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सूर सागर

ग्रन्थ के पद एवं श्लोक

72 items
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राधे तेरौ बदन बिराजत नीकौ

हे श्री राधे, आपका बदन पूरी तरह से शोभित है। जब तुम इधर-उधर तिरछे देखती हो तो चंद्रमा फीका हो जाता है। [1] बौहें रूपी धनुष नेन रूपी बाणों को साधे हुए ...

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भवसागर तैं बूड़त राखै

भवसागर में डूबने वालों को गुरु ज्ञान रूपी दीपक प्रदान करते हैं। सूरदास कहते हैं कि वास्तविक गुरु इतने समर्थ होते हैं कि वे क्षण भर में ही जीव का पूर्ण...

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ऊधौ, कर्मन की गति न्यारी

गोपियाँ उद्धव से कहती हैं: हे ऊधो कर्मों की गति न्यारी है। धरती पर जितनी भी नदियाँ हैं वे सब की सब अपना मीठा जल सागर में डाल रही हैं लेकिन वह फिर भी स...

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जब ते प्रीति श्याम से कीन्ही

जब ते प्रीति श्याम से कीन्ही, ता दिन तैं मेरें इन नैननि, नैकुहुँ नींद न लीन्ही। - श्री सूरदास, सूर सागर जब से मैंने श्याम सुन्दर से प्रीति की है, उस ...

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हों इन मोरन की बलिहारी

श्री सूरदास कहते हैं “मैं इन मोरों पर बलिहार जाता हूँ जिनके पंख गिरिधर श्री कृष्ण के मुकुट पर टिके रहते हैं। [1] मैं इस बांस के वंश पर बलिहार जाता हू...

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नवल किशोर नवल नागरियाँ

नवल किशोर श्री कृष्ण ने श्री राधा के ऊपर अपनी भुजा रखी है और नवल नागरी श्री राधा ने श्री कृष्ण के ऊपर अपनी भुजा रखी है एवं दिव्य युगल ने एक दूसरे को ...

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ठाड़े मनमोहन सुन्दर यमुना

श्याम सुंदर यमुना किनारे विराज रहे हैं। जब से वह मेरी दृष्टि में आए हैं, तब से एक क्षण को भी मुझे धीरज नहीं मिल रहा है एवं उनसे मिलने को व्याकुलता बढ...

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कहि राधा किन हार चोरायो

चतुर सखियाँ श्री राधा से पूछती हैं: हे राधा, आपका मोतियों का हार किसने चुराया है? मैं नाम से सभी साखियों को जानती हूं, सुनो: - श्यामा, कामा, चतुरा, न...

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हरिजन संग छिनक जो होई

यदि एक क्षण को भी हरिजन [संत] का दर्शन हो जाए, तो वह अनमोल है जिससे कोटि स्वर्ग सुख, कोटि मुक्ति सुख इत्यादि की भी तुलना असम्भव है। [1] ऐसा मानना च...

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पिया बिन चन्द्र लग्यो दुःख दैन

प्रियतम के बिना यह चंद्रमा भी दुख दे रहा है। मैं तारे गिन गिन कर हार चुकी हूँ, मुझे एक क्षण को भी चैन नहीं मिल रहा है। [1] कहाँ गयी, वो प्यारी रातें ...

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प्यारी तोहि गिरधर लाल

हे श्री राधे! आपके प्रियतम, श्री गिरिधर लाल जी आपको बुला रहे हैं। दिन और रात वे केवल "राधे राधे" रटते हैं और कुछ भी उन्हें नहीं भा रहा है। [1] प्रेम...

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वृन्दावन एक पलक जो रहिये

जो एक पल के लिए भी श्री वृन्दावन का वास करता है और मुख से कृष्ण नाम का उच्चारण करता है, उसके जन्म-जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं। [1] श्री सूरदास कहते ...

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राधा मोहन करत वियारू

दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण एक साथ भोजन कर रहे हैं। ब्रज की सुंदर युवतियां एक ही थाली में उनको खाना परोस रही हैं। उन्होंने एक जैसे कपड़े पहने हैं और उन...

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मुरली कौन तप तें कियौ

हे मुरली, तूमने कौन-सी तपस्या की है जिससे तुम सदैव गिरिधारी के अधरामृत पर विराजमान हो उसके दिव्य रस का पान करती हो। [1] नंद नंदन ने तुम्हारे लिए अपना...

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दीप मालिका को दिन आयौ

आज दीपावली का त्यौहार है। यशोदा नंदा बाबा से कहती हैं कि यह पर्व उनके मन को बहुत प्रिय है। [1] समस्त गोपियाँ सुंदर वस्त्र धारण कर, अपने घरों से चल कर...

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नाथ मोहिं अब की बेर उबारो

हे नाथ, मुझे अबकी बार उबार लीजिए।मैं कर्महीन एवं जन्म से अंधा हूँ, मुझसे अधिक नकारा कौन हो सकता है? [1] हे नाथ, आप तीनों लोकों के पालनकर्ता हो और मै...

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स्याम तन स्याम मन स्याम है हमारो धन

गोपियाँ उद्धव से कहती हैं: श्याम ही हमारा तन है, श्याम ही हमारा मन है, श्याम ही हमारा धन है, आठों याम हमें श्याम से ही केवल काम है। [1] श्याम ही हमार...

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सदा एक रस अखंडित, आदि अनादि अनूप

दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण का नित्य-विहार सदा एकरस और अखंड है—जिसका न आदि है, न अंत। श्री युगल स्वरूप (श्री राधा-कृष्ण) इस रस में मग्न होकर ऐसा विहार ...

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रसना एक नहीं शत कोटिक, शोभा अमित अपारी

हे श्री राधे, मेरी तो एक ही जिह्वा है न कि शत-कोटि, मैं किस प्रकार तुम्हारी अमित एवं अथाह शोभा का उससे वर्णन करूँ। कृपा कर मुझे कृष्ण-भक्ति दीजिए, मैं...

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सदा सँधाती अपनौ जिय कौ जीवन-प्रान

हे मन! जो भगवान (श्री हरि) सदा तुम्हारे साथ रहने वाला है, सदा तुम्हारी रक्षा करने वाला है एवं प्राणों का भी प्राण है, उस प्रभु को तूने अनायास ही, बातो...

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दीपक पीर न जानई

एक दीपक को पतंग की पीड़ा का अनुभव नहीं है, परंतु पतंगा दीपक के दीये की लौ से प्रेम करके प्रेम में जलकर भस्म हो जाता है। उस पतंगे का शरीर तो ज्वाला में...

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देखो करनी कमल की

कमल का निष्काम प्रेम तो देखो कि उसने जल से प्रेम किया था तो प्राण दे दिए, पर प्रेम को नहीं छोड़ा। यहाँ तक कि पानी के साथ कमल भी सूख गया।

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ब्रज में हरि होरी मचाई

ब्रज में हरि होरी मचाई। इतते आई सुघर राधिका, उततें कुँअर कन्हाई। [1] हिलि-मिलि फाग परस्पर खेलैं, सोभा बरनी न जाई। [2] बाजत ढोल मृदंग झाँझ ढप, बीना अरु...

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खंजन नैन सुरंग रसमाते

श्री कृष्ण के कमल-नयन खंजन पक्षी की भांति हैं जो श्री राधा की रूप-माधुरी के रस में मत्त है, जो अतिशय सुंदर, निर्मल एवं चंचल हैं, एक क्षण के लिए भी पलक...

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जो पै जिय लज्जा नहीं कहा कहौं सौ बार

सूरदास जी कहते हैं कि हे गँवार और दुष्ट मन! यदि तुझे लज्जा ही नहीं है, तो मैं तुझे सौ बार क्या कहूँ? क्योंकि तूने तो एक बार भी भगवान का भजन नहीं किया।

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तेरौ बुरौ न कोऊ मानै

गोपियाँ कहती हैं, हे ज्ञान मार्गी उद्धव! हम तुम्हारी ब्रह्म ज्ञान की बातों का कोई बुरा नहीं मानते क्योंकि हमारी रस की बातें तो कोई रसिक ही समझ सकता है...

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प्रीति तौ मरिबौऊ न विचारै

प्रेम मृत्यु की परवाह नहीं करता, जैसे दीपक को देखकर पतंगा बिना सोचे-समझे जल जाता है। [1] जैसे ध्वनि से मोहित होकर हिरण शिकारी के पास पहुँच कर मृत्यु ...

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तुम मेरी राखो लाज हरि

हे श्री कृष्ण, कृपया मेरी लाज रख लें। आप सर्वज्ञ हैं, सब कुछ जानने वाले हैं, मैंने कोई भक्ति नहीं की है। [1] मेरे अवगुण मेरा पीछा छोड़ते नहीं, वे हर ...

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वृंदावन सुख छाड़िकै, कहाँ बसे हो आइ

उद्धव जी जब ब्रज से वापस द्वारका लौटे, तो श्री कृष्ण के चरण पकड़कर, उन्हें उलाहना देते हुए कहने लगे, “श्री वृंदावन धाम का अद्भुत सुख और गोवर्धन धाम को...

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अब मेरैं निज ध्यान यह

ब्रह्मा जी कहते हैं, हे प्रभु, अब मैं बार-बार यही प्रार्थना करता हूँ कि मुझे ग्वालों का अवशिष्ट प्राप्त हो जाए। मैंने यह जान लिया है कि आपने भी उन ग्व...

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जोइ भावै सोइ करहु तुम लता सिला द्रुम गेहु

ब्रह्मा जी भगवान श्री कृष्ण से कहते हैं - हे प्रभु, तुम्हें जो अच्छा लगे मुझे वही बना दो — चाहे वृंदावन की लता बना दो, यहाँ की चट्टान बना दो, यहाँ का...

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मीन वियोग न सहि सकै

चाहे नीर (पानी) मछली की बात भी नहीं पूछता फिर भी मछली तो पानी का वियोग नहीं सह सकती। तुम मछली के प्रेम की निराली गति को देखो कि इसका शरीर चला जाता है ...

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बलिहारी वृंदावन भूमिति

श्री वृंदावन धाम की परम पावन भूमि की बलिहारी है, जो सर्वसौभाग्यशाली है, जहाँ सूरदास के प्रभु श्री कृष्ण नंगे पाँव हर दिन गायों को चराते थे।

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गर्भ-बास अति त्रास मैं जहाँ न एकौ अंग

अरे मूढ़, सुन! गर्भवास जैसी भयावह अवस्था में, जहाँ तेरा एक भी अंग पूर्ण रूप से विकसित नहीं हुआ था, वहाँ भी भगवान ने एक क्षण के लिए भी तेरा साथ नहीं छो...

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श्रीमुख बानी कही विलँब अब नैंकु न लावहु

जब ब्रह्मा जी क्षमा याचना कर रहे थे, तब श्री कृष्ण बोले - "अब जरा भी विलंब न करो। ब्रज की परिक्रमा करके अपने देह के पापों को नष्ट करो"।

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निसिदिन बरसत नैन हमारे

मेरे नेत्रों से दिन-रात निरंतर आँसू बहते रहते हैं, मानो श्यामसुंदर के प्रस्थान के बाद वर्षा ऋतु का सदा के लिए आगमन हो गया हो। [1] मेरी आँखों में का...

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जैसैं सुखहीं तन बढ़यौ तैसैं तनहिं अनंग

जैसे-जैसे सुखपूर्वक शरीर पुष्ट होता गया, वैसे-वैसे उसमें काम की वृद्धि होती गई। जिसके परिणाम स्वरूप अज्ञानता रूपी धुआँ इतना बढ़ गया कि विचाररूपी दृष्ट...

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तैं जो रतन पायौ भलौ जान्यौ साधि न साज

तूने मनुष्य देह रूपी अनमोल रत्न पाया, किंतु उसका उपयोग करना तूने नहीं जाना। अरे, प्रतिदिन प्रेम की कथा सुनता है, फिर भी अपनी प्रेम हीनता पर लज्जा नहीं...

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वे जमुना, वे सखा हमारे नित नव केली विहारी

श्री कृष्ण सत्यभामा से कहते हैं - मैं शपथपूर्वक कहता हूँ, वह यमुना, वह हमारे प्रिय ब्रजवासी सखा, सखियों संग नित्य नवीन केली विहार, वृंदावन धाम के पुष्...

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प्राण इक द्वै कीन्हे भक्ति-प्रीति-प्रकास

श्री राधा एवं श्री कृष्ण का प्राण एक ही है परंतु उन्होंने दो रूप धारण किए हैं भक्ति एवं प्रेम को प्रकाशित करने के लिए। श्री सूरदास कहते हैं: स्वामी (श...

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मेरी सुधि लीजौ हो, ब्रजराज

हे व्रज के नाथ, श्री कृष्ण! कृपा कर मेरी सुधि लीजिए। इस संसार में मेरा और कोई नहीं है। आप ही मेरी बिगड़ी को बनाने वाले हैं! [1] आपने अनेकों का उद्धा...

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यह सब जानों भक्त के लच्छन

श्री सूरदास कहते हैं "यह सब भक्त के लक्षण हैं। कोई उनकी निंदा करता है तो कोई उनकी वंदना करता है, तथा कोई उनपर प्रहार कर उनका धन लेकर भाग सकता है।" [1]...

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वेद, पुरान, सु‍मृति सबैं सुर-नर सेबत जाहि

सभी वेद, पुराण और स्मृतियाँ उसी प्रभु की महिमा का बखान करते हैं, जिसकी सेवा सभी सुर-नर-मुनि आदि करते हैं। अरे महामूर्ख मन! तू उस परम प्रभु का स्मरण क्...

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मन रे श्याम सों कर हेत

अरे मन! श्यामसुन्दर से प्रेम के बंधन में जुड़ जा। “कृष्ण” नाम का घेरा अपने चारों ओर बना ले, और अपना जीवन रूपी खेत सुरक्षित कर ले। [1] तेरा मन रूपी तो...

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लोचन भए स्याम के चेरे

मेरे नेत्र श्यामसुंदर के बिना दाम के गुलाम बन गए हैं। इस ग़ुलामी में इन्हें उस कोटि का सुख प्राप्त होता है कि ये मुड़कर मेरी ओर देखते तक नहीं। [1] मै...

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चारि बदन मैं कह कहौं

ब्रह्मा जी, श्रीकृष्ण से क्षमा याचना करते हुए कहते हैं — "हे प्रभु! आप ब्रज में गायें चराते रहते हो और नन्दबाबा की शपथ की दुहाई देते हो। आपकी इन अलौकि...

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ब्रज-वासी-पटतर कोऊ नाहीं

ब्रजवासियों की बराबरी कोई नहीं कर सकता। जिन श्रीकृष्ण को ब्रह्मा, शिव, सनकादि आदि भी ध्यान में नहीं पा सकते, वही श्रीकृष्ण प्रेमवश ब्रजवासियों की जूठ...

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सुनि परमित पिय प्रेम की चातक चितवति पारि

प्रिय के असीम प्रेम को सुनकर चातक पक्षी सदा बादलों की ओर अनन्य भाव से निहारता है। उसी मेघ की आशा से सब दुख सहता है, परंतु मरते दम तक भी जल (वर्षा) के ...

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हरि, तेरौ भजन कियौ न जाइ

हे भगवान् श्री हरि! आपका भजन किया ही नहीं जाता, क्या करूँ? आपकी प्रबल माया मेरे मन को बार-बार भ्रमित कर देती है। [1] जब मैं संतों का संग करता हूँ, तो...

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सब रस कौ रस प्रेम है विषयी खेलै सार

संसार के समस्त रसों में प्रेम-रस ही सर्वोत्तम है। जैसे एक विषयी जुआरी सार (जुए की गोटियाँ) खेलते समय तन, मन, धन और यौवन अर्थात् सब कुछ दाँव पर लगा देत...

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स्याम भये बस नागरि कैं

श्री कृष्ण नागरि (श्री राधा) के वशीभूत हो गये हैं। वे उन घोष (गोपालक) कुल को उजागर करने वाली श्री राधा के नेत्र-कटाक्ष और उनकी टेड़ी चितवन पर रीझे हु...

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वृंदावन मोकों अति भावत

श्री श्यामसुन्दर कहते हैं: अरे सब सखाजन सुबल, श्रीदामा, तुम लोग सुनो! वृन्दावन मुझे बहुत प्रिय है, इसी कारण व्रज से मैं यहाँ वन में गायें चराने आता ह...

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करहु मोहि ब्रज रेनु

हे प्रभु! मुझे ब्रज की रज बना दीजिए और नित्य ही श्रीवृन्दावन का वास प्रदान कीजिए। यदि मुझ पर कृपा करनी हो, तो प्रसादस्वरूप यही वर दे दीजिए; इसके अतिरि...

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प्रभु मेरे अवगुण चित ना धरो

हे प्रभु, कृपया मेरे दोषों की तरफ़ ध्यान न दें। आप समदर्शी जाने जाते हैं और सभी को समान रूप से प्यार करते हैं, यदि आप चाहें तो मुझे इस भवसागर से पार क...

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प्रीति की रीति को पैंड़ो ही न्यारो

श्री राधा कृष्ण के प्रेम मार्ग की गति ही न्यारी है।[1] प्रेम के इस मार्ग को या तो वृषभानु नंदिनी श्री राधा जानती हैं या नन्द के दुलारे श्री श्यामसुंद...

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झुकरही नींद श्याम के नैनन

श्री श्यामसुंदर के नयन नींद के कारण झुक रही हैं। वे श्री प्रिया जी के चिबुक (ठुड्डी) को उठाते हैं और उनके मुख कमल की ओर निहार रहे हैं जिसकी सुंदरता अव...

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हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीति

जब उद्धव योग की युक्ति-विधि की चर्चा करते हैं, तब ब्रज की गोपियाँ उत्तर देती हैं— हम तो सीधी-सादी ग्वालिनें हैं, हम योग साधने की क्रिया कैसे समझेंगी? ...

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कह जानो कहँवा मुवो

न जाने यह कुमति बुद्धि वाला दुष्ट जीव कैसी मौत मरेगा जो श्री हरि की भक्ति एवं प्रेम को छोड़ कर भी सुख चाहता है।

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आज वन उमगि रही

आज वन में समस्त ब्रज नारी उमंग से भरी हैं। निश्चित ही हर्षोल्लास से सब सखियाँ गुणrगान कर रही हैं एवं प्राण प्यारी श्री स्वामिनी जी [श्री राधा] झूला झू...

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राधे तू दधिसुत क्यों न दुरावे

अरी राधा, तेरा मुख कमल चंद्रमा के समान सुन्दर है, तू इसे क्यों नहीं छुपाती। सुनो, हे श्री वृषभानु नंदिनी, उसे उजागर कर, क्यों इतने जीवों को तरसाती हो।...

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फूल्यो री सघन वन तामे

हे प्यारी जू! देखो, वृंदावन के सघन कुंज किस प्रकार पुष्पों से भरकर अपनी अनुपम शोभा बिखेर रहे हैं। इन लताओं में कोयल मधुर स्वर में गान कर रही है, मानो ...

general

धनि यह वृन्दावन की रेनू

श्री वृन्दावन धाम की रज धन्य है। इस रज की तुलना के सामने तो समस्त इच्छाओं को पूरा करने वाली कामधेनु और कल्पवृक्ष भी नगण्य हैं।

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जब जब मुरली कान्ह बजावत

श्री सूरदास सखी भाव धारण कर श्री राधा से कहते हैं - जब-जब श्रीकृष्ण मुरली बजाते हैं, तब-तब वह “राधा” नाम का बार-बार उच्चारण कर आपको रिझाने का प्रयत्न ...

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साँचौ निहचै प्रेम कौ जीवन मुक्ति रसाल

उद्धव द्वारा प्रतिपादित योग के प्रत्युत्तर में ब्रज-गोपिकाएँ प्रेम-तत्व की सर्वोच्चता सिद्ध करते हुए कहती हैं— प्रेम का सच्चा निश्चय ही जीवन की सरस मु...

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देखौरी या मुकुट की लटकन

हे सखी, श्री कृष्ण की मुकुट की लटकनी को तो निहार, कैसी शोभा देखते ही बनती है जब श्री राधा महारानी के संग नूपुर एवं पायल की पटकन कर वे दोनों रास में व...

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खान-पान-परिधान मैं जीवन गयौ सब बीति

खाने-पीने और भोग-विलास में सम्पूर्ण जीवन यूँ ही व्यर्थ बिता दिया। जैसे कोई दुराचारी व्यक्ति रात किसी पराई स्त्री के साथ बिताकर सुबह भयभीत हो उठे, वैसे...

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वृन्दावन व्रज को महत कापे बरनी जाई

श्रीधाम वृन्दावन और सम्पूर्ण व्रजभूमि का ऐसा अपार महत्व है कि उसका वर्णन वाणी और बुद्धि की सीमाओं से परे है। जब स्वयं चार मुख वाले ब्रह्मा जी ने ब्रज ...

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धनि यह वृन्दावन की रेनू

श्री वृन्दावन धाम की रज धन्य है। इस रज की तुलना के सामने तो समस्त इच्छाओं को पूरा करने वाली कामधेनु और कल्पवृक्ष भी नगण्य हैं।

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जब ते प्रीति श्याम से कीन्ही

जब से मैंने श्याम सुन्दर से प्रीति की है, उस दिन से अब तक एक क्षण को भी मेरे इन नैनों ने नींद नहीं ली।

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राधे जु के प्रान गोवर्धन धारी

भावार्थ: श्री कृष्ण जो श्री गिरिराज पर्वत को धारण करने वाले हैं वो श्री राधा जी के प्राण हैं। वे गहरे तमाल के वृक्ष हैं और उनकी प्रिय श्री राधिका उनके...

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बलि बलि हौं कुँवरि राधिका

भावार्थ: मैं अपने जीवन और आत्मा को बार-बार श्री राधिका को समर्पण करता हूँ। श्री राधिका, जिन्हें नंद के पुत्र श्रीकृष्ण प्यार करते है। श्री कृष्ण चतुर ...

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तज मन हरि विमुखन को संग

भावार्थ: हे मेरे मन ! जो जीव हरि भक्ति से विमुख हैं, उन प्राणियों का संग न कर। उनकी संगति के माध्यम से तेरी बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी क्योंकि वे तेरी भक्...