श्री अलबेली अलि
जीवन चरित
श्री श्री अलबेली अलि वाणी संग्रह
लीनों बृन्दावन बसि लाह्यो
हे मन, वृंदावन में वास कर निशिदिन महल टहल [सेवा] का अनन्य नेम [व्रत] हृदय से पालन कर। [1] प्रेम विहार का यह रस अद्भुत एवं विलक्षण है, अत: रसिकों स...
गौर वरन श्री राधिका
श्री राधिका गौरवर्ण की हैं और श्रीकृष्ण श्यामवर्ण के। श्री अलबेली सखी कहती हैं कि उनके हृदय में ब्रज के दो वल्लभ-चन्द्र [श्री राधा-कृष्ण] नित्य ही वा...
देखु सखी, इनकी नव नेह
हे सखी, श्री राधा कृष्ण की नव नेह को निहार, ऐसा लगता है मानो घने बादल उमड़ उमड़ कर रस की वर्षा बरसा रहे हैं। [1] नित्य विहार में प्रिया प्रियतम खान...
कवास ! कवास ! हो स्वामिनी, महाबहु सुख रासि
हे स्वामिनी! हे परम सुख की राशि! आप मेरी रक्षा करें, रक्षा करें। आप शरणागत का पालन करने वाली हैं, अतः मेरे मन की जो अभिलाषा है, उसे पूर्ण कीजिए।
कामी के मन काम, दाम ज्यौं रंकहि भावै
जिस प्रकार घोर कामी व्यक्ति को काम प्रिय होता है, एवं रंक को धन प्रिय है, हे नवल-किशोरी राधिका! कृपा कर ऐसी प्रीति मुझे भी आपके चरण-कमलों में प्रदान क...
जो चाहौ सो करौ कुँवरि
हे श्री राधे! आप ही तीनों प्रकार के तापों और अज्ञान रूपी अंधकार का हरण करने वाली हैं॥ श्री अलबेली अलि आपके चरण-कमलों की शरण में आ चुकी है; अब आपको जैस...
नमो वनवृन्द अरविंद रससिंध कौ
श्री वृन्दावन को प्रणाम है, जो रस-सागर का पूर्ण खिला हुआ कमल है, जहाँ से आनंद की अमृत-धारा निरंतर प्रवाहित होती रहती है। वहाँ नीलमणि श्रीकृष्ण का झिलम...
राधा नाम नवल नामावली सो निस दिन उर धारी
श्री अलबेली अलि कहती हैं कि श्री राधा की नवल नामावली को निशिदिन हृदय में धारण कर, एक श्री राधा महारानी के भरोसे, वह दोनों पाऊँ पसार कर, निश्चिंत होकर...
अनुराग सौं भरी अस रूप गुन खरी अति
जहां अनुरागपूर्वक रूप और गुण हर क्षण खड़े (विद्यमान) रहते हैं, ऐसी वृंदावन की माधुरी को कौन जान सकता है? [1] जिस वृंदावन की रज में रतिपति अर्थात् काम...
श्री राधा विवि चरण वर करत उचारि-उचारि
श्री राधा के चरणों को हृदय में धारण कर “हा स्वामिनी, कहाँ हो? कहाँ हो?” ऐसा उच्चारण कर पुनः लम्बी लम्बी साँसे भरता हूँ। [1] लम्बी साँसों को धारण कर ब...
लाभ-हानि जानो न कछु, कौन मान-अभिमान
लाभ-हानि, मान-अपमान एवं अभिमान का त्याग कर नित्य ही श्री राधा के वदन कमल के मकरंद रस का नेत्रों से पान करो। [1] जिनके अंग-अंग में प्रेम सुधा रस भरा ह...
बृन्दावन बसि यह सुख लीजै
बृंदावन का वास करके यह सुख प्राप्त करिए। नित्य ही श्री राधा कृष्ण की महल टहल [सेवा] करिए, एवं एक भी क्षण व्यर्थ न जाने दीजिए। [1] परम प्रेम की राशि अ...
अहो कुँवरि बर लाड़िली करुणा सिंधु अपार
हे अपार करुणा की सिंधु लाड़िली [श्री राधा], मैं पुकार पुकार कर कहता हूँ कि “तुम बिन मेरा कोई नहीं है”। [1] हे प्यारी! कृपया मेरी विनती सुनिए। तुम ती...
ऐसैं काल बितावों निसिदिन
ऐसा मेरे जीवन में कब समय आएगा जब मुझे सांझ भोर लगेगी और भोर सांझ लगेगी अर्थात् मैं नित्य ही प्रिया लाल को लाड़ लड़ाऊंगा और मुझे समय का भी आभास नहीं रह...
अंग पर चीथरा हाथ में षीपरा
अंगों पर फटे-पुराने वस्त्र, हाथों में खीपरा लिए, मैं एकमात्र आशा लेकर ब्रज के वन-वन में भ्रमण करूँ। [1] जो भी सहजता से (बिना प्रयास के) फल, फूल और पत...
रंग भरी राजत अलकलड़ी री
प्रेम-रंग में भरी अलकलड़ी श्री राधा विराज रही हैं। श्री ललिता जू जल की झारी लिए पास में खड़ी हैं और श्री राधा के सुन्दर अंगों को निहार कर उन्मत्त हैं। [...
आवति कुंजन तें गरबहियाँ
दिव्य दम्पति श्री राधा कृष्ण कुंजों से गरबाहीं डाल कर, रस में छके, आलस्य से भर कर डगमगाते हुए चरणों से आ रहे हैं। [1] श्री राधा कृष्ण के नीले और पीले...
भोरहिं उठि अलिरूप विचारूं
सखी भाव की उपासना करने वाले साधक को सुबह उठ कर सखी रूप की भावना करना चाहिए, एवं श्री प्रिया प्रियतम की मानसिक सेवा करते हुए उनकी अद्भुत रूप माधुरी का ...
राजत आजु कुँवरि अति नीकी
कुँवरि श्री राधा आज अति सुन्दर सुशोभित हैं। वे नवीन अवस्था की तरुण किशोरी हैं जो परम चतुर हैं एवं रसिकों के जीवन की आधार हैं। [1] श्री किशोरी जी का व...
प्रेम अनुराग सों चित्त उन्मत्त हवै
प्रेम अनुराग से उन्मत्त चित्त होकर, मैं वृंदावन के ही सघन कुंजों में श्री राधिका के रस रँग में भींज कर घूमता रहूँ। [1] केवल श्री राधा नाम का उच्चारण ...
लाल की अँखियाँ रूप लुभानी
श्री लालजी [कृष्ण] की अँखियाँ सदा श्री राधा के रूप से मोहित रहती हैं। यूँ तो उनकी अँखियाँ सदा श्री राधा रूप रस को पीती रहती हैं, फिर भी वे तृप्त नहीं ...
आरति करत श्री ललित कुँवरि की
श्री ललिता आदि सखियाँ मनोहारिणी कुँवरि श्री राधा की आरती कर रही हैं, जिनके रूप-सौंदर्य की आभा करोड़ों सूर्य के समान उज्ज्वल है। [1] श्री श्यामा जू ...
रूप में अटके री नैना मेरे
यह नेत्र श्री राधा की रूप सुधा माधुरी में ही सदा अटके रहते हैं।उन्हीं के प्रेम रंग में दिन-रात रंगे हुए बिना मोल के दास बने हुए हैं। [1] श्री राधा ...
रूप सुधा भोजन जिनको री
जिन प्रेमी रसिकों के लिए रूप-सुधा का पान ही आहार है, वे अपने प्रियतम के दर्शन के अतिरिक्त किसी और को क्यों निहारेंगे? [1] जैसे चातक स्वाति की बूँद के...
जहँ जहँ चरन धरत प्यारी तूँ हूँ
एक सखी श्री राधा से कहती है - हे प्यारी जू [श्री राधा], जहाँ-जहाँ आप अपने चरणों को रखेंगी, वहाँ-वहाँ मैं अपने नैनों के पाँवड़े बिछाऊँगी। जब-जब आप सघन ...
प्यारी तेरे बड़े बड़े नैन सलोने
हे प्यारी जू (श्री राधे)! तुम्हारे बड़े-बड़े नयन अति सलोने हैं, जो चंचल, चपल, अरुण, एवं अनियारे हैं, और जिनकी थोड़ी सी चितवनी ही टोना कर देती है। [1] ...
पायन पायली जगमग जोति
श्री राधा के चरणकमलों में सुसज्जित पायल की ज्योति ऐसी जगमगा रही है मानो नवीन नौ रत्नों के दीपक अपनी दिव्य आभा बिखेर रहे हों जो बड़े, कंचन मोतियों में ...
निरखि निरखि अलि रूप लुभानी
जिस प्रकार भौंरे कमल पर मँडराते हैं, उसी प्रकार सहचरी के नेत्र श्री राधा की अलौकिक रूप-माधुरी का सतत पान करते रहते हैं। उसका रसपान करते हुए भी वे तृप्...
लटकत आावत बाहाँ जोरी
श्री राधा-कृष्ण बाँहों में बाँहें डालकर प्रेम से लहराती हुई चाल में आ रहे हैं। दोनों सुंदर प्रेमी (राधा और कृष्ण) खिलखिलाते हुए, एक-दूसरे का हाथ थामे,...
बड़े बड़े नयन अरुण रत्नारे
श्रीराधा के बड़े-बड़े नेत्र अरुण रत्नों जैसे लालिमायुक्त हैं। वे रस में ऐसे छके हुए है कि उनींदे-से प्रतीत होते हैं, मानो नींद उनकी पलकों के चारों ओर ...
बलि बलि श्रीराधा नाम प्रेम रस रंग भर्यो
श्री राधा नाम पर मैं बलिहारी जाता हूँ जो प्रेम रस के रंग से भरा हुआ है जिसे अनन्य रसिक श्री श्यामसुन्दर (एवं रसिक जन) अपना सर्वस्व मान कर अपने ह्रदय म...
चकित नैन कंपत हियौ महा विरह की पीर
श्री अलबेली अलि, श्री राधा के दर्शन की व्याकुलता में अपने विरह की दशा का वर्णन करती हैं— “नयन अचंभित हैं, हृदय और शरीर में निरंतर कंपन हो रहा है। अश्र...
भरै द्रग वारि उच्चार वन प्रेम सौं
हे श्री राधारानी! श्रीवृन्दावन में निवास करते हुए वह मंगलमय क्षण कब आएगा, जब मेरे नेत्र आपके प्रेम में अविरल अश्रुधारा बहाएँगे और मेरा मुख प्रेमपूर्वक...
ब्रजनागरि चूड़ामनि सुख सागर रस रास
हे ब्रज नागरी, परम चूड़ामणि रानी, सुख सागर एवं रस रास को बरसाने वाली स्वामिनी, श्री राधा ! ऐसी कृपा करो कि मेरे हंस रूपी मन को तुम अपने चरण रूपी पिंजर...
परमप्रेम गुन रूप अमित कवि को कहै
हे श्री राधे! तुम्हारे अगाध प्रेम, गुणों और सौंदर्य (रूप) का वर्णन कौन कवि कर सकता है? एक दीन मछली पानी में रहती है, भला वो अगाध सागर का अंत कैसे पा स...
मो सौ नहिं कोऊ पातकी, तुमसौ अधम उधारि
हे रसिक सकुँवारि (हे सुकोमल श्री राधा)! मेरे समान कोई दूसरा पापी नहीं है और आपके समान अधमों का उद्धार करने वाली कोई दूसरी नहीं है। अतः, आप जैसी (कृपाल...
रूप गुन गंस के हंस अरु मोर
वृन्दावन के रूप और गुणों के वशीभूत होकर हंस, मोर और कोयल सदैव प्रेम के रंग में सराबोर रहते हैं। [1] कोयल, मैना, तोते और अनेक रंगों के पक्षी दिन-रात स...
मो सौ नहिं कोऊ पातकी तुमसौ अधम उधारि
मेरे समान कोई पातकी नहीं और आपके समान कोई अधम उधार नहीं। हे रसिक क़ुंवरि श्री राधिके, कृपया आप वही कीजिए जिसके लिए आप ‘अधम उधारन’ जानी जाती हैं [अर्था...
गहैं चरन कल ललन लुभावैं
श्री राधा के चरण कमलों के स्पर्श का सुख प्राप्त करने के लिए श्रीकृष्ण सदा व्याकुल रहते हैं। श्री राधा के चरण कमल अरुणिम आभा से युक्त हैं और मेहँदी के...
जब लगि देखौं तुव मुख सुन्दरि
श्री कृष्ण कहते हैं - हे सुंदरी श्री राधे, जब तक मैं आपके मुखचन्द्र को निहारता हूँ तभी तक तन में प्राण रहते हैं। [1] आपके मुख दर्शन में अलकें एवं प...
काम क्रोध दंभनि भरयौ, बंध्यौ विषय की डोर
हे श्री राधा महारानी जू! मेरा मन काम, क्रोध, दंभ और विषयासक्ति से भरा हुआ है, और मैं विषयों की डोर में बँधा पड़ा हूँ। ऐसे मुझ अधम और पापी के लिए आप जै...
ए दोउ राजत रंग भरे री
युगल जोड़ी, गौर-वर्ण श्री राधा एवं श्याम-वर्ण श्रीकृष्ण प्रेम के दिव्य रंगों में सराबोर होकर, एक-दूसरे का आलिंगन कर, एक वृक्ष की डाल को थामे खड़े हैं।...
गुंजन मधुपन सुनत अलींरी
प्रभात बेला में जैसे ही सखियों के कानों में भौंरों की मधुर गुंजार पड़ी, वे आनंद-विभोर होकर महल की ओर बढ़ चलीं। उनकी चाल ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो प्रे...
भजन रस सार कौ सार रस विपिन कौ
भजन का सार तत्व रस है और रस का सार तत्व वृंदावन है। बिना इस वृंदावन राज (वनों के राजा) के स्पर्श के किसको अगाध रस की प्राप्ति हो सकती है ? [1] यह वृं...
अहो रसिक सुकुमारी करौ विनती कर जोरि
हे रसिक सुकुमारी लाड़ली श्री राधिके! मैं दोनों हाथों को जोड़कर यही विनती करती हूँ कि मेरा मन दिन-रात, हर क्षण तुम्हारे प्रेम की डोर से बँधा रहे।
रुनकि-झुनकि आवति कुंजनि तैं
नवल किशोरी (श्री राधा) कुंजों से अपने पायलों की रुनझुन ध्वनि करती हुई आ रही हैं और धीरे-धीरे अपने पग धर रही हैं। [1] सघन गलियों में चलते हुए प्रियतम ...