सन्तग्रन्थरागश्लोकस्तोत्रकविता
मुख्यपृष्ठसंतश्री वागीश शास्त्री
सभी संत

जीवन चरित

ब्रज परंपरा के वैष्णव संत।

श्री श्री वागीश शास्त्री वाणी संग्रह

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राधा साध्यं साधनं यस्य राधा मन्त्रो राधा मन्त्रदात्री च राधा

जिस अधिकारी जीव का राधा ही साध्य है और राधा ही साधन है। मंत्र भी राधा है और मंत्र देने वाली गुरुरूपा भी राधा है। राधा ही जिसका सर्वस्व है और राधा ही ज...

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राधेति नाम जप भो रसने ममाङ्ग

हे रसने, तू “राधा" इस सरस मधुर नाम का जप करती रह। हे देह! तू श्री राधा की परम पावन चरण रज से लिप्त होकर इस श्री राधावन (श्री वृंदावन) में सदा वास किय...

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राधा नामास्ति जिह्वाग्रे

जिसकी जिह्वा पर श्रीराधा-नाम आ गया, उसे किसी भी सुन्दर से सुन्दर साधन की आवश्यकता नहीं रहती; और यदि किसी को श्रीराधा-रस-सुधा का आस्वादन मिल गया तो उसक...

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पलाशार्क करीलाद्या राधे राधे रटन्ति ताम्

वृन्दावन के तृण, गुल्म और लता आदि सभी इनकी (श्रीराधारानी की) उपासना करते हैं। सखे! श्रीवृन्दावन में क्षुद्र चराचर जीव तथा आक, ढाक और करील आदि भी “राधे...

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राधे ते चरणौ विहाय शरणं

हे श्रीराधे ! तुम्हारे श्रीचरणोंको छोडकर मुझे कहीं भी शरण नहीं मिली। मेरा तो सुदृढ़ विश्वास है कि इस भूमण्डल में एकमात्र आप ही सेवा करने योग्य हैं। अक...

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शस्त्रवद्घातकं शास्त्रं

जिसने श्रीराधा का यशोगान नहीं किया, वह शास्त्र शस्त्र के समान घातक है तथा जिसने श्री राधा के नाम और गुण नहीं गाये, वह मनुष्य गुण सम्पन्न होने पर भी कस...

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यस्याः स्फुरत्पदनखेन्दुततिच्छटाया

जिसके चमकते हुए श्रीचरण-नख-चन्द्रों की छवि की छटासे (क्षणभरमें) माधुर्य-सार-रसके करोड़ों महासमुद्रों की सृष्टि हो जाती है, वह श्रीराधा यदि कभी किसी जी...

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वृन्दावननिवासेऽपि तद्रसानुभवं विना

अरे मित्र! रस का पिपासु रसिक भक्त तो श्री वृंदावन में निवास हो जाने पर भी, जब तक उस रस का स्वयं अनुभव न कर ले, तब तक कभी संतोष नहीं पाता।

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अर्धोन्मीलितलोचनस्य पिबतो राधेति नामामृतम्

अधखुली आँखों से देखता, ‘श्रीराधे! श्रीराधे!!’ इस नाम-अमृत का पान करता, नेत्रों से प्रेम के आँसू बहाता, सारे अंगों से पुलकित होता, कहीं लड़खड़ाता, कहीं...

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राधां ध्यायन् राधिकां वन्दमाना

मेरी एकमात्र यही इच्छा है कि मैं (सदा) श्रीराधिका का ही ध्यान, श्रीराधिका की ही वन्दना, श्रीराधिका का ही दर्शन, श्रीराधिका की ही कीर्तन-कथाओं का श्रवण...

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वृषभानुसुता राधा- जन्म कोटि शतैरपि

करोड़ों जन्म तक वांछा करने पर भी वृषभानु सुता श्री राधा जिसके ह्रदय में प्रकट हो जाय, वही मानुष धन्य है।

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योऽभूद् व्रजस्योज्ज्वलकामकेल्या

हे श्रीवनराज (श्री वृंदावन)! तुम्हारी रसरंगमयी भूमि में जो ब्रज की उज्जवल कामकेली का रास-रसोत्सव हुआ था, उस रस को श्री राधा और श्री कृष्ण तुम्हारे बिन...

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विष्णुश्चक्रधरः प्रयाति पुरतः

जो व्यक्ति मार्ग में गमन करते हुए केवल ‘राधा’ नाम का स्वच्छन्द उच्चारण करता है उसका बहुमान करते हुए आगे-आगे चक्रधारी श्रीविष्णु भगवान, पीछे पीछे शूलध...

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तेनापि सहसा प्रोक्तं तत्र वासेऽतिदुष्कर

श्री वृंदावन में वास करना बहुत कठिन कार्य है क्योंकि धाम में रहने पर जो धाम अथवा धाम वासियों में दोष देखने लगते हैं वे पतित हो जाते हैं।

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वस्तुतः प्रेयसी प्रेष्ठप्रेमामृतरसात्सकम्‌

वास्तव में प्रिया श्री राधा एवं प्रियतम श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण के पारस्परिक प्रेम का जो आंतरिक अमृतमय रस है, वही श्री वृंदावन का स्वरूप है। इसीलिए यह व...

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रे चित्त चिन्तय चिरं वृषभानुपुत्रिं

अरे मेरे चित्त! तू सदा श्री वृषभानु नंदिनी श्रीराधा का ही चिन्तन किया कर — उन्हें एक क्षण के लिए भी कभी न भूलना, यही मेरी अभिलाषा है। हे रसने! तू ‘रा...

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वृन्दारण्यलतागृहेषु वसतां गोविन्दलीलासुधा

जो श्रीवृन्दावनके लता-गृहों में निवास करते हैं, श्रीगोविन्दकी लीलासुधाको पान करके अविरल अश्रु बहाते रहते हैं, (निरन्तर) प्रेम से सुमधुर श्रीराधा-नाम क...

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रे चित्त मा त्यज वनं वृषभानुजाया

हे चित्त ! तुझसे मेरी एकमात्र यही प्रार्थना है कि तू श्रीवृषभानुनन्दिनी (श्री राधा) के इस श्रीवृन्दावन धाम को कभी न छोड़ना। यदि तुझे ब्राह्मण से लेकर ...

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रसस्वरूपः श्रीकृष्णः रसिकस्तु

श्रुतियों ने भगवान् को रस स्वरूप आनन्द स्वरूप बताया है, रस का भोक्ता नहीं बताया। रसभोक्ता रसिक तो उनको श्रीराधा ने बनाया है। भागवत में श्रीशुकदेवजी ने...

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न विषय भोगो भाग्यं कीर्तिर्वा विस्तृता लोके

विषय-भोगों का बहुलता से सुलभ होना सौभाग्य नहीं है, संसार में कीर्ति का विस्तार हो जाए—यह भी सौभाग्य नहीं है। असली सौभाग्य है श्रीवृन्दावन वास प्राप्त ...

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तादत्ते्ऽर्पितवस्तूनि राधासंकेतमन्तरा

श्रीकृष्ण को अर्पित की गई वस्तुओं को भी वे श्री राधा के संकेत के बिना स्वीकार नहीं करते। श्री राधा के बिना केवल श्रीकृष्ण की आराधना को दोषकारक माना ग...

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राधाकीर्ति कीर्त्तयन् पादरेणुं श्रीराधाया

श्रीराधा का यशोगान करते हुए कीर्तन, अपने सम्पूर्ण अंगों द्वारा श्रीराधा की चरण-रेणु का स्पर्श, श्रीराधा के विहार स्थली श्रीवृन्दावन में पर्यटन तथा 'श्...

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वृन्दावनं तद्गतवस्तुजातं सर्व नमस्यं

श्रीवृन्दावन और उसकी समस्त वस्तुएँ नमस्कार करने योग्य हैं। उनकी निन्दा कभी नहीं करनी चाहिये। जो निन्दा करते हैं, उन अपराधियोंका संग मुझे स्वप्न में भी...

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पुज्यं तच्चरणं ब्रजेन्द्रविपिनं

वे चरण परम पूज्य हैं, जो श्रीव्रजेन्द्रनन्दन के क्रीड़ा-कानन श्रीवृन्दावन की यात्रा करते हैं। वह रसना धन्य है, जो इस रसमन्दिर वृन्दावन की स्तुति करती ...

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यस्याः स्ववशगः कृष्णो

रसस्वरूप श्रीकृष्ण सदा श्रीराधारानी के अधीन रहकर उनके रस की वृद्धि करते रहते हैं, उनके नेत्रों के कटाक्ष और भृकुटि-विलास के अनुसार (भौंहों के संकेत पर...

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अदेयं चापि या दत्ते-दत्वा रक्षां करोति या

श्री राधा अपने भक्त (नाम-आराधक) को अदेय वस्तु भी दे देती हैं और उस वस्तु की रक्षा भी करती हैं। राधा योगक्षेम करने वाली हैं, भक्तों को ऐसा अनुभव भी होत...

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रादाने धारणे धा च इति धातुद्वयादपि

‘रा’ दानार्थक (दान करने की धातु) और ‘धा’ धारणार्थक (धारण करने अथवा रक्षा करने की धातु)—इन दोनों धातुओं से ‘राधा’ नाम की उत्पत्ति मानी जाती है। यह तथ्य...

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निरञ्जनं निर्गुणमद्वितीयं वदन्ति

विद्वान् लोग परम तत्त्वको निरञ्जन, निर्गुण और अद्वितीय बताया करते है; उनके लिये वह तत्त्व वैसा ही हो। परंतु मैंने तो अपने लिये श्रीवृन्दावनको ही परम त...

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वृद्धयर्थात् राधधातोश्व राधा

‘राधा’ शब्द ‘राध्’ धातु से उत्पन्न है, जिसका अर्थ है वृद्धि करना या उन्नति देना। इसी कारण भक्तजन श्रीराधा को ब्रह्म से भी अधिक गुण सम्पन्न मानते हैं। ...

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राधा साध्यं साधनं यस्य राधा मन्त्रो राधा मन्त्रदात्री च राधा

जिस अधिकारी जीव का राधा ही साध्य है और राधा ही साधन है। मंत्र भी राधा है और मंत्र देने वाली गुरुरूपा भी राधा है। राधा ही जिसका सर्वस्व है और राधा ही ज...

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अन्तरायान् रसास्वादे-दोषान्

श्री राधा अपनी अहैतुकी कृपा से भक्तों के रसास्वादन (दिव्य प्रेम-रस) में आने वाली बाधाओं तथा काम, क्रोध आदि दोषों सहित समस्त पापों का समूल नाश कर देती ...