ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
19 itemsऐसैं काल बितावों निसिदिन
ऐसा मेरे जीवन में कब समय आएगा जब मुझे सांझ भोर लगेगी और भोर सांझ लगेगी अर्थात् मैं नित्य ही प्रिया लाल को लाड़ लड़ाऊंगा और मुझे समय का भी आभास नहीं रह...
रंग भरी राजत अलकलड़ी री
प्रेम-रंग में भरी अलकलड़ी श्री राधा विराज रही हैं। श्री ललिता जू जल की झारी लिए पास में खड़ी हैं और श्री राधा के सुन्दर अंगों को निहार कर उन्मत्त हैं। [...
आवति कुंजन तें गरबहियाँ
दिव्य दम्पति श्री राधा कृष्ण कुंजों से गरबाहीं डाल कर, रस में छके, आलस्य से भर कर डगमगाते हुए चरणों से आ रहे हैं। [1] श्री राधा कृष्ण के नीले और पीले...
भोरहिं उठि अलिरूप विचारूं
सखी भाव की उपासना करने वाले साधक को सुबह उठ कर सखी रूप की भावना करना चाहिए, एवं श्री प्रिया प्रियतम की मानसिक सेवा करते हुए उनकी अद्भुत रूप माधुरी का ...
राजत आजु कुँवरि अति नीकी
कुँवरि श्री राधा आज अति सुन्दर सुशोभित हैं। वे नवीन अवस्था की तरुण किशोरी हैं जो परम चतुर हैं एवं रसिकों के जीवन की आधार हैं। [1] श्री किशोरी जी का व...
लाल की अँखियाँ रूप लुभानी
श्री लालजी [कृष्ण] की अँखियाँ सदा श्री राधा के रूप से मोहित रहती हैं। यूँ तो उनकी अँखियाँ सदा श्री राधा रूप रस को पीती रहती हैं, फिर भी वे तृप्त नहीं ...
रूप में अटके री नैना मेरे
यह नेत्र श्री राधा की रूप सुधा माधुरी में ही सदा अटके रहते हैं।उन्हीं के प्रेम रंग में दिन-रात रंगे हुए बिना मोल के दास बने हुए हैं। [1] श्री राधा ...
आरति करत श्री ललित कुँवरि की
श्री ललिता आदि सखियाँ मनोहारिणी कुँवरि श्री राधा की आरती कर रही हैं, जिनके रूप-सौंदर्य की आभा करोड़ों सूर्य के समान उज्ज्वल है। [1] श्री श्यामा जू ...
प्यारी तेरे बड़े बड़े नैन सलोने
हे प्यारी जू (श्री राधे)! तुम्हारे बड़े-बड़े नयन अति सलोने हैं, जो चंचल, चपल, अरुण, एवं अनियारे हैं, और जिनकी थोड़ी सी चितवनी ही टोना कर देती है। [1] ...
जहँ जहँ चरन धरत प्यारी तूँ हूँ
एक सखी श्री राधा से कहती है - हे प्यारी जू [श्री राधा], जहाँ-जहाँ आप अपने चरणों को रखेंगी, वहाँ-वहाँ मैं अपने नैनों के पाँवड़े बिछाऊँगी। जब-जब आप सघन ...
पायन पायली जगमग जोति
श्री राधा के चरणकमलों में सुसज्जित पायल की ज्योति ऐसी जगमगा रही है मानो नवीन नौ रत्नों के दीपक अपनी दिव्य आभा बिखेर रहे हों जो बड़े, कंचन मोतियों में ...
निरखि निरखि अलि रूप लुभानी
जिस प्रकार भौंरे कमल पर मँडराते हैं, उसी प्रकार सहचरी के नेत्र श्री राधा की अलौकिक रूप-माधुरी का सतत पान करते रहते हैं। उसका रसपान करते हुए भी वे तृप्...
बड़े बड़े नयन अरुण रत्नारे
श्रीराधा के बड़े-बड़े नेत्र अरुण रत्नों जैसे लालिमायुक्त हैं। वे रस में ऐसे छके हुए है कि उनींदे-से प्रतीत होते हैं, मानो नींद उनकी पलकों के चारों ओर ...
लटकत आावत बाहाँ जोरी
श्री राधा-कृष्ण बाँहों में बाँहें डालकर प्रेम से लहराती हुई चाल में आ रहे हैं। दोनों सुंदर प्रेमी (राधा और कृष्ण) खिलखिलाते हुए, एक-दूसरे का हाथ थामे,...
जब लगि देखौं तुव मुख सुन्दरि
श्री कृष्ण कहते हैं - हे सुंदरी श्री राधे, जब तक मैं आपके मुखचन्द्र को निहारता हूँ तभी तक तन में प्राण रहते हैं। [1] आपके मुख दर्शन में अलकें एवं प...
गहैं चरन कल ललन लुभावैं
श्री राधा के चरण कमलों के स्पर्श का सुख प्राप्त करने के लिए श्रीकृष्ण सदा व्याकुल रहते हैं। श्री राधा के चरण कमल अरुणिम आभा से युक्त हैं और मेहँदी के...
ए दोउ राजत रंग भरे री
युगल जोड़ी, गौर-वर्ण श्री राधा एवं श्याम-वर्ण श्रीकृष्ण प्रेम के दिव्य रंगों में सराबोर होकर, एक-दूसरे का आलिंगन कर, एक वृक्ष की डाल को थामे खड़े हैं।...
गुंजन मधुपन सुनत अलींरी
प्रभात बेला में जैसे ही सखियों के कानों में भौंरों की मधुर गुंजार पड़ी, वे आनंद-विभोर होकर महल की ओर बढ़ चलीं। उनकी चाल ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो प्रे...
रुनकि-झुनकि आवति कुंजनि तैं
नवल किशोरी (श्री राधा) कुंजों से अपने पायलों की रुनझुन ध्वनि करती हुई आ रही हैं और धीरे-धीरे अपने पग धर रही हैं। [1] सघन गलियों में चलते हुए प्रियतम ...