Verses & Passages
127 itemsवृन्दाटवी विमिलचिद्घन
श्री वृन्दाटवी में जो वास करते हैं, वे समस्त ही निर्मल एवं चिन्मय शरीर को प्राप्त करते हैं, सर्वश्रेष्ठ पूजनीय मुनीन्द्र वृन्द इस धाम की महिमा वर्णन क...
श्रीवृन्दावन जीवना इह महाभागा यदा जीवना
जिनको श्रीवृन्दावन ही प्राण समान है, ऐसे महा भाग्यवान् पुरुष जिनको प्राणों से भी अत्यन्त प्यारे हैं, उन्हें श्रीवृन्दावन की प्राप्ति कभी दुर्लभ नहीं ह...
हरि हरि धिगस्तु मामिह
हरि! हरि!! मुझे धिक्कार है!!! क्योंकि अति तुच्छ एवं अपना स्वार्थ(अभीष्ट) विनाश करने वाले लोक-धर्मों में अति-आसक्त होकर मैं श्रीवृन्दावन वास को भी नष्...
अपि तुच्छलोकंरजन-मासंजनमत्र
हे प्रिय! हे वृन्दावन जीवन!! अति तुच्छ लोक-रंजन एवं इस विष्ठापात्र-शरीर मे आसक्त तथा स्वार्थ-नाश करने वाले लोगों का संग त्याग कर।
लोकाः स्वच्छन्दनिन्दां विंदधति
यदि सब लोक मेरी यथेष्ट निन्दा करें, उससे मेरी हानि क्या? यदि मेरा सब कुटुम्ब दीनातिदीन (अत्यन्त दरिद्री) हो जाये तो उससे मेरा क्या बिगाड़? मेरी अत्यन्...
वन्दावनगुणकीर्त्तिं प्रति रसना में नरीनर्ति
श्रीवृन्दावन की गुणकीर्त्ति गान करने में मेरी रसना नृत्य करती रहे। यह श्रीधाम सबसे ऊपर विरजामन है। बात को जानने वाला व्यक्ति इस श्रीवृन्दावन का कभी भी...
सखीभिः सम्भूय स्वकरकमलद्वन्द्वकलितैर्जलैः
श्रीराधाजी सब सखियों के साथ मिल कर नागरमणि (श्रीश्यामसुन्दर) के शरीर पर अपने दोनों कर-कमलों से जब अनेक जल सिञ्चन करने लगीं, तब श्रीश्यामसुन्दर अपने मु...
वृन्दावन-तृणगल्माद्यनिशं
जो श्रीवृन्दावन के तृण-गुल्मादि का सच्चिदानन्दघन मूर्त्तिरूप में निशिदिन दर्शन करता है एवं उनको भक्तिपूर्वक निरन्तर प्रणाम करते हुए यहाँ (श्रीवृन्दावन...
अन्तरीयगसुरत्नमण्डपे स्वीयकुण्डमनु
अपने निज कुण्ड के निकुट अन्तरंग सुन्दर रत्नमण्डप में सखिवृन्द के साथ श्रीवृषभानुनन्दिनी श्रीश्यामसुन्दर के सहित गान-कौतुक कर रही हैं-ऐसी छवि मेरे चित्...
सेयं दीक्षा उच्चभावै र्व्रतेषु
श्रीवृन्दारण्य की सौभाग्यमय दर्शन-इच्छा ही उच्चतम भावयुक्त व्रतसमूहों में दीक्षा, एवं श्री राधिका की आराधनाओं में परम आज्ञा है तथा प्रेम के ईश्वर के ...
सेयं प्राप्तिः कोटीचिन्तामणीनां
श्रीवृन्दावन को आत्मसमर्पण करने की इच्छा करना ही कोटि चिन्तामणियों की प्राप्ति के समान है एवं कोटि अमृत पान से भी अधिक तृप्तिदायक है तथा सम्यक् भक्ति ...
राधाकृष्णौ विपुल पुलकावुन्मदोल्लास
विपुल पुलकावलि युक्त होकर उन्मद-उल्लास-हास्य परायण श्रीराधा-कृष्ण जिसका दर्शन करके मधुर-मधुर स्वर से ‘श्री’ युक्त (श्रीवृन्दावन) ‘जय’ युक्त (जय वृन्दा...
वन्दे वृन्दावनगतमहं भक्तिभारावनम्रो
भक्तिपूर्वक नम्र होकर श्रीवृन्दावन के परमधन्य कीड़े की भी मैं वन्दना करता हूँ, किन्तु अन्यत्र रहने वाले ब्रह्मादिक देवताओं को तृण के समान भी नहीं मानत...
चैरोऽयं पतितोऽयमित्यतिवदन्
कोई यदि मुझे ‘‘यह चोर है’’, ‘‘पतित है’’ इत्यादि वाक्यों से कठोर भर्त्सना करे, तर्ज्जना गर्ज्जनपूर्वक अच्छी तरह ताड़ना करे, बाँध दे, सब लोग निरपराधी मु...
कौवेरी धनसम्पदस्ति किमतो
यदि कुबेर का धन प्राप्त हो जाये, तो उसका क्या फल? यदि बृहस्पति जैसी सुवाणी प्राप्त हो, तो उससे क्या? महेन्द्र के लोक का ऐश्वर्य मिले, तो उससे क्या ला...
अपरतः पुरुषार्थचतुष्टय
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-ये चतुष्टय पुरुषार्थ अन्य अन्य स्थानों पर प्राप्त किये जा सकते हैं एवं भगवान् को बहुविध भजन हो सकता है, किंतु यह निश्चित है कि इस...
प्रयश्चित्तमघानां महदपराधे परं शरणम्
सब पापों का प्रायश्चित-महत्-पुरुषों का अपराध हो जाने पर परम शरण लेने योग्य-समस्त स्वधर्मशिरोमणि एवं पुरुषार्थ चूड़ामणि केवल श्रीराधिका-विपिन (श्रीवृन्...
अरुणतलमुपरि गौरं
तलवों में अरुणता, ऊपर के भाग में गौरवर्ण एवं मधुर लास्य के द्वारा श्रीहरि के मन को चुराने वाले, श्रीराधा के सुन्दर चरण-कमलों को मेरा मन जपता रहे॥
वृन्दावनविधुरास्तामास्तां वृन्दावनेश्वरी
श्रीवृन्दावनचन्द्र की कथा तो दूर रही और श्रीवृन्दावनेश्वरी की तथा उनकी सखियों का तो कहना ही क्या है? श्रीवृन्दावन के एक वृक्ष का एक पत्ता भी समस्त जगत...
राधारमणपदाम्बृज मधुरिमसिन्धोरनन्तपारस्य
जो अनन्यभाव से श्रीवृन्दावन का भजन करता है, एकमात्र वही श्रीराधारमण के चरण-कमलों के अपार माधुर्य-सिन्धु का अनुभव प्राप्त कर सकता है।
नो शृण्वन् नैव गृह्णन्
समस्त जीवों के दोषों तथा गुणों को न कहीं सुनता हुआ और न ही ग्रहण करता हुआ, सब वृन्दावनवासी प्राणियों में गुरु-बुद्धि से दण्डवत प्रणाम करता हुआ, सब अभि...
राधा-पदाम्बुजादन्यत् स्वप्नेऽपि
श्रीराधा के चरण कमल के अतिरिक्त स्वप्न में भी श्री राधा दासी और कुछ नहीं जानती। वह श्रीराधा के दिव्य प्रेम की तरंगों में सदा प्रवाहित हो रही है।
एवं नित्यमनुस्मरन्ननुसरन् राधापद
श्रीराधा का नित्य स्मरण करते हुए, उनके चरणकमलों की कांति का नित्य अनुस्मरण करते, उनके नाम में नित्य ही रसना को पूर्ण करते, करते, स्त्री तथा स्त्री का ...
वृन्दावने नन्दित कृष्णचन्द्र निस्तन्द्र
मैं प्रार्थना करता हूँ कि मेरा मन श्री वृंदावन की भूमि में श्री राधिका के चरणों की रज में एक गुंजायमान भौंरा बन जाए, जहां श्री कृष्ण नित्य ही दिव्य ली...
राधारूपविलासान् समधिक माधुरीधुरभरितान्
अतिशय माधुर्यधारपूर्ण श्रीराधा रूप-विलासादि का गान करते हुए मैं इस श्रीवृन्दावन में निश्चिन्त हो गया हूँ।
केचित् कुर्वन्ति विष्णोर्भजनमनुदिनं
कुछ लोग भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, कुछ प्रतिदिन ध्यान एवं योग करते हैं, कुछ वेदों के कर्म-कांड का अनुष्ठान करते हैं, और कुछ केवल पत्नी, बच्चों, धन...
अहह जन्म सहस्र समेधितै
अहह! हजारों जन्म अनेक तप, जप, योग एवं समाधि आदि साधनों से जिसकी प्राप्ति नहीं होती, वही प्रेम पुरुषार्थ इस श्रीराधिका वन को केवल एक बार शिर झुका कर प्...
यदि दुर्व्वाच्यसहस्रं यदि च त्रुकचेन दीर्यते देहः
यदि सहस्रों दुर्वचन सहन करने पड़े, यदि कोई इस देह को दरांत द्वारा विदीर्ण ही क्यों न कर दे, कोटि-कोटि दुष्कर्म भी यदि सहने पड़े तो भी श्रीराधा के प्रि...
विहाय वृन्दावनमिन्दिरादिभिः
अरे मूर्ख! लक्ष्मी आदि के लिये भी सुदुर्लभ (जहां महालक्ष्मी का भी प्रवेश नहीं) इस श्रीवृन्दावन को त्यागकर कहाँ जाता है? यहाँ ही तो सर्वाधीश्वर का ऐश्व...
जागर्ति दुन्दभिरवः परमोऽत्र
“श्रीराधा श्रीवृन्दावन में हैं” यह परम वाक्य रूप नगाड़ा (दुंदुभी ढोल) पुराणों में बज रहा है। यदि तू ऐसे वृंदावन धाम को त्याग देगा जो कि महा अनुराग की ...
वृन्दारण्योत्तमं नास्ति-नास्ति
श्रीवृन्दावन से अधिक श्रेष्ठ (अधम-उद्धारक) धाम और कोई नहीं है, एवं मेरे समान अधम और कोई नहीं है। "श्रीराधा" नाम के बल से ही इन दोनों का मिलन हो सकता ...
श्रीराधायाः शिञ्जन्मणिनूपुरपादविन्यासान्
जहां-तहां श्रीराधा की मणिमय नूपुरों की ध्वनिसंयुक्त चरण-धरन को प्रेमपूर्वक स्मरण करते करते अश्रुपूर्ण नेत्रयुक्त भाग्यवान् पुरुष ही श्रीवृन्दावन में व...
पततु मदुपरिष्ठात् कोटिशो वज्रपातः
मेरे ऊपर कोटि-कोटि वज्रपात हों और समस्त भुवनों को जला देने वाली अग्नि ही उत्थित हो जाय, अथवा प्रलयकालीन कोटि-कोटि प्रचण्ड सूर्य ही उदिन हो उठे, तथापि ...
हरिभक्ति सुरस सिन्धो
हरि भक्ति के सुरस सिन्धु मंथन से यह अनिर्वचनीय सार रूप श्रीवृन्दावन प्रकट हुआ है, समस्त असार वस्तुओं को त्याग कर परम उदार श्रीराधिका- उपवन (इस श्रीवृन...
रे मूढ़ गूढ़मखिलोपनिषत् स्वगाढ़
अरे मूर्ख चित्त मनुष्य! समस्त उपनिषदों से जो गुप्त है और अपने गाढ़ प्रेम से जो प्राप्त होने वाले हैं, समस्त पुरुषार्थों में शिरोमणि है आनन्दसागर परमाश...
श्रीमद्वृन्दावनेश्वर्य्या: सकृन्नामैक मंगलम्
श्रीमद्वृन्दावनेश्वरी (श्रीराधा) का एक बार ही श्रीराधा-नाम लेने से समस्त मंगल प्राप्त होते हैं, एवं समस्त अनन्त शक्तियों का विकास होता है। वह श्रीराधा...
त्वयि रचयति राधिकाऽवनाशा
“तुम्हारी रक्षा करूंगी” - इस प्रकार श्रीराधा के आश्वासन देते ही माया भयभीत होकर भाग गई है। हे दृष्ट हृदय! आकाश फूलों के समान काल्पनिक (झूठे) तुम्हारे ...
अरे शीघ्रं शीघ्रं
अरे! स्त्री, पुत्र, धनादि में ममता बढ़ाने का यह समय नहीं है, यह शरीर मृत्यु की ओर बढ़ रहा है। समस्त दुर्लभ वस्तुओं में भी अति सुदुर्लभ यह श्रीवृन्दावन...
माऽस्तु मम कदापि पापरूपिणो
मुझ घोर पापी का भले कभी भी नरक से भी उद्धार न हो, किन्तु श्रीवृन्दावन-नाम, श्रीराधा नाम तथा श्रीराधानागर [कृष्ण] के नाम को कभी न भूलूं।
जहि विषय दुर्विषवनं
हे मति रूप पक्षिनि! विषय के जहरीले वन को त्याग कर दुराशाओं के पाशों को काट डाल, अमृत स्वरूप श्रीवृन्दावन में ही उड़ चलना तुम्हें उचित है।
दुश्चेष्टानां दुर्मतीनांच कोटि
इस श्रीवृन्दावन में मुझसे कोटि-कोटि दुश्चेष्टाएं हो या कुमति उदय हों या घोर अनर्थ तथा दुर्वासनाएं उदित हो, एकमात्र श्रीराधा-नाम मुझे कदापि विस्मृत न ह...
वेदान्ताः प्रतिपादयन्ति मुखतो
श्री वृन्दावन की महिमा वेदान्त-समूह मुख से (मुख्यावृत्ति से) प्रतिपादन न करें तो मेरा क्या? शास्त्र रूप गत्र्त में गिरे हुए कुतार्किक गण यदि श्री वृन्...
दिने दिने तिवर्द्धिष्णु
प्रतिदिन अत्यन्त वर्द्धनशील महाभक्ति व वैराग्ययुक्त होकर, कोई एक भाग्यवान पुरुष ही अनन्य रूप से श्रीराधा-पदाश्रित होकर श्रीवृन्दावन में वास करता है।
न राधा न राधाप्रियो
जिसके हृदय में नित्य श्रीराधा, श्री कृष्ण, श्रीवृन्दावन तथा उनके प्रेमी रसिक-भक्त (सहचरी) गोचर नहीं होते हैं और न ही वाणी द्वारा कोई प्रचार होता है, व...
जयति जयति राधा प्रेमसारैरगाधा
अगाध प्रेमसार-रूपिणी श्रीराधा की जय हो, जय हो ; उन राधा-रस के लिए अपार तृषातुर श्रीकृष्ण की जय हो, जय हो ; इन युगल के मिलाप की आकांक्षा करने वाली सखीव...
मा कुरुकर्म न योगं
मत करो कोई कर्म, मत करो योग, मत करो विष्णु का भजन, मत करो उनके गुणों का श्रवण। तुम्हें केवल इतना ही करना है कि जैसे बन पड़े, वैसे ही वृन्दावन में पड़े...
अत्युत्कृष्टे सकलविधया श्रीलवृन्दावनेऽस्मिन्
सर्वभाव से अति उत्कृष्ट इस श्रीवृन्दावन में निज दुर्भाग्यवश दृष्ट-दोषों को जो लोग सत्य मान कर वर्णन करते हैं, अहो ! उन मूर्ख लोगों के मुख मैं प्राण सं...
वृन्दावन इह कति वा न
हे श्रीराधे! इस श्रीवृन्दावन में कितनी ही क्यों न चतुर गोपसुंदरी आकर रहे? किंतु मेरे नेत्र केवल तुम्हें ही देखेंगे। चन्द्रिका को छोड़ कर और कहीं चकोर ...
आनंदकन्देऽपि न विंदते
हे सुंदरी राधे! तुम्हारे मृदु मधुर मुस्कानयुक्त मुख को क्षणमात्र न देखने पर यह आनंद कंद श्रीवृन्दावन भी बिंदुमात्र सुख का अनुभव नहीं कर पाता, चंद्र के...
वृन्दारण्योत्तमं नास्ति
श्रीवृन्दावन से अधिक श्रेष्ठ (अधम-उद्धारक) और कोई नहीं है, एवं मेरे समान अधम और कोई नहीं है। ‘श्रीराधा श्रीराधा’ नाम रटने के प्रभाव से यदि इन दोनों का...
सकल विभव सारं सर्व धर्मैक
सब वैभवों का सार, समस्त धर्मों का सार, समस्त भजन का सार, समस्त सिद्धियों का सार, समस्त महिमाओं का सार तथा समस्त माधुर्य एवं रसों का सार, श्री धाम वृन्...
अतिसाहसमाचरितं विरुध्य
हे श्रीवृन्दावन! आप में वास करने के लिए इन्द्रियों के पराधीन होकर मेंने श्रेष्ठ गुरु तथा शास्त्र-वेत्ताओं से विमुख आचरण करके अत्यंत साहस का परिचय दिया...
अहह विगर्हित-कर्म्मण
अहा! मै दुष्टकर्मकारी अति मूर्ख हूं, मेरी कुछ भी गति क्यों न हो, किन्तु मैं श्रीवृन्दावन को नहीं छोडूंगा और न ही यहाँ श्रीराधा-नाम को छोडूंगा।
यदैव सच्चिद्रसरूप
जब श्री वृन्दावन में स्थित स्थावर और जंगम सभी में सत्-चित्-रसस्वरूप बुद्धि निष्कपट रूप से उत्पन्न होती है, तब ही मनुष्य को श्री राधा की प्रिय सेवा-योग...
सापराधाश्चे ये राधापदमाधाय चेतसि
जो अपराधी होकर भी चित्त में श्रीराधापदपद्मों को धारण करते हुए श्रीवृन्दावन में अनन्य वास करते हैं, उन बड़भागी भक्तगणों को मैं नमस्कार (उनका ध्यान) करत...
मोहिन्यामपि नास्ति मेऽद्भुतमतिः का पार्वती
जिनकी दासी की एक बार अंग छटा को देखकर पार्वती, उर्वशी तथा और किसी रतिमती सुन्दरी की तो बात ही दूर- स्वयं मोहिनी में भी मेरी बुद्धि आश्चर्य नहीं मानती...
श्रीवृन्दावनवत्तिरनि यत्र
श्रीवृन्दावन का जहां भी कोई अपराध करता है, वह साक्षात श्रीराधाकृष्ण का ही द्रोही है। उसका बहुत काल तक पीछे भी नरक से उद्धार नही होता।
जन्मनि जन्मनि वृन्दावन भुवि
जन्मनि जन्मनि वृन्दावन भुवि वृन्दारकेन्द्र वन्द्यायां। अपि तृण गुल्मक भावे भवतु ममाशासमुल्लासम्॥ - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (17.9) ...
राधाकेलिमृगस्य कस्यचिदहो श्यामस्य यूनौ नव
अभीरी गोपीगण जिसकी करुणापूर्ण दृष्टि की प्रार्थना करती हैं, उसी श्रीराधाकेलिमृग किसी एक श्यामाङ्ग नवीन युवक को कामोन्मत्तता विधान करने वाली एवं समस्त ...
वेणुं यत्र क्वणयति मुदा नीपमूलावलम्बी
शीतल श्रीयमुना के तीर पर कदंब वृक्ष के मूल का अवलम्बन लिये हुए सुन्दर पीताम्बरधारी श्यामवर्ण कामप्रकृतिविशिष्ट कोई एक दिव्य किशोर श्रीराधा मुखकमल दर्श...
हा हा! वृन्दावनं त्यक्त्वा
हाय! श्रीवृन्दावन त्यागकर जो और कार्यों में मेरा उत्साह होता है तो जानबूझ कर परमामृत को थुत्कार कर विष का ही भोजन करना चाहता हूँ।
यत् कारुण्यमगण्यमेव सुसुखं नास्त्येव यस्मात् परं
जिसकी करुणा अनन्त है, जिससे अधिक और सुख कहीं भी नहीं प्राप्त हो सकता, यह श्रीवृन्दावन जिनका असीम विचित्र शक्ति-युक्त क्रीड़ा-उद्यान है, उस श्रीराधा का...
धन्यो लोके मुमुक्षुर्हरिभजनपरो
इस पृथ्वी पर जो मुमुक्षु हैं, वे धन्य हैं। जो हरि भजन परायण हैं, वे धन्य धन्य हैं। उन से उत्कृष्ट वे हैं जो श्री-कृष्ण के चरणकमलों मे परमासक्त हैं। उन...
अलक्ष्याः श्रीलक्ष्म्या अपि
भगवती श्रीलक्ष्मी देवी सदा श्री भगवान की वक्ष स्थल-विलासिनी होते हुए भी जिन किन्हीं-किन्हीं मधुरतम रसों का आस्वादन नहीं कर सकती- अहो! जिनकी दासियां भी...
महाभाग्यैः प्राप्तं वपुरिदमिहाकर्णि महिमा
महाभाग्य से यह (नरतन) देह पाया है, (महाभाग्य से) श्री वृन्दावन की अद्भुत महिमा भी सुनी है, समस्त संसार स्वप्न समान है- यह भी (महाभाग्य से) जान लिया है...
शोच्यशोच्यातिशोच्योऽहं
महासोचनीय से भी अति महासोचनीय मैं हूँ। महामूर्ख से भी अति महामूर्ख बुद्धि मैं हूँ। क्योंकि जो शीघ्र ही सब कुछ त्याग कर श्रीवृन्दावन का आश्रय नहीं करत...
अस्तु में नरककोटि
मुझे कोटि नरक भोगने पडे, मनोरथों की प्राप्ति न हो, अथवा ईश्वर मुझ पर दया न करें, किन्तु श्रीराधा चरण कमलों में मेरी लालसा कभी कम न हो।
अलं कस्यापि संगत्या तवालं शास्त्रकर्मभि
तुम्हें किसी का संग करने की आवश्यकता नहीं एवं शास्त्रोक्त कर्मों का भी कोई प्रयोजन नहीं, क्योंकि जिन्होंने अपने को श्रीवृन्दावन के तृण समान समझ कर कृत...
भ्रातस्ते किमु निश्चयेन
अरे भाई ! तू क्या अपने मृत्यु काल को निश्चय रूप से जानता है- कि कब होगा ? बलवान मृत्यु की गति को रोकने का क्या तू कोई महामन्त्र जानता है? मृत्यु तुम्ह...
श्रीमद्ध वृन्दाटवी कुंजपुंजे नित्यविहारिणौ
श्रीवृन्दावन के निकुंजों में नित्य-विहार करने वाले गौरश्यामात्मक महाश्चर्यमय श्रीयुगलकिशोर ही मेरे जीवन हैं।
मिलन्ति चिन्तामणि कोटि
यदि [वृंदावन के अन्यत्र] कोटि कोटि चिन्तामणि स्वयं ही आकर प्राप्त हों और यदि श्रीहरि भी स्वयं नेत्रों के सामने दर्शन दें, तथापि श्रीवृन्दावन धूल-धूसरि...
धनपुत्रकत्रादिममता मम तापदा
धनपुत्रकत्रादिममता मम तापदा। इति व्यक्त्वाखिलं वृन्दावनमेव च मे वरम्॥ - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (5.46) धन, पुत्र कलत्रादि के प्रति ...
शरीरं श्रीवृन्दावनभुवि सदा स्थापय
शरीर को सदा श्रीवृन्दावन भूमि में स्थिर रख, मनको श्रीवृन्दावन रसिकयुगल श्रीराधा-कृष्ण के निकट भजन में लगा, उनकी लीला गान में निरन्तर वाणी का प्रयोग कर...
वृन्दाटवी नहि कवीश्वरकाव्यकोटि
श्रेष्ठ कवि गण कोटि कोटि काव्य रचना के द्वारा भी श्रीवृन्दावन के गुण रत्न समूह की एकमात्र छटा का भी वर्णन नहीं कर सकते। हे मित्र ! निखिल इन्द्रियों की...
इह न सुखं न सुखमरे क्वापि वृथा न पत मोहजालेऽस्मिन्
इस संसार में सुख नहीं है। अरे ! कहीं भी सुख नहीं है ! वृथा इस मोह जाल में मत फंस। अनुदिन नित्य परमानन्दमय श्रीवृन्दावन का सम्यक् प्रकार से आश्रय ग्रहण...
न वेदाज्ञाभङ्गे कुरु भयमयेनापि वचनं
हे सखे ! वेदों की आज्ञा को भङ्ग करने में भय मत कर। मातापितादि गुरुजनों के वचनों को मत मान, लोकव्यवहार वा लोकापेक्षा में प्रवेश न कर, दीन चित्त कुटुंबि...
न कुरु न कुरु मिथ्या देहगेहाद्यपेक्षां
मिथ्या देह गेहादि की कभी अपेक्षा न कर, समस्त पुरुषार्थों को नाश करने वाली मृत्यु को सिर पर खड़ा जान, हे बंधो ! आज ही श्रीवृन्दावन के लिए वज्र से भी कठ...
किं नो भूपैः किं नु देवादिभिर्वा
एकान्तभाव से श्रीवृन्दावनाश्रयी हमारा राजाओं से क्या प्रयोजन ? देवताओं से क्या गरज? और स्वाप्न ऐश्वर्य तुल्य ऐश्वर्य के द्वारा उत्फुल्लित मुक्तगणों से...
राधानागरकेलिसागरनिमग्नालीदृशां यत् सुखं
श्रीराधानागर के केलिसमुद्र में निमग्न सखियों के नेत्रों को जो सुख होता है, श्रीभगवान् के सकल सुखोत्सव भी उस सुख के लवलेश तुल्य नहीं हैं। अनुपम सौभाग्य...
साधो शक्नोषि नो चेत् सकलमपि
हे साधो! यदि तू इन समस्त स्वप्रकल्पित वस्तुओं का सहसा त्याग नहीं कर सकता, तो श्री वृन्दावन के युगल-किशोर की उपासना करते हुए निरन्तर श्री वृन्दावन का ध...
यत्रैवातिरसोन्मदं विहरते मत्प्रेष्ठवस्तुद्वयं
जहाँ अत्यन्त प्रेमरस में मग्न होकर मेरे प्रियतम युगल (राधा-कृष्ण) नित्य विहार करते हैं, जहाँ भक्ति महारसमय उत्सव की तरह निरन्तर प्रवाहित हो रही है, जह...
भ्रातर्यर्हि निमीलिताऽसि नयने
हे भ्रातः! जब तुम दोनों नेत्र बन्द करोगे (मृत्यु को प्राप्त होवोगे) तब तुम्हारे स्त्री, पुत्र, भ्राता एवं विश्वासपात्र सुहृदगण कहाँ रहेंगे? तुम्हारे ग...
नाहन्ता-ममते वृथा कुरु सखे
हे सखे! देह, गृह, स्त्री आदि में वृथा ‘अहं’ ‘मम’ बुद्धि न कर, मोह मात्र ही उत्पन्न करने वाले इन पाशों (जंजीरों) को गुरुवाक्यों द्वारा तोड़। समस्त साम्...
गरियो मौलीनामहमहह तेषां चरणयोः कृतः
अहो! जिन श्रीराधा प्रिय रसमय दिव्य चरितामृत स्रोत मुझे इस श्रीवृन्दावन में ले आया है, उन महापुरुषों में भी शिरोमणि जो रसिक महापुरुष हैं उन राधा प्रिय ...
श्रीमद् वृन्दावनने रत्नवल्लीवृक्षै
रत्नमय लता-वृक्षों से मण्डितविचित्र ज्योत्स्ना विस्तार करने वाले आनन्द मय पुष्पों से व्याप्त श्रीवृन्दावन में स्वर्ण-स्थली से शोभित कदम्ब की छाया में ...
यशोभिः पूरिता आशा कृतं विश्वानुरंजनम्
अनेक यश-कीर्त्ति से दशों दिशाएं पूर्ण हो चुकीं, विश्व का अनुरंजन (प्रससन्न करना) भी कर दिया, किन्तु हाय! श्रीवृन्दावनाधीश (श्रीयुगल-किशोर) की ओर देख म...
किं करोम्यहमुन्मत्तो यत् किंचत प्रलपाम्यलम्
क्या करूँ? मैं तो पागल हो गया हूँ। जो कुछ प्रलाप करता हूँ- उससे ही क्या होगा? श्रीवृन्दावन के (आश्रय) बिना ज्ञान, भक्ति, वैराग्य आदि सब व्यर्थ हैं।
अपि सर्वधर्महीनः सर्वकुकर्मावलेश्च निर्माता
सर्व धर्महीन होकर भी, सब कुकर्म करते हुए भी, ‘‘राधा’’ इन दो अक्षरों का सिद्ध-मन्त्र उच्चारण करके क्या तू भजन की सिद्धि को प्राप्त नहीं कर सकता?
नित्यं कामः किमपि कुरुते दुसहां
हे श्रीवृन्दावन! काम, कैसी कैसी असह मर्म-पीड़ा नित्य देता है, क्रोध, कितना अन्धा कर देता है, लोभ भी अत्यन्त क्षुभित करता है और दम्भ, असूया, मद, पिशुनत...
वृन्दाटव्यामटनमिह चेत् कोटि
इस श्रीवृन्दावन की परिक्रमा यदि तूने कर ली है, तो कोटि तीर्थ यात्राओं का क्या प्रयोजन? यहाँ के यदि पक्षियों की चहचहाहट तुम्हारे कानों में पड़ गई है तो...
वृंदाटवी जयति कामगवी
लक्ष्मी, शंकर, ब्रह्मा, आदि श्रेष्ठ सुरगण जिसकी अप्राकृत महिमा को कदापि नहीं जान सकते, एक रज-कण के द्वारा ही जो अगणित कामधेनु, कल्पवृक्ष एवं चिन्ता म...
यत्राभङ्गस्मरविलसितैः क्रीडतो दम्पती
जहां निरंतर कामविलास में क्रीड़ा परायण होकर प्रतिक्षण महाश्चर्यमय लाव्यण्य सौन्दर्य राशि का विस्तार करते हुए वही गौरश्यामाङ्ग युगलकिशोर गाढ़ आनन्द पूर...
भो भो धन्य शिरोमर्णे! भगवतः
हे धन्य शिरोमणि! यदि भगवत् चरण-कमलों के एकांतिक प्रेम के अति दुर्लभ परम रहस्य को सम्यक रूप से प्राप्त करने की तुझे इच्छा है, तो तू आद्य आस्वाद्य-रसात्...
राधानन्तापराधात् पततां
जो व्यक्ति श्रीराधा महारानी के प्रति अपराध करता है, वह उस अनंत अपराधों के कारण संसार की बाधाओं रूपी समुद्र में गिरकर उद्धार से वंचित रह जाता है। स्वयं...
आस्तां दुर्मतिकोटिर्दुश्चेष्टा
कोटि-कोटि दुर्बुद्धि आवें अथवा कोटि-कोटि दुश्चेष्टाएँ हो जाएँ या कोटि-कोटि अपयश ही क्यों न हो जाएँ, तथापि हे श्रीवृन्दावन! मैं आपसे विलग कभी न हो जाऊँ...
त्वयाकण्ठं पीतं यदि परमपीयूषमपि
यदि तुमन पेट भरकर अमृत भी पान कर लिया, तो उससे क्या? यदि उर्वशी के स्तनयुगल का तुमने आलिंगन कर लिया, तो क्या? और यदि ब्रह्मानन्द-अमृत का भी भली प्रकार...
त्यक्त्वा वृन्दावनमिदमहो चेद्बहिर्यासि
यदि इस वृन्दावन को त्याग कर तू अन्यत्र जाये, तो सचमुच तू कल्पवक्षों के श्रेष्ठ वन को छोड़ कर सिहोर के जंगल में जाता है। यदि वृन्दावन के रस की कथा को छ...
वरमिह वृन्दारण्ये सुवराकी मदनमोहनद्वारि
इस श्रीवृन्दावन में श्री राधा मदमोहन के दरवाजे पर तुच्छ कुक्करी (कुतिया) होकर भले ही रहूँगा, तथापि और जगह लक्ष्मी की प्यारी सखी अथवा स्वयं लक्ष्मी बनक...
वृन्दावनमनुविन्दाम्यहमपि देहं
श्रीवृन्दावन के कूकर शूकरादि का शरीर भी मैं धारण करूँगा, किन्तु और जगह देवताओं के लिए भी दुर्लभ सच्चिदानन्दमय शरीर को मैं नहीं चाहता।
यावद्राधापदनखमणि चन्द्रिका नाविरास्ते
जब तक श्रीराधा के पद नख की चन्द्रिका श्रीवृन्दावन-भूमि पर आविर्भूत नहीं होती, तब तक चकोर रूपी चित्त को आनन्द नहीं प्राप्त होता, और जब तक श्रीवृन्दावन-...
वृन्दावनैकशरणस्त्यक्तश्रुतिलोकवर्त्मसंचरणः
अहो एक मैं श्रीवृन्दावन की ही शरण ग्रहण करके वेदमार्ग एवं लौकिक समस्त आचरण त्याग कर, कब भावपूर्वक श्रीहरि के चरणों की मानसी सेवा करके मैं व्याकुल होऊं...
पापात्मा पुण्यवान् वा प्रसरदपयशाः
पापी या पुण्यात्मा, प्रसिद्ध अपकीर्त्ति या कीर्त्तिमान, महादरिद्र या महासम्राट, विषम जड़मति या सर्वविद्या-विशारद- तुम जो कुछ भी क्यों नहीं हो, हे सखे!...
रुददपि पितृमातृ-बन्धुपुत्रादिकमपहाय
रोते हुए पिता, माता, बन्धु तथा पुत्रादिकों को भी त्याग कर, (तुम्हारे वृन्दावन जाने में यदि वे स्नेहवश रोते हैं) पूजनीय व्यक्तियों के वाक्यों को सुन ही...
अनन्तैश्चिज्ज्योत्स्ना-रसजलधिपूरस्तत इतो
अननत चित् ज्योत्स्नामय रससमुद्र का प्रवाह इधर-उधर फैलकर गोलोक से अखिल (विश्व को) संप्लावित कर रहा है। यह श्रीवृन्दावन सबके ऊपर विराजमान होकर अति विमल ...
महारङ्कत्वे वा परमविभवे
महा दारिद्र्य में अथवा परम विभुत्व में, महान सुख में अथवा विषम दुःख में, बहुत यश में अथवा अपयश में, मणि में अथवा मिट्टी के ढ़ेले में, परम बन्धु में अथव...
राधादास्य लसद् वपुरनिशं
श्रीराधा दास्य-उपयोगी उज्ज्वल शरीर को पाकर नित्य श्रीराधा पादपद्म से सेवापरायण होकर श्रीराधा रसिक श्री श्यामसुन्दर को संतोषित करते हुए नित्य श्रीवृन्द...
निर्विद्य कृत्वाद्यखिलात् कदाहंच्छित्वा
समस्त कर्तव्यों से निर्वेद प्राप्त कर एवं जगत् की सकल अपेक्षाओं से रहित होकर मैं कब निःसङ्ग भाव से श्रीवृन्दावन में प्रवेश कर श्रीवृन्दावनेश्वरी एवं श...
करनिहितकपोलो नित्यमश्रूणि
नित्य कपोल देश पर हाथ रखे हुए अश्रु प्रवाह करते करते निसंग होकर एवं सेवक-अनुचर रहित हो कर प्रतिक्षण व्याकुलता पूर्वक जो श्रीराधा-कृष्ण के दास्य-रस में...
त्यक्त्वा संगं दूरतः स्त्रीपिशाच्याः
स्त्री-पिशाची का संग दूर से त्याग कर, समस्त वासनाओं को सम्यक् प्रकार से मूल से उच्छेद कर एवं दैवलब्ध-वस्तु, द्वारा देह-यात्रा का निर्वाह करते हुए श्री...
न कुरु न वद किञ्चद्
तुम्हारे लिये कर्तव्य और वक्तव्य कुछ भी नहीं है, दृश्य मान समस्त वस्तुओं को भूल जा, कामातुर उस गौर-नील जोड़ी को स्मरण कर, जिस स्थान पर लोकों का समूह ह...
आशापि नासाद्यत एव राधा-पादारविन्दार्चन
लक्ष्मी आदि देवीगण भी श्रीराधा के चरणकमलों की सेवा की आशा तक भी नहीं कर सकतीं, किन्तु हे वृन्दावन! मैं आपके प्रभाव से किसी भी भाव-योग से प्रबल इच्छुक ...
निर्विद्य कृत्वाद्यखिलात् कदाहंच्छित्वा
समस्त कर्तव्यों से निर्वेद प्राप्त कर एवं जगत् की सकल अपेक्षाओं से रहित होकर मैं कब निःसङ्ग भाव से श्रीवृन्दावन में प्रवेश कर श्रीवृन्दावनेश्वरी एवं श...
अस्तु में नरककोटि
मुझे कोटि नरक भोगने पडे, मनोरथों की प्राप्ति न हो, अथवा ईश्वर मुझ पर दया न करें, किन्तु श्रीराधा चरण कमलों में मेरी लालसा कभी कम न हो।
श्रीमंञ्जीर-ध्वनि मधुरया श्रीपदाम्भोजलक्ष्म्या
सुन्दर मधुर ध्वनि युक्त मंजीर-शोभित श्रीपाद-पद्म की शोभा से, ऊपरी-भाग में गौरकांति तथा तल-देश के रक्तवर्ण माधुर्यप्रवाह से स्फूर्तिशील पादांगद की मणिक...
तदखिल भगवत्स्वरूप-रूपामृत
अखिल भगवत्स्वरूपों के रूपामृत रस से भी अतिशय माधुर्य-मण्डित श्रीराधापद - कमल-रस से पूर्ण वन में भ्रमण करनेवाले उस सुप्रसिद्ध कुवलयवत् (नीलकमलवत् ) विग...
स्पर्शयदाननलोचन हृदये
श्रीराधा जी के सुगन्धित सुशीतल चरण-कमलों का अपने वदन, लोचन तथा हृदय को स्पर्श कराके बार-बार घ्राण करते हुए कोई अनिर्वचनीय श्याम-विग्रह विराजमान है।
राधा-चरण-रणन्मणिनूपुरमूकीकृतां हरेर्मुरलीम्
श्रीराधा के चरणकमलों के नूपुरों के शब्द से मुरली के मूक (शब्द रहित) हो जाने से जब श्रीहरि बार-बार फूँकने पर भी व्यर्थ-मनोरथ हो गये, तब समस्त सखी-मण्डल...
पादांगुलीय-पादांगद-नूपुररत्नरोचिषां वीचीः
श्रीराधा जी के चरणकमलों की अंगुलियों के पादांगद तथा नूपुरों की रत्नमय किरणों से नख-मणिचन्द्र से उच्छलित कांति की उद्भासिता तरगों को देखने की मैं इच्छा...
त्रैलोक्य मोहिनीभिर्नवतरुणीभिर्महाविदग्धाभिः
त्रिभुवन को मोहिन करने वाली महा विदग्धा एवं नवतरुणीवृन्दों की आराध्य सर्वोज्ज्वल श्रीराधाजी का श्रीवृन्दावन में स्मरण कर।
राधापदाम्बुजरस-महामाधुरीमत्त-चेतो
श्रीराधा जी के चरण-कमलों के रस के महामाधुर्य में भ्रमण को उन्मत करके, लोक-प्रसंग तथा वेद-प्रसंग को भी निरतिशय तोड़ कर, किसी मधुरातिमधुर भाव की निरन्तर...
श्रीगान्धर्वा चरणकमलद्वन्द्वलावण्यलीला
श्रीराधा-चरण-कमलों के लावण्यलीला-माधुर्य सागर में मेरा चित्त कब अतिशय मत्त होकर अवगाहन करेगा? समस्त महत् वस्तुओं को यहाँ तक कि मोक्षादि सम्पत्ति को भी...
महामोहिनी कोटि दुर्मोह दृष्टिर्महा
कोटि कोटि महामोहिनी स्त्रियों को भी दुर्मोह दृष्टि से देखता हुआ, कोटि महासिद्धियों में भी दुर्गंध बुद्धि करता हुआ और हृदय में श्रीराधा चरणकमलों की शोभ...
दूरे चैतन्यचरणाः कलिराविरभून्महान्
श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु के चरण तो दूर हैं (उनकी प्राप्ति मेंरे लिये कठिन है) महा कलियुग आ गया!! इसलिये श्रीवृन्दावन की रति के बिना श्रीकृष्ण-प्रेम कै...
भो भो धन्य शिरोमर्णे! भगवतः
हे धन्य शिरोमणि! यदि भगवत् चरण-कमलों के एकांतिक प्रेम के अति दुर्लभ परम रहस्य को सम्यक रूप से प्राप्त करने की तुझे इच्छा है, तो तू आद्य आस्वाद्य-रसात्...
यत्राभङ्गस्मरविलसितैः क्रीडतो दम्पती
जहां निरंतर कामविलास में क्रीड़ा परायण होकर प्रतिक्षण महाश्चर्यमय लाव्यण्य सौन्दर्य राशि का विस्तार करते हुए वही गौरश्यामाङ्ग युगलकिशोर गाढ़ आनन्द पूर...
वृन्दावनैकशरणस्त्यक्तश्रुतिलोकवर्त्मसंचरणः
अहो एक मैं श्रीवृन्दावन की ही शरण ग्रहण करके वेदमार्ग एवं लौकिक समस्त आचरण त्याग कर, कब भावपूर्वक श्रीहरि के चरणों की मानसी सेवा करके मैं व्याकुल होऊं...
क्षणं चरणविच्छेदाच्छ्रीश्वर्याः
क्षण काल के लिए चरण-सेवा त्याग करने पर वह सुन्दरी [राधा दासी] श्रीईश्वरी की प्राण हारिणी हो जाती है, अतः दिनरात वह राधा पद कमल के सन्निकट ही रहती है।