ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
50 itemsआनंद अनुभव होत नहिं
इस संसार में जान लो कि बिना प्रेम के वास्तविक आनंद का अनुभव संभव नहीं है। प्रेम के बिना जो सुख प्रतीत होता है, वह या तो केवल क्षणभंगुर 'विषयानंद' (इं...
सिर काटो छेदो हियो
चाहे मेरा सिर काट दिया जाए, मेरे हृदय को छेद दिया जाए या मेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएँ; परन्तु यदि इसके बदले मेरे श्यामसुंदर की प्रसन्नता प्...
अति सूछम कोमल अतिहि
दिव्य प्रेम अत्यन्त सूक्ष्म और अत्यन्त कोमल है। यह बहुत पतला (सूक्ष्म) है और बहुत दूर भी है। यह सबसे कठिन भी है। इसे पूर्ण रूप से केवल भाव के द्वारा ह...
प्रेम निकेतन श्रीबनहि, आइ गोबर्धन धाम
अपने वृन्दावन-वास की घटना की ओर संकेत करते हुए रसखान कहते हैं कि संसार का त्याग कर मैं प्रेम-धाम वृन्दावन में आकर गोवर्धन नामक स्थान में बस गया, जहाँ ...
प्रेम अगम अनुपम अमित सागर सरिस बखान
रसखान कहते हैं कि प्रेम अगम्य (जिसको जाना न जा सके), अनुपम (जिसकी कोई उपमा न दी जा सके), सागर की भाँति अत्यंत गहरा एवं रसपूर्ण है। जो भी जीव एक बार इस...
रसमय स्वाभाविक, बिना स्वारथ
जो प्रेम स्वभाव से ही रसमय हो, जिसमें किसी प्रकार का स्वार्थ न हो, जो अचल और महान हो, जो सदा एकरस रहते हुए निरंतर बढ़ता जाए—उसी को शुद्ध प्रेम कहा जात...
हरि के सब आधीन पै, हरी प्रेम-आधीन
यद्यपि समस्त चराचर जगत भगवान श्री हरि के ही अधीन है, परंतु स्वयं श्री हरि प्रेम के अधीन हैं। इसी कारण भगवान ने प्रेम को अपने से भी अधिक बड़ा माना है।
कारज कारन रूप यह
रसखान के अनुसार प्रेम ही सृष्टि का मूल कारण है। जगत की उत्पत्ति और उसकी समस्त क्रियाएँ प्रेम से ही हुई हैं। वही प्रेम कर्ता भी है, कर्म भी है, क्रिया ...
तोरि मानिनी तें हियो फोरि मोहिनी मान
कृष्ण-भक्ति की ओर अपना रुझान प्रकट करते हुए रसखान कहते हैं कि मान करने वाली नारी से हृदय को तोड़कर (अर्थात् उसके प्रेम-बंधनों को छोड़कर) और इस मोहिनी ...
ज्ञान ध्यान विद्या मती, मत बिस्वास बिवेक
ज्ञान, ध्यान, विद्या, विविध मतों का विश्वास और विवेक आदि सब बिना प्रेम के धूलि के समान निरर्थक हैं, क्योंकि प्रेम वह तत्त्व है जो ब्रह्म की भाँति इस स...
कमलतंतु सो छीद अरु, कठिन खड़ग की धार
प्रेम मार्ग एक अनिवार्य रूप से विलक्षण है। यह कमल के तंतु (रेशे) से भी अधिक सूक्ष्म और कोमल है, तो दूसरी ओर तलवार की पैनी धार पर चलने के समान अत्यंत क...
प्रेम अयनि श्री राधिका, प्रेम-बरन नंदनन्द
श्री राधा प्रेम का प्रधान धाम हैं और श्री कृष्ण प्रेम के जीवंत रूप। दिव्य युगल, राधा-कृष्ण प्रेम-वाटिका में माली और मालिन के समान हैं।
प्रेम वारूनी छानि कै बरुन भरा जलधीस
प्रेम की महिमा का गान करते हुए रसखान कहते हैं कि प्रेम-मदिरा छानने के कारण वरुण देव जलाधिपति बने, और प्रेमवश विष का पान करने से ही शिव पूजनीय हुए। प्र...
प्रेम-रूप दर्पन अहो रचै अजूबो खेल
प्रेम-रूपी दर्पण में अद्भुत खेल रचा हुआ है, क्योंकि उसमें अपना स्वरूप कुछ-कुछ अनमेल-सा दिखाई देता है।
कोउ याहि फाँसी कहत, कोउ कहत तरवार
भगवत्प्रेम की विलक्षणता का अनुभव करते हुए रसिक जन इसे भिन्न-भिन्न स्वरूपों में परिभाषित करते हैं। कोई इसे गले की फाँसी मानता है तो कोई पैनी तलवार; कोई...
पै एतोहूँ रम सुन्यौ
प्रेम की विलक्षणता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि हमने केवल इतना सुना है कि प्रेम अद्भुत खेल है जिसमें स्वेच्छा से प्राणों की बाज़ी लगाकर दिल से ...
प्रेम हरि को रूप है
प्रेम ही श्री हरि का रूप है और श्री हरि ही प्रेम हैं। एक होकर भी वे दो दिखते हैं जैसे सूरज और उसकी धूप।
जातें पनपत बढत अरु
रसिक भक्त कहते हैं कि जिससे प्रेम उत्पन्न होता है, फूलता तथा बढ़ता है और परिपक्व रहता है, वह सब प्रेम ही होता है।
भले वृथा करि पचि मरौ ज्ञान गरूर बढ़ाय
भले ही समस्त प्रकार के साधन करके मर जाओ, ज्ञान प्राप्त करके गर्व को बढ़ा लो, परंतु बिना प्रेम के सब कुछ व्यर्थ ही है चाहे करोड़ों उपाय कर डालो। अर्थात...
वा रस की कछु माधुरी ऊधो लही सराहि
प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि प्रेमानंद का कुछ माधुर्य उद्भव ने सराहकर ग्रहण किया था। जो प्रेम रस उद्भव को ब्रज में प्राप्त हुआ ...
अकथ कहानी प्रेम की जानत लैली खूब
प्रेम की कहानी अकथनीय है जिसे प्रेमी ही अच्छे से जानता है। प्रेम वह वरदान है जो उस प्रेमी के तन एवं मन को उसके प्रियतम से मिलाकर एक कर देता है।
पै मिठास या मार के रोम-रोम भरपूर
प्रेम की चोट गहरी होते हुए भी मधुर होती है। इसकी चोट से मनुष्य का रोम-रोम माधुर्यपूर्ण रस से भरपूर हो जाता है। जो प्रेम में अपना बलिदान देता है वही अम...
दो मन इक होते सुन्यौ
सिर्फ़ दो मनों का एक हो जाना ही सच्चा प्रेम नहीं कहलाता। जब मन और तन दोनों का पूर्णतः मिलन हो जाए, तभी उसे सर्वोत्तम प्रेम का स्वरूप माना जाता है।
जेहि बिनु जाने कछुहि नहिं जात्यौ जात बिसेष
जिसे जाने बिना और किसी का बोध नहीं होता, और जिसे जानने पर स्वयं दिव्य ज्ञान उत्पन्न होता है अर्थात् जिसका बोध हो जाने पर कुछ भी जानने को शेष नहीं रह ज...
ज्ञान करम रु उपासना सब अहमिति को मूल
ज्ञान, कर्म-काण्ड, उपासना आदि यह सब मन में अहंकार उत्पन्न करते हैं। जब तक मनुष्य अपने को पूर्णतः प्रेममार्ग में नहीं समर्पित करता, उसके अनुकूल नहीं ब...
डरै सदा चाहे न कछु सहै सबै हो होय
रसखान कहते हैं — जो इस भावना से डरता रहता है कि कहीं उसकी किसी चेष्टा से प्रियतम को कोई कष्ट न हो जाए, जो अपने प्रियतम से कोई भी कामना नहीं रखता, सब प...
याही तें सब मुक्ति तें लही बड़ाई प्रेम
प्रेम में दो शरीरों को एक कर देने की शक्ति होती है, इसी कारण प्रेम का स्थान मुक्ति से भी ऊँचा माना गया है। जहाँ प्रेम प्रकट हो जाता है, वहाँ समस्त निय...
स्वारथमूल असुद्ध त्यों सुद्ध स्वभाव अनुकूल
जो प्रेम स्वार्थ-भावना से युक्त होता है, उसे अशुद्ध प्रेम कहा जाता है और जो निष्काम अथवा सहज भाव से केवल प्रियतम के सुख के लिए किया जाता है, वही शुद्ध...
प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं
जो प्रभु के प्रेम के बंधन में बँधकर मर जाता है, वही वास्तव में शाश्वत जीवन (अमरत्व) को प्राप्त करता है। इसके विपरीत, प्रेम के इस गूढ़ रहस्य को जाने बि...
प्रेम प्रेम सब कोऊ कहत
सब साधक कहते हैं कि हमें "भगवान से प्रेम है, हम तो भगवान के अनन्य प्रेमी हैं", परन्तु प्रेम क्या है, यह कोई नहीं जानता। जो वास्तविक प्रेम करना जानता ह...
दंपति सुख अरु विषय रस
रसखान कहते हैं कि दम्पति-सुख (पारिवारिक सुख) और विषय-सुख (इन्द्रियों द्वारा अनुभव किए जाने वाले राग-भोग आदि), तथा पूजा-पाठ और ध्यान—ये सब लौकिक हैं। प...
राधा माधव सखिन संग
जहाँ रसिक-शिरोमणि श्रीकृष्ण और रसखानी श्रीराधिका सखियों के साथ वृन्दावन के कुंजों में विहार कर रही हैं, उस अपार दृश्य का अवलोकन कर श्री रसखान उस अनुपम...
कबहुं न जा पथ भ्रम-तिमिर रहै सदा सुखचंद
सच्चे प्रेम के मार्ग में भ्रम या संदेह का अंधकार नहीं रहता। प्रेमी सदैव आनंद से भरा रहता है और उसका प्रेम दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है; उसमें कभी कमी...
पोथी पढ़ि पंडित हुआ
पोथी पढ़-पढ़ कर कोई पंडित बन जाए या कोई मौलवी कुरान पढ़कर ज्ञान बाँटे, परंतु प्रेम-रस में डूबे बिना सब व्यर्थ है; कहीं कोई गति नहीं।
बिन गुन जोबन रूप धन
श्री रसखान कहते हैं— ‘गुणों के बिना यौवन, रूप और धन सब व्यर्थ हैं, और अपने हित के बिना कोई किसी से सच्चा हित नहीं करता। दूसरी ओर प्रेम विशुद्ध होता ह...
मित्र कलत्र सुबन्धु सुतइ नमें सहज सनेह
यद्यपि संसार में मित्र, पत्नी, भ्राता और पुत्र आदि संबंधों में स्वाभाविक अनुराग दृष्टिगोचर होता है, तथापि इसे 'विशुद्ध प्रेम' की संज्ञा नहीं दी जा सकत...
जग में सबते अधिक अति
संसार में लोगों को सबसे अधिक ममता अपने शरीर से होती है; परन्तु यदि अपने तन से भी अधिक ममता प्रेमास्पद में हो, तो वही सच्चा प्रेम है।
इक अंगी बिनु कारणहि
जो बिना कारण ही एकांगी (पक्षपाती) हो जाए, जो सदा एकरस बना रहे, और जो अपने प्रियतम को ही अपना सर्वस्व मानता हो—उसी का प्रेम शुद्ध प्रेम कहलाता है।
जो जातें जामैं बहुरि जा हित कहियत वेष
जिसमें जाने के बाद वापस लौटने की संभावना नहीं रहती, और जिसके कारण यह मानव-वेष प्राप्त हुआ है—वह सब प्रेम ही प्रेम है; इसके अतिरिक्त संसार असार है।
लोक वेद मरजाद सब
संसार का ज्ञान, बुद्धि, मर्यादा, लोक-लज्जा, क्रिया-कर्म तथा पारस्परिक सन्देह आदि सभी भौतिक कल्मषों को प्रेम बहा देता है, और प्रेम स्नेह के समस्त बंधन...
जेहि पाए बैकुंठ अरु
जिसे प्राप्त करने के बाद वैकुण्ठ और हरि को भी पाने की इच्छा नहीं रहती, वही अलौकिक, शुद्ध, शुभ और सरस वस्तु प्रेम है।
पोथी पढ़ि पंडित हुआ कै मौलवी कुरान
पोथी पढ़ पढ़ कर कोई पंडित हुआ हो या कोई मौलवी कुरान पढ़ कर ज्ञान बांटे परंतु बिना प्रेम रंग में डूबे सब व्यर्थ है, कहीं कोई गति नहीं।
Pai Mithas Ya Maar Ke Rom-Rom Bharpoor
Pai Mithas Ya Maar Ke, Rom-Rom Bharpoor.Marat Jiyai Jhukatau Thirai, Banai Su Chaknachoor.- Shri Raskhan, Prem Vatika (30)The wound of love is deep, y...
Gyan Karam Ru Upasana Sab Ahamiti Ko Mool
Gyan Karam Ru Upasana, Sab Ahamiti Ko Mool.Dridh Nischay Nahin Hot Bin, Kiye Prem Anukool.- Shri Raskhan, Prem Vatika (12)Knowledge, actions, and even...
Do Man Ik Hote Sunyo
Do Man Ik Hote Sunyo, Pai Vah Prem Na Aahi.Hoi Jabai Dvai Tanahu Ik, Soi Prem Kahahi.- Shri Raskhan, Prem Vatika (34)True love is not merely the union...
Prem Phans Mein Fansi Mare Soi Jiye Sadai
Prem Phans Mein Fansi Mare, Soi Jiye Sadahi.Prem-Maram Jane Bina, Mari Kou Jivat Naahin.- Shri Raskhan, Prem Vatika (26)One who dies, bound in the tie...
Jehi Binu Jane Kachhhi Nahin
Jehi Binu Jaane Kachhuhi Nahin, Jaatyau Jaat Bisesh.Soi Prem Jehi Jaanikai, Rahi Na Jaat Kachhu Sesh.- Shri Raskhan, Prem Vatika (18)Without which not...
Dare Sada Chahe Na Kachu Sahe Sabe Ho Hoy
Dare Sada Chahe Na Kacchu, Sahe Sabe Ho Hoy.Rahe Ek Ras Chaahi Ke, Prem Bakhano Soy.- Shri Raskhan, Prem Vatika (22)Raskhan says — That love alone is ...
Yahi Te Sab Mukti Te Lahi Badai Prem
Yahi Ten Sab Mukti Ten, Lahi Badai Prem.Prem Bhaye Nasi Jahin Sab, Bandhen Jagat Ke Nem.- Shri Raskhan, Prem Vatika (35)Love has the power to unite tw...
Swarathmula Asudh Tyon Sudh Swabhav Anukul
Swarathmool Asuddh Tyon, Suddh Swabhaav-Anukool.Naradadi Prastaar Kari, Kiyau Jaahi Ko Tool.- Shri Raskhan, Prem Vatika (41)That love which is mixed w...