श्री रसखान
जीवन चरित
श्री श्री रसखान वाणी संग्रह
या छवि पै रसखान अब
रसखान कहते हैं कि उस सुंदर मनोहर रूप पर करोड़ों कामदेव भी न्योछावर हैं, जिसकी उपमा और तुलना कवि लोग कहीं भी ढूँढ़ नहीं पाते। श्री राधा-कृष्ण के रूप-सौ...
कोटिक ही कलधौत के धाम
“ कोटिक ही कलधौत के धाम, करील की कुंजन उपर वांरो । ” - श्री रसखान सोने से बने अनगिनत महलों को ब्रज की कुंजो पर त्यागा जा सकता है।
धूरि भरे अति शोभित स्यामजु
श्यामसुंदर का धूल धूसरित श्यामल शरीर कितना मनोहर लगता है ! उस पर भी उनकी चोटी की छटा और भी अच्छी लग रही है। रसखान कहते हैं कि उनकी इस छवि पर मैं करोड़...
शंकर से सुर जाहि भजै
शंकर जैसे महादेव दिन-रात जिनका स्मरण और भजन-कीर्तन करते हैं; चतुरानन ब्रह्मा जिनका ध्यान कर अपने धर्म को पुष्ट करते हैं। [1] यदि वे थोड़ा सा भी हृदय...
देख्यो रूप अपार
जब से उस अपार रूप वाले मनमोहन श्याम सुंदर को देख लिया है, वह ब्रजराज कुमार श्री कृष्ण हृदय, प्राण और नेत्रों में बस गए हैं अर्थात् वही सब कुछ हो गए है...
खंजन नैन फंसे छवि पिंजर
एक गोपी कहती है — खंजन पक्षी की भांति श्रीकृष्ण के विशाल नेत्रों ने मुझे पूरी तरह से अपने वश में कर लिया है, अब उनके बिना मुझे चैन नहीं। सखी! उस मोहिन...
सुन्दर श्याम सिरोमनि मोहन
मोहकता के शिरोमणि, श्यामसुन्दर अपनी छवि से मन का हरण कर लेते हैं। उनकी बाँकी (तिरछी) चितवन, नयनों की नोक सबको सहजता से अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। [1]...
मोहनी मोहन सों रसखानि
मोहनी श्री राधा एवं मोहन श्री कृष्ण की अचानक वन में भेंट हो गई। जेठ की धधकती धूप भी सुख प्रदान करने लगी, और दोनों के रोम-रोम में आनंद की तरंगें दौड़ने...
सुनियै सबकी कहिये न कछु
ऊपर-ऊपर से चाहे सबकी सुनो, परंतु मुख से कुछ न कहो। इस रीति से जीने पर तुम सांसारिक राग-द्वेष से बचे रहोगे। [1] जो भी व्रत धारण करो, उसे निष्ठापूर्वक ...
मंजु मनोहर मूरी लखै
जब से उस अनुपम और मनोहर श्रीकृष्ण के दर्शन हुए, उसी क्षण से ब्रज की गोपियों ने मान और प्रतिष्ठा का बंधन तोड़ दिया। उनके अद्भुत और अलौकिक रूप के जाल मे...
सिर काटो छेदो हियो
चाहे मेरा सिर काट दिया जाए, मेरे हृदय को छेद दिया जाए या मेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएँ; परन्तु यदि इसके बदले मेरे श्यामसुंदर की प्रसन्नता प्...
जो रसना रस ना विलसै
यदि वाणी को प्रेमरस का स्वाद न मिले, तो उसे प्रभु के नाम-संकीर्तन में लगा देना चाहिए। [1] यदि हाथ शुभ कर्म की खोज में हों, तो उन्हें ब्रज के कुंज-कुट...
श्री नँदनंदजू आनंद कंद जू
श्री नंदनंदन जी, जो आनंद के स्रोत हैं और व्रजचंद्र के रूप में विहार करने वाले हैं, उनकी जय-जयकार हो। [1] वे नव-मेघ जैसे श्याम, अत्यंत सुंदर और मन को...
भूत छिये मदिरा पिये
चाहे कोई प्रेत-बाधा से ग्रस्त हो या मदिरा के नशे में चूर हो, समय बीतने पर उसकी सुध-बुध वापस आ जाती है। परंतु जिसने एक बार श्री राधा कृष्ण के 'प्रेम-सु...
मेरो सुभाव चितैबे को माई री
हे सखी! मेरे स्वभाव को देखकर ही गोपाल ने अपनी बाँसुरी बजाई। [1] उस दिन से मैं मानो ठगी-सी रह गई हूँ। अब तो मुझे देखकर लोग कहते हैं, “यह कोई बावरी है ...
अति सूछम कोमल अतिहि
दिव्य प्रेम अत्यन्त सूक्ष्म और अत्यन्त कोमल है। यह बहुत पतला (सूक्ष्म) है और बहुत दूर भी है। यह सबसे कठिन भी है। इसे पूर्ण रूप से केवल भाव के द्वारा ह...
मोरपखा मुरली बनमाल
जब से मैंने मोरपंख, मुरली और वनमाला से सुसज्जित श्यामसुंदर को देखा, तभी से हृदय में प्रेम की लहरें उमड़ने लगीं। उस दिन से न जाने कितने ताने और कटु वचन...
प्रीतम नन्द किशोर जा दिन ते नैननि लग्यौ
हे मेरे प्रियतम नन्दनन्दन! जिस दिन से मेरी आँखें आपसे लगी हैं, आप मेरे मन को भाने वाले और चित्त को चुराने वाले बन गए हैं। अब स्थिति यह है कि आपके दर्श...
मो मन मानिक लै गयो चितै चोर नंदनंद
नन्द के लाडले (श्री कृष्ण) ने अपनी चितवन मात्र से मेरे मन रूपी अनमोल माणिक्य को चुरा लिया है। अब मैं बिना मन के क्या करूँ? मैं तो उनके प्रेम के इस विच...
प्रेम पगे जु रँगे रँग साँवरे, माने मनाये न लालची नैना
श्री रसखान कहते हैं साँवरे कृष्ण के प्रेम से रंगी मेरी आंखें उनके रूप के लिए लालची सी बनी हैं। वे कृष्ण की खोज में वहाँ ही जाती हैं जहाँ मोहन है, चाहे...
अंग ही अंग जड़ाऊ जड़े
बांके बिहारी का अंग-अंग स्वर्णाभूषणों से जड़ा हुआ है, सिर पर सोने की जरीदार पगड़ी है। हृदय पर मोतियों की मालाएँ झूल रही हैं और घुँघराले लटों में झूमते...
मोर के चन्दन मौर बन्यौ
हे सखी! नंदनंदन मोरपंख से सुसज्जित होकर दूल्हा बने हैं और दुल्हन हैं वृषभान-सुता श्री राधा। विधाता ने इस अनुपम जोड़ी को सुख का मूल और आनंद का आधार बना...
आनंद अनुभव होत नहिं
इस संसार में जान लो कि बिना प्रेम के वास्तविक आनंद का अनुभव संभव नहीं है। प्रेम के बिना जो सुख प्रतीत होता है, वह या तो केवल क्षणभंगुर 'विषयानंद' (इं...
भटू सुन्दर स्याम सिरोमनि मोहन
एक सखी दूसरी सखी से कहती है- हे सखि! सुंदर व शिरोमणि कृष्ण मन मोहक है तथा नजर पड़ते ही वह मन को अपने वश में कर लेता है। वह अपने तिरछे नयनों से ब्रज-बा...
मैन मनोहर बैन बड़े सखि
सखी! वे बहुत मनोहर वाणी वाले हैं। उन्होंने इशारों में ही हमारा चित्त हरण कर लिया है। घर का कार्य तो छूट गया है। रसखान, अब तो हृदय में ब्रजराज श्रीकृष्...
आज भटू मुरली बट के तट
हे सखी! आज नंदनंदन श्रीकृष्ण यमुना-तट पर वंशीवट के नीचे मधुर मुरली की तान छेड़ते हुए रास रच रहे हैं। [1] श्यामसुंदर ने अपनी चितवन, संकेत और मधुर वाणी...
प्रेम निकेतन श्रीबनहि, आइ गोबर्धन धाम
अपने वृन्दावन-वास की घटना की ओर संकेत करते हुए रसखान कहते हैं कि संसार का त्याग कर मैं प्रेम-धाम वृन्दावन में आकर गोवर्धन नामक स्थान में बस गया, जहाँ ...
प्रेम अगम अनुपम अमित सागर सरिस बखान
रसखान कहते हैं कि प्रेम अगम्य (जिसको जाना न जा सके), अनुपम (जिसकी कोई उपमा न दी जा सके), सागर की भाँति अत्यंत गहरा एवं रसपूर्ण है। जो भी जीव एक बार इस...
बंक बिलोचन हंसनि मुरि
तिरछे नेत्रों से देखकर मुस्कुराते और मधुर वचन बोलते हुए इस प्रकार रसिक और रसराज—अर्थात् श्रीकृष्ण और श्रीराधा—मिले कि उनकी युगल-छवि को देखकर मन आनन्दि...
खंजन मीन सरोजन को
श्री कृष्ण के नेत्र खंजन (पक्षी), मीन, कमल-पुष्प एवं हिरण के नेत्रों की सुंदरता को पराजित करते हैं। [1] वे मुस्कराते हुए कुंज से बाहर आए और उनके अधरो...
हरि के सब आधीन पै, हरी प्रेम-आधीन
यद्यपि समस्त चराचर जगत भगवान श्री हरि के ही अधीन है, परंतु स्वयं श्री हरि प्रेम के अधीन हैं। इसी कारण भगवान ने प्रेम को अपने से भी अधिक बड़ा माना है।
संपति सौं सकुचाई कुबेरहि
यदि आपके पास इतनी अपार संपदा हो कि स्वयं धनाध्यक्ष कुबेर भी देखकर चकित रह जाएँ, और आपका रूप इतना अनुपम हो कि कामदेव भी लज्जा से सिर झुका लें। [1] यद...
रसमय स्वाभाविक, बिना स्वारथ
जो प्रेम स्वभाव से ही रसमय हो, जिसमें किसी प्रकार का स्वार्थ न हो, जो अचल और महान हो, जो सदा एकरस रहते हुए निरंतर बढ़ता जाए—उसी को शुद्ध प्रेम कहा जात...
लाय समाधि रहे ब्रह्मादिक
जिसका ध्यान ब्रह्मा आदि देवता समाधि में करते हैं और योग-सिद्धि प्राप्त करने पर भी जिनका अंत नहीं पा सकते। [1] शेषनाग अपने सौ मुखों से दिन-रात निरंतर ...
ए सजनी लोनो लला लह्यो नंद के गेह
हे प्रिय सजनी, श्यामसुंदर के दर्शन का विशेष लाभ है। जब हम नंद के घर जाते हैं, तो वे हमें मधुर मुस्कान से देखते हैं और हमारी सारी सुध-बुध हर लेते हैं।
परम चतुर पुनि रसिकवर, कैसो हू नर होय
कोई मनुष्य चाहे कितना ही चतुर, ज्ञानी या रसिकवर क्यों न हो; यदि वह श्री कृष्ण-प्रेम से रहित है, तो उसका हृदय नीरस है और उसकी चतुराई, ज्ञान तथा रसिकता ...
अंजन मंजन त्यागौ अली
जब उद्धव ने गोपियों को संदेश दिया कि वे योग को अपनाकर श्रीकृष्ण-वियोग में तड़पना छोड़ दें, तब भी गोपियाँ भक्ति-पथ पर अडिग रहीं। उन्होंने बाहरी आडंबर क...
प्रेम वारूनी छानि कै बरुन भरा जलधीस
प्रेम की महिमा का गान करते हुए रसखान कहते हैं कि प्रेम-मदिरा छानने के कारण वरुण देव जलाधिपति बने, और प्रेमवश विष का पान करने से ही शिव पूजनीय हुए। प्र...
कारज कारन रूप यह
रसखान के अनुसार प्रेम ही सृष्टि का मूल कारण है। जगत की उत्पत्ति और उसकी समस्त क्रियाएँ प्रेम से ही हुई हैं। वही प्रेम कर्ता भी है, कर्म भी है, क्रिया ...
प्रेम-रूप दर्पन अहो रचै अजूबो खेल
प्रेम-रूपी दर्पण में अद्भुत खेल रचा हुआ है, क्योंकि उसमें अपना स्वरूप कुछ-कुछ अनमेल-सा दिखाई देता है।
तोरि मानिनी तें हियो फोरि मोहिनी मान
कृष्ण-भक्ति की ओर अपना रुझान प्रकट करते हुए रसखान कहते हैं कि मान करने वाली नारी से हृदय को तोड़कर (अर्थात् उसके प्रेम-बंधनों को छोड़कर) और इस मोहिनी ...
प्रेम अयनि श्री राधिका, प्रेम-बरन नंदनन्द
श्री राधा प्रेम का प्रधान धाम हैं और श्री कृष्ण प्रेम के जीवंत रूप। दिव्य युगल, राधा-कृष्ण प्रेम-वाटिका में माली और मालिन के समान हैं।
रंग भर्यौ मुसकात लला
प्रेम से भरे रंग में रँगा, मुस्कुराता हुआ वह मोहन सुंदर कुंज से बाहर निकला। [1] मैं भी उसी समय घर से निकली थी, और उसके विशाल नेत्रों की चोट ने मुझे घ...
कमलतंतु सो छीद अरु, कठिन खड़ग की धार
प्रेम मार्ग एक अनिवार्य रूप से विलक्षण है। यह कमल के तंतु (रेशे) से भी अधिक सूक्ष्म और कोमल है, तो दूसरी ओर तलवार की पैनी धार पर चलने के समान अत्यंत क...
ज्ञान ध्यान विद्या मती, मत बिस्वास बिवेक
ज्ञान, ध्यान, विद्या, विविध मतों का विश्वास और विवेक आदि सब बिना प्रेम के धूलि के समान निरर्थक हैं, क्योंकि प्रेम वह तत्त्व है जो ब्रह्म की भाँति इस स...
जातें पनपत बढत अरु
रसिक भक्त कहते हैं कि जिससे प्रेम उत्पन्न होता है, फूलता तथा बढ़ता है और परिपक्व रहता है, वह सब प्रेम ही होता है।
प्रेम हरि को रूप है
प्रेम ही श्री हरि का रूप है और श्री हरि ही प्रेम हैं। एक होकर भी वे दो दिखते हैं जैसे सूरज और उसकी धूप।
कोउ याहि फाँसी कहत, कोउ कहत तरवार
भगवत्प्रेम की विलक्षणता का अनुभव करते हुए रसिक जन इसे भिन्न-भिन्न स्वरूपों में परिभाषित करते हैं। कोई इसे गले की फाँसी मानता है तो कोई पैनी तलवार; कोई...
भले वृथा करि पचि मरौ ज्ञान गरूर बढ़ाय
भले ही समस्त प्रकार के साधन करके मर जाओ, ज्ञान प्राप्त करके गर्व को बढ़ा लो, परंतु बिना प्रेम के सब कुछ व्यर्थ ही है चाहे करोड़ों उपाय कर डालो। अर्थात...
वा रस की कछु माधुरी ऊधो लही सराहि
प्रेम की महत्ता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि प्रेमानंद का कुछ माधुर्य उद्भव ने सराहकर ग्रहण किया था। जो प्रेम रस उद्भव को ब्रज में प्राप्त हुआ ...
मकराकृत कुण्डल गुंज की माल
नंदलाल श्री कृष्ण ने मकराकार कुण्डल और गुंजा की माला धारण की है, और उनके पैरों में सुंदर पायल की शोभा है। [1] मनमोहन श्री कृष्ण बछड़ों को चराने के लि...
पै एतोहूँ रम सुन्यौ
प्रेम की विलक्षणता का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि हमने केवल इतना सुना है कि प्रेम अद्भुत खेल है जिसमें स्वेच्छा से प्राणों की बाज़ी लगाकर दिल से ...
पै मिठास या मार के रोम-रोम भरपूर
प्रेम की चोट गहरी होते हुए भी मधुर होती है। इसकी चोट से मनुष्य का रोम-रोम माधुर्यपूर्ण रस से भरपूर हो जाता है। जो प्रेम में अपना बलिदान देता है वही अम...
कुंज गली में अली निकसी
कुंज की गली में जब मैं (गोपी देह धारी) निकली, वहीं सांवरे श्याम ने अचानक सामने आकर मेरा मार्ग रोक लिया। [1] माई री! उस मुख की मुस्कान ने मेरा मन ऐसा...
सरस नेह लवलीन नव द्वै सुजानि रसखानि
श्री रसखान कहते हैं कि जो रसिक श्री राधा और श्री कृष्ण के सरस एवं नूतन प्रेम में तल्लीन हैं, उन्हीं की कृपा की आशा और विश्वास से मेरे प्राण सदैव पगे ह...
बिमल सरल रसखानि मिलि
शुद्ध और सरल स्वभाव वाली ब्रजांगनायें, जब रस की ख़ान श्री कृष्ण से मिलीं, तो वे भी स्वयं रस की खान बन गईं। श्री रसखान कहते हैं कि ऐसे नवल रसखान श्री क...
एक सु तीरथ डोलत है
कोई मनुष्य तीर्थों की यात्रा करता हुआ घूमता है, कोई हजारों बार पुराणों की कथाएँ सुनता है; अर्थात् पुराणों का पाठ करता है। [1] कोई जप, तप आदि में लगा ...
अकथ कहानी प्रेम की जानत लैली खूब
प्रेम की कहानी अकथनीय है जिसे प्रेमी ही अच्छे से जानता है। प्रेम वह वरदान है जो उस प्रेमी के तन एवं मन को उसके प्रियतम से मिलाकर एक कर देता है।
मन लीनों प्यारे चितै पै छटाँक नहिं देत
हे कृष्ण! तुम मेरे मन को तो ज़बरदस्ती हर लेते हो, पर उसके बदले कटाक्ष तक नहीं देते। तुमने यह कला कहाँ से सीखा है कि केवल लेना ही जानते हो, देना नहीं।
द्रोपदी औ गणिका हू अजामिल
श्रीकृष्ण की करुणा ने द्रौपदी, पतिता गणिका, अजामिल और असंख्य भक्तों को दुःख से उबार दिया। [1] उन्होंनें महर्षि गौतम की पत्नी अहिल्या बाई को तारा, ध्र...
जा दिन ते मुसकानि चुभी चित
एक सखी अन्य सखी से कहती है: हे सखि! जिस दिन से श्रीकृष्ण की मधुर मुस्कान ने मेरे हृदय को घायल किया है, उस दिन से उनकी सुंदर छवि हृदय से निकाले नहीं नि...
नैन दलालिन चौहटें मन माणिक पिय हाथ
एक गोपी कहती है, इन नेत्र-रूपी दलालों ने मेरे हृदय रूपी माणिक (बहुमूल्य रत्न) को बीच बाजार में श्री कृष्ण को बेच दिया और उन्होंनें (श्री कृष्ण ने) मेर...
जोहन नन्दकुमार कौ गई नन्द के गेह
हे सखी! श्री कृष्ण के दर्शन करने के लिए मैं नन्द के घर गई थी। कृष्ण ने मुझे देखकर मुस्कुरा दिया। उनकी मुस्कान से प्रेम का मेघ बरस पड़ा, अर्थात मैं उनक...
ज्ञान करम रु उपासना सब अहमिति को मूल
ज्ञान, कर्म-काण्ड, उपासना आदि यह सब मन में अहंकार उत्पन्न करते हैं। जब तक मनुष्य अपने को पूर्णतः प्रेममार्ग में नहीं समर्पित करता, उसके अनुकूल नहीं ब...
नन्द महर कै बगर तन ऊब मेरे को जाय
कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि नन्द महल के आँगन में अब मेरी बलाय जाय, अर्थात् मैं वहाँ बिल्कुल नहीं जाऊँगी क्योंकि वहाँ व्यर्थ ही मन रूपी चरण में प्र...
गुञ्ज गरें सिर मोरपखा
श्रीकृष्ण ने सुंदर गुंजा-माला और मोर-मुकुट धारण किया है, और उनकी मतवाली, गजराज-सी चाल मेरे मन को मोह लेती है। [1] श्यामसुंदर सम्पूर्ण व्रजभूमि में ब्...
दो मन इक होते सुन्यौ
सिर्फ़ दो मनों का एक हो जाना ही सच्चा प्रेम नहीं कहलाता। जब मन और तन दोनों का पूर्णतः मिलन हो जाए, तभी उसे सर्वोत्तम प्रेम का स्वरूप माना जाता है।
बैन वही उनको गुन गाइ
वही वाणी सार्थक है जो श्रीकृष्ण के गुणों का गान करे, और वही कान सार्थक हैं जो उनकी रस-वाणियों को सुनें। वही हाथ सार्थक हैं जो श्रीकृष्ण के अंगों की से...
जेहि बिनु जाने कछुहि नहिं जात्यौ जात बिसेष
जिसे जाने बिना और किसी का बोध नहीं होता, और जिसे जानने पर स्वयं दिव्य ज्ञान उत्पन्न होता है अर्थात् जिसका बोध हो जाने पर कुछ भी जानने को शेष नहीं रह ज...
याही तें सब मुक्ति तें लही बड़ाई प्रेम
प्रेम में दो शरीरों को एक कर देने की शक्ति होती है, इसी कारण प्रेम का स्थान मुक्ति से भी ऊँचा माना गया है। जहाँ प्रेम प्रकट हो जाता है, वहाँ समस्त निय...
कैंधो रसखान रस कोस
श्री राधा के अद्भुत सौन्दर्य का वर्णन करते हुए रसखान कहते हैं कि विधाता ने संसार को प्यासा जानकर उसकी पूर्ण तृप्ति के लिए तुम्हारे नेत्रों में आनन्द क...
स्वारथमूल असुद्ध त्यों सुद्ध स्वभाव अनुकूल
जो प्रेम स्वार्थ-भावना से युक्त होता है, उसे अशुद्ध प्रेम कहा जाता है और जो निष्काम अथवा सहज भाव से केवल प्रियतम के सुख के लिए किया जाता है, वही शुद्ध...
खेलत फाग लख्यौ पिय प्यारी को
एक सखी अन्य सखी से फागलीला का वर्णन करते हुए कहती है कि हे सखी! मैंने कृष्ण और उनकी प्यारी राधा को फाग (होली) खेलते हुए देखा है। उनके मुखों की सुंदरता...
श्री मुख यों न बखान सके
श्री रसखान कहते हैं—पहले अपने सारे ज्ञान का अहंकार त्याग दो, और फिर प्रेममयी दृष्टि से उन्हें निहारो। [2] उनके सुंदर ललाट पर सिंदूर से सुशोभित लाल रस...
या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारौं
ब्रजेश्वर श्रीकृष्ण के हाथों की लकुटी और कंबल पर तीनों लोकों का राज भी त्याज्य है। आठों सिद्धियाँ और नौं निधियों का सुख भी उस मधुर रस के सामने फीका ...
सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावै
जिन भगवान के गुणों का गान स्वयं शेषनाग, गणेश, शिव, सूर्य और इंद्र अनवरत करते हैं। [1] जिन्हें वेद अनादि, अनंत, अखंड, अछेद्य और अभेद्य बताते हैं। [2]...
डरै सदा चाहे न कछु सहै सबै हो होय
रसखान कहते हैं — जो इस भावना से डरता रहता है कि कहीं उसकी किसी चेष्टा से प्रियतम को कोई कष्ट न हो जाए, जो अपने प्रियतम से कोई भी कामना नहीं रखता, सब प...
कहा करें रसखान को
हे रसखान! चाहे कोई कितना ही कुटिल व्यक्ति हमारी चुगली [निंदा] क्यों न करे, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि हमारी रक्षा करने वाला माखन-चोर श्रीकृष्ण ...
दंपति सुख अरु विषय रस
रसखान कहते हैं कि दम्पति-सुख (पारिवारिक सुख) और विषय-सुख (इन्द्रियों द्वारा अनुभव किए जाने वाले राग-भोग आदि), तथा पूजा-पाठ और ध्यान—ये सब लौकिक हैं। प...
उन्हीं के सनेहन सानी रहै
हे रसखान! मैं उन्हीं के प्रेम में डूबी और उन्हीं के स्नेह में दीवानी हूँ। बस वही हैं, जिनकी मधुर वाणी सुने बिना मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। [1] उन प...
वा मुसकान पै प्रान दियौ
एक गोपी अपनी सखी से कहती है, “हे सखि! श्यामसुंदर की एक मुस्कान पर मैंने अपना प्राण वार दिया और उसकी बंसी की मीठी धुन पर अपना मन अर्पित कर दिया। [1] र...
लाड़िली लाल लसै लखिए अलि
रसखान कहते हैं—उस अनुपम छवि की तुलना में तीनों लोकों की सारी शोभा भी फीकी पड़ती है। वह मोहन, सिर पर मोरपंख सजाए, श्री राधा को साथ लिए, निकुंजों में प्...
अधर लगाय रस प्याय बाँसुरी बजाय
अपने होठों से लगाकर उन्होंने ऐसा मधुर रस पिला दिया, जब अपनी प्रिय बाँसुरी को बजाया। मेरा नाम भी बाँसुरी के सुरों में गूँजाया, हाय! जैसे उन्होंने मुझ प...
प्रेम प्रेम सब कोऊ कहत
सब साधक कहते हैं कि हमें "भगवान से प्रेम है, हम तो भगवान के अनन्य प्रेमी हैं", परन्तु प्रेम क्या है, यह कोई नहीं जानता। जो वास्तविक प्रेम करना जानता ह...
कौन को लाल सलोनो सखी
एक सखी दूसरी से चकित होकर पूछती है – यह किसका लाड़ला है, जिसके अनियारे नेत्र ऐसे मनमोहक और विशाल हैं? [1] उसके वे चंचल नेत्र ऐसे हैं मानो तीक्ष्ण बाण...
फागुन लाग्यौ सखी जब तें
जब से फाल्गुन का आनंदमय महीना आरंभ हुआ है, हे सखी! तब से पूरे ब्रजमंडल में उल्लास और उमंग की लहर दौड़ गई है। [1] ब्रज की कोई नवयुवती अब शेष नहीं रही,...
नैन लख्यो जब कुंजन तैं
हे सखी, जब मेरी आँखों ने कुंज से निकलते हुए उस मनमोहक श्याम को देखा, वे बन-ठन के मटकते हुए निकल रहे थे। [1] कैसा शोभायमान दृश्य था, उनके हृदय पर सुं...
प्रेम फाँस मैं फँसि मरै , सोई जियै सदाहिं
जो प्रभु के प्रेम के बंधन में बँधकर मर जाता है, वही वास्तव में शाश्वत जीवन (अमरत्व) को प्राप्त करता है। इसके विपरीत, प्रेम के इस गूढ़ रहस्य को जाने बि...
राधा माधव सखिन संग
जहाँ रसिक-शिरोमणि श्रीकृष्ण और रसखानी श्रीराधिका सखियों के साथ वृन्दावन के कुंजों में विहार कर रही हैं, उस अपार दृश्य का अवलोकन कर श्री रसखान उस अनुपम...
पूरब पुन्यनि ते चितई जिन ये
पूर्व जन्म के पुण्य से जिन गोपियों ने श्रीकृष्ण के दर्शन किए, उनकी आँखों में अनोखी मुस्कान खिल उठी। कोई कठपुतली-सी स्थिर हो गई, कोई वृक्ष की भाँति जड़...
अलबेली बिलोकनि बोलनि औ अलबेलियै लोल निहारन की
श्री श्याम सुंदर का देखना भी अद्भुत है तथा उनकी वाणी भी अद्भुत है। उनके गालों पर जो हिलते कुंडलों की छाया है, वह भी अत्यंत अद्भुत लगती है। [1] गोपी ...
कबहुं न जा पथ भ्रम-तिमिर रहै सदा सुखचंद
सच्चे प्रेम के मार्ग में भ्रम या संदेह का अंधकार नहीं रहता। प्रेमी सदैव आनंद से भरा रहता है और उसका प्रेम दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है; उसमें कभी कमी...
श्री प्रिया वदन छवि चंद्रमनौ
श्रीकृष्ण के नयन चकोर पक्षी के समान हैं, जो निशि-दिन चन्द्र के समान श्री राधा के मुख-कमल से प्रेमरूपी सुधा-माधुरी का पान करते रहते हैं।
मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन
इस सवैया में श्री रसखान जी ने ब्रज के प्रति अपनी अटूट प्रेम-भावना व्यक्त की है। यदि मैं मनुष्य रूप में जन्म लूँ, तो ग्वालों के बीच गोकुल गाँव में ही व...
बिन गुन जोबन रूप धन
श्री रसखान कहते हैं— ‘गुणों के बिना यौवन, रूप और धन सब व्यर्थ हैं, और अपने हित के बिना कोई किसी से सच्चा हित नहीं करता। दूसरी ओर प्रेम विशुद्ध होता ह...
मित्र कलत्र सुबन्धु सुतइ नमें सहज सनेह
यद्यपि संसार में मित्र, पत्नी, भ्राता और पुत्र आदि संबंधों में स्वाभाविक अनुराग दृष्टिगोचर होता है, तथापि इसे 'विशुद्ध प्रेम' की संज्ञा नहीं दी जा सकत...
पोथी पढ़ि पंडित हुआ
पोथी पढ़-पढ़ कर कोई पंडित बन जाए या कोई मौलवी कुरान पढ़कर ज्ञान बाँटे, परंतु प्रेम-रस में डूबे बिना सब व्यर्थ है; कहीं कोई गति नहीं।
श्याम सघन घन घेरि के रस बरस्यो रसखानि
श्री श्यामसुन्दर रूपी सघन मेघों ने चारों ओर से घेरकर रसमय प्रेम की वर्षा की है। रसखान कहते हैं कि जिसने भी इस दिव्य प्रेम-मदिरा का पान किया, वह उस प्र...
जग में सबते अधिक अति
संसार में लोगों को सबसे अधिक ममता अपने शरीर से होती है; परन्तु यदि अपने तन से भी अधिक ममता प्रेमास्पद में हो, तो वही सच्चा प्रेम है।
इक अंगी बिनु कारणहि
जो बिना कारण ही एकांगी (पक्षपाती) हो जाए, जो सदा एकरस बना रहे, और जो अपने प्रियतम को ही अपना सर्वस्व मानता हो—उसी का प्रेम शुद्ध प्रेम कहलाता है।
जो जातें जामैं बहुरि जा हित कहियत वेष
जिसमें जाने के बाद वापस लौटने की संभावना नहीं रहती, और जिसके कारण यह मानव-वेष प्राप्त हुआ है—वह सब प्रेम ही प्रेम है; इसके अतिरिक्त संसार असार है।
मोहन छबि रसखानि लखि
मनमोहन श्रीकृष्ण के रूप-दर्शन कर लेने के बाद अब ये आँखें अपनी नहीं रहीं; वे उसी प्रकार परवश हो गई हैं, जैसे धनुष से निकला हुआ तीर।
लोक वेद मरजाद सब
संसार का ज्ञान, बुद्धि, मर्यादा, लोक-लज्जा, क्रिया-कर्म तथा पारस्परिक सन्देह आदि सभी भौतिक कल्मषों को प्रेम बहा देता है, और प्रेम स्नेह के समस्त बंधन...
जेहि पाए बैकुंठ अरु
जिसे प्राप्त करने के बाद वैकुण्ठ और हरि को भी पाने की इच्छा नहीं रहती, वही अलौकिक, शुद्ध, शुभ और सरस वस्तु प्रेम है।
पोथी पढ़ि पंडित हुआ कै मौलवी कुरान
पोथी पढ़ पढ़ कर कोई पंडित हुआ हो या कोई मौलवी कुरान पढ़ कर ज्ञान बांटे परंतु बिना प्रेम रंग में डूबे सब व्यर्थ है, कहीं कोई गति नहीं।
एक सु तीरथ डोलत है
कोई मनुष्य तीर्थों की यात्रा करता हुआ घूमता है, कोई हजारों बार पुराणों की कथाएँ सुनता है; अर्थात् पुराणों का पाठ करता है। [1] कोई जप, तप आदि में लगा ...