सन्तग्रन्थरागश्लोकस्तोत्रकविता
मुख्यपृष्ठसंतगोस्वामी श्री हरिराय
सभी संत

जीवन चरित

ब्रज परंपरा के वैष्णव संत।

श्री गोस्वामी श्री हरिराय वाणी संग्रह

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वृंदावन सघन कुंज, माधुरी द्रुम भँवर गुंज

श्री वृंदावन धाम की सघन निकुंजों में जहां भँवर गुंजार करते हैं वहाँ श्री प्रिया प्रियतम नित्य विहार करते है, जिनकी अनुपम रूप माधुरी को इन नेत्रों से न...

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आवत है मन ऐसी मेरें, सगरी लाज गमाऊँ

मेरे मन में अब ऐसा विचार आता है कि मैं लोक-लाज की सारी मर्यादाओं को पूरी तरह त्याग दूँ क्योंकि प्रियतम श्री श्यामसुंदर से जो प्रेम का नाता जोड़ा है, उस...

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श्री वृषभानु लड़ैती गाइए, कीरती-कुल-मंडन बाल हो

श्री वृषभानु जी की परम लाड़ली श्री राधा का यश गान कीजिए, जो माता कीर्ति के कुल की शोभा बढ़ाने वाली दिव्य सुकुमारी हैं। वे स्वर्णमयी लता (बेली) के समान...

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नई बात कछु, नई रीति सब

प्रिया प्रियतम की अद्भुत छवि का वर्णन करते हुए श्री गोस्वामी हरिराय जी कहते हैं कि आज तो कुछ नवीन ही बात लग रही है, नवीन ही प्रकार की सब रीति है और नव...

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तलहटी गोवर्धन की रहिये

श्री गोवर्धन की तलहटी में निवास करना चाहिए जहां नित्य प्रति उठ कर श्री मदन गोपाल लाल [श्री कृष्ण] के चरणों में ही चित्त को लगाना चाहिए। [1] तन से रोम...

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नैन भरि देखि अब भानु तनया

मैं अब वृषभानु नंदिनी श्री राधा को आँखे भरकर देख रहा हूँ, जो प्रियतम श्री कृष्ण के संग केलि-परायण हैं एवं जिनके श्री अंग के श्रम-जल को पान करते हुए भँ...

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रसिक जन बहु ना मिले सिंह यूथ नहिं होय

रसिक संत बहुत अधिक नहीं होते (अर्थात् वे अत्यंत दुर्लभ हैं), जैसे सिंह का कोई झुंड नहीं होता। विरह रूपी बेल सब जगह प्रकट नहीं होती, और न ही घट घट में...

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प्रेम पारखी जो मिले ताको करि मनुहार

जब कोई प्रेम का पारखी, अनन्य रसिक संत मिले तो उनका प्रेम से आदर सत्कार करो, क्योंकि श्री प्रिया प्रियतम ऐसे प्रेमी महात्माओं की कृपा से मिलते हैं। इसल...

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बहुत दिना भटकट फिर्यो

बहुत दिनों तक नाना प्रकार की साधनाओं में भटकता रहा, परंतु उससे कल्याण संभव नहीं हुआ। लेकिन जब से श्री कृष्ण का मन से स्मरण और भक्ति की, तभी से हृदय को...

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श्री वृंदावन बानिक बन्यो कुंज कुंज अली केली

श्री धाम वृंदावन की शोभा देखते ही बनती है, जहाँ प्रत्येक कुंज में दिव्य दंपति श्री राधा-कृष्ण की केली लीलाओं का माधुर्य छलक रहा है। श्री राधा-कृष्ण ऐ...

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कोटि पाप छिन में टरे लेहि वृंदावन नाम

कोटि-कोटि पाप क्षणभर में मिट जाते हैं, जब कोई वृंदावन नाम का उच्चारण करता है। सुख की निधि “गोकुल गांव” का यश तीनों लोकों में गूंजता है।

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श्री वल्लभ वर को छांडि के भजे जो भैरव भूत

जो व्यक्ति भगवान श्री कृष्ण को छोड़कर भैरव-भूत आदि की उपासना करता है, उसका अंत अत्यंत अपमानजनक होता है जैसे किसी गणिका (वेश्या) के बेटे को समाज आदर-सम...

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अरे मन श्री वल्लभ गुन गाय

अरे मन! तू श्री वल्लभ (श्री वल्लभाचार्य / श्रीकृष्ण) के गुणों का प्रेमपूर्वक गान कर। तू वेद-पुराण पढ़ने में अपना समय व्यर्थ क्यों कर रहा है? [1] गिरि...

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जग में मिलन अनूप है भगवदियन को संग

इस संसार में सबसे अनुपम मिलन भगवत्प्रेमियों का संग है क्योंकि उनके संग के प्रभाव से मन सहजता से श्री कृष्ण के प्रेम-रंग में सराबोर हो जाता है।

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रतन खचित कंचन महा

श्रीवृन्दावन की महान भूमि रत्नों से जड़ी हुई स्वर्णमयी है जहाँ समस्त वृक्ष कल्पवृक्ष हैं और फल-फूलों से लदी डालियाँ झूमती रहती हैं।

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श्री यमुनाजी सो नेह करि यह नेमी तू लेह

यदि जीवन में कोई नियम अपनाना है, तो बस इतना कर — यमुना जी से अटूट प्रेम कर, और श्रीकृष्ण के दासों (भगवद्प्राप्त संतों) को छोड़ अन्य किसी से स्नेह न कर...

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श्री वृंदावन के दरस ते

श्री वृंदावन का दर्शन जीव के लिए भगवत्प्राप्ति के मार्ग में अत्यंत अनुकूल और सहायक होता है। यह संसार एक अथाह समुद्र के समान है, जिसे पार करने का श्रे...

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जागत सोवत स्वप्न में भोर द्योस निश सांझ

चाहे जाग्रत अवस्था हो, निद्रा हो या स्वप्न; चाहे प्रातःकाल, मध्यान्ह, संध्या या रात्रि का समय हो, सदा सर्वदा ब्रजेश्वर श्री कृष्णचंद्र के चरणकमलों को ...

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उर बिच गोकुल नयन जल मुख श्री वल्लभ नाम

जो अपने हृदय में गोकुल बसाए रखते हैं, जिनकी आँखों में भक्ति के आँसू छलकते हैं, और जिनके मुख पर सदा श्री वल्लभ (श्रीकृष्ण) नाम रहता है, ऐसे भक्त की समस...

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देखी देह सुरंग यह मति भूले मन मांहि

हे मन! मोहक देह के सुंदर रूप को देखकर बहको मत। यह कभी न भूलो कि श्री वल्लभ (श्रीकृष्ण) के अतिरिक्त इस संसार में कोई भी तुम्हारा सच्चा साथी नहीं है।

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लगे जो श्री बल्लभ पद रंग

जो श्री वल्लभ (श्रीकृष्ण अथवा श्री वल्लभाचार्य) के चरणकमलों के रंग में रंग जाता है, उसके हृदय में किसी भी प्रकार का कुसंग व्याप्त नहीं रहता। वह सहज ही...

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श्री वृंदावन के वृक्ष को मरम न जाने कोय

श्री वृन्दावन के वृक्षों की ऐसी महिमा है जिसका मर्म कोई भी नहीं जानता। यहाँ के वृक्षों के केवल एक पत्ते का स्मरण कर लेने मात्र से ही जीव के भीतर दिव्य...

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चले पिय भाँवती रस लेन

प्रियतम (श्री कृष्ण) अपनी प्राणप्रिया (श्री राधा) के संग प्रेम-रस का आस्वादन लेने के लिए चले हैं। फाग (होली) खेलते हुए उनका अनुराग इतना बढ़ गया है कि उ...

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पतितन में विख्यात हों

हे श्रीकृष्ण! मैं पतितों में सर्वाधिक प्रसिद्ध हूँ — ‘महापतित’ ही मेरा नाम है। अब मैं आपसे याचक बनकर यह प्रार्थना करता हूँ कि प्रत्येक क्षण मेरी शरणाग...

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बैठे लाल फूलन की पिछबारी

फूलों से सजी पिछवाड़े की बाड़ी में हमारे लाल विराजमान हैं। सुंदर श्याम, शोभा की पराकाष्ठा हैं, उनके कंठ की मालाएँ मन को हर लेती हैं। [1] नवल किशोर, र...

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हरि जन आवे बारने हँसी हँसी नावे शीश

जब श्रीहरि के भक्त आपके द्वार पर पधारें, तब पूर्ण हर्ष और उल्लास के साथ, नतमस्तक होकर उनका वंदन करना चाहिए। उनके हृदय का आंतरिक भाव क्या है, यह तो वे ...

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सघन वन छायो प्रफुल्लित द्रुमवेली

घने वृक्षों और प्रफुल्लित लताओं से सुसज्जित वन को देखकर, ब्रजवासियों के हृदय आनंद से भर उठते हैं। [1] चारों ओर कोयल अपनी मधुर तान छेड़ रही हैं, और भौ...

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मोहि श्री बल्लभ ही कौ भरोसौ

मुझे एकमात्र श्री वल्लभ पर ही भरोसा है। उनके अतिरक्त न तो मैं किसी अन्य देव को जानता हूँ न मानता हूँ, केवल उनका अनन्य आसरा ही सच्चा है। [1] हे मेरे म...

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कृष्ण प्रेम मातो रहे, धरे ना काहु शंक

श्री कृष्ण के प्रेम में मतवाला भक्त किसी का भय नहीं रखता। केवल तीन गांठों वाला साधारण कौपीन धारण करते हुए भी, वह स्वर्ग के सम्राट इंद्र को भी भिखारी स...

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मन नग ताको दीजिये जो प्रेम पारखी होय

अपने मन रूपी अनमोल रत्न को केवल उसी व्यक्ति को सौंपना चाहिए जो प्रेम का सच्चा पारखी अर्थात् रसिक संत हो। यदि कोई प्रेम की गहराई और मूल्य को समझने वाल...

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ललित लतान पर नन्हीं नन्हीं बूँद परें

मनमोहक लताओं पर वर्षा की नन्हीं-नन्हीं बूँदें गिर रही हैं और राधा-कृष्ण दोनों प्रेममय भीग रहे हैं। [1] वे दोनों हँसते हुए बात कर रहे हैं, भुजाएँ एक-द...

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मेरी मति राधिका चरन रज में रहौ

ऐसी कृपा हो कि मेरी मति श्री राधिका चरण रज में सदा बनी रहे (अर्थात् उनके चरणों की रज में मेरी पूर्ण शरणागति रहे )। मैं अपने मन को दृढ़ता पूर्वक, बार ब...