ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
84 itemsश्री राधावल्लभ मंदिर भारत में उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा जिले में वृन्दावन में स्थित है। यह बांके बिहारी मंदिर के पास है। "श्री राधावल्लभ दर्शन दुर्लभं" श्री राधावल्लभ के दर्शन बहुत दुर्लभ हैं। यह कहावत श्री राधावल्लभ मंदिर के बारे में बताने के लिए पर्याप्त है। श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी का जन्म एक गाँव में हुआ था। श्री राधा के दिए हुए निर्देशों के अनुसार उन्होंने श्रीधाम वृन्दावन के लिए प्रस्थान किया। वह भगवान श्री कृष्ण के बांसुरी के अवतार माने जाते हैं। जब वह चार्तवाल गाँव पहुंचे, श्री जी ने उन्हें फिर से निर्देश दिया कि गाँव में एक ब्राह्मण की दो बेटियां है और आपको उनसे शास्त्रीय विधि के अनुसार विवाह करनी चाहिए। श्री राधा रानी ही केवल उनकी गुरु थीं। जब वे केवल छ: मास के थे, तो उनके मुख से श्री राधा सुधानिधि के श्लोक निरंतर प्रकट होते रहे अर्थात कम आयु में ही वे श्री राधा रानी के गीत गाया करते थे। श्री राधावल्लभ इतिहास: आत्मदेव ब्राह्मण के पूर्वजों ने कैलाश पर्वत पर भगवान् शिव के लिए तपस्या की थी। भगवान शिव प्रसन्न हुए और अपनी इच्छा का आशीष पाने के लिए कहा। उन आत्मदेव ब्राह्मण के पूर्वजों पर बहुत अधिक जोर दिया अथार्त भगवान शिव से उन्हें अपनी इच्छा अनुसार वर मांगने के लिए कहा। जिसपर उन्होंने भगवान शिव की सबसे प्रिय वास्तु के लिए पूछा (उन्होंने भगवान शिव से पूछा की किस कार्य को करने में आपको अति रस की प्राप्ति होती है। तब भगवान शिव ने उन्हें अपने हृदय से श्री राधावल्लभ जी महाराज की मूर्ति दी और उन्हें अपनी सेवा की विधि बताई। श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने इस विधि को अपनाया, और वृन्दावन आने पर यमुना के तट पर 'ऊँची ठौर' (हाई क्लिफ) (मदन टेर) पर स्थापित किया था। कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर) के महीने के शुकल पक्ष की तेरह तारीख को श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी महाराज ने श्री राधावल्लभ जी की सेवा की शुरुआत की और उत्सव मनाया। श्री राधावल्लभ जी शुरू में मदन टेर पर विराजमान थे, फिर वे सेवा कुंज में चले गए। बाद में जब इस नए मंदिर का निर्माण हुआ, तब से यहाँ विराजमान हो गए। श्री राधावल्लभ लाल के संग श्री राधा का श्रीविग्रह नहीं है। लेकिन इसके बजाय वेदी पर एक मुकुट विराजमान है। जिसे श्री राधिका की पूजा की जाती है। इसके अलावा श्री राधावल्लभ श्रीविग्रह में श्री राधा और श्री कृष्ण, दोनों का युगल स्वरुप ही माना जाता है। श्री विग्रह की त्रिभंग मुद्रा, चंचल अरूण नयन , मन्द-मन्द मुस्कान, सुंदर श्याम स्वरुप, हर अंग मन को आकर्षित करती है। जब श्री कृष्ण मुरली बजाते हैं तो सभी गोपीयों को आकर्षित करते हैं। इसी तरह मुरली के अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी के ही नियंत्रण में यह है, की युगल सरकार का मिलन कराएं और रस की निर्झरण हो। मंदिर का समय: गर्मी सवेरे 5:30 बजे - मंगला आरती सवेरे 8:15 बजे - श्रृंगार आरती दोपहर 12:45 बजे - राजभोग आरती शाम 5:30 बजे - संध्या आरती शाम 9:00 बजे - शयन आरती समाज गायन - [7:30 PM] सर्दी सवेरे 7:00 बजे - मंगला आरती सवेरे 8:30 बजे - श्रृंगार आरती दोपहर 12:30 बजे - राजभोग आरती शाम 5:30 बजे - संध्या आरती शाम 8:15 बजे - शयन आरती समाज गायन - [7:00 PM]
बने दोउ रसिक बिहारी बिहारनी
(पद) बने दोउ रसिक बिहारी बिहारनी रूप भरे गुन भरे। अंग अंग सोहें रंग भीने अभरन रतन जरे॥ पहरें बसन सुबरनी छबि मनहरनी ढरनि ढरे। श्रीहरिप्रिया बैठे सिंहास...
कबहु सेवा कुंज में बनू मैं श्याम तमाल
ऐसा कब होगा कि मैं वृंदावन में सेवा-कुंज में एक तमाल वृक्ष बन जाऊँ, जहाँ ललित युगल श्री राधा-कृष्ण उस वृक्ष तले एक-दूसरे का हाथ पकड़कर विहार परायण हों...
श्री पौर्णमासी पूरी तरह से श्री राधा कृष्ण के लिए भोग की सबसे उत्तम व्यवस्था करने में सक्षम हैं। व्रजवासियों द्वारा इनके चरण कमलों की पूजा की जाती है। स्थान: श्री योगमाया पौर्णमासी देवी (अन्नपूर्णा देवी) मंदिर वृंदावन में सेवा कुंज के पास स्थित है।
हे किशोरी जी, मेरी यह अभिलाष पूर्ण कर, मुझे सेवा का सुख प्रदान करिए। आप सुंदर शैया पर विश्राम करिए एवं मैं आपके चरणों की प्रेम पूर्वक सेवा करूँ। [1] हे सुंदरी, मैं आपकी उंगलियों को चटकाऊँ, आप मेरे हृदय में सेवा सुख को बढ़ा दीजिए। श्री प्रेम सखी कहती हैं कि आपके गुणों को गा गा कर, आपकी प्रशंसा गान कर [रीझ रीझ] कर सुख पाऊँ। [2]
हे श्रीराधे! मुझे अखंड वृंदावन धाम का वास प्रदान करें, जहाँ मैं प्रतिदिन यमुना तट पर स्नान कर सकूँ। [1] जहाँ गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा करूँ और ब्रजभूमि के पावन दर्शन से अपने जीवन को सफल बना सकूँ। [2] जहाँ सेवाकुंज की आरती में सम्मिलित होऊँ और अंततः ब्रज की परम-पावन रज में ही विलीन हो जाऊँ। [3] हे श्रीराधे! मुझ पर ऐसी कृपा करें कि मैं वृंदावन छोड़कर कभी बाहर न जाऊँ। [4]
जीवनि धन राधा वल्लभ लाल
॥पद॥ जीवनि धन राधा वल्लभ लाल। कृष्ण वल्लभा रसिकिनि राधा वारिज बदनी बाल॥ [1] जुगल किसोर किसोरी जोरी गोरी स्याम तमाल। बसहु निरन्तर हियें श्रीहरिप्रिया आ...
पुण्य का प्रताप उदय होता कई जन्मों का
अनेक जन्मों के पुण्य का फल तब प्राप्त होता है जब किसी मनुष्य को एक बार ब्रज में आने का अवसर मिलता है। [1] सेवाकुंज, वंशीवट, कालीदह आदि को देख-देखकर ...
सेवाकुञ्ज जाके ब्रजधूल को चढ़ाओ शीस
वृंदावन के सेवाकुंज वन में जाओ और वहाँ की पावन रज को अपने सिर पर लगाओ; वहाँ सुहावने तमाल वृक्षों का सौंदर्य निहार लो। [1] बंशीवट में श्री बांके बिहा...
हे श्री राधा, आपके चरण कमल पुष्प के समान कोमल हैं और माखन की भाँति चिकने हैं, जिन पर दृष्टि पड़ने से ही हृदय में प्रेम की वर्षा होने लगती है। [1] आपके विमल और अनुपम चरण कमलों को निहारने पर श्री कृष्ण रसमयी सृष्टि में डूबने लगे हैं। [2] मनमोहन श्री कृष्ण, मन को मोहने की कला भी भूल जाते हैं, श्री राधा के चरण कमलों के ऐसे प्रभाव को देखकर वे कोटि-कोटि रतियों को न्योंछावर करने लगते हैं। [3] श्री प्रियादासी जी कहतीं हैं कि सेवा कुञ्ज में श्री कृष्ण श्री राधा के चरणों की सेवा अनोखी भाँति से कर रहे हैं, जिसका मैं लताओं की ओट से दर्शन कर रही हूँ। [4]
अलक-लड़ैती लाड़ली, अलक लड़ौ सुकुंवार
लाड़ करने योग्य या तो लड़ैती जू (राधा) हैं या इनके प्यारे लाड़िले सुकुमार हैं, या यह सुंदर निज महल या इन दोनों का नित्य विहार ही लाड़ करने योग्य है।
बाल्यकाल : भोलानाथजी के जीवन-संबंधी एक बड़ी ही प्रेरणास्पद घटना है। भोलानाथजी को बचपन से भग्वद्प्रप्ती की धुन थी। इसके लिए योग्य गुरु की खोज के लिए ये घर से निकल पड़े। दो सप्ताह की निरन्तर खोजबीन के बाद ये नरसिंहपुर जिले के एक वन में पाए गये। उस समय इनके बड़े भाई बैजनाथजी कोलारस जिला शिवपुरी में नाजिर थे। बैजनाथजी भोलानाथ जी को घर ले आये। दीक्षा : कोलारस में ही श्रीकृष्ण का एक मन्दिर था। इनके भाई बैजनाथजी ने मंदिर के सेवाधिकारी पं. गोपालजी से भोलानाथजी को राधावल्लभ-सम्प्रदाय में दीक्षित करवा दिया। शिक्षा एवं विवाह : श्री भोलानाथ जी को गृहस्थ जीवन में कोई रूचि नहीं थी लेकिन राधावल्लभ-सम्प्रदाय में दीक्षित हो जाने के बाद भोलानाथजी ने अपने गुरु की आज्ञा शिरोधार्य कर गृहस्थ जीवन में रहते हुए उपासना करना स्वीकार कर लिया और विवाह न करने का अपना हठ छोड़कर वैवाहिक जीवन व्यतीत करने के लिए सहमत हो गये। भोलानाथजी जब बी.ए. के विद्यार्थी थे, तब इन्होंने अखिल भारतीय रामायण-प्रतियोगिता में भाग लेकर मर्यादापुरुषोत्तम राम पर एक लेख लिखा और उस पर प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया। इस प्रकार एक प्रतिभावान् गृहस्थ के रूप में इनकी ख्याति बढ़ती गयी। छतरपुर के राजा विश्वनाथ जी के यहाँ नियुक्ति एवं राजकीय ग्रंथालय से वाणियों का परिचय : श्री भोलानाथ जी के धार्मिक वैदुष्य से आकृष्ट होकर छतरपुर-नरेश विश्वनाथ सिंह ने इनको अपना धार्मिक परामर्शदाता नियुक्त किया। उस समय तक राजा विश्वनाथ सिंह ने राधावल्लभीय सम्प्रदाय की वाणियों का संग्रह कर लिया था। छतरपुर-नरेश के यहाँ इनका कार्य मात्र राजासाहब से धार्मिक चर्चा करना था। यहाँ इनको स्वाध्याय का बहुत समय मिल जाता था। यह इनके लिए बहुत अच्छा सुयोग था। राजकीय ग्रन्थालय का सदुपयोग करते हुए इन्होंने भक्तों की वाणियों के साथ ही भारतीय दर्शन का भी गहन अनुशीलन किया। कुछ समय बाद ये छतरपुर राज्य की नौकरी छोड़कर भेलसा चले गये। पत्नी, पुत्र एवं पिता की मृत्यु के बाद वृन्दावन आगमन : भेलसा में रहकर इन्होंने वकालत आरम्भ की। कुछ दिन बाद भेलसा से अपने भाई के पास कोलारस जाकर वकालत की, किन्तु वहाँ भी इनका मन नहीं लगा। तब राजा साहब के आमन्त्रण पर ये पुनः छतरपुर चले गये। लेकिन इनका मन ब्रज में स्थित प्रेम रस धाम वृन्दावन का अबिचल वास प्राप्त करने, कदम्ब के वृक्षों की छाया में बैठकर जुगल-नाम का निरन्तर भजन करने, ब्रजवासियों का जूँठन प्रसाद खाने, यमुना जल का पान करने, रसिकजनों का सत्संग-लाभ प्राप्त करने एवं उनके द्वारा समाज-गान में गाये जाने वाली प्राचीन रसिकों की रस भरी पदावलियों को सुनने, कुंज- निकुंजों में डोलने एवं प्रातःकाल के समय वहाँ की सोहनी-सेवा करने एवं श्रीप्रिया-लालजू के साक्षात् दर्शन प्राप्त करने आदि के लिये अतिशय लालायित हो उठा था, जिसका उल्लेख इन्होंने एक पद में इस प्रकार किया है - दीजै मोहि वास ब्रज माहीं। जुगल नाम कौ भजन निरन्तर, और कदम्बन छाहीं॥ इन्हीं दिनों इनके पुत्र और पत्नी का देहान्त हो गया। कुछ समय बाद पिताजी भी चल बसे। अब ये अपने ग्रहस्थ धर्म से मुक्त होकर वृन्दावन चले गये और फिर शेष जीवनभर ये वहीं साधना करते रहे। वृन्दावन में आने के पश्चात् श्रीभोलानाथजी ने श्रीराधावल्लभजी के मन्दिर के रासवंशीय सेवाधिकारी श्रीहित गोवर्धनलालजी महाराज से राधा-चरण-प्रधान, नित्य- विहार-प्राण, वृन्दावन-रसोपासना के निज मन्त्र की दीक्षा प्राप्त की और रस-भजन-भावना में अनन्यता के साथ संलग्न हो गये। इस तथ्य का उल्लेख श्रीहित किशोरीशरण 'अलि' जी ने 'श्रीहित अनन्य 'रसिकावली' में निम्न प्रकार से किया है गुरु गोवर्द्धनलाल, चरण सेये नीकी विधि। रीझे परम दयाल, दई करि कृपा सु हित निधि॥ रहत भावना छके, आठ हू जाम जुगल की। गिरा मधुर में छलकी अरु नैंननि में झलकी॥ अब भोरी सखि होइ कैं, रहत सखिन के साथ जू। परम रसिक इहि काल में, भये श्रीभोलानाथ जू॥ श्री भोलानाथ जी का सेवाकुंज से प्रेम : श्रीभोलानाथजी का सेवाकुंज से विशेष लगाव था। इन्होंने सेवाकुंज मन्दिर में विराजमान चित्रपट-सेवा में छिपे हुए भाव को स्पष्ट करते हुए कहा है कि रसिक प्रीतम श्रीलालजी के प्रति लाड़ से भरी हुई श्रीलाड़िली जी ने प्रथम मिलन की लज्जा के कारण अपने नेत्रों को अपने श्रीचरणों में गढ़ा रखा है तथा उनके पद-संवाहन की लोल लालसा लिये श्रीलालजी के नेत्र भी उनके श्रीचरणों को लालच से भरे होकर देख रहे हैं। जैसे ही दोनों की दृष्टि एक दूसरे से मिलती है, तभी श्रीलालजी श्रीप्रियाजी की मौन स्वीकृति प्राप्तकर एवं श्रीप्रियाजी के श्रीचरणों को अपने हृदय में धारणकर, उनके श्रीचरणों को चाँपने की सेवा ललित रीति से प्रारम्भ कर देते हैं तथा उन्हें चूम-चूमकर उनकी बलिहारी लेने लगते हैं।जैसा उन्होंने इस पद में व्याख्या की है: लाड़ भरी मुसिकात लजीली, झुकि देखत निज पाँय। लालच भरे लाल के लोचन, ललक रहे तहँ छाय॥ युगल वदन संगम अति सुन्दर, पद पंकज उर लाय। लालत ललित लाड़िली 'भोरी', चूमि-चूमि बलि जाय॥ श्रीभोलानाथजी प्रतिदिन प्रातः काल में सेवाकुंज एवं वृन्दावन की कुंज गलियों में झाड़ने-बुहारने का कार्य अत्यन्त प्रीति के साथ किया करते थे। इस बात का उल्लेख इन्होंने एक दोहे में इस प्रकार किया है - या तन हू में प्रीति सौं, तुमही कौं दुलरात। श्री वन वीथिनु रमत हैं, लिये सोहनी हाथ॥ श्री भोरी सखी की प्राण वृंदावन की रज है जो साक्षात श्री कृष्ण की भी प्राण है, जो उनके लिए साधारण न होकर उनके प्राणों के समान प्रिय है : कण-कण में जा रेणु के, बसत लाल के प्रान। हाय सोहनी ताहि याँ, साधारण मत मान॥ - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (435.6) श्रीहित भोरीसखी जी कहते हैं कि अरी सोहनी श्रीप्रियाजी के श्रीचरणों की इस रज के प्रत्येक कण में श्रीलालजी के प्राण निवास करते हैं। अरी सोहनी इसे साधारण समझने की भूल मत कर। भोरी सखी के लिए श्री राधा का स्वप्नमें सेवाइतको आदेश देना : भोलानाथजी की मनोस्थिति ऐसी थी कि वह अपनी जीविकोपार्जन के लिए न तो कुछ कर सकते थे, और न ही किसीसे कुछ मांग सकते थे ,जो करुणामई राधारानीजी की शरण में हो उसे किसीसे कुछ मांगने की आवश्यकता भी क्या। उन्होंने इसके लिए एक सुंदर युक्ति निकाल ली, सेवाकुंज में यात्री बंदरों को चने डाल जाते थे, अच्छे चने तो वे खा लेते थे और ठुड्डी छोड़ देते थे, उसी ठुड्डी को खाकर भोलानाथजी अपनी क्षुधानिवृत्ति कर लिया करते थे। परंतु स्वामिनीजी को यह बात कैसे सहन हो सकती थी कि उनका प्यारा भक्त ठुड्डी खाकर रहे, उन्होंने राधाबल्लभ मंदिर के सेवाइत को स्वप्न में आदेश दिया कि, भोरीसखी सेवाकुंज में चनों की ठुड्डी खाकर रह रही है, उसे मेरा प्रसाद प्रतिदिन लेजाकर दे दिया करो। स्वामिनीजी की कृपा से भोरीसखी के सुंदर भोजन की व्यवस्था हो गई, उन्हें बढ़िया से बढ़िया प्रसादी भोजन नित्य मिलने लगा, पर भोरीसखी राधारानीकी इतनी सी कृपा से भुलावे में आनेवाली नहीं थी। वे प्रसाद की थाल से मात्र 2 रोटी रख कर पूरा प्रसाद यमुना जी में अर्पित कर देती थीं। और उल्टा श्री राधारानी को उलाहना देने लगी कि तुम्हारी इस तुच्छसी कृपा से मेरा क्या होगा, तुमने कभी मुझसे यह भी पूछा है कि मैं चाहती क्या हूं [वह तो श्री राधा के दर्शन के लिए व्याकुल थे]? तुमने आज लौं बात न पूछी, को द्वारे चिल्लात न पूछी। जीवन बीत्यौ गोद पसारे, कहा लोभ ललचात न पूछी॥ मैं नित हौंस भरी कहिबे की, हंसि कबहूं कुसलात न पूछी। कोटि उपाय कियै पै तुमने, का सोचत दिन रात न पूछी॥ कैसे कटत दिवस-निसि तेरे, का दुख सूखत गात न पूछी। भोरी दीन दुखी आरत सौं, विहंसि हृदयकी बात न पूछी॥ "मैंने तो अपनी ओरसे सारे नाते तुमसे ही मान रखे हैं पर मुझे संदेह है क्या तुम भी मुझे अपनी चेरी मानती हो ? यदि तुम मुझे अपना मानती तो मेरी सुध अवश्य लेती, मुझसे पूछती कि भोरी आखिर तू चाहती क्या है ?" श्रीभोलानाथजी का नाम से प्रेम : श्रीभोलानाथजी की हित स्वरूप हरिवंश-नाम-स्मरण में गहरी आस्था थी। इनकी मान्यता थी कि जब तक श्वाँसों की माला के प्रत्येक मनके रूपी श्वाँस के साथ हरिवंश-नाम का उच्चारण नहीं किया जाता, तब तक नामी के निज स्वरूप और उनके नित्यविहार का दर्शन प्राप्त करना असम्भव ही है - नाम-स्वाँस दोउ विलग चलत हैं, इनकौ भेद न मोकौं भावै॥ स्वाँसहि नाम नाम ही स्वाँसा, नाम स्वाँस कौ भेद मिटावै। बाहिर कछु न कछू तब भीतर, जिय और नाम एक ह्वै जावै॥ तब निज रूप नाम कौ प्रगटै, तन में श्री वन सहज दिखावै। भोरी सखी का राधा-कृष्ण के दर्शनों की लालसा : भोरी सखी नित्य ही श्री श्यामा श्याम से उनके मिलने की प्रार्थना करती है - "श्री राधावल्लभ रंग भरे लाल। कबहूँ मोहि कृपा कर हेरौ, चरण शरण प्रतिपाल॥" "कोमल चित मन मोहन, कब मेरी सुरति करैहौ।" "कबहूँ मोहि उमगि अपनैहौ।" "व्याकुल मन कबहूँ समझावौ। हित हरिवंश किशोर कृपानिधि, सपने दरस दिखावौ॥" भोरी सखी का श्री राधा के प्रति अनन्य प्रेम : श्री राधा के प्रति प्रेम उनका स्वाभाविक था। वे श्री राधा से कभी विनती करते हैं, तो कभी उलाहना देते हैं, उनके कुछ पद निचे दिए गए हैं - "पतित पावनी प्यारी हमारी।" "सर्वोपरि म्हारी महारानी।" "करुणाधाम कृपालुकिशोरी।" "जानत प्रीति की रीति किशोरी।" भोरी सखी का श्री वृन्दावन वास की उत्कट अभिलाषा : भोरी सखी श्री वृन्दावन वास की उत्कट अभिलाषा में यह कह रहे हैं की "कब मुझे श्री वृन्दावन का वास प्राप्त होगा ? जहाँ नित्य श्री श्यामाश्याम विहार करते हैं।" "कब बसिहौ ब्रज बीथीन माहीं। जहँ नित डोलत जुगल लाडिले, दिये विमल गलबाहीं।" "कब बसिहौं ब्रज कुंजन माहीं।" "दीजौ मोहि वास ब्रज माहीं।" "श्री वृन्दावन तोहि करूँ परनाम।" ग्रन्थ रचना : श्री भोलानाथ जी के द्वारा रचित कुल 600 पद प्राप्त होते हैं जो "प्रेम की पीर" नामक ग्रन्थ में संकलित हैं जिसमें अधिकतर विनय के पद हैं। श्रीभोलानाथजी वृन्दावन आने से पूर्व पद रचना करने लग गये थे। इन्होंने अपनी रचनाओं में 'भोरी', 'हित भोरी' एवं 'भोरी हित' छाप प्रयुक्त की है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि इन्होंने पद रचनायें प्रारम्भ करने के पूर्व ही राधा-किंकरी-भाव से अनुभावित होकर अपना नाम श्रीहित भोरीसखी जी रख लिया था। वृन्दावन आने से पूर्व में रचित अधिकांश पदों में जहाँ इन्होंने स्वयं को पोच, पामर, पतित, कामी, कुटिल, दुष्ट दुर्भाग्यशाली एवं शठ आदि बताते हुए स्वामिनी श्रीराधा से अपना उद्धार करने, सखी परिकर में सम्मिलित कर विविध सेवाओं को प्रदान करने आदि की वकीलों की तर्क पूर्ण भाषा-शैली में अनुनय-विनय की है, इन पदों में एक सच्चे भक्त-हृदय की व्याकुलता एवं प्रेम की पीड़ा की झलक देखने को मिलती है; वहीं वृन्दावन आने के पश्चात् रचित हितोत्सव, होली आदि के पदों में 'हित' को पूर्ण परात्पर तत्व एवं गो. श्रीहित हरिवंशचन्द्र जी को हितावतार उद्घोषित किया गया है, ये पद अधिक प्रौढ़, शान्त-प्रकृति एवं भाव-गाम्भीर्य को लिये हुए हैं, फिर भी इनमें प्रेम की नैसर्गिक पीड़ा की अभिव्यक्ति हुई है। श्रीभोलानाथजी ने वृन्दावन में रहते हुए पद साहित्य के सृजन के साथ-साथ ब्रह्मसूत्र पर हिन्दी में भाष्य एवं राधाबल्लभीय प्राचीन रसिकों के अनेक ग्रन्थों की टीकायें भी लिखी है। रस भारती संस्थान, वृन्दावन में इनके द्वारा लिखी गई गो. श्रीहित हरिवंश चन्द्र जी की 'राधा(रस)-सुधा-निधि', गो. कृष्णचन्द्र जी की 'राधा उप सुधा निधि', गो. वृन्दावनदास जी के 'अध्ववि निर्णय', गो. ब्रजलाल जी के 'सेवा विचार', गो. प्रियालाल जी के 'उत्सव निर्णय' एवं श्री लाड़िलीदास जी की 'सुधर्म बोधिनी' की टीकाऐं संग्रहीत हैं। लीला संवरण : "इनहीं नैंननि सब सुख देखें। जीवन जनम सुफल करि लेखें॥" के अनुसार यद्यपि श्रीभोलानाथजी ने पूर्ण परात्पर तत्व हित किंवा प्रेम की रसमय उपासना पद्धति को अपनाकर, अनन्यता के साथ भजन-भावना पूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए, इसी जीवन में ही प्रेम की अद्वय युगल मूर्त्ति श्रीहित लाड़िली-लाल के प्रेम-रस-धाम श्रीवृन्दावन में चल रहे अविचल विहार को संप्राप्त कर लिया था; तथापि ये श्रीप्रियाजी से अति आकुलता एवं व्याकुलता के साथ प्रेमविह्वल होकर नित्य निकुंज में सहचरि वपु प्राप्त कर उनकी सेवा करने के लिये उत्सुक एवं आतुर ही नहीं बने रहे, अपितु उनसे अनुनय-विनयपूर्वक आग्रह के साथ निवेदन भी करते रहे। श्रीप्रियाजी ने इनकी विनम्र प्रार्थना एवं इनकी हार्दिक लालसा को देखते हुए, 42 वर्ष की अल्पायु में ही, 1932 की आषाढ़ शुक्ला षष्ठी के दिन, इन्हें अपनी छत्र-छाया में सदा रहने वाले अनन्तानन्त सखी परिकर में सम्मिलित कर लिया। किसी कवि हृदय रसिक ने प्रेम की पीड़ा से व्यथित इनके चारु चरित्र का प्रशस्ति-गान इन शब्दों में किया है - जाके प्रानन संग, प्रेम की पीड़ा आई। प्रानन ही में रमी, कछुक नैंनन में छाई॥ पीड़ा ही में, प्राननाथ के दर्शन पाये। जुग-जुग के प्यासे नैंना, छबि देखि सिहाये॥ सही सराहि-सराहि कैं, कठिन प्रेम की पीर। बिक जान्यौ बिनु मोल ही, हित भोरी मति धीर॥
गैल श्रीवृन्दावनकी गहिये
श्री वृन्दावन के मार्ग में ही अनन्यता पूर्वक बढ़ना चाहिए। सेवाकुंज के कोने में बैठे युगल किशोर श्री राधा कृष्ण की छवि को निहारना चाहिए। [1] श्री ललित ...
जन्म हुआ भाग्य से पवित्र भूमि वृन्दावन
ब्रजवासी बालक कहता है: जहां जन्म लेने के लिए देवताओं का राजा भी तरसता है ऐसी पवित्र भूमि श्री धाम वृंदावन में भाग्य से हमारा जन्म हुआ है। [1] यह वही...
सखी हों राधा चरण उपासी
श्री राधा की एक अंतरंग सखी दूसरी सखी से कहती है: हे सखी, मैं तो श्री राधा चरणों की ही दृढ़ उपासी हूँ। उनके चरणों के अनन्य बल के गर्व से ही दिन रात भरी...
जय राधे जय सब सुख साधा
जय राधे जय सब सुख साधा जय जय कमल नैन बस करनी । जय स्यामा जय सब सुख धामा जय जय मन मोहन मन हरनी । । जय गोरी जय नित्य किसोरी जय जय भागनी भरी सुभामिनी । ज...
नव निकुंज रसदायिनी, करुणामयी रसपुंज
नव-निकुंज रस का दान करने वाली, परम करुणामयी रस की धाम, श्री हित गोपाल को सुख देने वाली स्वामिनी श्री राधिका सेवाकुंज में विहार करती हैं।
प्रिया छवि बार बार कालिन्दी की धारधार
श्री प्रिया जी की रसमयी छवि को बार बार निहार, जहां कालिन्दी [यमुना] की लहरें हिलोरे ले रही हैं और जिनके के अंग संग चार दोनों तरफ़ चार चार सखियाँ खड़ी ...
हमारी सर्वस राधारानी
मेरी सर्वस्व तो केवल श्री राधारानी ही हैं जिनकी कृपा से ही मुझे उनकी राजधानी श्री धाम वृंदावन का वास मिला है। [1] मुझ निर्धन का धन तो केवल राधारानी ह...
वारि डारौं विश्व सेवाकुंज के विहार पै - अभे राम वृंदावन के सेवा कुंज के विहार पर पूर्ण विश्व को न्यौछावर कर दो।
वृंदावन के इन कुंजों में श्री राधा कृष्ण नित्य ही विहरण करते हैं। सेवा कुंज अद्भुत छवि को बरसाता है, जहां जहां भी दृष्टि जाती है वहीं ह्रदय प्रेम से रोमांचित हो उठता है। [1] श्री युगल किशोर रूप एवं रस में छके घूमते हैं जिनको निहार निहार कर सखियाँ ह्रदय से फूली फूली रहती हैं। श्री प्रेम सखी अपने गुरुदेव श्री कृष्ण अली जी की कृपा की आकांक्षा करती हैं, जिससे वे सदा इस दिव्य जोड़ी के प्रेम में वे सदा अनुरक्त रह सकें। [2]
कृष्णरूप श्रीराधिका, राधे रूप श्रीस्याम
श्री राधिका कृष्ण-रूप हैं और श्री श्यामसुंदर श्री राधा-रूपा हैं। ये दोनों दर्शन-मात्र को तो दो हैं, परंतु तत्त्वतः ये दोनों सुख-धाम एक ही हैं।
कौन दिन होगा नाथ
हे नाथ, ऐसा कौन सा दिन होगा जब मैं वृन्दावन में बसूँगा ? जहाँ नित्य प्रातःकाल उठकर श्री यमुना जी में स्नान करूँगा। [1] मैं नित्य हरेकृष्ण ! हरेकृष्ण ...
परिचय: श्री अभयराम जी जाति के गौरए ठाकुर थे। ये श्री वृन्दावन के दुसायत मुहल्ले में रहते थे। उस समय के बड़े-बड़े ज़मीनदारों में मुखिया के रूप में देखे जाते थे। कवि-गोष्ठियों में इनका बहुत सम्मान था। इनके अनेक पद वृन्दावन वासियों को बहुत प्रिय हैं और आज भी बड़े उत्साह से गाये जाते हैं। दीक्षा: श्री अभयराम जी जगद्गुरु निम्बार्काचार्य श्री 'श्रीजी' श्री निम्बार्कशरण देवाचार्य जी के शिष्य थे। रचना: श्री अभयराम जी ने अनेक पदों की रचना की है जो ‘श्रीवृन्दावन रहस्य-विनोद' ग्रन्थ में संकलित है जिसके तीन अनुभाग हैं। इस पुस्तक में वृंदावन से संबंधित हर वस्तु एवं प्राणी की वंदना की गई है। इसमें वृन्दावन के गोपीश्वर महादेव, वृन्दादेवी, काली मर्दन, मदनगोपाल, युगलबिहारी, मनमोहन, कुञ्जविहारी, राधामोहन, दूसरे कुञ्जविहारी, राधामाधव, राधाकान्त, राधावल्लभ, अटलबिहारी (नागाजी की कुञ्ज, बिहारघाट) रसिकविहारी, जुगलकिशोर, छैलचिकनियां, गंगामोहन, चीरविहारी, नवलगोबिंद, यशोदानन्दन, राधारमण, साखी गोपाल, चतुरशिरोमणि आदि अनेक मंदिरों की चर्चा है। इनके अध्ययन से इन मंदिरों की तत्कालीन स्थिति का परिचय भी मिलता है। वृद्ध माताओं के प्रति भाव: साधकों में सर्वप्रथम श्री अभयराम जी की दृष्टि उन डुकरियों (वृद्ध माताओं) की ओर जाती है जो अत्यन्त वृद्ध हैं, अकिंचन हैं। ठंड में भी सिकुड़ती हुई नित्य यमुना स्नान करने जाती हैं। ऐसी दीखती हैं मानों एक-दो दिन में ही इनका देहावसान हो जायेगा - धन धन वृन्दावन की डुकरियां। प्रात होत जमुना को जायें, सुकरी जाँय सुकरियां॥ आसन बासन घर में नाहीं, नाहीं हँडिया परियां। अभयराम ये हू बड़भागिनि, इनकी त्यार लकरियां॥ - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (54) श्री वृन्दावन की वृद्ध माताएं धन्य हैं, जो प्रातः काल ही सिकुड़ते हुए यमुना स्नान करने जाती हैं। इनके घरों में न कोई वस्त्र है न पात्र, लेकिन फिर भी ये बड़ी भाग्यशाली हैं क्योंकि ये श्री वृन्दावन की रज में ही शरीर त्याग करेंगी। वृन्दावन के प्रति श्रद्धा: श्री नागरीदास जी के 'वन-जन-प्रशंसा' ग्रन्थ की शैली में श्री अभयराम जी ने भी वृन्दावन के चींटी जैसे तुच्छ से तुच्छ प्राणियों तक की प्रशंसा में अनेक पद बनाये हैं, जिससे इनके वृन्दावन के प्रति अटूट प्रेम का परिचय प्राप्त होता है। उदाहरण के लिए - एक व्रज-रेणुका पै चिन्तामनि वारि डारों, लोकन को वारों सेवाकुञ्ज के विहार पै। लतन की पातन पै कल्पवृक्ष वारि डारों, रम्भाहू को वारि डारों गोपिन के द्वार पै॥ व्रज पनिहारिन पै शची रती वारि डारों, बैकुण्ठहिं वारि डारों कालिन्दी धार पै। कहैं अभयराम एक राधेजू को जानत हौं, देवन को वारि डारौं नन्द के कुमार पै॥ - श्री अभयराम अनगिनत इच्छा-पूर्ति चिन्तामणियों को ब्रज की रज के एक कण पर न्यौछावर किया जा सकता है। वृंदावन के सेवा कुंज के विहार पर पूर्ण विश्व को वारा जा सकता है। इच्छा पूर्ति करने वाले अनगिनत कल्प वृक्षों को ब्रज की लता पता पर वारा जा सकता है। अप्सराओं की रानी ‘रम्भा' को गोपियों के द्वार पर न्यौछावर कर दो। कामदेव की पत्नी ‘रति' और इंद्र की पत्नी (स्वर्ग की रानी) ‘सचि' को ब्रज की पनिहारिन (जो ब्रज में पानी भरने की सेवा करती हैं ) पर न्यौछावर कर दो। भगवान् नारायण का पूरा वैकुण्ठ धाम ही न्यौछावर कर दिया जा सकता है यमुना रसरानी पर। 'श्री अभय राम' कहते हैं, "मेरी आराध्या एकमात्र श्री राधा हैं, मैं उनके अतिरिक्त किसी और को सपने में भी नहीं जानता, और नंद के पुत्र श्री कृष्ण पर समस्त भगवान् के अवतारों को ही न्यौछावर किया जा सकता है (जो स्वयं श्री राधारानी की शरण में हैं )।" श्री अभयराम जी का श्री यमुना जी एवं वृन्दावन की लताओं से प्रेम: धन धन वृन्दावन की लता प्यारी। फूले कदम माधुरी लपटी कोयल बोलत कारी॥ [1] छहौ राग छत्तीस रागिनी कुञ्ज कुञ्ज उच्चारी। अभयराम रज वनकी महिमा देखत हैं पियप्यारी॥ [2] - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (1) श्री वृन्दावन की प्यारी-प्यारी लताएं धन्य हैं, जो खिले हुए पुष्पों से भरी हुई कदम्ब वृक्ष से लिपटी है, जिसपर कोयल बैठकर मधुर शब्द कर रहा है। [1] श्री अभयराम जी कहते हैं कि "श्री वृन्दावन कि लता कुञ्जों में समस्त राग-रागिनियाँ गान कर रहे हैं, ऐसे सुन्दर श्री वृन्दावन के रज की शोभा को श्री राधाकृष्ण निहार रहे हैं। [2] धन धन वृन्दावन जमुना जल पानी। उठै तरंग अङ्ग सों लागे कटै पाप ज्यों घानी॥ साधु संत अस्नान करत हैं भजन करत हैं ज्ञानी। अभयराम रज वनकी महिमा आप करी पटरानी॥ - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (2) श्री वृन्दावन में प्रवाहमान श्री यमुना जी धन्य हैं, जिनकी उठती तरंगे अंगों का स्पर्श कर उन्हें समस्त पापों से मुक्त कर देती हैं। समस्त साधु, वैष्णव, एवं ज्ञानीजन इसी में स्नान कर भजन में उन्नति को प्राप्त होते हैं। श्री अभयराम जी कहते हैं कि "श्री वृन्दावन के रज में प्रवाहित श्री यमुना जी श्री कृष्ण की पटरानी हैं, जिसकी महिमा अपार है।" श्री वृन्दावन के मोर एवं चींटी के भाग्य की सराहना : धन धन वृन्दावन के मोर। कुञ्जन ऊपर नृत्य करत हैं जिनको देखैं नन्द किसोर॥ [1] जिनकी बोली लगै सुहाई कूंकैं निशदिन हरि की ओर। अभयराम ऐहू बड़भागी इनके दरसन कीजै भोर॥ [2] - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (62) श्री वृन्दावन के मोर धन्य हैं, जो कुंजों के ऊपर नृत्य करते हैं एवं जिन्हें श्री कृष्ण देखते हैं। [1] इनकी बोली बड़ी सुहावनी लगती है, जो निशिदिन हरि की ओर मुख करके कुहुकते हैं। श्री अभयराम कहते हैं "वृन्दावन के मोर बड़े भाग्यवान हैं, नित्य इनके भोर में दर्शन किया करो।" [2] धन धन वृन्दावन की चैंटी। महाप्रसाद को किनका लैके जाय भिले में बैठी॥ [1] है गयो ज्ञान ध्यान हृदय में व्याधि जन्म की मैटी। अभयराम येहूं बड़भागिनि रज में रहैं लपेटी॥ [2] - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (74) धन्य है वृंदावन की चींटी जो महाप्रसाद का कण लेकर बिल में बैठ कर खाती है। [1] जिसके माध्यम से यह जन्म और मृत्यु की व्याधि को नष्ट कर, भीतर से ज्ञान एवं ध्यान को प्राप्त करती है। श्री अभयराम कहते हैं, "वृंदावन की चींटी कितनी धन्य है क्योंकि यह वृंदावन की रज से ही लिपटी रहती है"। [2] श्री वृन्दावन के संतों से प्रेम: धन धन वृंदावन के विरक्त सन्त। प्रात होय जमुना में न्हावैं, आछे रज सेवत॥ [1] ब्रज वासिन के टुकड़ा पावैं, भोजन करैं एकन्त। अभयराम ऐ तो बड़भागी, ये सन्तन के सन्त॥ [2] - श्री अभयराम, वृंदावन रहस्य विनोद (82) श्री वृंदावन धाम के विरक्त संत धन्य धन्य हैं। सुबह होते ही यह संत श्री यमुना जी में नहाते हैं एवं यहाँ की परम पावन रज का सेवन करते हैं (एवं अपने अंगों पर धारण करते हैं)। [1] ब्रज वासियों द्वारा टुकड़े पाते हैं एवं एकांत में भोजन करते हैं। श्री अभयराम जी कहते हैं कि यह अत्यंत भागश्याली हैं, एवं समस्त संतों के भी यह संत हैं। [2] निकुंजगमन : श्री अभयराम जी ने अपने समय के वृन्दावन के प्रायः सभी मन्दिरों का वर्णन किया है पर श्रीजी मंदिर (निर्माणकाल 1883 ईसवी), रंग-मन्दिर (निर्माणकाल 1909 ईसवी) जैसे विशाल मंदिरों की कोई चर्चा नहीं की है, जिससे प्रतीत होता है कि इनका देहावसान 1880 ईसवी के आस-पास या इससे भी कुछ वर्ष पूर्व हो चुका होगा।
मेरे मनहिं हुलास स्वामिनी श्रीवन सुरख लहोंगी
हे स्वामिनी जू (श्री राधा)! मेरे मन में अति उल्लास भर चुका है कि अब मैं भी श्रीधाम वृंदावन में तुम्हारे सुकोमल लाल चरणों की छवि का दर्शन करूँगी। [1] ...
महाछवि राजें कोटि भानु लिखि लाजैं रूप
निज धाम श्री वृंदावन में दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण एक दूसरे के अंक में विराज रहे हैं, जिनकी महाछवि की कांति कोटि-कोटि सूर्यों की आभा को भी तुच्छ कर र...
श्री वनराज विलासिनी मृदुहासिनी सुख पुंज
श्री धाम वृंदावन की कुंज लताओं में रमण करने वाली, मंद-मंद मुस्कान से चित्त को मोहने वाली, स्वयं आनंद और माधुर्य की निधि श्री राधिके! आपकी जय हो! हे श्...
प्रिया तेरे चरण कमल की चेरी
हे प्रिया जू (श्री राधा)! मैं तुम्हारे चरण कमलों की दासी हूँ। मैं कब से कुञ्ज के द्वार पर आपकी प्रतीक्षा में खड़ी हुई हूँ, कृपा कर ब देर न करो। [1] ...
कवधौं सेवाकुंज में ह्वैंहों श्यामतमाल
मैं श्री वृंदावन के सेवा कुंज में कब ऐसा श्याम तमाल वृक्ष बन जाऊँगा, जिसकी लताओं को पकड़कर युगल सरकार श्री श्यामा-श्याम प्रेम भरी लीलाएँ करते हुए विश्...
आज सखी सेवाकुंज कुंजन ते आवत जू
हे सखी! देखो, आज श्री राधा प्यारी अपने प्रियतम श्री कृष्ण के संग सेवाकुंज की सघन लताओं से प्रेम और सुख की अमृतवर्षा करती हुई आ रही हैं। [1] उनकी मधुर...
श्यामा अब तो रह्यौ न जाय
हे श्यामा (राधा), अब मैं आपके बिना एक पल भी नहीं रह सकता। आपकी याद मुझे हर क्षण सताती रहती है एवं आपकी नित्य स्थली सेवाकुंज मेरे हृदय को अत्यंत मनोहर...
जाति पाँति नाना भांति कुल अभिमान तजि
जाति, पंथ और कुल का अभिमान त्यागकर, मैं नित्य रसिकों के चरणों में श्रद्धापूर्वक सिर नवाऊँगा। [1] मैं सेवाकुंज, रासमंडल, यमुना पुलिन, वंशीवट, निधिवन...
परिचय : 'रसिक अनन्य परिचई' में अनन्यअलि के सम्बन्ध में कहा गया है - श्री गुरु गोविन्द लाल धाम लीला जब कीनी। लाइक सबविधि जानि टहल प्रभु गृह की दीनी॥ सो आज्ञा प्रतिपाल करी अति भक्ति सचाई। देह अन्त परजन्त बंक गति सौं रसिकाई॥ हित पद्धति के भजन बिनु सुमति न रंचक जाहि चलि। श्री व्यास सुवन पथ बाँकुरे बाँकी अति निपट अनन्य अलि॥ चाचा हित वृन्दावनदासजी कहते हैं कि अनन्यअलि के गुरु श्री गोविन्दलाल गोस्वामी ने अपने लीला प्रवेश के समय इनको पूर्ण योग्य समझकर अपने परिवार की सेवा में नियुक्त किया था। अनन्यअलि ने इस गुरु-आज्ञा का अपने जीवन के अंत तक भक्तिभावपूर्वक पालन किया। ये अपने भजन में श्री हित-पद्धति का पूर्ण रूप से अनुसरण करते थे। श्री अनन्यअलि श्री हिताचार्य के भक्ति-पथ के अनन्य अनुयायी थे। श्री अनन्यअलि जी का जन्म अनुमानतः 1683 में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनका पूर्वनाम भगवानदास था। इनके घर में पहले से ही श्री राधावल्लभीय उपासना चली आ रही थी। इनके बड़े भाई श्री हितजी महाराज की भजन पद्धति का आश्रय लेकर सिद्धावस्था को प्राप्त हुए थे। श्री वृन्दावन में अनन्यअलि जी श्री ध्रुवदासजी की कुटी के समीप रहते थे और जीवन के अन्त तक वहीं रहकर भजन करते रहे। ये स्वभाव से अक्खड़ थे और अपने सिद्धान्तों के साथ किसी प्रकार का समझौता करने को तैयार नहीं थे। अनन्यअलि जी श्री हिताचार्य के द्वितीय पुत्र श्रीकृष्णचन्द्र गोस्वामी के वंशज गोस्वामी गोविन्दलालजी के शिष्य थे। आध्यात्मिक जीवन : श्री अनन्यअली के प्रारंभिक जीवन का कुछ परिचय इनकी एक रचना 'स्वप्न-प्रसंग' से प्राप्त होता है। इसमें इनके पन्द्रह 'स्वप्न' संगृहीत है। इनमें से प्रथम नौ प्रसंगों में इन्होंने अपने सम्बन्ध में चर्चा की है। प्रथम प्रसंग में इन्होंने बताया है कि ये आठ वर्ष की अवस्था में अपने देश में ही श्री गोविन्दलाल जी के शिष्य हो गये थे। और इन्होंने श्री हितचौरासी के पद उस अल्प आयु में ही कण्ठ कर लिये थे। ये पाँचों पद रास के है 'वेनु माई बाजे वशीवट’ (पद स. 64), ‘मोहन मदन त्रिभंगी’ (पद सं. 63), 'आज नागरी किशोर भावती विचित्र जोर कहा कहो अंग-अंग परम माधुरी’ (पद स. 10), ‘आज देख सुन्दरी मोहन बनी केलि' (पद सं. 17), ‘मदन मथन घन निकुंज खेलत हरि राधा रुचिर’ (पद सं. 65)। इन्होंने एक पद स्फुटवाणी का कंठस्थ किया था - ‘रहो कोऊ काहू मनहि दिये’ (पद सं. 20)। इन्होंने लिखा है कि “मैं खेलते समय इन्हीं पदों का गान करता था और दूसरे बालकों से भी यही गवाता था। चलते-फिरते उठते-बैठते बालकों संग यही पद गाता था। जब मैं पढ़ने जाता तो वहां भी इन्हीं पदों को गाता और दूसरों से गवाता, यहीं पद लिखता और पढ़ता, दूसरों को भी यही पढ़ाता।” स्वप्न में किसी के द्वारा वृन्दावन चलने का आग्रह करने का प्रसंग : द्वितीय प्रसंग में अनन्यअली ने बताया है कि इसके बाद इन्होंने श्री ध्रुवदासजी की 'बयालिस लीला' में से 'श्री वृन्दावनशत' कण्ठ किया और सोते-जागते, उठते बैठते उसी को रटते रहे। इस स्थिति में दो वर्ष व्यतीत हो गये। एक दिन स्वप्न में इनको किसी ने आवाज देकर जगाया और कहा कि भगवानदास, श्री वृन्दावन चल। उसके बाद यह स्वप्न इनको बार-बार दिखाई देने लगा । स्वप्न में कोई इनकी कोठरी के किवाड़ों पर दस्तक देकर इन्हें जगाता, ये चौककर जाग उठते और किवाड़ खोल देते। ऐसी घटना प्रतिदिन होते देखकर इनकी माता और भ्राता को चिन्ता हो गयी। भगवानदास जी ने उनको बताया कि प्रतिदिन मुझसे कोई वृन्दावन चलने को कहता है। इनकी माता को विश्वास नहीं हुआ और वे यह मानने लगी कि उनका लड़का पागल हो गया है। किन्तु इनके बड़े भाई श्रीजी के कृपापात्र थे। वे इनकी दशा देखकर शांत बने रहे और इन पर श्रीजी की कृपा मानते रहे। अनन्य अलिजी ने लिखा है कि जब तक ये श्री वृन्दावन नहीं पहुँच गये, तब तक इन्हें इस प्रकार के स्वप्न बराबर आते रहे। स्वप्न में बड़े भाई का सखी रूप में आना और एक पद कंठस्थ करवाने का प्रसंग : तीसरे प्रसंग में अनन्यअलि जी ने बताया है कि मेरे भाई ने मुझे पूरी हित-चौरासी कण्ठ करायी, किन्तु चौरासीजी का एक पद 'चलहि किन मानिनि कुञ्ज कुटीर' (पद सं. 37) मुझे किसी तरह भी कण्ठ नहीं हुआ। जब तक मैं बीस बरस का हुआ, तब तक 83 पदों का ही पाठ करता रहा। मेरी आयु के बीसवें वर्ष में मेरे भाई ने शरीर छोड़ा। जब मेरे भाई का शरीर छूटने का समय आया तब उनके शिष्यों ने उनसे पूछा कि भगवानदास से कुछ कहेंगे ? भाई ने कहा कि मैं उससे क्या कहूँ, मैं सिर्फ इतना ही कहता हूँ कि यह श्रीजी का भजन करता रहे। अर्द्धरात्रि के समय भाई ने मुझे जगाकर कहा कि मुझे हित चौरासीजी का पाठ सुनाओ। मैं धीरे-धीरे पाठ करने लगा और सवेरे तक पाठ करता रहा। सबेरा होते ही भाई ने मुझसे कहा कि मेरा शरीर अब छूटनेवाला है। यह कहकर वे खाट पर से नीचे उतरे, स्नान किया, महाप्रसाद लिया और मुझसे कहा कि तुम धुवदासजी की धमार- 'देख सखी नवकुंज राधा लाल बने री' मुझे गाकर सुनाओ। यह धमार उन्होंने स्वयं भी गाई और अपने कृपापात्रों से भी गवाई। इस धमार को गाते-गाते उनका शरीर छूट गया और वे सखीस्वरूप प्राप्त करके निकुंज महल में प्रवेश कर गये। सब लोग भाई के पार्थिव शरीर को ले जाकर उसका दाह संस्कार कर आये। उनके सब कृपापात्र उस दिन हमारे घर ही रहे और अर्धरात्रि तक सबने मिलकर नाम-संकीर्तन किया। उसके बाद सब लोग सो गये और उनके साथ मैं भी सो गया। जब रात्रि एक पहर शेष रही तब आठ सखियों ने आकर मुझे जगाया। मैंने स्वप्न में ही उनसे कहा कि तुम लोग कौन हो और कहाँ से आयी हो। उनमें से एक सखी हँसकर बोली कि मैं तो तेरा भाई हूँ। मैंने उनसे पूछा कि तुम्हारा ऐसा स्वरूप कैसे हो गया तो उन्होंने कहा कि अब हमारा यही स्वरूप है। तू उठ बैठ मैं तुझे चौरासीजी का वह पद याद कराता हूँ जो तुझे किसी तरह याद नहीं हो रहा था। यह कहकर उन्होंने 'चल किन मानिनि कुञ्ज कुटीर' वाला पद मुझे कंठ करा दिया। उसके बाद में जाग उठा और रुदन करने लगा। कृपापात्रों ने मुझसे पूछा कि भाई, तुम रोते क्यों हो? तुम्हारे भाई जब मरे तब तो तुम रोये नहीं, किन्तु अब क्यों रो रहे हो? जैसे-जैसे सब लोग मुझसे रोने का कारण पूछते थे, वैसे वैसे ही मेरी छाती फटी जाती थी और मैं रोते-रोते श्वास भी नहीं ले पा रहा था। मेरी यह दशा देखकर सब लोगों ने कहा कि अब ये भी बचेंगे नहीं। मैंने उन लोगों से कहा कि न तो तुम मुझसे बोलो और न ही मेरे पास आओ। मैं इसी तरह तीन दिन तक रोता रहा और कुछ खाया-पिया नहीं। चौथे दिन मेरा भावावेश कुछ कम हुआ और सब लोगों को शान्ति मिली। स्वप्न में श्री हितजी महाराज के समाधि मंडल, श्रीजी के मन्दिर और यमुनाजी के दर्शन होने का प्रसंग : चतुर्थ प्रसंग में श्री अनन्यअलि जी ने बताया है कि "भाई की मृत्यु के बाद मुझे फिर वही स्वप्न आने लगा जिसमें कोई मुझसे श्री वृन्दावन चलने को कहता था। अपने देश में ही एक दिन मुझे स्वप्न में श्री हितजी महाराज के समाधि मंडल तथा श्रीजी के मन्दिर और यमुनाजी के दर्शन हुए। थोड़े दिनों के बाद हमारे गुरुचरण श्री गोस्वामी गोविन्दलालजी महाराज हमारे गाँव में पधारे। उन्होंने मुझसे कहा कि तुम अपना विवाह मत होने देना, हम तुम्हें श्री वृन्दावन ले जायेंगे और वे मुझे श्रीवृन्दावन ले आये।" स्वप्न में श्री प्रिया जी संग सखियों के दर्शन होने का प्रसंग : पंचम प्रसंग में अनन्यअली जी ने बताया है कि ये 1702 ज्येष्ठ कृष्णा द्वितीया को श्री वृन्दावन पहुँचे थे। उस समय श्री राधावल्लभलाल आजानगढ़ (कामवन) में विराजते थे। अनन्यअलि जी के श्री वृन्दावन पहुँचने के लगभग 25-26 वर्ष पूर्व बादशाह औरंगजेब की आज्ञा से श्री राधावल्लभजी का मन्दिर नष्ट-भ्रष्ट कर दिया गया था। कामवन में इन्होंने देखा कि सेवा में केवल श्री श्यामसुन्दर का स्वरूप विराजमान है और उनके निकट केवल एक गादी बच रही है। "सम्प्रदाय में श्री राधा की प्रधानता होते हुए भी सेवा में उनका प्रकट रूप न देखकर मैं द्विविधा में पड़ गया। उस दिन रात्रि को जब में सोया तब मैने देखा कि मैं मन्दिर में जगमोहन के खड़ा हुआ दर्शन कर रहा हूँ। दूसरे क्षण में ही मैंने देखा कि श्री राधा की गादी से कोटि-कोटि दामिनी को लज्जित करने वाला श्री प्रिया जी का स्वरूप प्रकट हो गया। श्री लाड़िलीजी ने मुझे हँसते हुए संकेत करके अपने पास बुला लिया और में निज मन्दिर (गर्भमन्दिर) सिंहासन के पास जाकर खड़ा हो गया। मैंने अन्दर जाकर देखा कि मेरे भाई भी सखीरूप में वहीं पर खड़े हुए हैं। उन्होंने मुझे डाँटते हुए कहा कि तू मन्दिर के अन्दर क्यों आ गया ? मैंने कहा कि मैं तो लड़ैतीजी के बुलाने से आया हूँ। लड़ैतीजी ने भी मन्द-मन्द मुस्कराकर कहा कि यह तो हमारा है। सबेरे जब मैं सोकर उठा तो डेढ़-दो घण्टे तक रोता रहा। सेवाकुंज में स्वप्न में श्री राधा के दर्शन होना : एक बार अनन्यअली जी सेवाकुंज में अन्न जल त्यागकर तीन दिन तक सघन वृक्ष के नीचे बैठे रहे। चौथे दिन रात्रि को स्वप्न में श्री राधा ने उनसे कहा कि, 'तू हठ मत कर, हम तो तेरे हृदय में नित्यक्रीड़ा करते रहते हैं। तू अपनी कुटी में जाकर प्रसाद ग्रहण कर।" इसके बाद ये जाग पढ़े और अपने को कृपा का अनाधिकारी समझकर रुदन करने लगे। प्रातः काल होने पर कुछ रसिक भक्त इनको ढूँढते हुए सेवाकुंज में पहुंचे और उन्होंने भी इनसे यही कहा कि इस धर्म में हठ करने से कोई काम नहीं बनता है। इस तरह से इनको समझा-बुझाकर ये वहाँ से उठा लाये। दुष्ट अन्न-भक्षण के प्रभाव का प्रसंग : दसवें और ग्यारहवें प्रसंग में अनन्यअलि जी ने दुष्ट अन्न-भक्षण के कुप्रभाव का एक उदाहरण दिया है। इनके गुरु श्री गोविन्दलाल गोस्वामीजी की एक वैश्याणी शिष्या थी। उसके पिता और भाई बादशाह औरंगजेब की नौकरी में थे। वैश्याणी अनन्यअलिजी से कुछ भेंट स्वीकार करने का आग्रह करती रहती थी किन्तु ये उसके घर में म्लेच्छों का धान्य समझकर स्वीकार नहीं करते थे। ये उससे कहते रहते थे कि 'बीबी, तेरे यहाँ म्लेच्छों का धान्य है। उसको खाने से हृदय मलिन होता है, भजन-भावना क्षीण होती है और इष्ट से विमुखता हो जाती है। किन्तु वह वैश्याणी इनके पीछे पड़ी ही रही और निरन्तर आग्रह करती रही। निरुपाय होकर उसने एक दिन अपनी गुरुमाता के यहाँ खीर की रसोई कराई और उनको शपथ दिला दी कि आप भगवानदास को यह न बतायें कि यह खीर मैंने भोग लगाई है और उसको प्रसाद खिला दें। अनन्यअलि जी जब माताजी के पास प्रसाद ग्रहण करने पहुंचे तो उन्होंने इनको खीर भी परोसी। अनन्यअलिजी ने पूछा कि यह किसका मनोरथ है तो माताजी ने कह दिया कि यह मेरे द्वारा ही बनाई गई है। तुम कोई विचार न करके आनन्दपूर्वक प्रसाद ग्रहण करो। रात्रि को जब ये सोये तो स्वप्न में देखा कि ये दिल्ली के कोट के एक द्वार पर खड़े हैं और इनके हाथ में शौच जाने के लिए मिट्टी का पात्र है। थोड़ी ही देर में इनको एक सवारी सामने से आती दिखाई दी। इन्होंने लोगों से पूछा कि यह किसकी सवारी है तो उन्होंने कहा कि तुम पहचानते नहीं हो ये बादशाह औरंगजेब हैं। इन्होंने देखा कि चारों ओर से फौज चली आ रही है और बादशाह एक पालकी में बैठा हुआ है। उसकी सफेद लम्बी दाढ़ी है, भारी गर्दन है और उसने सफेद सादे वस्त्र पहन रखे है। उसके सामने कुरान की प्रति रखी है जिसको वह पढ़ता जा रहा है। यह सब देखकर ये घबड़ा गये और इनकी आँख खुल गयी। दूसरे दिन जब ये गुरुजी के यहाँ प्रसाद पाने गये तब इन्होंने माताजी से पूछा कि आप मुझे सच-सच बतलाइये कि खीर किसने बनवायी थी ? माँजी ने कहा कि पहले तुम यह बतलाओ कि तुम्हें उसका क्या प्रभाव दिखलायी दिया ? अनन्यअली जी ने उनको औरंगजेबवाला पूरा स्वप्न सुना दिया। उसे सुनकर माँजी को बहुत कष्ट हुआ और उनके नेत्रों में जल भर आया। उन्होंने वैश्याणी को बुलाकर बहुत डाँटा और उससे कहा कि तू अपने अपराध के लिये क्षमा माँग। वैश्याणी घबड़ा गयी और भविष्य में ऐसा कोई कार्य न करने की शपथ ली। ग्यारहवें प्रसंग में इन्होंने अन्न-दोष का एक अन्य उदाहरण दिया है। वैष्णव को कठोर वचन बोलने के दुष्परिणाम का प्रसंग : बारहवें प्रसंग में अनन्यअलि जी ने कठोर वचन बोलने के दुष्परिणाम को अपने जीवन की एक घटना से उद्धृत किया है। इन्होंने बताया है कि एक दिन मैंने श्रीजी के कृपापात्र श्यामदास गुजराती से बहुत कर्कश वचन कहे। मैंने उसको डाँटते हुए कहा कि तू दिनभर सोता रहता है, भजन बिलकुल नहीं करता है। यह बड़ी अनुचित बात है। तुझे श्रीजी का नाम लेना चाहिए, वाणी का पाठ करना चाहिये और सोना नहीं चाहिए। मेरे डाँटने से श्यामदास के मन में बड़ा कष्ट हुआ और इस अपराध से मुझे रात्रि में यमराज के दर्शन हुए। मैंने एक महाभयानक स्वरूप को आकाश से धनुष-बाण लिये हुए अपनी ओर दौड़ते हुए देखा। मैं बहुत डरा और उससे बचने के लिए भागने लगा। मैं जितना दौड़ता था, उसको अपने सामने पाता था। घबड़ाहट में मेरी आँख खुल गयी। मैं उठकर सीधा श्यामदास के पास गया और उसके चरणों में अपना मस्तक रखकर अपने अपराध की क्षमा माँगी। मानसी सेवा का प्रसंग : पन्द्रहवें और अन्तिम प्रसंग में अनन्यअलि जी ने बताया कि एक दिन इनको बहुत जोर से ज्वर आया और ये अचेत हो गये। ये मानसी सेवा किया करते थे। अचेतावस्था में उस दिन रात के समय श्री लड़ैतीलाल को मानसी सेवा में ब्यालू करवाना भूल गये। अर्द्धरात्रि के बाद किसी ने इनकी कुटी में पुकारकर कहा कि 'अनन्यअलि, तू उठ और हमें ब्यालू करा। हम बहुत देर से बैठे-बैठे तेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं। स्वप्न में यह बात सुनकर ये जाग उठे और मन को सावधान करके मानसी में शयन-भोग अर्पण किया। रचना : श्री अनन्यअलि जी की वाणी का विपुल विस्तार है। इनकी छोटी-बड़ी 80 रचनाएं प्राप्त है। इनमें से सबसे छोटी 'जीविका को नेम' चार छन्दोंवाली है तथा सबसे बड़ी 'श्री हित हरिवंश जू की नामावली' में 351 दोहे हैं। उनकी वाणी के कुछ उदाहरण नीचे दिये जाते हैं - जुगल भजन की हाट करि, ऐसी विधि ब्यौहार। रसिकन सौं सौदा बनै, चर्चा नित्यविहार॥ चित डाँडी पलरा नयन, प्रेम डोर सौं बानि। हियौ तराजू लेहु कर, तौल रूप मन सानि॥
कीर्तन के यूथ देख उठती उमंग एक
श्री धाम वृन्दावन में कीर्तन-मंडलियों को देखकर हृदय में उमंग उठती है। गोवर्धन पर दृष्टि पड़ते ही गोवर्धन-धारण करने वाले कृष्ण की स्मृति हो जाती है। [1...
पराभक्ति रस वर्धिनी श्यामा सब सुख दैन
श्री श्यामा जू (श्री राधा) पराभक्ति दान करने वाली, रस को बढ़ाने वाली हैं तथा समस्त सुखों को प्रदान करने वाली हैं। रसिकों के लिए वे ही परम शिरोमणि हैं।...
परिचय : राधावल्लभ संप्रदाय के गोस्वामी श्री हित रूपलाल जी ने अपने सहचरी वपु से श्री श्यामा श्याम की एक लीला का दर्शन किया, जिसे वे स्वयं वर्णन कर रहे हैं - व्यासनंदन व्यासनंदन व्यासनंदन गाइये। जाको हित नाम लेत दम्पति रति पाइये॥ रास मध्य ललितादिक प्रार्थना जू किन्हीं। कर ते सुकुमारी प्यारी वंशी तब दीन्हीं॥ सोइ कलि प्रगट रूप वंशी वपु धार्यौ। कुञ्ज भवन रास रवन त्रिभुवन विस्तार्यौ॥ गोकुल रावल सु ठाम बाद निकट राजे। विदित प्रेमरासि जनम रसिकन हित काजे॥ तिनको पिय नाम सहित मन्त्र दियौ श्री राधे। सत-चित-आनंद रूप निगम अगम साधे॥ श्री वृन्दावन धाम तरणि जासु तीर वासी। श्री राधापति रति अनन्य करत नित खवासी॥ अद्भुत हरि जू को वंश भनत नाम श्यामा। जय श्री रूपलाल हित चित दै पायौ विश्रामा॥ - श्री हित रूपलाल जी श्री श्यामाश्याम की नित्य निभृत निकुंज लीला का रस अनवरत बरस रहा है। एक समय श्री श्यामा जू की प्रधान सखी श्री ललिता जू ने विचार किया की "यह दिव्य मधुर रस धरा धाम पर मनुष्य मात्र के लिए कैसे सुलभ हो।" ऐसा विचार कर श्री ललिता जू ने महारास के मध्य श्री स्वामिनी जू की ओर प्रार्थनामयि दृष्टि से देखा। श्री श्यामा जू ने श्री श्यामसुंदर की ओर मधुर चितवन भरी दृष्टि से देखा तो श्री श्यामसुंदर श्री श्यामा जू के ह्रदय की बात समझ गए और प्रेमरस रसास्वादन कराने वाली अपनी वंशी को श्री श्यामा जू के कर कमलों के दे दिया। प्यारी जू ने वंशी को ललिता जू को दिया और कहा "हे ललिते, आप और ये वंशी दोनों मिलकर हमारे नित्य विहार रस को प्रकाशित करो।" प्यारी जू की वह वंशी श्री हित हरिवंश महाप्रभु के रूप में ब्रज मंडल में श्री राधारानी के ग्राम रावल के निकट बाद ग्राम में प्रकट हुई और तीनो लोकों में इस दिव्य मधुर नित्य विहार रस का विस्तार किया। श्री ललिता जू श्री स्वामी हरिदास जू के रूप में वृन्दावन के राजपुर ग्राम में प्रकट हुए। भूमिका : उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में एक ग्राम है देववन, जहाँ श्री तपन मिश्र के पुत्र, ज्योतिष के परम विद्वान्, यजुर्वेदीय, कश्यप गोत्रीय, गौड़ ब्राह्मण श्री व्यास मिश्र जी निवास करते थे। व्यास मिश्र उस समय के प्रसिद्ध ज्योतिषी थे और इस विद्या के द्वारा उन्होंने प्रचुर संपत्ति प्राप्ति की थी। धीरे-धीरे उनकी ख्याति तत्कालीन पृथ्वीपति के कानों तक पहुँची और उसने बहुत आदर सहित व्यास मिश्र को बुला भेजा। व्यास मिश्र बादशाह से चार श्रीफल लेकर मिले। बादशाह उनसे बातचीत करके उनके गुणों पर मुग्ध हो गया और उनको 'चार हजारी की निधि' देकर सदैव अपने साथ रखने लगा। व्यास मिश्र की समृद्धि का अब कोई ठिकाना नहीं रहा और वे राजसी ठाट-बाट से रहने लगे। व्यास मिश्र के पूर्ण सुखी जीवन में एक ही प्रबल अभाव था। वे निस्संतान थे। इस अभाव के कारण वे एवं उनकी पत्नी तारारानी सदैव उदास रहते थे। व्यास मिश्र जी बारह भाई थे जिनमें एक नृसिंहाश्रम जी विरक्त थे। नृसिंहाश्रम जी उच्चकोटि के भक्त थे, एवं लोक में उनकी सिद्धता की अनेक कथायें प्रचलित थीं। विरक्त होते हुए भी इनका व्यास जी से स्नेह था और कभी-कभी यह उनसे मिलने आया करते थे। एक बार मिश्र-दंपति को समृद्धि में भी उदास देख कर उन्होंने इसका कारण पूछा। व्यास मिश्र ने अपनी संतान हीनता को उदासी का कारण बताया और नृसिंहाश्रम जी के सामने 'परम भागवत रसिक अनन्य' पुत्र प्राप्त करने की अपनी तीव्र अभिलाषा प्रगट की। नृसिंहाश्रम जी ने उत्तर दिया "भाई, तुम तो स्वयं ज्योतिषी हो। तुमको अपने जन्माक्षरों से अपने भाग्य की गति को समझ लेना चाहिये और संतोष-पूर्ण जीवनयापन करना चाहिये।" यह सुनकर व्यास मित्र तो चुप हो गए, किन्तु उनकी पत्नी ने दृढ़ता-पूर्वक पूछा "यदि सब कुछ भाग्य का ही किया होता है, यदि विधि का बनाया विधान ही सत्य है, तो इसमें आपकी महिमा क्या रही ?" इस बार नृसिंहाश्रम जी उत्तर न दे सके और विचारमग्न होकर वहाँ से चले गये। एकान्त वन में जाकर उन्होंने अपने इष्ट का आराधन किया और उनसे व्यास मिश्र की मनोकामना पूर्ण करने की प्रार्थना की। रात्रि को स्वप्न में प्रभु ने उनको सन्देश दिया कि "तुम्हारे सत्संकल्प को पूर्ण करने के लिये स्वयं हरि अपनी वंशी सहित व्यास मिश्र के घर में प्रगट होंगे।" नृसिंहाश्रम जी ने यह सन्देश व्यास मिश्र को सुना दिया और इसको सुनकर मिश्र-दम्पति के आनन्द का ठिकाना नही रहा। जन्म : बादशाह व्यास मिश्र जी को सर्वत्र अपने साथ तो रखता ही था। श्री हित हरिवंश के जन्म के समय भी व्यास मिश्र अपनी पत्नी-सहित बादशाह के साथ थे और ब्रजभूमि में ठहरे थे। वहीं मथुरा से 5 मील दूर 'बाद' नामक ग्राम में वैशाख शुक्ला एकादशी सोमवार सम्वत 1559 में अरुणोदय काल में श्रीहित हरिवंश का जन्म हुआ। महापुरुषों के साथ साधारणतया जो मांगलिकता संसार में प्रगट होती है, वह श्री हित हरिवंश के जन्म के साथ भी हुई और सब लोगों में अनायास धार्मिक रुचि, पारस्परिक प्रीति एवं सुख-शान्ति का संचार हो गया। ब्रज के वन हरे-भरे हो गए, लताओं में पुष्प खिलने लगे, सूखे सरोवर जल से भर गए, वातावरण में सुगन्धि व्याप्त हो गयी, आकाश में बिजली चमकने लगी, हलकी-हलकी बारिश की बूंदे गिरने लगी, वातावरण सुहावना हो गया, ब्रजवासियों के ह्रदय अकस्मात ही प्रेम एवं हर्ष से भर गए, पक्षीगण मधुर कलरव करने लगे, मोर नृत्य करने लगे। श्री राधा सुधा निधि जी का प्राकट्य : जब श्री हिताचार्य 6 मास के थे तब उनके मुख से संस्कृत के श्लोक उद्धृत होने लगे, जिसे वहां उपस्थित श्री नृसिंहाश्रम जी ने श्रवण किया। वह कोई साधारण श्लोक नहीं थे, अपितु श्री श्यामाश्याम की दिव्य निकुंज लीला से सम्बंधित थे। ऐसा बहुत दिनों तक होता रहा और जब श्लोकों की संख्या 270 पहुंची तो श्री हिताचार्य के मुख से श्लोक उद्धृत होना बंद हो गया। उन समस्त 270 श्लोकों को श्री नृसिंहाश्रम जी ने ग्रन्थ में लिपिबद्ध कर लिया जिसका नाम "श्री राधासुधानिधि" हुआ। शैशव क्रीड़ा : श्री हित हरिवंश के पिता श्री व्यास जी ब्रज दर्शन के उद्देश्य से आये थे। अतः उन्होंने ब्रज में छह महीने निवास कर दिव्य लीला स्थलों के दर्शन किये और देववन चले गये। नामकरण के समय ज्योतिषियों ने बतलाया था कि यह बालक अनेक अद्भुत कर्म करने वाला होगा। उनकी भविष्य वाणी बालक की जन्म कुण्डली पर आधारित थी अतः वह सम्पूर्णतः सत्य भी हुई। बालक हरिवंश के उन शैशव कालीन अनेक चमत्कार पूर्ण कार्यों का वर्णन रसिकजन प्रणीत अनेक चरित्र ग्रन्थों में मिलता है। श्री हिताचार्य समवयस्क कुमारों के साथ साधारण बाल क्रीड़ा करते देखकर ज्ञानू नामक भक्त को ज्योतिषियों की बात पर अविश्वास होने लगा था अतः वह अपना सन्देह दूर करने के उद्देश्य से एक दिन बालक हरिवंश की परीक्षा लेने गया किन्तु उसे श्री हिताचार्य ने अपनी बाल क्रीड़ा में ही श्यामा-श्याम की कुंज केलि के प्रत्यक्ष दर्शन करा दिये और वह देह त्याग कर निकुंज महल में सम्प्रविष्ट हो गया। श्री नवरंगीलाल जी का प्राकट्य : एक दिन रात्रि में हित हरिवंश को श्रीजी ने आज्ञा दी की "बाग़ में एक कुंआ है जिसमे हमारा एक द्विभुज स्वरुप है जो कर में बांसुरी लिए हुए हैं, उन्हें मेरी गादी संग स्थापित कर सेवा करो।" दूसरे दिन श्री हरिवंश जी कुएँ में कूद पड़े और वहाँ से श्याम वर्ण द्विभुज मुरलीधारी एक श्री विग्रह निकालकर ले आये। उन्होंने उस विग्रह को श्रीराधा की गद्दी के साथ एक नव निर्मित मन्दिर में विराजमान करके विधि निषेध शून्य अपनी मौलिक सेवा पद्धति का शुभारम्भ किया। बालक हरिवंश ने उस विग्रह का नाम 'रंगीलाल' रक्खा; जो अद्यापि देववन नगरस्थ मन्दिर में विराजमान है। इस घटना का स्मारक वह कुंआ भी 'हरिवंश चह' के नाम से विख्यात आज भी देखा जाता है। यह घटना तब की है जब श्री हिताचार्य की आयु सात वर्ष की थी। शिक्षा : श्री हिताचार्य को किन-किन विद्वानों से कब और किन-किन शास्त्रों की शिक्षा हुई यह अज्ञात है। किन्तु इनके द्वारा विरचित 'हित चौरासी' और 'स्फुट वाणी नामक ब्रजभाषा ग्रन्थ तथा 'राधासुधानिधि' एवं 'यमुनाष्टक' जैसी संस्कृत कृतियों से ज्ञात होता है कि उन्हें संस्कृत व्याकरण, साहित्य, संगीत, ज्योतिष तथा श्रुति पुराणादिकों की सर्वोच्च शिक्षा प्राप्त हुई होगी। उनकी चारों कृतियाँ ही इस तथ्य को प्रमाण बनाती हैं। गुरुवर व मन्त्र प्राप्ति : रसिकों द्वारा विरचित चरित्र ग्रन्थों व वाणी ग्रन्थों के अनुसार श्री हिताचार्य को उनकी स्वेष्ट श्रीराधा ने मंत्र प्रदान किया था। एक दिवस सोवत सुख लह्यौ। श्री राधे सुपने में कह्यौ॥ द्वार तिहारे पीपर जो है। ऊँची डार सबनि में सोहै॥ तामै अरुन पत्र इक न्यारौ। जामें जुगल मंत्र है भारौ॥ लेहु मंत्र तुम करहु प्रकाश। रसिकजननि की पुजवहु आश॥ - श्री हित चरित्र, उत्तमदास जी व्यासनंदन व्यासनंदन व्यासनंदन गाइये। तिनको पिय नाम सहित मन्त्र दियौ श्री राधे। सत-चित-आनंद रूप निगम अगम साधे॥ - श्री हित रूपलाल जी स्वयं श्री हिताचार्य ने अपनी 'राधासुधानिधि' नामक रचना में अनेक स्थलों पर श्री राधा को अपनी इष्ट के साथ ही गुरु रूप में भी स्मरण किया है। यस्याः कदापि वसनाञ्चल खेलनोत्थ, धन्याति धन्य पवनेन कृतार्थ मानी। योगीन्द्र दुर्गम गतिर्मधुसूदनोपि, तस्या नमोस्तु वृषभानु भुवनोदिशेऽपि॥ रहौ कोउ काहू मनहि दिए। मेरे प्राणनाथ श्रीश्यामा शपथ करौं तृण छिये॥ एक दिन श्री हिताचार्य रात्रि में सो रहे थे, तब श्री राधा ने स्वप्न में आदेश दिया "तुम्हारे घर के सामने जो पीपल का वृक्ष है, उसकी सबसे ऊँची डाल पर एक अद्भुत अरुण पत्र है, उसमें हमारा युगल मन्त्र है, उसे ग्रहण कर उसका रसिकजनों में प्रकाश करो।" इस आदेश को पाकर श्री हिताचार्य ने सुबह उस अरुण पत्र को पीपल वृक्ष की डाल से उतार कर उसका रसिकजनों में प्रकाश किया। श्री हरिवंश जी को श्री राधा के द्वारा "हित" छाप प्रदान करना : जब श्री हिताचार्य देववन में निवास करते थे, तब श्री राधा ने स्वयं प्रकट होकर श्री हिताचार्य को "हित" छाप प्रदान किया था। तभी से श्री हिताचार्य का नाम हित हरिवंश हो गया। "हित" का अर्थ है प्रेम। रसमय करे चरित परशंश। जगगुरु विदित श्री हरिवंश॥ श्री राधा अनुग्रह कियौ। श्री मुख मंत्र निजु कर दियौ॥ दयिता कृष्ण जिनके इष्ट। पुनि गुरु भाव प्रीति गरिष्ट॥ दीनी रीझ हित की छाप। ता करि बढ्यौ भक्ति प्रताप॥ - चाचा वृन्दावन दास जी उपनयन संस्कार, विद्याध्ययन और विवाह : आठ वर्ष की आयु में श्री हिताचार्य का उपनयन संस्कार हुआ। इस आयु मे इनकी बुद्धि सामान्य बालकों से कहीं अधिक तीव्र और धारणाशक्ति चमत्कारी थी। इन्होंने अपने स्नेह और सौजन्य से शैशव में ही अपने चारो ओर अच्छा-खासा सखा-मण्डल स्थापित कर लिया था। इन बाल-सखाओं के साथ इनकी क्रीडाएँ असाधारण होती थी। प्रायः भगवद्भक्ति के आश्रित ही कोई न कोई खेल यह खेलते थे। ठाकुर जी की सेवा-पूजा करने की ओर भी इनकी नैसर्गिक रुचि थी और इन्होंने महाप्रसाद का माहात्म्य शैशव में ही अपने बाल सखाओं के समक्ष वर्णन किया था। एकादशी व्रत के प्रति इनका विलक्षण भाव इसी आयु में व्यक्त हो गया था। शनै शनै अपनी अनन्य भावना और सेवा-पूजा के कारण इनकी ख्याति समीपवर्ती प्रदेश में हुई और इनके पास रसपिपासुओं का आगमन होना प्रारम्भ हुआ। इस आयु में इन्होंने जो चमत्कार किए उनका वर्णन साम्प्रदायिक वाणी-ग्रंथों में भरा पड़ा है। सोलह वर्ष की आयु में श्री हिताचार्य का विवाह रुक्मिणी देवी के साथ सम्पन्न हुआ। गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने पर भी इन्होंने अपनी धार्मिक निष्ठा में परिवर्तन नही किया। गृहस्थाश्रम के समस्त कर्त्तव्यों का पालन करते हुये ये सच्चे रूप में भक्त और सन्त बने रहे। इस जीवन के प्रति इनके मन मे न तो वैराग्य भावना थी और न इसके प्रति किसी प्रकार का हीन भाव ही ये रखते थे। इनका दाम्पत्य-जीवन सुखी-सम्पन्न और आदर्श था। सर्व प्रकार के ऐश्वर्य एवं भोगविलास की सामग्री इनके पास थी किन्तु इनकी भावना में उसके लिये किसी प्रकार की आसक्ति न होने से उसको लेकर ये कभी व्यग्र, विचलित या लिप्त न होते थे। श्रीमती रुक्मिणी देवी से श्री हिताचार्य के एक पुत्री और तीन पुत्र उत्पन्न हुए। ज्येष्ठ पुत्र श्री वनचंद्रजी स० 1585, द्वितीय पुत्र श्री कृष्णचंद्रजी संवत् 1587, तृतीय पुत्र श्री गोपीनाथजी सवत् 1588 तथा पुत्री साहिब दे सम्वत् 1589 मे उत्पन्न हुई। श्री हरिवंशजी की माता तारारानी का 1589 में तथा पिता श्री व्यास मिश्र का निकुंजगमन 1590 सम्वत् में हुआ। माता-पिता की मृत्यु के उपरान्त श्री हरिवंशजी के मन में यह भाव आाया कि किसी प्रकार भगवान् की लीलास्थली में जाकर वहाँ की रसमयी भक्ति-पद्धति में लीन होकर जीवन सफल करें। उसी समय इनकी ख्याति से प्रभावित होकर तत्कालीन राजा ने इनको अपने दरबार में बुलाने के लिये सादर निमंत्रण भेजा किन्तु इन्होंने अपने अन्तर्मन में भगवान् की लीलाभूमि का निमंत्रण स्वीकार कर लिया था इसलिये राजा के निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया। और एक श्लोक में यह उत्तर भिजवा दिया कि सृष्टि के आदि से नरेन्द्र-सुरेन्द्र, ब्रह्मा आदि कालग्रसित होते आये हैं अतः हरिचरण में लीन होकर उनका ही ध्यान करना अभीष्ट है। श्री राधा की आज्ञा से वृन्दावन के लिए प्रस्थान : बत्तीस वर्षकी आयु में श्रीराधा ने श्री हित हरिवंश को श्री वृन्दावन-वास एवं धर्म-प्रचार की आज्ञा दी। इस आज्ञा के प्राप्त होते ही श्री हित जी वृन्दावन चल दिए। उन्होंने चलते समय रुक्मिणी जी से साथ चलने को कहा किन्तु वे साथ न आ सकी। देववन से प्रस्थान के बाद मार्ग में इनको श्री राधा के स्वप्न में दर्शन हुये और उन्होने इनसे कहा कि "आगे एक चिरथावल नाम का गाँव तुम्हारे मार्ग में पड़ेगा, उस गांव में यदि कोई ब्राह्मण अपनी दो कन्याओं का तुम से विवाह करना चाहे तो तुम उसे स्वीकार कर लेना। यह विवाह तुम्हारे भक्ति-पथ मे किसी प्रकार का अन्तराय उत्पन्न करने वाला न होगा। इस विवाह के द्वारा तुम दाम्पत्य जीवन का आदर्श प्रतिष्ठित करोगे।" साथ ही यह भी उस स्वप्न मे उन्हें राधाजी ने कहा कि "मेरा एक विग्रह (राधावल्लभजी के रूप मे) तुम्हे मिलेगा जिसे तुम वृन्दावन मे ले जाकर मंदिर में विधिवत् स्थापित करना।" ऐसा ही स्वप्न आत्मदेव नामक ब्राह्मण को भी हुआ जो उसी चिरथावल गाँव का रहने वाला था। इस स्वप्न के बाद श्री हरिवंश जी अपने यात्रा पथ में अग्रसर हुये और उस गाँव मे (चिरथावल) पहुँचे जिसमें आत्मदेव नाम का ब्राह्मण रहता था। उसके दो नवयुवती कन्याएँ थी और पूर्व दृष्ट स्वप्न के आधार पर वह श्री हरिवंशजी के आगमन की सतत प्रतीक्षा कर रहा था। उनके आते ही उसने अपनी दोनों कन्याओं का पाणिग्रहण करने के लिये हरिवंशजी से प्रार्थना की जिसे उन्होने सहर्ष स्वीकार किया। इन कन्यायों के नाम कृष्णदासी और मनोहरीदासी थे। चिरथावल गाँव में कुछ समय तक ठहर कर फिर श्री हरिवंश जी ने अपनी यांत्रा प्रारम्भ की और सम्वत् 1590 को फाल्गुन की एकादशी को वृन्दावन पहुंचे। यहाँ पहुँचने पर मदनटेर नामक स्थान पर विश्राम के लिये डेरा डाला। यह स्थान आज भी वृन्दावन में प्रसिद्ध है। वहीँ श्री हिताचार्य ने श्री राधावल्लभ के लिए लता-कुञ्ज निर्माण कर उन्हें स्थापित किया और सेवा प्रारम्भ की। पञ्चकोसी वृन्दावन का प्रकाश : श्री हिताचार्य जिस समय वृन्दावन में आये उस समय वह लता पुंजाकार दल-फल और फूलों से परिपूर्ण एक सघन कुंज के रूप में था। यह लता पुंजाकार वृन्दावन शुक पिक-सारस हंस आदि पक्षियों के कलरव से मुखरित और चारों ओर यमुना से समावृत्त था। कहीं-कहीं यमुना तटस्थ ऊँचे टीलों पर यमुना स्नान हेतु आये हुए ब्रजवासीगण से अवश्य दिखाई देते थे। समागत श्री हिताचार्य के द्वारा यह ज्ञात होने पर कि- इस सघन निर्जन वन में हम निवास करेंगे उन सभी ब्रजवासियों को अत्यधिक विस्मय और हार्दिक प्रसन्नता हुई। उन्होंने श्री हिताचार्य के हाथ में तीर कमान देते हुए कहा के गुसाईं जी आप तीर चलाइये, आपका तीर जहाँ तक पहुँचेगा वहाँ तक की भूमि आपकी होगी। यह श्री हिताचार्य का मधुर प्रभाव ही था कि इन बटमार वृत्ति वाले ब्रजवासियों के चित्तों का पूर्ण परिवर्तन हो गया और वे पंचकोसी वृन्दावन में श्री हिताचार्य को भूमि प्रदान करने के लिये तैयार हो गये। ब्रजवासियों के कहने पर श्री हिताचार्य नें एक तीर छोड़ा और वह पर्याप्त दूरी पर जाकर गिरा। श्री हिताचार्य ने जहाँ से तीर फेंका, अपना निवासालय उसी स्थान को बनाया और जहाँ पर वह तीर गिरा, कालान्तर में वह स्थान 'तीर घाट' और बाद में 'चीर घाट' के नाम से प्रसिद्ध हो गया। श्री हिताचार्य के दिव्य स्वरूप पर मुग्ध होकर ब्रजवासी दर्शनार्थ आने लगे और शीघ्र ही समीपवर्ती गाँवो में इनके आगमन का समाचार फैल गया। जब श्री हिताचार्य वृन्दावन आये तब उस समय वृन्दावन घनघोर जंगल था। वहां एक नरवाहन नाम का डाकू रहता था जिसके भय से वहां दिन में भी कोई न आता। उसने अपनी शक्ति के द्वारा सम्पूर्ण ब्रज प्रदेश पर अपना अधिकार ही बना लिया था। उसकी इस शक्ति से बड़े-बड़े राजे महाराजे भी डरते थे। यहाँ तक कि दिल्लीश्वर का भी इस नरवाहन पर कोई नियन्त्रण नहीं था। जब नरवाहन को अपने गुप्तचरों द्वारा यह ज्ञात हुआ कि कोई ऐसा चमत्कारी महापुरुष हिंसक जन्तुओं से संसेवित निर्जन वन में आया है; जिसके मधुर प्रभाव से हिंसक जन्तु तथा निर्जन वन के परिसर में बसे बटमारों के मन-बुद्धि और चित्त बदल गये हैं और वे सब उस महापुरुष की सेवा सुश्रुषा में निरत हो गये हैं; तो कुतूहल देखने की दृष्टि से एक दिन नरवाहन भी श्री हिताचार्य के निवास स्थान पर आया। उस समय श्री हिताचार्य अपने शिष्यों तथा ब्रजवासियों से समावृत्त थे और 'नवल' नामक शिष्य के साथ कुछ आलाप-संलाप कर रहे थे। राजा नरवाहन भी श्री हिताचार्य के मधुर प्रभाव से अछूता न रह सका। वार्तालाप सुनकर उसे अपनी वृत्ति पर बहुत खेद हुआ। उसने अपना हार्दिक दुख प्रकट करते हुए श्री हिताचार्य से स्वयं को शरण में लेने की प्रार्थना की। श्री हिताचार्य ने उसकी निष्कपट वाणी सुनकर मन्त्रदान के साथ-साथ उपदेश भी दिये जिससे उसके जीवन का आमूलचूल परिवर्तन हो गया। नरवाहन जैसे खूँखार डाकू के जीवन के इस परिवर्तन से पंचकोसी वृन्दावन में निवास करना सबके लिए सुगम हो गया। फलतः बृहद वृन्दावनस्थ ब्रज के नन्दग्राम, बरसाना, राधाकुंड और संकेत आदि ग्रामों में बसे हुए सन्तजन भी श्री हिताचार्य द्वारा प्रकटित इस पंचकोसी रासस्थल वृन्दावन में निवास करने लगे। इससे पूर्व सभी भक्तगण इस पंचकोसी वृन्दावन से अपरिचित ही थे। श्री हिताचार्य ने जिस स्थान से तीर फेंका था उसी स्थान पर लता विनिर्मित मन्दिर या पर्ण कुटी में श्री राधाबल्लभलाल जी को विराजमान कर दिया और अपने निवास के लिए किसी प्रकार का निवासालय बनाकर श्री राधाबल्लभलाल जी की अष्टयामी सेवा करने लगे। वे इस पर्ण विनिर्मित मन्दिर में उस समय तक सेवा करते रहे जब तक राजा नरवाहन द्वारा नवीन मन्दिर का निर्माण नहीं हुआ था। राजा नरवाहन ने श्री राधाबल्लभलाल जी का नवीन मन्दिर उसी स्थान पर बनवाया था, जहाँ पर श्री हिताचार्य सपरिवार निवास करते थे। नवीन मन्दिर निर्माण हो जाने पर वि. सं. 1591 की कार्तिक शु तेरस को श्री हिताचार्य ने श्री राधाबल्लभलाल जी को उसमें विराजमान किया और विशेष समारोह के साथ पाटोत्सव मनाया। अनेक संतगण गोकुल, गोवर्धन, नंदगाव और बरसाने में निवास करते थे। उस समय गोवर्धन, नंदगाव और बरसाना भी वृहद् वृन्दावन था। श्री हरिवंश जी ने यहाँ अनेक लीला स्थलियों को प्रकट किया और वृन्दावन की सीमा पंचकोसी निर्धारित की। उसी दिन आज भी वृन्दावन प्राकट्य उत्सव मनाया जाता है। श्री नरवाहन जी पर कृपा करना : रहें भौगाँव नांव नरबाहन साधुसेवी, लूटि लई नाव, जाकी बन्दीखानै दियौ है। लौंड़ी आवै दैन कछू, खायवे को, आई दया, अति अकुलाई लै, उपाय यह कियौ है॥ बोलौ राधवल्लभ औ, लेवौ हरिवंश नाम, पूछै शिष्य नाम कहौ, पूछी नाम लियौ है। दई मँगवाय वस्तु, राखियो दुराय बात, आय दास भयौ, कही रीझि पद दियौ है॥ - श्री भक्तमाल (419) श्री “नरवाहन” जी श्रीहरिवंशजी के शिष्य, परम संतसेवी, "भैगाँव” में रहते थे। ब्रज के एक जमींदार थे और लुटेरे भी। कोई सेठ लाखों की संपदा नाव में भरे यमुना जी के मार्ग से जा रहा था, नरवाहन ने संतसेवा के लिये सब लूटलिया, और उस सेठ को कारागार (बन्दीघर) में डाल दिया। उस वणिक (सेठ) को भोजन देने एक लौंड़ी (टहलनी) कारागार में जाती थी, सेठ की दुर्दशा देखकर उस टहलनी के हृदय में बड़ी दया आई, तब बहुत अकुलाके उसको एक उपाय बताया कि "तुम बड़े ऊँचे स्वर से "राधावल्लभ श्रीहरिवंश !” यह नाम जपो, जब पूछा जाय, तब कहना कि मैं श्रीहरिवंश जी का शिष्य हूँ।” उस सेठ ने ऐसा ही किया और उच्च स्वर से "राधावल्लभ श्रीहरिवंश” नाम रटने लगा। जब श्रीनरवाहनजी ने यह सुना तो उस सेठ के पास गए और पूछा कि “तुम यह नाम क्यों जपते हो?” उस सेठ ने कहा “मैं श्रीहरिवंशजी का शिष्य हूँ।” राजा नरवाहन बड़े ही गुरु निष्ठ थे। सुनते ही उस सेठ को मुक्त कर दिया और धन देकर कहा कि "श्रीगुसाईंजी से यह बात नहीं कहना।" वह सेठ शीघ्र ही श्रीवृन्दावन जाकर श्रीहित हरिवंशजी का शिष्य हो गया, और अपना वृत्तान्त भी सुनाया "नरवाहन जी ने लाखों का धन लेकर मुझे कारागार में डाल दिया सो मैंने आपका नाम लिया और झूठ ही कहा कि "आपका शिष् हूँ।” यह सुनते ही नरवाहन जी ने मुझे मुक्त कर दिया और मेरा सम्पूर्ण धन देकर मुझे घर भेज दिया।" सुनकर प्रसन्न हो श्री गुसाईंजी ने दोनों को प्रभुपद प्रेम प्रदान किया। श्रीनरवाहन जी की गुरुभक्ति पर रीझकर इन्हीं की छाप देकर श्री हरिवंश जी ने दो पद बनाकर अपनी "चौरासी" ग्रन्थ में रख लिया और श्री नरवाहन जी को नित्य विहार रस का साक्षात्कार करा दिया। नवीन सिद्धांत एवं स्वेष्ट-सेवा-संस्थापना : श्री हिताचार्य के परमोपास्य षटैश्वर्य सम्पन्न भगवान नहीं थे; प्रत्युत कोटि ब्रह्म ऐश्वर्य के परकोटे के अन्तर्गत किन्तु उससे दूर पूर्ण माधुर्य मूर्ति, रस-रसिक, अद्वय युगल किशोर थे। भगवान की सेवा पूजा वैदिक विधान द्वारा ही संविधेय होती है किन्तु माधुर्य मूर्ति, 'प्रेम' किंवा 'रस' विग्रह श्री राधावल्लभलाल जी की सेवा प्रीति-विधान से ही सम्भव थी। अतः श्री हिताचार्य ने अपने स्नेह भाजन श्रीराधाबल्लभलाल जी का अहर्निशि समयानुरूप अनेक प्रकार से लाड़-दुलार प्यार किया। इस लाड़-प्यार को ही उन्होंने सात भोग और पाँच आरती वाली विधि निषेध शून्य 'अष्टयामी सेवा' तथा वर्ष में आने वाले ऋतु उत्सवों [वसन्त, होली, होरीडोल, जलबिहार, पावस, झूला और आदि) की 'उत्सविक सेवा' का सुरम्य रूप प्रदान किया। साथ ही अपने आचरणों एवं वाणी द्वारा दैनिक स्वेष्ट की मानसी सेवा करने का भी मूर्त विधान दिया। सिद्ध केलिस्थलों का प्राकट्य : श्री हिताचार्य ने ऐसे वृन्दावन का प्रागट्य किया था जोकि भूतलस्थ होते हुए भी 'देवानामथ भक्त-मुक्त' और श्री कृष्ण के लीला परिकर के लिए भी दुर्लक्ष्य था। इसीलिए यह वृन्दावन परम रहस्य संज्ञक बना रहा और बना रहेगा। ऐसे वृन्दावन में होने वाली लीलायें और लीला स्थलों का प्रागट्य भी अनेक दृष्टियों से अनिवार्य था। अतः श्री हिताचार्य ने उन लीला स्थलों का भी प्रागट्य किया जिनका उल्लेख श्रीमद्भागवत आदि पुराणों में नहीं है। इन लीला स्थलों का प्रागट्य ही पंचकोसी वृन्दावन का प्रागट्य है और जो रहस्य रूप वृन्दावन के परिचय प्रदाता तथा प्रत्यक्ष प्रतीक हैं। पंचकोसी वृन्दावन में उनके द्वारा प्रकटित लीला स्थल हैं-रासमण्डल, सेवाकुंज, वंशीवट, धीरसमीर, मानसरोवर, हिंडोल स्थल, शृंगारवट और वन विहार। नमो जयति जमुना वृन्दावन। नमो निकुंज कुंज सेवा, हित मण्डल रास, डोल, आनंदघन॥ नमो पुलिन वंशीवट, रसमय धीरसमीर, सुभग भुव खेलन। नमो-नमो जै मानसरोवर सुख उपजावन दंपति के मन॥ नमो-नमो दुम बेली खग-मृग जे-जे प्रगट गोप्य श्री कानन। नमो जयति हित स्वामिनि राधा अलबेली अलबेलौ मोहन॥ - श्री अलबेलीशरण जी नित्य रासलीलानुकरण प्रागट्य : प्रेम किंवा रस मूर्ति श्यामा-श्याम प्रकृतितः रास और विलास प्रिय हैं। रास और विलास प्रियता इनके स्वरूप की प्रकट प्रतीक है। इसीलिए श्री हिताचार्य इन्हें आशीर्वाद देते हुए कहते हैं कि रास-विलास के साथ यह जोरी सदा विराजमान रहे - नव निकुंज अभिराम श्याम सँग नीको बन्यो है समाज। जै श्री हित हरिवंश विलास रास जुत जोरी अविचल राजु॥ राधाकिंकरीगण इस रास-रस का पान नेत्र- चक्षुओं द्वारा किया करती हैं। राधाकिंकरी भावानुभावितहृदय रसिकों को भी प्रत्यक्ष दर्शन द्वारा इस रास-विलास का रसास्वाद निरन्तर मिल सके इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए श्री हिताचार्य ने प्रेम मूर्ति श्यामाश्याम की इस नित्य रासलीला के अनुकरण का प्रागट्य किया। यह रासलीलानुकरण वृंदावन में होने वाले उस नाद्यन्त नित्यरास का अनुकरण था जो मुक्तजनों, भक्तजनों और गोविन्द प्रिय परिकर से सर्वथा अलक्षित है। यह भागवत वर्णित द्वापरान्त में होने वाले महारास से भिन्न उस नित्यरास का अनुकरण था जिसे केवल राधा-प्रिय किंकरीगण ही देखा करती हैं। इस रासलीलानुकरण का शुभारंभ श्री हिताचार्य ने वि. से. 1592 के लगभग पंचकोसी वृन्दावनस्थ चैन घाट [वर्तमान नाम गोविन्द घाट) में विनिर्मित रास मण्डल पर ब्रजवासी बालकों को श्यामा-श्याम व सहचरियों के वेष से सुसज्जित करके किया था। इसी रासमण्डल में एक समय महारास के मध्य श्री राधा के चरणों की नूपुर टूट गयी थी और वहां उपस्थित श्री हरिराम व्यास जी ने अपने यज्ञोपवीत से नूपुर गूँथ कर श्री प्रिया जी के चरणों में धारण कराया था। समाजगायन [ संगीत ]- समुद्भव : 'प्रेम' किंवा 'रस' जब उज्जृम्भित होता है तब उसमें राग की ऊर्मियाँ प्रकृतितः उच्छलित होती हैं। श्यामा-श्याम-प्रेम किंवा रस की सघन मूर्ति ही हैं। यही कारण है कि उन्हें रागालापन तथा वीणा-वंशी वादन अत्यधिक प्रिय है। कभी रसिकशेखर श्यामसुन्दर वंशी वादन के माध्यम से श्री प्रिया के साथ गायन करके उन्हें प्रसन्न करते हैं तो कभी केवल प्रिया जी अपने मधुर गायन तथा वीणा वादन-द्वारा अपने प्रियतम को आनंदित करती हैं। इसी प्रकार राग और अनुराग की राजीव मूर्तियाँ सहचरीगण भी समय-समय पर युगल के रागालाप का अनुगमन करके कभी प्रातः, कभी मध्यान्तर, उत्थापन काल में और कभी रात्रि रास में गायन-वादन करके युगलवर का मनोरंजन किया करती हैं। राधाकिंकरी भावानुभावित रसिक भी इसी प्रकार से रस लीलाओं के पद्यात्मक गायन द्वारा अपने इष्ट युगल को आनन्दित कर सके तथा स्वयं वृन्दावनरसानन्द का अनुभव कर सके - इस उद्देश्य से श्री हिताचार्य ने 'समाज गायन' की अभिनव और मौलिक गायन पद्धति का भी समुद्भव किया। यहाँ पर यह नितान्त अविस्मरणीय है कि उन्होंने सामवेद के स्वर प्रधान संगीत को अक्षर प्रधान बनाकर इस मौलिक गान पद्धति को जन्म दिया और रस लीला संबंधी गेय पदों को एक धुन विशेष में आबद्ध करके उन विशिष्ट 'धुनों' का भी आविष्कार किया; जो आज भी राधावल्लभीय समाजगान गायको के कण्ठ में परम्परा से सुरक्षित हैं। शिष्य परिकर : रसिकाचार्य गो. हित हरिवंश जी के अनेक शिष्य हुए, उनमें से भगवत मुदित जी द्वारा रचित 'रसिकअनन्यमाल' में वर्णित शिष्यों का नामोल्लेख किया जाता है इन उल्लिखित रसिकों में से श्री नरवाहन, हरिरामव्यास, छबीलेदास, नाहरमल, बीठलदास, मोहनदास, नवलदास, हरीदास तुलाधार, हरीदास जी [कर्मठी बाई के ताऊ], परमानन्ददास, प्रबोधानन्द सरस्वती, कर्मठी बाई, सेवक जी, खरगसेन, गंगा, जमुना, पूरनदास, किशोर, सन्तदास, मनोहर, खेम, बालकृष्ण, ज्ञानू, गोपालदास नागर, आदि। रचनायें : श्री हिताचार्य द्वारा विरचित रचनायें निम्नांकित हैं - 1: श्रीराधासुधानिधि यह एक संस्कृत काव्य है जिसकी श्लोक संख्या 270 है। इस ग्रन्थ में श्री राधाकृष्ण की विभिन्न निकुञ्ज लीलाओं का वर्णन है, संग में अभिलाषा एवं वंदना के श्लोक भी संगृहीत हैं। 2: श्री यमुनाष्टक श्री यमुनाष्टक संस्कृत में रचित एक अष्टक है जिसकी श्लोक संख्या 9 है। इसमें श्री यमुना जी का यश एवं उनकी वंदना का वर्णन है। 3: श्री हित चौरासी श्री हित चौरासी ब्रजभाषा में एक पद्य रचना है जिसमें 84 पद संकलित हैं। इस ग्रन्थ में श्री श्यामाश्याम की निकुंज लीला का वर्णन है। 4: स्फुट वाणी इस ग्रन्थ में ब्रजभाषा में 24 पद संकलित हैं, जिसमें सिद्धांत, आरती, श्री श्यामाश्याम की निकुंज लीला, आदि के पद हैं। इन 4 रचनाओं के अतिरिक्त श्री हिताचार्य जी के 2 पत्र ब्रजभाषा गद्य में रचित हैं। लीला संवरण : जयकृष्ण जी ने श्री हिताचार्य का निकुंज गमन वर्णन करते हुए लिखा है कि - श्री यमुना जी के तट पर मानसरोवर के निकट भांडीरवट है। कुसुमित ललित लतिकाओं से रमणीय इस वन स्थली में ‘भँवरनी भवन' नामक एक निभृत निकुंज है। इस निकुंज में श्यामा-श्याम रति रस बिहार किया करते हैं। शारदीय पूर्णिमा [आश्विन की पूर्णिमा] की चन्द्र-चन्द्रिका में रति रस बिहार के रसासव से आघूर्णित नयन श्री रसिक युगल झूम रहे थे, घूम रहे थे, उनकी श्री अंग की कान्ति चन्द्र-कान्ति को अत्यधिक कान्त बना रही थी। श्री हिताचार्य को प्रिया जी के अंग की सुगन्ध ने अपनी ओर बलात् आकर्षित किया। परिणामतः वे उस सुगन्ध के आधार से "प्रिया जी ! आप कहाँ हो ? कहाँ हो ?" यह कहते हुए उस वन में घुसते ही चले गये और थोड़ी देर में प्रिया जी की अंग-चन्द्रिका में घुल मिल गये। इस प्रकार से वि. सं. 1609 की आश्विन पूर्णिमा की रात्रि में श्री हित जी लोक-दृष्टि से ओझल हो गये। दिव्य कमल श्री यमुना कूल। वट भांडीर निकट रस मूल॥ संतत जहँ भँवरन की भीर। शीतल-मन्द-सुगंध समीर॥ जहँ बिहरत श्री रवनी-रवन। ताकौ नाम भँवरनी भवन॥ शरद मास राका उजियारी। पूरन शशि जु प्रकाशित भारी॥ प्रिया-जौन्ह में यौं मिलि गई। तिहि छिन सहचरि संभ्रम भई॥ कहत कि कहाँ-कहाँ हो लली। सौंधे के डोरे लगि चली॥ दृष्टान्तर यौं श्री हरिवंश। मानसरोवर रस के हंस॥ भँवर भँवरनी में दोउ चलैं। श्री हित जू तिन सँग ही रलैं॥ सम्वत सोरह सै रु नव, आश्विन पूनौ मास। ता दिन श्री हित जग-दृगन, कियौ अप्रगट विलास॥ श्री हरिराम व्यास जी ने हिताचार्य के निकुंज गमन कर जाने के फलस्वरूप वृन्दावन के रसिक समाज की दुर्दशा और अपनी हार्दिक वेदना का वर्णन किया है - हुतौ रस रसिकन कौ आधार। बिनु हरिवंशहि सरस रीति कौ कापै चलिहै भार॥ को राधा दुलरावै गावै वचन सुनावै चार। वृन्दावन की सहज माधुरी कहिहै कौन उदार॥ पद रचना अब कापै ह्वै है निरस भयौ संसार। बड़ौ अभाग अनन्य सभा कौ उठिगौ ठाठ सिंगार॥ जिन बिनु दिन छिन सत युग बीतत सहज रूप आगार। 'व्यास' एक कुल कुमुद बन्धु बिनु उड़गन जूठौ थार॥
जयति जय राधा रसिक मनि मुकुट मनि
(स्तोत्र) जयति जय राधा रसिक मनि मुकुट मनि हरनी त्रिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये॥ [1] जयति गोरी नव किसोरी सकल सुख सीमा श्रिये। परा...
श्री श्री राधा दामोदर मंदिर 1542 ईसवी में श्री जीव गोस्वामी द्वारा स्थापित एक प्राचीन मंदिर है। राधा दामोदर की सेवा श्री जीव गोस्वामी द्वारा की जाती थी। श्री राधा दामोदर को श्रील रूप गोस्वामी द्वारा प्रकट किया जिन्हे उन्होंने सेवा और पूजा के लिए अपने प्रिय शिष्य और भतीजे-जीव गोस्वामी को दिया। श्री रूप गोस्वामी, श्री जीव गोस्वामी की समाधि। श्री रूप गोस्वामी के भजन कुटिया और समाधि: श्री श्री राधा-कृष्ण की शीर्ष सेवक श्री रूप मंजरी हैं। उनका भजन-कुटिया और समाधि-मंदिर श्री श्री राधा दामोदर मंदिर के आंगन में स्थित हैं। जीव गोस्वामी समाधि: जीव गोस्वामी की समाधि राधा दामोदर मंदिर में स्थित है। श्रीला कृष्ण दास कविराज गोस्वामी समाधि: श्रीला कृष्ण दास कविराज गोस्वामी की समाधि राधा दामोदर मंदिर में भी स्थित है। अन्य वैष्णव संतों की पुष्प समाधि भी मंदिर में स्थित हैं। गिरिराज चरण शिला इतिहास: श्रीपाद सनातन गोस्वामी श्री राधा मदनमोहन मंदिर के पास वृंदावन में रहते थे। हर दिन वह परिक्रमा के लिए वृंदावन से गोवर्धन जाते थे। जब वह बूढ़े हो गए तब भी वहां मार्ग पर चलते थे और परिक्रमा किया करते थे और यह देखकर यह भगवान स्वयं उनके सामने प्रकट हुए और उसे बताया कि वह उनकी भक्ति से खुश हैं और वृंदावन में रहने और राधा कृष्ण की सेवा करने के लिए गोस्वामी पाद जी से कहा। श्रील सनातन गोस्वामी ने कहा कि गोवर्धन न आने आने पर उन्हें दर्द और दुःख महसूस होता है। तब श्री कृष्ण ने उन्हें अपने चरण चिन्ह, बांसुरी, छड़ी और गायों के चरण चिन्ह के साथ एक गोवर्धन शिला दी और गोस्वामी पाद को बताया कि इस गोवर्धन शीला के चार चिन्ह के साथ आपको गोवर्धन परिक्रमा का पूरा लाभ मिलेगा। तब से इस मंदिर में इस शिला को स्थापित किया गया है। कई भक्त मंदिर परिक्रमा करने के लिए इस मंदिर में आते हैं। मंदिर का समय: सवेरे 4:45 बजे - मंगला आरती सवेरे 8:30 बजे - श्रृंगार आरती दोपहर 12:30 बजे - राजभोग आरती शाम 6:00 बजे - संध्या आरती शाम 9:00 बजे - शयन आरती स्थान: राधा दामोदर मंदिर, सेवा कुंज के नज़दीक निकुंज वन में वृंदावन में स्थित है।
इस स्थान का विशेष महत्व है क्योंकि यहाँ श्री श्री रासेश्वरी (राधारानी) जी की प्रतिमा श्याम रंग (काली) रूप में उपस्थित है। कहा जाता है कि इस जगह श्री कृष्ण की भक्ति में लीन रहने की वजह से, राधारानी के शरीर का रंग पूरी तरह से श्याम रंग में बदल गया। इसीलिए इस स्थान को श्री श्रीजी रासेश्वरी जी महाराज के नाम से भी जाना जाता है। श्री हित हरिवंश रास मंडल, श्री हितहरिवंश महाप्रभु से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि हित हरिवंश महाप्रभु ने अपने जीवन का अधिकांश समय सेवा कुंज, हित रास मंडल और मदन टेर (वराह घाट) वृंदावन में बिताया। रास मंडल में श्री हरिराम व्यास ने किशोरीजी को पायल पहनाई: यहां रास मंडल में एक बार श्री राधा-कृष्ण रास नृत्य कर रहे थे और राधारानी की पायल टूट गई, व्यासजी (विशाखा सखी के अवतार) जो कि लीला में लीन थे, उन्होंने तुरंत अपनी तुलसी माला को गले से तोड़कर श्री प्रिया जू के चरणों में बांध दिया। वैष्णवों में से कुछ ने उनके इस व्यवहार के बारे में शिकायत की। लेकिन वह अपने निर्णय पर बहुत दृढ़ थे क्योंकि उन्होंने सुझाव दिया था कि श्री राधारानी की सेवा में इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है तो यह मेरे लिए किस काम का है। इस बात को सुनकर सब दंग रह गए। श्री सेवक जी (दामोदरदास जी) : श्री दामोदर दास जी जिनको सेवक जी के नाम से भी जाना जाता है, वह इसी जगह वृक्ष के नीचे बैठे हुए निकुंज लीला में पधार गए थे। ऐसा भी माना जाता है कि वह उस वृक्ष में लीन हो गए। श्री ध्रुवदास जी: श्री ध्रुवदास जी: ध्रुवदास जी, श्री हित हरिवंशजी के तीसरे पुत्र, श्री गोपीनाथजी के शिष्य बने। कहा जाता है कि जब श्री ध्रुवदास जी को राधा रानी ने दर्शन दिए थे तब उनके हृदय में अपनी शक्ति दी थी जिससे उन्होंने इसी जगह पर बयालीस लीला नामक ग्रंथ लिखा जिसमें श्री राधा कृष्ण की निकुंज लीलाओं का वर्णन उन्होंने किया है। मंदिर का समय: गर्मी सवेरे 6:00 बजे - मंगला आरती शाम 7:15 बजे - शयन आरती सर्दी सवेरे 6:30 बजे - मंगला आरती शाम 6:15 बजे - शयन आरती स्थान: हित रास मंडल, यमुना के किनारे, चीर घाट के पास स्थित है। इसको बड़ा रास मंडल भी कहते हैं।
पूरा ब्रज मण्डल वृंदा देवी का घर है। इस स्थान के बारे में यह लिखा हुआ है कि नंदगाँव से पश्चिम की ओर डेढ़ मील की दूरी पर आपको वृंदा देवी का निवास मिलेगा। तो यह वही वृंदा देवी का स्थान है, जो डेढ़ मील की दूरी पर है, नंदगाँव के पश्चिम दिशा में स्थित है। सामने की तरफ वृंदा कुंड है और पीछे की तरफ पहला योग पीठ गुप्त कुंड है। ब्रज में कुल 8 योग पीठ हैं जहां राधा और कृष्ण विभिन्न लीलाएँ करते हैं। इनमें से पहला गुप्त कुंड है जो इस मंदिर के ठीक पीछे स्थित है। ब्रज की रानी श्री राधा हैं और राजा श्री कृष्ण हैं और लीला भूमि का निर्माण वृंदा देवी द्वारा किया जाता है। ब्रज में समस्त लीलाओं का नेतृत्व वृंदा देवी द्वारा किया जाता है। सुबह 7:00 बजे से 8:24 बजे के बीच अभी भी लीला चल रही है। हर जगह मंगला आरती सुबह 4:00 बजे से शुरू होती है लेकिन यहाँ सुबह 7:00 बजे, लेकिन यह मंदिर सुबह 7:00 बजे खुलता है। जब सुबह 7:00 बजे मंदिर खुलता है, तो राधा कृष्ण लीला पारायण होते हैं, वृंदा देवी इसका प्रबंध करने के लिए यहां आती हैं। राधा कृष्ण के आने के बाद मंदिर खुलता है, रात 7:00 बजे से लीला आरम्भ होती है और सुबह 8:24 पर समाप्त होती है, राधा कृष्ण लीला समाप्त कर प्रस्थान करते हैं। कृष्ण गाय चराने जाते हैं और राधा रानी सूर्य देव की पूजा करने जाती हैं। जब आप छात्ता से गोवर्धन जाते हैं, तो भनाकला नाम का एक गाँव होता है, राधा रानी वहाँ सूर्य देव की पूजा करने जाती हैं। राधा और कृष्ण की दूसरी भेंट राधा कुंड और श्याम कुंड पर होती है। उसके बाद, बैठक वृंदावन में राधा गोविंद मंदिर में और फिर भांडिरवन में, फिर सेवा कुंज में, फिर निधिवन, फिर कोकिलावन, काम्यवन, धूमिलवन में होती है। ये 8 योगपीठ हैं, जिनमें, यह वृंदा कुंड पहला है। ब्रज में हर लीला का नेतृत्व वृंदा देवी द्वारा किया जाता है। जब राधा कृष्ण 7:00 बजे यहां आते हैं, तब वृंदा देवी कुंज का निर्माण करती हैं। राधा और कृष्ण उस कुंज के केंद्र में हैं और ललिता, विशाखा, चित्रा, तुंगविद्या, सुदेवी, चंपकलता, इन्दुलेखा, रंगदेवी, 8 प्रमुख गोपियाँ, कुंज के 8 कोनों पर खड़ी हैं। उनके बाद मंजरी, उप-मंजरी आदि खड़े होने पर जब आप अंदर देखेंगे, वृंदा देवी एक हाथ से आशीर्वाद दे रही हैं और दूसरे हाथ में एक कमल है, और एक तोता उस कमल के ऊपर बैठा है, उसका नाम दक्ष है। वह वृंदा देवी का दूत है। वह ब्रज की सारी जानकारी लाता है और वृंदा देवी को देता है। तोते (दक्ष) के 100,000 शिष्य हैं, जो पूरे ब्रज में यात्रा करते हैं। और वे पूरे ब्रज की सारी जानकारी वृंदा देवी तक पहुंचाते हैं.आप अभी भी यहां शिष्यों (पक्षियों) की आवाज़ सुनते हैं , वृंदा देवी के शिष्य दिन-रात पूरे ब्रज में घूमते हैं। स्थान: यह मंदिर नंदगाँव में स्थित है, नंद भवन से 1.5 KM और टेर कदम्ब से 4 KM की दूरी पर, मथुरा, उत्तर प्रदेश 281121
श्री श्यामानन्द प्रभु को इसी स्थान पर सोहनी सेवा करते समय श्री राधा रानी का नूपुर प्राप्त हुआ था। जिसके पश्चात् उन्हें श्री राधा रानी का दर्शन एवं श्री राधा श्यामसुंदर का श्री विग्रह प्राप्त हुआ। इसी स्थान पर उनकी समाधी बनी है। स्थान: श्यामानंद प्रभु की समाधि राधा श्यामसुंदर मंदिर के पास स्थित है, सेवा कुंज रोड, वृंदावन, मथुरा, उत्तर प्रदेश 281121
हे सखी, मुझे श्री वृन्दावन बहुत प्यारा लगता है, जहाँ मेरे आँखों के तारे श्री राधावल्लभलाल विराजमान हैं। [1] रास-मंडल, सेवा कुञ्ज, यमुना पुलिन, आदि-आदि स्थानों में श्री श्यामाश्याम की अद्भुत छवि समाई हुई है। श्री प्रियासखी जी कहते हैं कि नव मंदिर में विराजमान युगल जोड़ी की शोभा को मैंने अपने ह्रदय में धारण कर लिया है। [2]
करो कोई जैसे मन भावे
जिसको जो मन भावे सो करे, हमने तो दिव्य दंपति (श्री राधा-कृष्ण) की शरण ले ली है। [1] हम तो रसिकों की वाणियों को ही आधार मानते हैं और उन्होंने नित्य कि...
अचरज धाम नाम वृन्दावन, रसमय सृष्टि जहाँ है
श्रीवृन्दावन नामक एक आश्चर्यमय धाम है, जहाँ रसमय सृष्टि है। [1] इस वृन्दावन में रसभोगी आश्चर्यमय श्रीगौर-श्याम निरन्तर निवास करते हैं। [2] यहाँ सखिय...
परिचय : श्री गोपालदास जी "लघु सखी" राधावल्लभ संप्रदाय में दीक्षित एक परम भक्त थे। इनका जन्म पंजाब में 1940 के आसपास अनुमानित होता है। आध्यात्मिक जीवन : जब श्री गोपालदास जी 14 साल के थे, तभी अपने प्राथमिक गुरु श्री मुकुंद हरी की सेवा में वृन्दावन आ गए। ये स्वाभाव के बड़े सरल थे एवं वृन्दावन से बहुत प्रेम करते थे। इन्होने वृन्दावन में सेवा कुञ्ज में सोहनी सेवा आरम्भ की। श्री गोपालदास जी सेवाकुंज की लताओं को साक्षात् सखी ही मानते थे। श्री राधारानी से सोहनी सेवा सीखाने की प्रार्थना करना : जब श्री गोपालदास जी ने सेवा कुञ्ज में सोहनी सेवा शुरू की तो उस समय उन्हें भली प्रकार से सोहनी देने नहीं आता था। एक दिन सेवाकुंज के गोस्वामी जी गोपालदास जी की सोहनी सेवा को देखकर बड़े रुष्ट हुए और उन्हें बहुत ज़ोर की डाँट लगायी की "तुझे सोहनी सेवा करने नहीं आती ?" इस डाँट से श्री गोपालदास जी बहुत दुखी हुए और लताओं के भीतर चले गए और खूब रोने लगे। श्री गोपालदास जी विचार करने लगे की मैं कैसा अभागा हूँ जिसे सोहनी सेवा भी नहीं आती। तब उन्होंने श्री राधारानी से प्रार्थना की - किशोरी मोहे सोहनी देन सिखावो। हे, मंद मुस्काये लाड़ली, नव नव कृपा कोर बरसाओ॥ [1] कोटि किरण छिड़कत अंगन में, बेगि कृपा करी धावो। तब बोलो हंस-हंस के श्यामा, मंद स्वरन बतलावो॥ [2] ऐसी सेवा करो री बांवरी, तो गाल पे मीठी सी चपत लगाओ। श्री गोपाल हित ललित लाड़िली श्री हित सजनी कि दासी बनाओ॥ [3] हे श्री राधा, मुझे सोहनी सेवा करना सीखा दो। हे लाड़िली, मंद-मंद मुस्कुराकर नव कृपा की कोर बरसाइये। [1] हे किशोरी, आपके अंगों से प्रकाश के कोटि-कोटि किरण निसृत हो रही हैं, मुझपर कृपा करने के लिए शीघ्र दौड़ कर आइये। फिर मुझसे हंस-हंस के बोलिये, मंद स्वर में बातें कीजिये। [2] "अरी बावरी, ऐसे-ऐसे सेवा कर" ऐसा कह कर हे श्री राधा, मुझे सेवा करना सिखाइये, इसपर भी मैं ठीक से सेवा न कर पाऊं तो मेरे गाल पर मीठी सी चपत लगाइये। श्री गोपालदास जी कह रहे हैं "हे श्री ललित लाडिली जू, मुझे हित सजनी की दासी बना दीजिये।" [3] श्री राधारानी ने इस प्रार्थना को सुन ली जिससे गोपालदास जी सम्पूर्ण जीवन सेवाकुञ्ज में सोहनी देते रहे। नित्य सोहनी सेवा का निर्वाह : श्री सेवा कुञ्ज में सोहनी सेवा करना श्री गोपालदास जी का नित्य का नियम था। एक समय कुछ वैष्णवों के अनुरोध पर श्री गोपालदास जी दिल्ली चले गए। वहां भजन संध्या में इन्हें आमंत्रित किया गया था। समारोह मध्य रात्रि तक चला। रात के करीब 2 बज गए। श्री गोपालदास जी ने सबसे कहा की अब हम सोएंगे। ऐसा कह कर गोपालदास जी सो गए। 5-7 मिनट के बाद श्री गोपालदास जी झट से उठ कर खड़े हो गए और कहने लगे की मुझे वृन्दावन जाना है, मेरी सोहनी सेवा छूट जाएगी, श्री राधारानी की मंगला आरती छूट जाएगी। सब वैष्णवों ने गोपालदास जी को वृन्दावन ले आये और श्री गोपालदास जी ने मंगला आरती का दर्शन कर सोहनी सेवा की। सेवा कुञ्ज की लता कटने से श्री गोपालदास जी की स्थिति : 2013 में सेवा कुञ्ज के नवनिर्माण कार्य के लिए कुछ लताओं को हटाना था जिससे बीचमे रासलीला स्थली का निर्माण हो सके। मजदूरों ने कुछ लताओं को काट दिया। यह देखकर श्री गोपालदास जी विचलित हो गए और अनशन पर बैठ गए। निर्माण कार्य रोक दिया गया लेकिन लता तो गोपालदास जी की दृष्टि में साक्षात् सखी थी। इस कारण श्री गोपालदास जी का स्वास्थ ख़राब हो गया। उनका उपचार किया गया लेकिन वे पुनः स्वस्थ न हो सके। रचना : श्री गोपालदास जी ने अनेक पदों की रचना की है जो "निकुंज रस वल्लरी" नामक ग्रन्थ में संकलित है। लीला संवरण : श्री गोपालदास जी ने 2013 में अस्वस्थता में अपने देह का त्याग कर दिया और निकुंज में प्रवेश किया।
श्री युगल किशोर या किशोर वन, सेवा कुंज के पास व्यास घेरा में स्थित है। श्री हरिराम व्यास जिन्हें वृंदावन के ब्रज रसिक विशाखा सखी अवतार रूप में मानते हैं, वे यहीं भजन करते थे। उनकी भजन कुटिया और समाधि मंदिर भी यहीं स्थित है। सेवा कुंज की सीमा किशोर वन से जुड़ी हुई है। युगल किशोर दिव्य लीला: एक बार श्री हरिराम व्यास जी को ठाकुर जी का सपना आया, जिसमे श्री कृष्ण ने उन्हें किशोर वन के कुएं से बाहर निकालने और मंदिर में स्थापित करने का निर्देश दिया। उस सपने में, हरिराम व्यास जी ने ठाकुर जी से पूछा, क्या आप अकेले हो या श्री राधा रानी के साथ हो? यदि आप राधा रानी के साथ हो, तो मैं आपको कुएं से बाहर निकाल दूंगा। इसे सुनते ही, ठाकुर जी ने कहा, हां, मैं राधा रानी के साथ हूं, मुझे कुएं से बाहर निकालो और वहां स्थापित कर दो। इस प्रकार, युगल किशोर स्थापित किये गये। स्थान: किशोर वन सेवा कुंज के पास व्यास घेरा में स्थित है।
वृन्दावन में प्रसिद्ध सेवा-कुंज के पास चार गलियाँ हैं: 1) दान-गली 2) मान-गली 3) गूमाना-गली 4) कुंज-गली एक बार,जब श्री राधा रानी मान में थीं, उन्होंने मान-गली में से मान- सरोवर को अपना रास्ता बना दिया। दान-गली इसलिए प्रसिद्ध है इस गली में श्री कृष्ण और उनके मित्र गोपियों से प्रेम रूपी कर के लिए के लिए मांग करते थे और गोपियाँ भी कन्हैया से यही मांगती थी । इसलिए इस गली को दान-गली के रूप में जाना जाता है। प्रेम-गली में श्री राधा रानी और श्री कृष्ण की पहली मुलाकात हुई थी। उस पल में, उनकी आंखों के आपसी मिलन से, प्रेम का संबंध उन लोगों के बीच स्थापित हो गया था जो हर क्षण में बढ़ता रहता था। यही कारण है कि इस गली को प्रेमा-गली के रूप में जाना जाता है । कुछ लोग इसे गुमान-गली भी कहते हैं, क्योंकि जब श्री कृष्ण ने श्री राधा रानी को कर के लिए बुलाया था, तो उन्होंने महान गर्व (गुमान) का प्रदर्शन किया और इसे देने से इनकार कर दिया। गली जो नीचे की ऒर सेवा-कुंज को अपना रास्ता बनाती हैं, जहां श्री कृष्ण श्री राधा रानी के चरणों को मालिश की थी, उसे कुंज-गली कहा जाता है। श्री राधा रानी दामोदर मंदिर इन चार गलियों से दूरी पर स्थित है।
जन्म एवं बाल्यकाल : ब्रज रस भक्ति धारा की रस वारिधी को और अधिक प्रखर करने में चाचा श्री हित वृंदावन दास जी का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। चाचा श्री हित वृंदावन दास जी का जन्म 1694 में श्याम सुंदर की क्रीडा स्थली ब्रजधाम के किसी ग्रामाँंचल में गौड़-ब्राम्हण कुल में हुआ। आप बाल्यकाल से ही दिव्य गुणों से युक्त एवं प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के धनी थे। आध्यात्मिक जीवन : अलपव्यस् में ही आपको श्री किशोरी जी के रसमय, प्रेममय, मंगलमय, श्री वृंदावन धाम आश्चर्य का सुयोग प्राप्त हुआ। आप हितावतंश रासवंशीय गोस्वामी हरिलाल व्यास जी के आत्मज स्वनाम धन्य युगल रस अभिसिक्त गोस्वामी श्री हित रूपलाल के परम कृपापात्र शिष्य थे। प्रसंग 1: [वृंदावन दास नाम एवं चाचा जी नाम से पुकारे जाना]: वृंदावन दास नाम आपको गुरुदेव कृपा से प्राप्त है। बचपन में ही माता-पिता के साथ आर्थिक स्थिति सदृढ़ न होने के कारण श्री वृंदावन धाम आ गए और गोस्वामी श्री रूपलाल जी महाराज के आश्रय में रहने लगे। गुरुदेव भगवान की कृपा से ही संपूर्ण शास्त्रों का अध्ययन किया। कहते हैं कि आप जब गुरुदेव भगवान के गृह में निवास करते थे उस समय गुरुवर्य श्री रूपलाल जी के प्रिय पौत्र गोस्वामी श्री लाडली लालजी, जो कि युवा थे, आपको नाम लेकर पुकारते। यह बात वृंदावन दास जी को पुत्रवत स्नेह एवं सम्मान देने वाले गुरु जी को उचित प्रतीत नहीं होती। इसलिए एक दिन गुरु जी ने अपने पौत्र को समझाते हुए कहा कि तुम इन्हें नाम से ना पुकार कर चाचा जी कहा करो। उसी समय से अन्य सभी लोग चाचा जी कहकर पुकारने लगे। चाचा जी के मन में प्रवाहित यह रस वारिधि अब उच्छलित होना चाहता था। परंतु स्वामिनी जू की एवं गुरु चरणों की अहैतु की कृपा के बिना यह कैसे संभव हो सकता है ? और परम करुणामयी श्री किशोरी जी तो सदा ही निज जनों की अभिलाषाओं को पूर्ण करती आई हैं।चाचा जी ने विरक्त वेष गुरुदेव भगवान श्री रूपलाल गोस्वामी जी के निकुंज गमन के पश्चात 64 वर्ष की आयु में ग्रहण किया था। दिव्यानुभूति : प्रसंग 1: अहमद शाह अब्दाली द्वारा वृंदावन पर आक्रमण जब वृंदावन में यवनो का आक्रमण हुआ था तब अहमद शाह अब्दाली के उत्पात का वर्णन करते हुए चाचा जी ने हित मुकुंद लाल जी, हित प्रेमदास जी, हित कृष्ण दास जी भावुक, आनंदघन कवि, जादौ दास, कृष्णदास पुजारी, जुगल दास अवधूत आदि रसिक भक्तों का आक्रमण में मारे जाने का भी उल्लेख किया है। भक्तों की ऐसी स्थिति को देखकर चाचा जी का हृदय अत्यंत दुखी था। कुछ दिन बाद चाचाजी फरूखाबाद चले गए। वहां रासलीला अनुकरण का आयोजन था। चाचा जी रासलीला देखकर रात्रि में विश्राम कर रहे थे। तभी स्वप्न में आनंदघन कवि जी का ख्याल सुना और देखा कि 12 वर्ष का एक बालक ऊंचे भवन से गिर पड़ा। चाचाजी व्याकुल हो गए की कहीं बालक मर तो नहीं गया। लेकिन वह तुरंत खड़ा होकर अपनी भुजाएं ठोकने लगा। चाचा जी के पूछने पर उसने बताया मैं तो आनंदघन के पास आया था। चाचा जी ने पूछा -आनंदघन जी कहां है? बालक ने कहा पीछे मुड़कर देखो। चाचा जी ने पीछे मुड़कर देखा की रासलीला में सभी भक्त विराजमान हैं, जो की आक्रमण में मारे गए थे। बालक बोला - अभी मैंने एक कला खेली है, और एक खेलूंगा अर्थात यवनो का आक्रमण 1813 एवं 1817 में दो बार हुआ। प्रातः काल सभी संतो से चाचा जी ने यह बात बताई और हरि इच्छा जानकर सहन किया। प्रसंग 2: वृंदावन के लिए असहनीय पीड़ा एवं वृंदावन आगमन कुछ समय चाचाजी कृष्णगढ़ नरेश बहादुर सिंह और उनके पुत्र विदिर सिंह के राज्य में रहे। राज महल में निवास करते हुए राजा के प्रार्थना पर कई ग्रंथों की रचना यहां हुई। लगभग 6 वर्ष यहां बहुत कठिनाई से बीते। वृंदावन का विरह प्रतिक्षण असह्य हो रहा था। चाचा जी की प्रार्थना स्वीकार कर प्रभु ने कृष्णगढ़ नरेश को स्वप्न में प्रेरणा दी कि चाचा जी को शीघ्र वृंदावन पहुंचाओ। चाचा जी को राजा ने सम्मान पूर्वक वृंदावन भेजा। गुरु कृपा एवं रचित ग्रन्थ : जब हृदय में प्रेम का प्रादुर्भाव होता है तब हृदय से प्रेम के प्रतिकात्मक शब्द निकलने लगते हैं। प्रेम के प्रतिकात्मक शब्दों में प्रेम के ही अनंत रूप एवं गुणों का आख्यान होता है। इस प्रेमोदगान को ही रसिकों ने ‘वाणी’ कहकर प्रकीर्तित किया है। एक बार गोस्वामी श्री हित रूपलाल जी ने चाचा जी को प्रभु का यशगान करने की आज्ञा दी, किन्तु प्रतिभा का प्रस्फुरण न होने से पद बनाने में यह समर्थ नहीं हुए। इससे गुरु ने आज्ञा दी - "तुम यहाँ से चले जाओ।" गुरु आज्ञा से अत्यन्त दुःखी होकर आप मानसरोवर चले गए; किन्तु वहाँ पहुँचते ही प्रभु ने कृपा की और प्रतिभा जागृत हो गयी। पद-रचना का प्रवाह चल पड़ा और आपने वृन्दावन आकर गोस्वामी जी को श्रीराधावल्लभ लाल का गुणानुवाद सुनाया। श्री गुरु कृपालब्ध चाचा वृंदावन दास जी के कण्ठ से अब वाणी का अजस्र प्रवाह होने लगा, जो कि उनके जीवन पर्यंत श्रावणी सरिता सलिल की भांति अखंड रूप से चलता रहा। चाचा जी इतने रस सिद्ध थे कि स्वप्न में भी लीला दर्शन करते जो कि जागने पर इन्हें देखे हुए चित्रों की भाँती स्मरण रहती और यह इसे लिपिबद्ध कर लिया करते। ‘स्वप्न विलास’ नामनी रचना इसका पुष्ट प्रमाण है। भरतपुर नरेश सुजान सिंह जी के यहां कुछ काल निवास करते हुए ‘हरिकला बेली’ नामक ऐतिहासिक ग्रंथ की रचना की। भरतपुर राज्य के डीग ग्राम में निवास करते हुए चाचा जी ने ‘यमुना प्रताप बेली’ की रचना की। कोसी में निवास करते हुए ‘विवाह मंगल बेली’ और वृंदावन का वास करते हुए ‘अष्टयाम सेवा समय प्रबंध’ की रचना की। ‘श्री हित रूप चरित्र बेली’ जैसे प्रमाणित इतिहास ग्रंथ की रचना कामवन स्थित राधा बल्लभ जी के मंदिर के निकट काशीराम नामक रसिक के घर में रहकर पूर्ण की। ‘वृंदावन जस प्रकाश बेली’ ‘युगल प्रीति प्रकाश पचीसी’ कृष्ण विवाह उत्कंठा बेली, आत्र पत्रिका’ आदि अनेक रचना यवनों के आंतक काल में रचित है। आकर चाचा जी ने श्री राधा कांत मंदिर, अठखंभा, वृंदावन में निवास करते हुए यहीं 'ब्रज प्रेम आनंद सागर' ग्रंथ पूर्ण किया। भरतपुर नरेश के आग्रह पर चाचा जी कुछ समय के लिए भरतपुर पधारें और उसका आतिथ्य स्वीकार करते हुए 'प्रेम पहेरी' वाणी की रचना की। कुछ दिनों के बाद चाचाजी पुनः वृंदावन आ गए और स्थाई रूप से वृंदावन का वास करने लगे। वृंदावन का वास करते हुए चाचा जी ने कई स्थलों को अपनी साधना स्थली बनाया। 'ईष्ट पद बंदन बेली' रचना में चाचा जी ने लिखा है कि परमेषट श्यामा श्याम ने वृंदावन के कैवारी वन स्थित दावानल कुंड के किनारे पर मुझे कदंब वृक्ष लगाने की आज्ञा दी थी और मैंने इस आज्ञा का पालन भी किया। वहाँ कदंब वृक्ष का आरोपण करके पद भी गाया। कदम्ब वृक्षों का दर्शन आज भी वहां होता है। चाचा जी ने ब्रज चौरासी कोस का भ्रमण भी किया। गोस्वामी कृष्ण चंद जी के सेव्य स्वरुप श्री राधा मोहन जी के मंदिर में रसिक भक्तों की प्रेरणा से सेवक भक्ति परचावली और सेवक जस विरदावली नामक दो ग्रंथों की रचना की। इस प्रकार चाचा जी का संपूर्ण जीवन श्यामा श्याम के दिव्य चिंतन और लीला गान के मध्य रहा। चाचा श्री हित वृन्दावनदास जी के 187 ग्रन्थ तथा और बहुत सी वाणियाँ कही जाती हैं। लीला संवरण : हित संप्रदाय की मान्यता के अनुसार चाचाजी का निकुंज गमन 1774 में फाल्गुन शुक्ल द्वितीया को वृंदावन के प्राण सेवा कुंज में बड़ी विचित्र रीति से हुआ। फालगुन शुक्ल द्वितीया के दिन सेवा कुंज में पूर्व परंपरा से प्रचलित समाज गायन हो रहा था। सभी रसिकों के साथ चाचा जी भी समाज गान में तल्लीन थे और वह सबके समक्ष रासलीला में तन्मय होकर निजस्वरूप का चिंतन करते हुए शरीर सहित अंतर्ध्यान हो गए। उनके स्थान पर उनका एक उत्तरीय ही प्राप्त हुआ। आश्रय में इस घटना के कारण ही श्री हित नाद बिंदु परिवार के द्वारा सेवा कुंज में उनका स्मारक स्थल निर्मित हुआ और पूर्व परंपरा से प्रचलित यह एक दिवसीय समाज गान चाचा जी के अष्ट दिवसीय समृति महोत्सव के रूप में परिवर्तित हो गया। उसी दिन से आज भी फाल्गुन शुक्ल द्वितीया से फाल्गुन शुक्ल दशमी तक चाचा जी का यह निकुंज प्राप्ति महोत्सव सेवा कुंज में होता चला आ रहा है। चाचा जी के निकुंज प्रवेश का स्मारक चिन्ह सेवा कुंज में आज भी विद्यमान है जिसमें उनके द्वारा रचित वाणी की संख्या एवं जीवन प्रवेश के समय का उल्लेख है।
यह एक प्रसिद्ध मंदिर है जिसे श्री रूप गोस्वामी जी ने प्रकाशित किया है। श्री गोविंद देव जी श्री रूप गोस्वामी जी को जमीन के नीचे मिले थे जहां इस समय यह मंदिर स्थापित है। श्री गोविंद देव जी की स्थापना श्री वज्रनाभ जी ने 5000 साल पहले (एक जगह जो गोविंद पीठ के नाम से विख्यात है) की थी। श्री रूप गोस्वामी सेवा कुंज में श्री राधा दामोदर मंदिर के पास एक कुटिया बनाकर भजन करते थे। श्री चैतन्य महाप्रभु की आज्ञा अनुसार वह श्री गोविंदा जी को प्रकाशित कर उनकी स्थापना करना चाहते थे। वह प्रतिदिन परिक्रमा लगाते थे। एक दिन जब वह परिक्रमा लगा रहे थे तब वह श्री गोविंद देव जी के ध्यान में अत्यंत व्याकुल हो उठे। तब वह यमुना जी के किनारे एक वृक्ष के नीचे बैठ कर रोने लगे और व्याकुल होकर श्री गोविंद देव जी के दर्शन के लिए रुदन करने लगे। तभी एक ब्रजवासी लड़का जो उनके साथ परिक्रमा कर रहा था, वह उनके पास आया और उनसे पूछा कि आप रो क्यों रहे हैं। पहले तो रूप गोस्वामी जी ने कुछ नहीं कहा परंतु बाद में उन्होंने अपने हृदय में जो चल रहा था वह सब कुछ ब्रज वासी लड़के को बता दिया। उसी क्षण बृजवासी लड़का उन्हें गोमा टीले पर ले गया और वहां उन्होंने बोला कि यहां प्रतिदिन एक गाय दूध देने आती है, लगता है आपकी आकांक्षा और इच्छा यहां पूरी हो जाएगी। ऐसा बोलकर वह ब्रजवासी लड़का अंतर्ध्यान हो गया। उस ब्रज वासी लड़के की मधुर वाणी और रूप सौंदर्य देखकर श्री रूप गोस्वामी भाव में बेहोश हो गए। उनके होश आते ही उन्होंने आस पास के ब्रज वासियों को अपने पास बुलाया और जिस जगह पर उस बृजवासी लड़के ने उन्हें बताया था वहां उन्होंने खुदाई शुरू की। थोड़ी ही खुदाई करने पर उन्हें श्री गोविंद देव जी मिले जो अनंत कामदेव के सौंदर्य को भी हेय करने वाले थे। उन्होंने श्री गोविंद देव जी को नहलाया और समस्त बृजवासी एकत्रित हो गए। श्री रूप गोस्वामी जी के आने से पहले श्री राधिका जी को जगन्नाथ पुरी धाम में चक्रबति जगह पर लक्ष्मी देवी के रूप में पूजा जाता था। श्री राधा जी ने महाराज प्रताप रुद्र के पिता को सपने में आकर आदेश दिया कि मैं लक्ष्मी नहीं राधा हूं। मैं श्री कृष्ण की प्रेमिका हूं। मैं श्री गोविंद देव जी के प्राकट्य की परीक्षा कर रही हूं। जब श्री गोविंद देव जी वृंदावन में प्रकट हो जाएं तब मुझे वृंदावन भेज देना। उसके पश्चात जैसे ही पता लगा कि श्री गोविंद देव जी का प्राकट्य हो चुका है तो श्री जान्हवा ठकुरानी जी के संग उन्हें वृंदावन भेज दिया। उसके पश्चात मंदिर के सब गोस्वामी जी ने श्री राधा ठकुरानी को श्री गोविंद देव जी के बाईं ओर स्थापित कर दिया। तो इस तरह श्री राधा गोविंद देव जी का प्राकट्य हुआ।
व्रजधाम में मिलेंगी, लाड़ली प्यारी तोहे
ब्रजधाम में श्री लाड़िली जी [प्यारी राधा] तुम्हें अवश्य ही मिल जाएँगी, बस वृंदावन की कुंजों में जाकर थोड़ा प्रेम से लोट लगा लो। [1] यहाँ के तोते और ...
जुगल किसोर किसोरी जोरी
श्री गौर वर्ण प्रिया जू (श्री राधा) एवं श्री श्याम वर्ण लाल जू (श्री कृष्ण) की जोड़ी सदैव मेरे हृदय में केलि-रूपी आनंद की वर्षा करती हुई विराजमान रहे।
मन मोहन मन मोहनी
सदैव आनंदमयी दिव्य युगल—श्री राधा का सुन्दर मुख और श्रीकृष्ण का नीला रंग—वृन्दावन के रसिक संतों के मन को मोह लेता है। यही आकर्षण ही रसिक संतों का खजा...
इसे वृंदावन में विशेष स्थान कहा जाता है, जिसे हरि त्रिवेणी या हरित्री जगह भी कहा जाता है, जहां तीन शिरोमणि रसिक, स्वामी श्री हरिदास ललिता सखी के अवतार, भगवान कृष्ण के बांसुरी के श्री हित हरिवंश महाप्रभु अवतार और विशाखा सखी के श्री हरिराम व्यास के अवतार मिलते हैं। यह निधिवन, सेवकुंज और किशोरवन के रास्ते में है। यह रास्ता बैठक बिंदु रसिक बिहारीजी मंदिर और गोरेलाल कुंज के अंदर से तय होता है। 500 साल पहले, यह निकुंज जंगल के अंदर था। श्री रसिक देव जी ने 300 साल पहले यहाँ श्री रसिक बिहारीजी की सेवा की थी। गोरेलाल कुंज का समय: सवेरे 9:00 बजे - मंगला आरती शाम 6:00 बजे - संध्या आरती
अलबेले आँगन खरे
अलबेले रसिक दम्पति श्री राधा-कृष्ण परस्पर गलबहियाँ दिए हुए निकुंज महल के आँगन में खड़े हैं और सहचरी दर्पण दिखला रही है।
कृपा करो अब नवल नवेली
हे नवल-नवेली श्रीराधा! अब मुझ पर कृपा कीजिए, सेवाकुंज और निकुंज के भवन की मैं लता, फूल एवं बेली बन जाऊं। [1] मैं सदा आपके रस में ही निमग्न रहूँ, कृपा...
शिष्य : श्री वनचन्द्र जी के मुख्य शिष्यों के नाम चतुर्भुजदास जी, भुवनदास जी, नागरीदास जी, झूंठा स्वामी जी, भागमती जी, कल्याण पुजारी जी, माधौ मुकुन्द जी, सुरध्वज, माधौ रसिक जू, जयदेव जी, कल्याणी बाई, भगवानदास जी, सोमनाथ भट्ट, वैष्णवदास जी। इनमें से सब गृहस्थ थे केवल झूंठा स्वामी जी एवं चतुर्भुजदास जी ने ही वैराग्य लिया था। लीला संवरण : श्री वनचन्द्र जी ने अपने चारों पुत्रों को सेवा बांट श्री चरणों में लीन हुए। श्री सुन्दरवर जी को सन्ध्या शयन दी, श्री राधा वल्लभ दास जी को शृंगार आरती व श्री नागरवर जी को राज भोग आरती तथा श्री ब्रज भूषण दास जी को मंगला आरती दी। इस प्रकार आपने चारों पुत्रों को सेवा बांट कर श्री वनचन्द्र जी 1608 अगहन शुक्ल 11 को निकुंज प्रवेश कर गए।
वृन्दावन छाँड़ि कहूँ सुख नाहीं
वृंदावन छोड़ कर कहीं भी आनंद नहीं है। मनोहर यमुना, सुंदरयुगल सरकार श्री प्रियतम-प्यारी (राधा-कृष्ण), एवं कदंब की छाया आदि अति मन मोहक है। [1] वंशीवट ...
अनगिनत इच्छा-पूर्ति चिन्तामणियों को ब्रज की रज के एक कण पर न्यौछावर कर देना चाहिए। वृंदावन के सेवा कुंज के विहार पर पूर्ण विश्व को वार देना चाहिए। [1] इच्छा पूर्ति करने वाले अनगिनत कल्प वृक्षों को ब्रज की लता पता पर वार देना चाहिए। अप्सराओं की रानी ‘रम्भा' को गोपियों के द्वार पर न्यौछावर कर देना चाहिए। [2] कामदेव की पत्नी ‘रति' और इंद्र की पत्नी (स्वर्ग की रानी) ‘सचि' को ब्रज की पनिहारिन (जो ब्रज में पानी भरने की सेवा करती हैं ) पर न्यौछावर कर देना चाहिए। भगवान् नारायण का वैकुण्ठ धाम यमुना रसरानी पर न्यौछावर कर देना चाहिए। [3] श्री अभय राम कहते हैं, "मेरी आराध्या एकमात्र श्री राधा हैं, मैं उनके अतिरिक्त किसी और को सपने में भी नहीं जानता, और नंद के पुत्र श्री कृष्ण पर समस्त भगवान् के अवतारों को ही न्यौछावर किया जा सकता है (जो स्वयं श्री राधारानी की शरण में हैं )"। [4]
राधाकृष्ण स्वरूपां वै कृष्ण राधास्वरूपिणम्
श्री राधा कृष्ण स्वरूपा हैं और कृष्ण श्रीराधा रूप हैं, मैं निकुञ्जस्थ गुरुरूपा श्रीराधा की शरण में जाता हूँ।
निकुंज वन, वर्तमान में सेवा कुंज, वृंदावन के बारह छोटे वनों में से एक वन है। सेवा कुंज को पहले निकुज वन भी कहा जाता था। पुराणों के अनुसार सेवा कुंज वृंदावन के विशाल उपवनो के सभी बारह उपवनो के केंद्र को दर्शाता है। पुराणों के अनुसार, यमुना नदी से घिरा हुआ पूरा क्षेत्र, मोहन चीर घाट से आदि-बरहा घाट तक सेवा कुंज या निकुंज वन के रूप में जाना जाता था। इसलिए, कालिया-घाट, मदन-मोहन, इम्ली तला, राधा दामोदर, श्रृंगार वट, गोविंद घाट, चेहाना घाट, केशी घाट, निधिवन, झुलनवन, गोपीनाथ, धीर समीर, वंशीवट, गोपीश्वर, ब्रह्मा-कुंड, गोविंदा कुंड जैसे स्थान और गोविंद जी योग-पीठ को भी निकुंज वन के भीतर अलग-अलग लीला स्थली के रूप में माना जाता है। इस विशेष घने वन में, युगल सरकार नित्य रासलीला करते हैं। उसके बाद श्री कृष्ण श्री राधा रानी के चरण कमलों की सेवा करते हैं। उन्हें लाल सिंदूर से श्रृंगार करते हैं और उनके लम्बे काले केशो का श्रृंगार करते हैं। श्री राधा रानी के मुख चंद्र पर रचना करते हैं, उनको रेशमी वस्त्र पहनाते हैं और मणि-जड़ित आभूषणों के साथ श्रृंगार करते हैं। रास-नृत्य संपन्न होने पर सखियाँ फूलों की पंखुड़ियों से बने कोमल शैय्या का निर्माण करती हैं जिसके पश्चात राधा और कृष्ण को एक साथ विराजमान होने के लिए आमंत्रित करतीं हैं। पूरे क्षेत्र में जहां यह दिव्य रास लीला निरंतर होती है उसे निकुंज वन या सेवा कुंज कहतें हैं। श्री कृष्ण की मुरली के अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने यहाँ भजन किया है, और उनकी समाधि भी इधर है। मंदिर का समय: गर्मी सवेरे 5:30 बजे - मंगला आरती सवेरे 8:30 बजे - श्रृंगार आरती दोपहर 12:30 बजे - राजभोग आरती शाम 5:30 बजे - संध्या आरती शाम 7:15 बजे - शयन आरती सर्दी सवेरे 7:00 बजे - मंगला आरती सवेरे 9:00 बजे - श्रृंगार आरती दोपहर 12:00 बजे - राजभोग आरती शाम 4:30 बजे - संध्या आरती शाम 6:30 बजे - शयन आरती
नैनन कौ लाठौ लीजिये
(पद) नैनन कौ लाठौ लीजिये। गोरी श्याम सलौनी जोरी सुरस माधुरी पीजिये॥ [1] छिन-छिन प्रति प्रमुदित चित चावहि निज भावहि में भीजिये। श्रीहरिप्रिया निरखि तन ...
हमारी बृंदावन रजधानी
श्री वृन्दावन समस्त तीर्थों का शिरोमणि, रसिकों की राजधानी है, जहाँ निधिवन के अधिपति, ब्रजराज लाड़िले श्रीकृष्ण नित्य विराजमान हैं, और श्री राधा रानी ...
जीवनि धन राधा वल्लभ लाल
(पद) जीवनि धन राधा वल्लभ लाल। कृष्ण वल्लभा रसिकिनि राधा, वारिज बदनी बाल॥ जुगल किसोर किसोरी जोरी गोरी स्याम तमाल। बसहु निरन्तर हियें श्रीहरिप्रिया आनन...
श्री वृंदावन की शरण ग्रहण कीजिए। युगल बिहारी (श्री राधा-कृष्ण) के चरणकमलों से दिन-रात प्रेम कीजिए। [1] सेवाकुंज के समीप बैठकर श्री युगल सरकार का ध्यान करो, जहाँ सहज ही भाव सिद्ध हो जाता है। नेत्रों से उनके दर्शन पाकर मन उल्लासित हो उठता है। [2] रसिक संतों की जूठन पाकर अपनी भूख की बाधा शांत करो, और श्री यमुनाजी का शीतल, सुन्दर जल पीकर अपनी प्यास बुझाओ। [3] मुख से राधे-श्याम नाम रटते हुए, नेत्रों से प्रेमाश्रु बहाइए। श्री सरस माधुरी कहते हैं कि युगल सरकार के प्रेम-रस में डूबकर, पुलकित होकर उनके गुणों का गान करो। [4]
प्रिया बदन सुखमा सदन
श्री प्रिया जू का मुख कमल सुख का वह सदन है जो प्रेम से परिपूर्ण है, जिसमें प्रियतम के प्राण बसे हुए हैं। वही उनके प्राणों का आधार है।
जय राधे जय राधे राधे
“श्यामा गोरी नित्य किशोरी, प्रीतम जोरि श्री राधे। रसिक रसिलो छैल छबीलो, गुण गर्विलो श्री कृष्णा”॥2॥ श्री राधा: नित्य किशोरी हैं और अंग का वर्ण सुनहरा ...
अनगिनत इच्छा-पूर्ति चिन्तामणियों को ब्रज की रज के एक कण पर न्यौछावर कर देना चाहिए । वृंदावन के सेवा कुंज के विहार पर पूर्ण विश्व को वार देना चाहिए । [1] इच्छा पूर्ति करने वाले अनगिनत कल्प वृक्षों को ब्रज की लता पता पर वार देना चाहिए। अप्सराओं की रानी ‘रम्भा' को गोपियों के द्वार पर न्यौछावर कर देना चाहिए । [2] कामदेव की पत्नी ‘रति' और इंद्र की पत्नी (स्वर्ग की रानी) ‘सचि' को ब्रज की पनिहारिन (जो ब्रज में पानी भरने की सेवा करती हैं ) पर न्यौछावर कर देना चाहिए । भगवान् नारायण का वैकुण्ठ धाम यमुना रसरानी पर न्यौछावर कर देना चाहिए। [3] श्री अभय राम कहते हैं, "मेरी आराध्या एकमात्र श्री राधा हैं, मैं उनके अतिरिक्त किसी और को सपने में भी नहीं जानता, और नंद के पुत्र श्री कृष्ण पर समस्त भगवान् के अवतारों को ही न्यौछावर किया जा सकता है (जो स्वयं श्री राधारानी की शरण में हैं )"। [4]
निकुंज वन, वर्तमान में सेवा कुंज, वृंदावन के बारह छोटे वनों में से एक वन है । सेवा कुंज को पहले निकुज वन भी कहा जाता था । पुराणों के अनुसार सेवा कुंज वृंदावन के विशाल उपवनो के सभी बारह उपवनो के केंद्र को दर्शाता है। पुराणों के अनुसार, यमुना नदी से घिरा हुआ पूरा क्षेत्र, मोहन चीर घाट से आदि-बरहा घाट तक सेवा कुंज या निकुंज वन के रूप में जाना जाता था। इसलिए, कालिया-घाट, मदन-मोहन, इम्ली तला, राधा दामोदर, श्रृंगार वट, गोविंद घाट, चेहाना घाट, केशी घाट, निधिवन, झुलनवन, गोपीनाथ, धीर समीर, वंशीवट, गोपीश्वर, ब्रह्मा-कुंड, गोविंदा कुंड जैसे स्थान और गोविंद जी योग-पीठ को भी निकुंज वन के भीतर अलग-अलग लीला स्थली के रूप में माना जाता है। इस विशेष घने वन में, युगल सरकार नित्य रासलीला करते हैं । उसके बाद श्री कृष्ण श्री राधा रानी के चरण कमलों की सेवा करते हैं । उन्हें लाल सिंदूर से श्रृंगार करते हैं और उनके लम्बे काले केशो का श्रृंगार करते हैं । श्री राधा रानी के मुख चंद्र पर रचना करते हैं, उनको रेशमी वस्त्र पहनाते हैं और मणि-जड़ित आभूषणों के साथ श्रृंगार करते हैं । रास-नृत्य संपन्न होने पर सखियाँ फूलों की पंखुड़ियों से बने कोमल शैय्या का निर्माण करती हैं जिसके पश्चात राधा और कृष्ण को एक साथ विराजमान होने के लिए आमंत्रित करतीं हैं । पूरे क्षेत्र में जहां यह दिव्य रास लीला निरंतर होती है उसे निकुंज वन या सेवा कुंज कहतें हैं। श्री कृष्ण की मुरली के अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने यहाँ भजन किया है, और उनकी समाधि भी इधर है। मंदिर का समय: गर्मी सवेरे 5:30 बजे - मंगला आरती सवेरे 8:30 बजे - श्रृंगार आरती दोपहर 12:30 बजे - राजभोग आरती शाम 5:30 बजे - संध्या आरती शाम 7:15 बजे - शयन आरती सर्दी सवेरे 7:00 बजे - मंगला आरती सवेरे 9:00 बजे - श्रृंगार आरती दोपहर 12:00 बजे - राजभोग आरती शाम 4:30 बजे - संध्या आरती शाम 6:30 बजे - शयन आरती
बने दोउ रसिक बिहारी बिहारनी
(दोहा) श्रीहरि एवं प्रिया, मानों सुन्दरता रूपी साँचे में अच्छी प्रकार से ढले हुए सिंहासन पर सुशोभित हैं । ये दोनों रसिक बिहारी बिहारनी रूप तथा समस्त ग...
कालिन्दी पै घूम घूम प्रिया चरण चूंम चूंम
श्री यमुना किनारे घूमते-घूमते, श्री प्रिया जी के चरणों को चूमते-चूमते, श्री वृंदावन वास कर के अपना जीवन सुधार लेना चाहिए। [1] “श्री राधा राधा” भजने ...
वेणु विनोद कुंज वृंदावन में राधा दामोदर मंदिर के बगल में स्थित है। इस कुंज का निर्माण श्री बाल कृष्णदास जी महाराज "अली" ने सत्संग के लिए करवाया था। महाराज जी के लीला प्रवेश के पश्चात् महाराज जी की एक मूर्ति यहाँ स्थापित की गई है। यहाँ नियमित आरती और वाणी संकीर्तन होता है। कुंज का समय: सवेरे 7:30 बजे - मंगला आरती शाम 7:30 बजे - संध्या आरती समाज गायन - [7:30 AM] स्थान: सेवा कुंज रोड, श्री राधा दामोदर मंदिर के सामने, गोतम नगर, वृंदावन, मथुरा, उत्तर प्रदेश 281121
तमाल कुंज तमाल कुंज वृंदावन में राधा दामोदर मंदिर के बगल में स्थित है। इस कुंज का निर्माण श्री बाल कृष्णदास जी महाराज "अली" ने सत्संग के लिए करवाया था। महाराज जी के लीला प्रवेश के पश्चात् महाराज जी की एक मूर्ति यहाँ स्थापित की गई है। यहाँ नियमित आरती और वाणी संकीर्तन होता है। कुंज का समय: सवेरे 7:15 बजे - मंगला आरती शाम 7:15 बजे - संध्या आरती समाज गायन - [6:00 PM] स्थान: सेवा कुंज रोड, श्री राधा दामोदर मंदिर के सामने, गोतम नगर, वृंदावन, मथुरा, उत्तर प्रदेश 281121
श्री सेवक जी का चरित्र बड़ा रहस्यमय है क्योंकि उन्होंने श्री हित हरिवंश जी का कभी साक्षात्कार नहीं किया पर वह उनके सबसे बड़े कृपापात्र थे। उन्होंने उनके उपदेश नहीं सुने परंतु वह उनके सिद्धांत के सबसे बड़े जानकार थे। वह वृंदावन में केवल 10 दिन रहे पर राधावल्लभ संप्रदाय में उन्हें जो स्थान प्राप्त है वह श्री हित हरिवंश जी के शिष्य परंपरा में किसी को नहीं है इसका प्रमाण यह है कि उनकी वाणी आजतक स्वयं श्री हित हरिवंश जी की वाणी श्री हित चौरासी के साथ लिखी और पढ़ी जाती है। उनका जन्म 1577 के लगभग माना जाता है जबलपुर में गड़ा नामक एक गांव में ब्राह्मण परिवार में हुआ एवं बाल्यकाल से ही भक्ति भाव में संपन्न थे। उसी परिवार में उत्पन्न श्री चतुर्भुजदास नामक एक व्यक्ति थे जो उन्हीं के समान निष्ठावान और भक्त परायण थे। उनके गांव में एक बार श्री हितहरिवंश जी के कुछ शिष्य साधु भ्रमण करते हुए गड़ा पहुंचे जहां हितहरिवंश जी के राधा कृष्ण के केली से संबंधित मधुर पदों का गान किया, पद सुनकर सेवक जी और चतुर्भुजदास जी बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने वृंदावन जाकर श्री हितहरिवंश जी से दीक्षा लेने का निश्चय किया। परंतु दुर्भाग्य से हितहरिवंश जी नित्य निकुंज पर प्रवेश कर चुके थे उनके अंतर्धान संवाद पाकर सेवक जी अत्यंत मर्माहत हुए। चतुर्भुजदास जी ने तब हितहरिवंश जी के ज्येष्ठ पुत्र आचार्य वनचंद्र दास जी से दीक्षा लेने का विचार किया। सेवक जी से भी उन्होंने यही प्रस्ताव किया पर सेवक जी ने कहा मैं हित हरिवंश जी को अपना गुरु मान चुका हूं, दूसरे किसी से दीक्षा लेने का प्रश्न ही नहीं उठता। इतनी ही नहीं उन्होंने कहा यदि हित हरिवंश दीक्षा देंगे तो ठीक, नहीं तो प्राण विसर्जन कर दूंगा। चतुर्भुजदास जी ने सेवक जी से बार बार निवेदन किया परंतु वह असफल हुए और अकेले ही वह वृंदावन जाकर श्री आचार्य वनचंद्र दास जी से दीक्षा लेकर लौटें। लेकिन वापस लौट कर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ यह देखकर कि सेवक जी भी उसी मंत्र का प्रेम पूर्वक जाप कर रहे हैं जो वन चंद जी ने उन्हें दिया था। सेवक जी पर हित हरिवंश जी की कृपा हो गई, उन्होंने स्वप्न में स्वयं मंत्र देकर दिव्य वृंदावन के दर्शन करा कर उन्हें कृतार्थ किया था। अनन्य भक्ति और निष्ठा में कितना बल है यह उन्होंने अपने उदाहरण से सिद्ध कर दिया। मंत्र जाप करते करते और हृदय से ध्यान करते हुए उनकी बुद्धि में दिव्य ज्ञान होने लगा और हितचौरासी के पदों का गूढ़ अर्थ उनकी समझ में अपने आप आने लगा। हितहरिवंश जी की रसोपासना के सिद्धांत का रहस्य उनके हृदय में अंकुरित होने लगा और उन्होंने हितहरिवंश जी की वाणी करने वाले सूचक पदों का सृजन किया जो कि सेवक वाणी के नाम से प्रसिद्ध हुई। हितचौरासी के भाष्य के रूप में इसकी मान्यता हुई जब यह वाणी वृंदावन में श्री वन चंद्र जी, हितहरिवंश जी के सुपुत्र के पास पहुंची तो उन्होंने आज्ञा दी कि वह हितचौरासी के साथ ही लिखी और पढ़ी जाया करें। वन चंद्र जी उस वाणी से इतना प्रभावित हुए कि सेवक जी को देखने की उनकी उत्कंठा दिनों दिन बढ़ती गई। उन्होंने सेवक जी को वृंदावन आने के लिए निमंत्रण दिया और भेजने के साथ साथ निमंत्रण उन्होंने यह भी निश्चित कर लिया कि जिस दिन सेवक जी वृंदावन आएंगे उस दिन वह उनके आगमन की खुशी में श्री राधा वल्लभ जी का सारा वैभव लुटा देंगे। सेवक जी वन चंद जी के निमंत्रण की उपेक्षा नहीं कर सकते थे। वह स्वयं भी वृंदावन जाकर राधा वल्लभ जी के दर्शन करने को उत्सुक थे, वह इस निमंत्रण को उन्होंने श्री राधा वल्लभ जी का ही निमंत्रण माना पर जब उन्हें वन चंद्र जी के निश्चय का पता चला कि वह उनके वहां पहुंचने पर राधा वल्लभ जी का सारा वैभव लुटा देंगे तब वह संकट में दुविधा में पड़ गए, अंत में उन्होंने वेश बदलकर जाने का निश्चय किया जिससे वह पहचान में ना आएं और उनके कारण श्री राधा वल्लभ जी को किसी प्रकार की दिक्कत न हो। पर वृंदावन पहुंचकर जब वह श्री राधा वल्लभ जी के मंदिर गए, तब वन चंद्र जी ने उनकी भावविभोरता देख उन्हें पहचान लिया और आनंदित हो उन्हें प्रेम आलिंगन प्रदान किया। सेवक जी को भय हुआ कि कहीं वह अपने निश्चय के अनुसार श्री राधा बल्लभ का वैभव लुटा ना दें और उन्होंने हाथ जोड़ प्रार्थना की कि वह ऐसा कुछ ना करें। तब वन चंद्र जी को अपना निश्चय बदलना पड़ा। उन्होंने सेवक जी के उपलक्ष में केवल प्रसादी पदार्थों का ही वितरण किया। सेवक जी कुछ ही दिन (लगभग १० दिन ) वृंदावन में रह सके। कहते हैं कि एक दिन श्री हित हरिवंश के निकुंज गमन को एक ही वर्ष हुआ था, और उसी दिन वह रास मंडल (रासेश्वरी राधा रानी मंदिर, सेवा कुञ्ज के नज़दीक) में एक वृक्ष के नीचे ध्यान अवस्था में बैठे-बैठे निकुंज लीला में प्रवेश कर गए।
यह सेवाकुंज ही हमारा परम निज-धाम कुंज है, जहाँ निरंतर श्री प्रिया-प्रियतम की सेवा करना ही हमारा परम लक्ष्य है। यह सेवा ‘तत्सुख-सुख’ के भाव से की जाती है—अर्थात् प्रिया-प्रियतम के सुख में ही अपना सुख मानना है। यही भाव अत्यंत उज्ज्वल और सर्वदा सरस है। हमारा गोत्र ‘अच्युत’ है—अर्थात् हमारा सर्वस्व श्रीकृष्ण से ही सम्बन्धित है।
सवेरे 4:45 बजे - मंगला आरती सवेरे 8:30 बजे - श्रृंगार आरती दोपहर 12:30 बजे - राजभोग आरती शाम 6:00 बजे - संध्या आरती शाम 9:00 बजे - शयन आरती स्थान: राधा दामोदर मंदिर, सेवा कुंज के नज़दीक निकुंज वन में वृंदावन में स्थित है।
अलबेले आँगन खरे, अंस अंस भुज धारि
अलबेले रसिक दम्पति श्री राधा कृष्ण परस्पर गलबहियाँ दिए हुए निकुंज महल के आँगन में खड़े हैं और सहचरी दर्पण दिखला रही हैं।
जय राधे जय सब सुख साधा
नित्य किशोरी वाम, सुख धाम स्वरूप उन राधारानी की सदा जय हो जो अपनी प्रेम माधुरी से अपने प्यारे कमल नैन को अपने वश में करे रखती हैं। सब सुखो की सिद्धि स...
Priya Tere Charan Kamal Ki Cheri
Priya Tere Charan Kamal Ki Cheri.Kunj Dwaar Pai Thaadi Kab Son, Karo Nahin Ab Deri. [1]Kripa Karo Ab Jhalak Dikhaavo, Ye Abhilaasha Meri.Seva Kunj Nik...
Kavadhau Sevakunj Mein
Kavadhau Sevakunj Mein, Hvaihon Shyamatamal.Latika Kargahi Viramihain, Lalit Ladaitilal.- Shri Lalit Kishori, Abhilash Madhuri, Vinay (56)When will I ...
Shyama Ab To Rahyau Na Jaay
(Raag Peelu Trital)Shyama Ab To Rahyau Na Jaay.Pal-Pal Yaad Sataaye Tihaari, Sewakunj Man Bhaay. [1]Vrindavipin Nikunjan Maanhi, Charanan Raj Mil Jaay...
Jaati Paanti Nana Bhanti Kul Abhiman Taji
(Kavitt)Jaati Paanti Nana Bhanti Kul Abhiman Taji,Nishidin Sheesh Kaun Navaoon Rasikan Mein. [1]Sewakunj Mandal Pulin Vanshivat,Nidhivan Au Sameer Dhe...
Hamaari Brindavan Rajdhani
(Raag Sarang, Titala)Hamaari Brindavan Rajdhani.Nidhi Ban Maharaj Brajraj Laadilo, Shriradha Patarani. [1]Nidhi Ban Seva Kunj Pulin, Bansivat Sukh-Dha...
(Raag Gaud Saarang)Sharan Shri Vrindavan Ki Jaiye.Yugal Bihari Charan Kamal Son, Nish Din Neh Lagaiye. [1]Seva Kunj Sameep Baithke, Dampati Dhyaan Samaiye.Hoy Bhaavna Siddh Sahaj Hi, Nirakhi Nayan Hulasaiye. [2]Lele Seet Rasik Santan Ki, Baadha Bhookh Bhagaiye.Sheetal Sundar Jal Yamuna Ko, Pee Pee Pyaas Mitaiye. [3]Radhe Shyaam Naam Rat Rasna, Aansoo Drigan Bahaiye.Sarasamadhuri Piy Pyari Ke, Prem Pulak Gun Gaiye. [4]- Shri Saras MadhuriSeek refuge in Shri Vrindavan. Day and night, love the lotus feet of the Yugala Bihari (Shri Radha-Krishna). [1] Sit near Seva Kunj and meditate upon the divine couple, where bhāva is naturally accomplished, and the eyes become joyous upon beholding their form. [2] Satisfy the hunger by accepting the leftovers of rasik saints, and quench your thirst by drinking the cool waters of Shri Yamuna. [3] While chanting the names of “Radhe Shyam”, shed tears of love from your eyes. Shri Saras Madhuri says — be immersed in the nectar of the divine couple and sing their glories, filled with pure love. [4]
Kirtan Ke Yuth Dekh Utthi Umang Ek
(Kavitt)Kirtan Ke Yuth Dekh Utthi Umang Ek,Govardhan Ko Dekh Govardhan Dharaiya Ki. [1]Bhul Jata Gyan Sabhi, Dekh “Gyan Gudri” Ko,Chir Ghat Dekhkar, C...