेम अगाधा। किमी 'कृपालु' तहँ रहि सकत सपनेहुँ , भुक्ति मुक्ति दोई बाधा। - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम र...
मोहिं मनमोहन मनभाय रे
मुझे तो केवल वे मन को मोहने वाले प्राणप्रिय मनमोहन (श्री कृष्ण) ही मनभावन लगते हैं। कोई जप करता है, कोई तप करता है, कोई व्रत रखता है, तो कोई जंगल में ...
प्रेम रस रूप अगाधा राधा
श्री किशोरी जी प्रेम–रस एवं रूप की अनंत राशि हैं। उनकी जो उपासना करता है वह सहज ही दिव्य रास–रस प्राप्त करता है। [1] इतना ही नहीं, वह किशोरी जी की सहच...
प्रेम-रस-बोरी भानुदुलार
भावार्थ :-- हमारी किशोरी जी प्रेम-रस में सराबोर हैं। जड़े हुए रत्नों से युक्त सिंहासन पर सुशोभित हैं एवं उनकी रूप-माधुरी को देखकर मूर्तिमान श्रृंगार भी...
अनूपम, जोरी श्यामा श्याम
श्यामा – श्याम की युगल जोड़ी सर्वथा अनुपमेय है । किशोरी जी ने अपना सोलह श्रृंगार कर रखा है एवं श्यामसुन्दर ने नटवर भेष बना रखा है । दोनों ही गलबाहीं दि...
धरो मन ! युगल माधुरी ध्यान
अरे मन ! तू प्रिया-प्रियतम की रूपमाधुरी का निरंतर ही ध्यान किया कर । श्यामसुन्दर को मोहित करने वाली किशोरी जी एवं किशोरी जी को मोहित करने वाले श्यामसु...
श्री राधे हमारी सरकार फिकिर मोहे काहे की
जब श्री राधा रानी हमारी गुरु और स्वामिनी हैं, तो हमें किस बात का भय? हमें चिंता क्यों करनी चाहिए?
प्रेम रस रूप अगाधा राधा
श्री किशोरी जी प्रेम – रस एवं रूप की अनंत राशि हैं । उनकी जो उपासना करता है वह सहज ही दिव्य रास – रस प्राप्त करता है । [1] इतना ही नहीं, वह किशोरी जी...
बसे रे मेरे, नैनन दोउ सरकार
भावार्थ – मेरी आँखों में युगल – सरकार बस गये हैं। परस्पर गलबाहीं दिये हुए प्रेम रस सराबोर छवि एवं श्रृंगार की भी छवि को चुरा रहे हैं। मधुर मुरली की सु...
सुनो मन! यह अनन्य की रीत
अरे मन अनन्यता की रीति सुन, केवल और केवल श्यामा श्याम और उनके रसिकों को छोड़कर सपने में भी कहीं प्रीती भूल कर भी मत करना।
अरे मन मूरख निपट गवाँर
भावार्थ- अरे मन! तू वास्तव में अत्यन्त ही मूर्ख एवं नासमझ है। [1] तू आप अपना भी नाश कर रहा है, साथ ही मेरा भी नाश कर रहा है। तू इस विषय में थोड़ा सा भ...
हम चाकर प्रीतम प्यारी के
हम अकेले श्री राधा कृष्ण के शाश्वत सेवक हैं। किसी और के बारे में क्या कहना है, हम महाविष्णु और उनकी पत्नी महालक्ष्मी से बहुत दूर रहते हैं। हमेशा श्री ...
हमारी अलबेली सरकार
हमारी स्वामिनी, अलबेली सरकार, श्री राधारानी दिव्य प्रेम-आनंद की अंतिम सीमा है। रसिकों के लिए आनंद का एक स्रोत, वह सभी महान गुणों का भंडार है और जिनसे ...
युगल रस वृन्दावन बरसे
युगल रस वृन्दावन बरसे, मणि रमणी राधा गज गमनि, कमनी मनहर से || - जगदगुरु श्री कृपालु जी महाराज - प्रेम रस मदिरा, युगल माधुरी (4) वृन्दावन में श्यामा - ...
वृन्दावन रसिक राजधानी
श्री वृंदावन रसिकों की राजधानी है। जगदगुरु श्री कृपालु जी कहते हैं कि यह कहना पर्याप्त है कि श्री वृंदावन का महत्व श्यामसुंदर द्वारा कुछ ही हद तक, श्र...
रसिकन की गति रसिकन जाने | कह कृपालु यह दिव्य विषय किमी
रसिकन की गति रसिकन जाने | कह कृपालु यह दिव्य विषय किमी, जाने विषय रस साने || - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, रसिया - माधुरी (15) रसि...
प्रेम
भावार्थ :-- हमारी किशोरी जी प्रेम-रस में सराबोर हैं। जड़े हुए रत्नों से युक्त सिंहासन पर सुशोभित हैं एवं उनकी रूप-माधुरी को देखकर मूर्तिमान श्रृंगार भी...
श्यामा श्याम शरण गहु रे मन
अरे मन ! तू राधा-कृष्ण के चरण-कमलों की शरण में जा, तथा राधा-कृष्ण का स्वरूप अपने हृदय में रखकर उनके विविध नाम गुणादिकों को प्रेम-विभोर होकर गाता हुआ न...
मम स्वामिनी गुन की आगरी
जिनकी चाल मस्त हाथी के समान है, जिनकी सुन्दर छवि है, उनका नाम श्री राधा है और वह सब गुणों से युक्त हैं।
नित्य विहार करति वृन्दावन, कुंजनि प्रेम अगाधा।
वृन्दावनेश्वरी श्री राधा (मानो प्रेम की अगाध समुद्र), जो वृन्दावन धाम में नित्य विहार करती हैं एवं अपने जन को नित्य विहार रस देती हैं , उनका कृपा पात्...
वृन्दावन, रसिकन रजधानी
वृन्दावन, रसिकन रजधानी। [1] जा रजधानी की ठकुरानी, महरानी राधा-रानी। [2] जा रजधानी पनिहारिनि बनि, चारिहुँ मुक्ति भरति पानी। [3] जा रजधानी रज अज याचत, प...
रटु निशिदिन राधे नाम रे
भावार्थ - अरे मन ! तू निरन्तर राधे नाम की रटना कर, जिसके नाम को पूर्णकाम श्यामसुन्दर भी रटते हैं, जिसकी अनुपम रूप माधुरी का श्यामसुन्दर निरन्तर ध्यान ...
हम डरहूँ डर ते ना डरेँ
भावार्थ:- हम साक्षात् भय के भय से भी भयभीत नहीं होते। [1] कोई निन्दा करे चाहे अभिनन्दन करे जिसको जो रुचे, करे। [2] हम तो सदा श्याम रंग में मस्त रहते ह...
बलि जाउँ निकुंज लतान की
भावार्थ – मैं विविध प्रकार की लताओं के कुंजों की बार–बार बलैया लेता हूँ | मैं वृक्षों में लिपटी हुई लता एवं लताओं में फूले हुए विविध प्रकार के फूल तथा...
वृन्दावन रसिकन राजधानी
श्री राधा वृंदावन की एकमात्र सर्वोच्च रानी है, जो रसिक संतों की राजधानी है।
श्याम हौं कब ह्वै हौं ब्रज धूरि
O Krishn! When would I become the dust of Braj? When would I, being dust of Braj, cover whole body with a great joy and bliss. I wish to be that dust,...
जब रस की बतियन महँ झगरैं
श्री राधे, मेरी एक इच्छा को पूर्ण करें जब भी आपके और प्रिय श्याम सुंदर के बीच प्रेम से झगड़ा होता हो, तो दिव्य प्रेम और रस में, मैं एक मात्र आपका पक्ष...
धरो मन ! युगल माधुरी ध्यान
धरो मन ! युगल माधुरी ध्यान, रिझवत नित निकुंज श्यामा कहँ, मरम न सक कोउ जान। यह ‘कृपालु’ रस रसिकहिं जानत, जो नित कर रह पान ।। - जगद्गुरु श्री कृपालु जी ...
रंगीली राधा रसिकन प्रान
रंगीली राधा रसिकों को प्राण के समान प्रिय हैं। रसमयी किशोरी जी की प्रेम रस से सरोबार भोली सी मुस्कान अत्यन्त ही मधुर है। किशोरी जी की देह का रंग सुवर्...
किशोरी मोरी अब न लगाओ बार
हे मेरी किशोरीजी अब आप मुझ पर कृपा कीजिये। मैंने रसिकों से सुना है कि आपका ही केवल एक दरबार है जहाँ दीन जन को आदर की दृष्टि से देखा जाता है।
Shri Shyama Ju Ko Shyam Palotat Paam
Shri Shyama Ju Ko, Shyam Palotat Paam.Brahm Sachchidanand Nandasut, Jehi Kah Poorankam.Komal Kamal Lali Pag Laali, Lakhi Behaal Soi Shyam.Bali-Bali Ja...
Sant Jan Barah Maas Basant
Sant Jan Barah Maas Basant.Piu Piu Kahi Kahi Chhin Chhin Nishidin, Kukat Kokil Sant. [1]Kabahun Jharat Drigan Ansuva Jan, Jhar Taru - Patra Anant.Kaba...
Ham Bhukhe Braj Ki Gaari Ke
Ham Bhukhe Braj Ki Gaari Ke,Vaarat Nij Baikunth Lok-Sukh, Suni Suni Gaari ‘Daari Ke’. [1]Bhaav Na Mo Kaham Nekahun Astuti, Maha Vakya Shruti Chaari Ke...
Sakhi Sab Hve Gaye Laalhi Laal
Sakhi! Sab, Hvai Gaye Laalhin Laal.Aiso Rang Chalyo Pichkarin, Aiso Udayo Gulaal. [1]Laali Laal, Laal Bhaye Laalhun, Laal Bhain Brajbaal.Taruwar Laal,...
Shri Radhe Ju Ko Adhadhundh Darbar
Shri Radhe Ju Ko, Adhaadhundh Darbaar.Jin Vancharin Aacharan Kutsit, Jag Jehi Kah Vyabhichaar.Tin Kahun Nij Sahchari Kari Hari Son, Karavaavati Manuha...
Rasa-rasa Rasika Rangili Radha
Rasa-rasa Rasika Rangili Radha.Ja Pada-nakha-mani-chamdra Chamdrikahim, Shambhu Samadhihim Sadha. [1]Bike Shyama Binu Dama Yama-vasu, Jasu Nama Aradha...
Kaho Piya Kin Tohin Rasik Banayo
Kaho Piya!, Kin Tohin Rasik Banayo.Kab Varah Bani Roop-Rashi-Bal, Mohanmadan Kahayo.Dhari Tanu Meen Vari Bich Basi Kab, Gopin Cheer Churayo. [1]Lalit ...