Verses & Passages
166 itemsलावण्य सार रस, सार सुखैव सारे
श्री राधा सुंदरता, सुख, करुणा और आनंद का प्रतीक है।
दूरे स्निग्ध परम्परा विजयतां दूरे सुहन्मण्डली
जहां कुञ्ज-भवन के अभ्यन्तर भाग में परम-प्रेमी श्रीलालजी एवं श्रीवृषभानुनन्दिनीजू की रति-केलि होती रहती है, ब्रजपति श्रीलालजी के स्नेहीजनों की परम्परा ...
कालिन्दी-तट-कुञ्जे
वृंदावन में श्री यमुना तट के कुञ्ज में कोई अनिर्वचनीय रसामृत एवं अद्भुत केलि-निधान “श्रीराधा” नामक स्वरुप असीम रूप से उमड़ रहा है।
दृष्ट्वैव चम्पकलतेव चमत्कृताङ्गी
जो अपने प्रियतम श्रीलालजी को देखते ही चम्पकलता के समान अङ्ग-अङ्ग से चमत्कृत हो उठती हैं, और कभी मन्द-मन्द वेणु-ध्वनि को सुनकर जिनके समस्त अङ्ग विह्वल ...
आशास्य-दास्यं-वृषभानुजाया
भानु-नन्दिनी श्रीयमुना के तट में अविचल भाव से स्थिर रहकर एवं वृषभानु-नन्दिनी के दास्य-भाव को मन में धारण करके मैं वृन्दावन की कुञ्ज-वीथियों में क्या क...
हा कालिन्दि त्वयि मम
हे यमुने ! तुम्हारे जल में मेरी निधि -स्वरूपा स्वामिनी को प्रियतम ने स्नान कराया है। उनके (श्रीराधा के) कर स्पर्श को प्राप्त करने वाले, हे अलौकिक और आ...
संकेतकुंजमनुकुंजरमन्दगामि न्यादाय
हे श्री राधे ! प्रेमविहार के आवेग से संकेत कुंज की ओर गज जैसी मन्द गति से प्रस्थान करती हुई आपके पीछे-पीछे, दिव्य और कोमल चन्दन तथा सुगन्धित माला लेक...
लावण्यसाररस सारसुखैकसारे कारुण्यसार
लावण्य के सार, रस के सार, सुख के एकमात्र सार, करुणा के सार, मधुर छवि वाले रूप के सार, चतुरता के सार, प्रेम-क्रीडाविलास के सार तथा समस्त सारों के सार श...
कदा वृन्दारण्ये मधुर मधुरानन्द रसदे
मैं मधुर से भी मधुर आनंद-रस-प्रद श्रीवृन्दावन में प्रियेश्वरी श्रीराधा के केलि-भवन नव-कुञ्ज-पुञ्जों का कब अन्वेषण करूँगी ? और श्रीराधा चरण कमल मकरन्द ...
राधापादसरोजभक्तिमचलामुद्वीक्ष्य निष्कैतवां
श्रीराधा के चरणकमलों में अचल और निष्कपट भक्ति देखकर मोहन (श्रीश्यामसुन्दर) अतिशय महाप्रेम से सर्वात्मना अपना भजन करने वालों से भी अधिक प्रसन्न होकर, ...
चलत्कुटिल कुन्तलं तिलक
हे श्रीराधिके ! चंचल घुँघराली अलकों वाले, तिलक से शोभित भाल वाले, तिल के फूल के समान नासापुट में शोभित मोती वाले निष्कलंक चन्द्रमा से भी अत्यन्त उज्ज्...
राधाकेलि कलासु साक्षिणि कदा वृन्दावने
मैं कब प्रेम-विवशाकृति होकर श्री राधा-केलि के साक्षी प्रकट उज्ज्वल-अद्भुत-रस-पूर्ण एवं पवित्र वृन्दावन में निवास करूँगी? तथा नेत्र-पिण्डों में स्थित त...
प्रीतिरिव मूर्तिमती रससिन्धो
मूर्तिमान प्रीति जैसी, रस-समुद्र की सार-सम्पत्ति की भाँति निर्मल और चतुरता की सर्वस्व कोई अनिर्वचनीया श्रीवृन्दावन-स्वामिनी की जय हो।
परस्परं प्रेमरसे
परस्पर प्रेम-रस में निमग्न एवं सौन्दर्य पूर्ण क्रीड़ाओं से सबको मोहित करने वाला वह गौर-श्याम युगल श्रीवृन्दावन के मध्य में स्थित नवीन कुंज गृह में प्र...
कृष्णामृतं चल विगाढुमितीरिताहं
जब श्री राधा मुझसे कहेंगी- "अरी सखि ! श्रीकृष्णामृत अवगाहन करने के लिए चल"। तब मैं हँसकर कहूँगी- "हे सखि ! तब तक धैर्य्य रखो जब तक रात्रि नहीं आ जाती।...
राधाकेलि-निकुञ्ज-वीथीषु
मैं श्री राधा के केलिभवन कुञ्ज-वीथियों [श्री वृंदावन] में कब विचरण करूँगी? कब केवल और केवल श्री राधा का ही नाम लेकर उनकी अनन्य भक्ति करूँगी और अपना प...
मंजुस्वभावमधिकल्पलतानिकुंजं व्यंजंतमद्भुतकृपारसपुंजमेव
हे मन, तू उस श्रीराधा नामक प्रेमामृत के अगाध और बाधा शून्य सागर का शीघ्र भलीभाँति आश्रय ग्रहण कर जो कोमल स्वभाव वाला (है), जो कल्पलता की कुंज में विर...
गत्वा कलिन्दतनयाविजनावतार
हे श्री राधे ! श्री यमुनाजी के निर्जन घाट पर जाकर कामदेव को जीवित कर देने वाले आपके अमृतमय श्री अंगों को उबटन लगाती हुई मैं, ऊँचे कदम्ब वृक्ष पर बैठे ...
अनाथं पतितं मूढं
हे श्रीवृन्दावनेश्वरि [श्री राधा] ! इस अनाथ, पतित और मूढ़ की ओर एक बार भी तो अपनी स्नेहमयी कृपावलोकन से देख दीजिये; क्योंकि इसने केवल आपके ही चरणाश्रि...
त्वत्सेवा रीतिराश्चर्य लोकवेद-विलक्षणा
हे श्रीवृन्दावनाधीश्वरि [श्री राधे] ! आपके चरण-कमलों की सेवा रीति आश्चर्य्यमयी एवं लोक-वेद-विलक्षण है। वह केवल आपकी कृपा और सद्गुरु के संग से ही कभी प...
अस्तु वामास्तु वा राधे कोटि जन्मान्तरेऽपि मे
हे राधे ! आपके चरण-सरोरुह-दास्य की आवश्यकीय आशा ही मेरी एक मात्र आशा है, वह चाहे कोटि-कोटि जन्मों में पूरी हो या न भी हो।
सर्वथा सार सारैक नखचन्द्र
मैं आपके चरण-कमलों की सेवाशा का त्याग कैसे कर सकती हूँ ? जबकि हे राधे! आपके चरण-नख-चन्द्र की सुधा का लव - लेशमात्र ही सम्पूर्ण सारों का एकमात्र सार है...
यस्याः पदरसानन्दा कोटयं शेनापि नो समाः
जिनके पद-रस के कोट्यांश आनन्द के तुल्य अन्य सब मिलकर भी नहीं हैं। वह सर्व-प्रेमानन्द-रसं-स्वरूपा [श्रीराधा] ही मेरी स्वामिनी हैं।
श्रीराधिकां निजविटेन सहालपन्तीम्
श्रीप्रियाजी अपने प्रियतम श्रीलालजी के साथ कुछ मधुर मधुर बातें कर रही हैं, जिससे उनके लाल-लाल ओठों से सौन्दर्य्य-राशि निकल निकलकर चारों ओर फैल रही है।...
वैष्णवानन्दकोटिर्वा ब्रह्मानन्दादि कोटयः
हे राधे ! कोटि-कोटि वैष्णवानन्द और कोटि-कोटि ब्रह्मानन्दादि भी मेरे द्वारा आपकी पदनखच्छटा के एक कण पर ही न्यौछावर कर दिये गये या मैं उन्हें न्यौछावर क...
श्रीगोपेन्द्र-कुमार-मोहन
जो नन्दनन्दन को मोहित करने वाली महा विद्या रूपा हैं, जिनके नेत्रों की कोरों से उमड़ती हुई महा माधुरी के सार का उछलता हुआ रस-समुद्र सहज रूप से प्रवाहित ...
राधादास्यमपास्य यः प्रयतते
‘श्रीराधा’ के कैंकर्य को छोड़कर जो गोविन्द के संग की चेष्टा करते हैं, वे बिना पूर्णिमा तिथि के पूर्णचन्द्र प्राप्त करना चाहते हैं। कृष्णप्रेम प्रवाह क...
श्रीराधिके सुरतरङ्गि नितम्ब भागे
हे श्रीराधिके ! हे सुरत-केलि-रंजीत नितम्ब-भागे ! अहा ! आपका यह काञ्ची-कलाप क्या है मानो कल हंसों का कल-कल अनुलाप है, और चरण-कमलों के नूपुरों की मन्द-म...
यद्यप्यानन्द साम्राज्यं
[ हे स्वामिनि राधे ! ] यद्यपि श्याम-सुन्दर श्रीकृष्ण समस्त लीलावतारों के शिरोभूषण और श्रानन्द-साम्राज्य की पराकाष्ठा हैं फिर भी वे सर्वेश्वर आपके आपक...
हा राधे स्वामिनि कदा किशोरी दिव्य रूपिणी
हा राधे ! हा स्वामिनि !! मैं कब दिव्य स्वरूपमयी, एक मात्र प्रेम-रस-मग्न किशोरी होकर आपकी किंकरी (दासी ) हो सकूँगी ?
लिखन्ति भुजमूलतो न खलु शंख-चक्रादिकं
श्री गुरु द्वारा दिए गए भजन के पराक्रम से युक्त वे कोई महाबुद्धिमान विरले ही अनन्य रसिक जन हैं, जो न तो भुजाओं में शंख चक्र आदि वैष्णव चिन्हों को धारण...
जे नहि लोक वेद गति जानहिं
वे भाग्यशाली जन जो न तो संसार की मर्यादा, वेदों या कुलों को स्वीकार करना चाहते हैं। [1] न तो वे महान संतों के चरित्र को जानना चाहते हैं और न ही उनका ...
लोकवेद पथं त्यक्त्वा तवैव चरणाम्बुजम्
हे स्वामिनि [राधे] ! लौकिक एवं वैदिक मार्गों का परित्याग करके मैं केवल आपके श्रीचरण-कमलों की शरण आई हूँ !
यज्जापः सकृदेव गोकुलपतेराकर्षकस्तत्क्षणाद्यत्र
जिसका एक बार मात्र उच्चारण गोकुल- पति श्रीकृष्ण को तत्क्षण आकर्षित करने वाला है, जिससे प्रेमियों के लिये अर्थ, धर्मादि समस्त पुरुषार्थों में तुच्छता क...
गिनत बनै ना अघ अगनित अपार सोऊ
जो व्यक्ति एक बार भी मुख से “राधा” नाम का उच्चारण करता है, श्री श्यामसुंदर भगवान कृष्ण उसके अनंत पापों की गणना न करते हुए हृदय से अति उदार होकर यह विच...
सदा गायं-गायं मधुरतर राधा-प्रिय यशः
मैं श्रीराधा के नव-निभृत केलि कुञ्ज कानन में स्थित रहती हुई, सदा मधुरतर श्रीराधा के प्रिय यशों का तथा घनीभूत नव-नव आनन्द-रस-दायी श्रीराधापति की कथाओं ...
प्यारी तव पद टहल कौं, कमलादिक ललचाहिँ
हे प्यारी जू (श्री राधा)! आपके चरणों की सेवा और टहल प्राप्त करने के लिए लक्ष्मी जी (कमला) आदि देवियाँ भी निरंतर ललचाती रहती हैं। यहाँ तक कि श्री शुकदे...
त्वमेव स्वपदाम्भोज रस-चर्त्मनि
हे स्वामिनि [राधे]! केवल आपके ही चरण-कमलों के रस में मेरी मति रमण करती रहती है, तब आपकी करुणा-दृष्टि से अभिसिञ्चित होने की मेरी आशा को आप पूर्ण न करें...
प्रत्यङ्गोच्छलदुज्ज्वलामृत
प्रेम का एक अनुपम परिपूर्णतम सागर है। जिसके अङ्ग-प्रत्यङ्गों से नित्य-प्रति उज्ज्वल अमृत-रस उच्छलित होता रहता है। वह (प्रेममहानिधि ) लावण्य का भी अनुप...
यस्यास्ते बत किंकरीषु
वृन्दाटवी कन्दर्प श्रीलालजी श्री राधिका के प्रसादोत्सव की इच्छा से उनकी किंकरियों की अत्यन्त हर्ष-पूर्वक अधिकाधिक सदा चाटुकारिता करते रहते हैं। आपके ज...
सर्वज्ञोपि परेशोपि मुग्ध मुग्धोति
जो सर्वज्ञ और परेश (परम-प्रभु) होकर भी मुग्ध दशा में दीनवत् जिनकी चाटुकारी करते हैं, वही [कृष्ण-प्रिया श्रीराधिका] मेरी एक मात्र गति हैं।
प्रेम्णः सन्मधुरोज्ज्वलस्य हृदयं श्रृंगारलीलाकला
जो मधुर और उज्ज्वल प्रेम की प्राण-स्वरूपा, श्रृंगार रस की लीला कलाओं की विचित्रता की सर्वोच्च अवधि, भगवान् श्रीकृष्ण की आराधनीया कोई अनिर्वचनीया शासन-...
कहौ कहा प्रयोजन मोय ऐसे शास्त्र बातन सौं
जिनमें प्रेम-मूर्ति श्रीराधा के चरणों का रस नहीं ऐसे शास्त्रों के समूह से मेरा क्या प्रयोजन ? [1] ऐसे साधुजन, उनके द्वारा गृहीत मार्ग-समूहों से भी हम...
एक बार हू लेहि मुख, राधा-राधा नाम
श्री राधा नाम की इतनी महिमा है कि केवल ‘राधा राधा’ कहने मात्र से ही श्री कृष्ण तुरंत उसे सुनते हैं और दौड़ कर उस भक्त से मिलने आते हैं।
राधिका के नाम हीसौं काम हमें रैन-दिन
अनुदिन श्रीराधा-नाम के भजन के प्राप्त होने पर कोटि कोटि श्रेष्ठ साधन भी परित्याज्य हो जाते हैं। [1] श्रीराधा-पद-कमल-सुधा पर कोटि-कोटि मोक्षादि पुरुष...
यल्लक्ष्मी शुक नारदादि
हे नव- कुञ्ज नागरि ! मैं आपके उस कैंकर्य प्राप्ति की आशा को धारण किये हुए हूँ जिससे क्षण-क्षण में अद्भुत रस की प्राप्ति होती है और जिसे उन अनुराग-उत्स...
रस औ लुनाई की सार है नवेली बाल
जो लावण्य एवं रस की सार हैं। जो करुणा एवं सुख की सार हैं। [1] जो मधुर छवि एवं रूप माधुरी की सार हैं। जो परम प्रवीण एवं चतुरता की सार हैं। [2] जो लाल...
कोटि कोटि जगद्भासि नखचन्द्र मणिच्छटे
अपने चरणों की नख चन्द्र मणि की छटा से कोटि कोटि भ्रमांडों को भी प्रकाशित करने वाली स्वामिनी! हे आश्चर्यमय रूप लावण्यमयी! मुझे एक बार तो दर्शन दीजिए ?
भूत्वाति सुकुमाराङ्गी किशोरी गोप कन्यका
हे श्री राधा! मैं कब सुकुमाराङ्गी किशोरी गोप कन्या होकर आपके मृदुल पद-कमलों का लालन- सम्वाहन करूँगी ?
जोई परा तत्व वृन्दावन में प्रकाश जाकौं
अहो जो परम तत्व, केवल श्रीवृन्दावन में ही दृष्टिगोचर होता है, अन्यत्र कहीं नहीं। जिसका वर्णन करने में श्रुति-शिरोभाग उपनिषद् भी समर्थ नहीं हैं। [1] ज...
न त्वं वैकुंठ लोकेपि
हे श्री राधे! न आप वैकुण्ठ लोक में हैं और न आपके रस दाता प्रियतम श्री कृष्ण ही। यदि आप कहीं हैं, तो केवल श्री वृंदावन में। अतएव मैंने भी उसी श्री वृंद...
प्यारी तव पद टहल कौं
हे राधा प्यारी जू, आपके चरणों की सेवा के लिए लक्ष्मी आदि देवीयां भी लालायित रहती हैं। शुकदेव, नारद, आदि भागवतगण उसकी कामना करते हैं लेकिन प्राप्त नहीं...
सर्वे धर्माममाधर्माः
हे राधे! जहां कहीं भी, यदि आपके श्री चरण कमलों की माधुरी वहाँ प्राप्त नहीं होती तो मेरे लिए वे सब धर्म अधर्म है, साधु असाधु हैं एवं साधुता असाधुता ही ...
कदा वा राधायाः पदकमल
मैं कब श्रीराधा के परम करुणायुक्त चरण कमलों को हृदय में धारण करके इस संसार के नियमित विधि निषेधों को पूर्ण रूप से त्याग दूंगी, और कब सर्व सुखद गोविन्द...
जाकी दृगन कटाक्ष सर
जिनके नयन बाणों की चोट से श्री कृष्ण मूर्छित होकर धरती पर गिर जाते हैं और पुनः-पुनः व्याकुल और अधीर हो उठते हैं। [1] उनके हृदय में ऐसा भावावेश उत्पन्...
विदग्ध सुन्दरी-बृन्द वर
चतुर सुन्दरी-बृन्द की श्रेष्ठ चूड़ामणि रूपा श्रीराधे स्वामिनि ! हे महारस-निधे ! मैं कब आपके चरणों का आराधन (सेवन) करूँगी ?
श्रीराधे त्वपदाम्भोज पराग
हे श्रीराधे! आपके चरण-कमल-पराग से पूर्णतया अनुरंजित रसमय श्रीवृन्दावन के प्रति मुझे अचला प्रीति प्रदान कीजिए।
वैकुण्ठादि पदं काम्यमपि
हे वृन्दावन में विलास करने वाली श्री राधे! जहाँ जहाँ पर भी मैं आपका दर्शन नहीं करती, उन वैकुंठ आदि परम धाम (एवं उनकी कामना) भी मेरे लिए अत्यंत तुच्छ ह...
किं करोमि क्क गच्छामि
हे राधे ! मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? और किसके चरणों में लुण्ठित होऊँ ? तुम्हीं कहो तुम्हारा वह दास्य-रसोत्सव मुझे किस प्रकार प्राप्त होगा ?
यत्किंकरीषु बहुशः खलु काकुवाणी
निश्चय ही; जिनकी दासियों से परम-पुरुष शिखण्ड-मौली श्रीश्यामसुन्दर नित्य-निरन्तर कातर-वाणी द्वारा भूरी-भूरी प्रार्थना करते रहते हैं, क्या मैं कभी उन रस...
याही रस-मय नाम सौं राखत प्रेम अपार
जिसके प्रभाव के सामने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चारों पुरुषार्थ भी तुच्छ प्रतीत होते हैं, उस परम रसमय “राधा” नाम से श्रीकृष्ण अपार प्रेम रखते हैं।
यद्राधापदकिंकरीकृतहृदा
पवित्र श्री वृंदावन धाम केवल उन लोगों के लिए सुलभ है जो अपने ह्रदय में श्री राधा जी के चरण कमलों की सेवा का भाव रखते हैं। यह कभी भी उनके अनुग्रह के स्...
निज प्राणेश्वरर्य्या यद्पि दयनीयेयमिति मां
मेरी प्राणेश्वरी की यह दया पात्र है, ऐसी जानकर अद्भुत गति शोल प्रियतम मेरा बार-बार चुम्बन करते हैं, और सुरत-मदिरा से मुझे उन्मद बना देते हैं। यदपि वे ...
राधानामैव कार्यं ह्यनुदिन मिलितं साधनाधीश कोटि
अनुदिन श्रीराधा-नाम के श्रवण-कीर्तनादि के प्राप्त होने पर कोटि कोटि श्रेष्ठ साधन भी परित्याज्य हो जाते हैं। श्रीराधा-पद-कमल-सुधा पर कोटि-कोटि मोक्षादि...
दूराद्पास्य स्वजनान् सुखमर्थकोटि
मैंने अपने स्वजन सम्बन्धी वर्ग और कोटि कोटि सम्पतियों के सुख को दूर से ही त्याग दिया है, इतना ही नहीं परमार्थ सम्बन्धी समस्त श्रेष्ठ साधनों में भी मे...
सर्व मर्य्यादयातीत सर्वेशाधिक
हे वृन्दावनेश्वरी श्रीराधे ! आपका वैभव सर्वेश [श्रीकृष्ण] से भी अधिक है। आप समस्त मर्यादाओं से परे हैं [ अर्थात् लोक-वेद-मर्याएँ आपको छू तक नहीं पात...
धर्म अर्थ फल काम मोक्ष सब दूर विराजैं
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये उत्तम चार पुरुषार्थ यदि जगत में अत्यन्त उत्कृष्ट माने भी जाते हों, तो वे भले ही बने रहें। मुझे तो उनकी व्यर्थ चर्चा करने क...
प्रेमामृत रसानन्द मकरन्दौघ
हे स्वामिनि! हे प्रेमामृत के आनंदरस का मधुर रस बरसाने वाली श्री राधे! आप कब मुझे अपने चरणकमलों का दास्य प्रदान करेंगी?
कोटि कोटि नरकादिक तिनहूँ सौं निंद ऐसी
विषय तो दूर विषय की चर्चा भी मत करो क्योंकि वह करोड़ों नरकों से भी घृणित है। [1] मुक्ति आदि जो अनेक मार्ग वेदों एवं शास्त्रों ने गाए हैं उससे तो मुझे...
न जानीते लोकं न च निगमजातं कुल-परं- परां
जो महानुभाव इस एकान्त देश में ब्रज-मणि श्रीकृष्ण और श्रीराधा के भाव और रस का निश्चय रूप से भजन करते हैं। अहो ! वे न तो लोक को जानना चाहते है, न निगम ...
रसघन मोहन मूर्ति, विचित्रकेलि-महोत्सवोल्लसितम्
मैं उन रस-घन-मोहन-मूर्ति हरि (श्रीकृष्ण) की वन्दना करती हूँ जो विचित्र केलि-महोत्सव से उल्लसित हैं, जिनका मोर पंख इस समय श्री राधा चरणों में लुंठित हो...
यत्पादाम्बुरुहेक रेणु-कणिकां
जिनके चरणकमलों की एक रज कण को ब्रह्मा, शिव आदि गोपी-भाव का आश्रय लेकर के भी प्राप्त नहीं कर पाये, वही प्रेमामृत रस-सागर की निधि श्री राधा महारानी समय ...
सुधाकरमुधाकरं प्रतिपदस्फुरन्माधुरी
जो सुधाकर (चन्द्र) को भी असत् कर दिखाने वाला है, जो पद-पद पर देदीप्यमान् माधुरी के श्रेष्ठतम् सार-रूप नवीन किरणों के समुद्र से पूरित है, जो श्रीहरि अत...
अन्योन्यहास परिहास विलास केली वृन्दावने
अहो परस्पर हास-परिहास युक्त विलास केली क्रीड़ाओं की विचित्रता से प्रवृद्ध (उमड़े हुए) महारस के वैभव के साथ श्रीवृन्दावन में विहार करने वाले किसी (अनिर...
कदा मधुर सारिका: स्वरस पद्यमध्यापय
कभी मधुर - स्वरा सारिकाओं को निज रस सम्बन्धी पदों का अध्यापन कराते हुए, कभी ताली बजा-बजाकर मयूरों को नचाते हुए, तो कहीं कनक-लता से आवृत तमाल के लीला-...
सान्द्र प्रेम-रसौघ-वर्षिणि
हे घनीभूत प्रेम रस-प्रवाह-वर्षिणी ! हे नवीन विकसित महामाधुरी साम्राज्य की सर्व-श्रेष्ठ केलि-विभव - युक्त करुणा - कल्लोलिनि ! (सांरते !) हे श्रीवृन्दाव...
नव निकुञ्ज वर नागरी
हे नित्य निकुंजेश्वरी श्री राधे! हे रस प्रदायिनी प्रिया जू! मुझे अपनी दासी जान अपनी महल की टहल (निज सेवा) दीजिए।
हा राधे प्राण कोटिभ्योऽप्यति
हा राधिके ! मुझे आपके श्रीचरण-कमल अपने कोटि कोटि प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। आपकी चरण-सेवा के बिना मेरा क्षण भर का भी जीवन कठिन है। [मैं उसे कैसे धा...
ब्रह्मेश्वरादिसुदुरूहपदारविन्द
मैं श्री राधा रानी का निरन्तर स्मरण करता रहता हूं जिनके सहयोग और चरणों की रज को प्राप्त करना महान व्यक्तित्वों ब्रह्मा, शिव,शुकदेव, नारद और भीष्म के ...
यतन्तु कृतिनो यज्ञः तपः
हे राधे [ स्वामिनि ! ]! भले ही कोई सुकृती यज्ञ, तप, स्वाध्याय (वेद-पाठ) और नियम-संयमों का यजन-साधन करे, किंतु मैं तो केवल आपके श्रीचरण-कमलों की रेणु [...
कालिन्दी-कूल-कल्प-द्रुम-तल निलय प्रोल्लसत्केलिकन्दा
जो कालिन्दी- कूल-वर्ती कल्पद्रुम तल-स्थित भवन में उल्लसित केलि-विलास की मूल स्वरूप हैं, जो श्री वृन्दावन में सदा-सर्वदा प्रकटतर रूप से विराजमान् हैं,...
जग उपहासन सौं राखत न काज कछू
सृष्टि-रचना आदि की बात तो दूर रही, निकुंजेश्वर श्रीकृष्ण अपने नारद आदि भक्तों को भी नहीं पहचानते। [1] श्रीदामा आदि मित्रों से नहीं मिलते तथा अपने म...
वृन्दानि सर्वमहतामपहाय दूराद्
ए मेरे मन तू समस्त महत वृन्दों (महापुरुषों) को दूर से ही छोड़कर प्रीति पूर्वक श्री वृन्दावन में जा, जहाँ श्री राधा नामक एक दिव्य निधि विराजमान है, जो...
सद्योगीन्द्र सुद्दश्य सान्द्र रसदानन्दक सन्मूर्तय
जिनका संग अद्भुत महिमा पूर्ण मधुर वृन्दावन से है, वे भले ही क्रूर पापी और सज्जनों के दर्शन सम्भाषण के अयोग्य व्यक्ति क्यों न हों किन्तु वे सभी लोग महा...
वेणु: करानञि पतित: स्खलितं शिखंडं
जिनके नयन बाणों की चोट से श्री ब्रजराज कुमार की मुरली हाथ से छूट गिरती है। सिर का मोर मुकुट खिसक चलता है और पीताम्बर भी स्थान च्युत हो जाता है, यहाँ त...
यदि स्नेहाद्राधे दिशसि
हे राधे रति लाम्पट्य पदवी प्राप्त अपने प्रियतम के प्रति आप स्नेहवश मुझे सौंप देंगी तब भी मेरी निष्ठा क्या होगी, उसे सुनिए - "मैं मंद मंद मुस्कान के सा...
करे कमलमद्भुतं
अद्भुत कमल को हाथों में घुमाते हुए, एवं परस्पर स्कन्धों पर पुलकित भुजलता अर्पित किये हुए, कामोन्मत्त, वृन्दावन-विहारी-रसिक युगल की सहास-रस-सुन्दर, शत-...
लोग कुटुम सुख अर्थ अनन्तहि
मैंने लोक-परलोक, परिवार के सुख और अनन्त भौतिक कामनाओं को दूर से ही त्याग दिया है। इतना ही नहीं, जप, व्रत तथा परमार्थ सम्बन्धी समस्त श्रेष्ठ साधनों से ...
क्वासौ राधा निगम पदवीदुरगा कुत्र चासौ कृष्णस्तस्याः कुचकमलयोरन्तरै कान्तवासः ।
कहाँ तो वैदिक मार्ग से दूर वे श्री राधा, कहाँ उनके कुच-कमलों के मध्य में एकान्त निवास करने वाले वे श्री कृष्ण और कहाँ मैं तुच्छ, परम अधम और निन्दनीय क...
लुलित नव लवङ्गोदार कर्पूरपूरं
कपूर की शीतलता के कारण जिनके कपोलों पर पुलक का उदय हो रहा है और जो अनिर्वचनीय रूप से दासी-वत्सला हैं। ऐसी श्रीराधा प्रियतम श्रीकृष्ण के मुख-चन्द्र द्व...
लावण्यामृतवार्त्तया जगदिदं संप्लावयंती
(अपने) रोचक एवं रसपूर्ण वार्तालाप से इस जगत को आप्लावित (सराबोर) करती हुई (एवं) मुखचन्द्र की चाँदनी से शरद ऋतु के अनन्त पूर्ण चन्द्रों का विस्तार करती...
करं ते पत्रार्लि किमपि कुचयो: कर्त्तुमुचितं
हे श्रीराधे ! मेरा ऐसा शुभ-दिन कब होगा, जब मैं आपके कुच-तटों पर अनिर्वचनीय पत्र-रचना करने के योग्य अपने हाथों को, कुञ्जों में प्रियतम के प्रति अभिसरण ...
येषां प्रेक्षा वितरति नवोदार गाढ़ानुरागान्
जिन चरणार विन्दों की महिमा श्रीवृन्दा कानन में चमत्कृत हो रही है। जो रस के अद्भुत निधान हैं एवं नवीन और उदार अनुराग-पूर्ण मधुर-मधुरानन्द-मूर्ति घनश्या...
ययोन्मीलत्केली विलसित कटाक्षैक कलया
जिन्होंने किञ्चित विकसित केली-विलास जन्य कटाक्षों की एक ही कला से श्रीवृंदावन के मदोन्मत्त गजराज किशोर (श्री लाल जी) को बंदी बना लिया और ऐसे बन्दी कि ...
उच्छिष्टामृत भुक्तवैव चरितं श्रृण्वंस्तवैव स्मरन्
हे श्रीराधे! हे रसदे ! तुम्हारी ही उच्छिष्ट अमृत भोजन करने वाली मैं, तुम्हारे ही चरित्रों का श्रवण करती हुई, तुम्हारे ही कुञ्ज भवन में विचरण करती हुई,...
न देवैर्ब्रह्माद्यैर्न खलु हरिभक्तैर्न सुहृदा
श्रीराधा-मधुसूदन का रहस्य न तो ब्रह्मादि देवताओं को ही विदित है न हरि-भक्तों को ही। और तो और श्यामसुन्दर के सखा आदिकों को भी वह सुविदित नहीं है किन्तु...
यद्गोविन्द-कथा-सुधा-रस-हृदे
जो कुछ भी मैंने गोविन्द के कथा-सुधा-रस-सरोवर में अपने चित्त को डुबाया है अथवा उनके गुण-कीर्त्तन, चरणार्चन, विभूषणादि-विभूषित करने में दिन लगाये हैं कि...
तन्नः प्रतिक्षण चमत्कृत चारूलीला
जिस आनन-कमल से प्रतिक्षण महामोहन माधुर्य्य के विविध अङ्गों की भङ्गिमा युक्त सुन्दर-सुन्दर लीलाओं का लावण्य चमत्कृत होता रहता है और जो माधुर्य्य के अङ्...
अप्रेक्षे कृत निश्चयापि
यद्यपि [श्रीप्रियाजी ने प्रियतम की ओर] न देखने का निश्चय कर लिया है, फिर भी नेत्र-कोणों से [उनकी ओर] देर तक देखती ही रहती हैं। अहो ! [आश्चर्य है] मौन ...
यस्याः स्फूर्जत्पदनखमणि ज्योति
जिनकी प्रकाशमान् पद-नख-मणि-ज्योति की एक छटा का विलास सघन प्रेमामृत-रस के कोटि-कोटि सिन्धुओं के समान है। वे श्रीराधा यदि कदाचित् मुझ पर कृपा-दृष्टि-पात...
किवं वैकुण्ठ लक्ष्म्याप्यहह परमया यत्र में नास्ति राधा
"वैकुण्ठ" निवास के साथ हमारा क्या प्रयोजन एवं उद्देश्य है जहां महालक्ष्मी रहती है लेकिन श्री राधा नहीं?
अहो तेमी कुञ्जास्तदनुपम रासस्थलमिदं
अहो ! बड़े आश्चर्य की बात है ! यह सब वही कुंजें ! वही अनुपम रासस्थल तथा रति-रङ्ग-प्रणयिनी गिरि ( गोवर्धन ) गुहाएँ हैं !! किन्तु हाय ! हाय !! बड़ा खेद ...
यन्नारदाजेश शुकैरगम्यं वृन्दावने
यहीं श्री वृंदावन में मनोहर वेतस्-कुञ्ज में नारद, ब्रह्मा, शिव, और शुकदेव आदि के द्वारा भी सर्वथा अगम्य, श्री कृष्ण के चित्त का हरण करने में एकमात्र ...
भोः श्रीदामन्सुबल वृषभस्तोक कृष्णार्जुनाद्याः
[श्यामसुन्दर ने कहा]"हे श्रीदाम, सुबल, वृषभ, स्तोक-कृष्ण, अर्जुन आदि सखाओ ! तुमने क्या देखा? मेरी चकित दृष्टि ने कुञ्ज में प्रवेश न करने पर भी जो देखा...
किंवा नस्तैः सुशास्त्रैः किमथ
जिनमें प्रेम-मूर्ति श्रीराधा की महिमा-सुधा एवं उनके भाव का वर्णन नहीं है उन सुशास्त्र समूहों से अथवा उन शास्त्र-विहित, साधुजन, उनके द्वारा गृहीत मार्ग...
श्री राधे श्रुतिभिर्बुधैर्भगवताप्यामृग्यसद्वैभवे
वेद, पण्डितगण तथा भगवान के द्वारा भी अन्वेषणीय (ढूँढ़े जाने योग्य) श्रेष्ठ वैभव वाली हे श्री राधे ! आपने अपनी कृपा के ही द्वारा पद्य रूप में अपने स्तोत...
दिव्यप्रमोदरससारनिजांगसंग
अलौकिक आनन्द स्वरूप रस के सारभूत अपने श्रीअंगों के संगरूपी अमृत तरंगों के समूह से सींचकर, कोटि-कोटि कामदेवों के बाणों से व्यथित नन्दकुमार को संजीवित क...
पादांगुलीनिहितदृष्टिमपत्रपिष्णुं
अपने प्रियतम रसिक-शेखर श्रीलाल जी के मुखचन्द्र मण्डल को दूर से ही देखकर जिन्होंने लज्जा से भरकर अपनी दृष्टि को अपने ही चरणों की अंगुलियों में निहित कर...
चिन्तामणिः प्रणमतां व्रजनागरीणां
जो प्रणाम मात्र करने वालों की चिन्तामणि (सम्पूर्ण चिन्तित पदार्थों को प्राप्त कराने वाली), ब्रज सुन्दरियों की शिरोमणि, श्रीवृषभानु के कुल की मणि (प्रक...
उज्जागरं रसिकनागरसंगरंगैः
हे श्री राधे ! तुमने अपने प्रियतम रसिक नागर श्रीलालजी के संग कुञ्ज-भवन में आनंद-विहार करते हुए मोद में ही सम्पूर्ण रात्रि जागरण कर व्यतीत कर दी हो तब ...
आधाय मूर्द्धनि यदापुरुदारगोप्यः
उदार गोपियों ने जिस चरण-धूलि को मस्तक पर चढ़ाकर मोरमुकुट वाले श्यामसुन्दर के लिए भी कामना करने योग्य पद (श्रीप्रियाजी के दास्यभाव की पदवी) को प्रिय गु...
राधे त्वद्दास्य पदवी सर्व
हे राधे! यद्यपि आपकी दास्य-पदवी समस्त भक्तों के लिये भी अत्यन्त दुर्गम है, तथापि मैं निर्लज्ज की भाँति केवल उसी दुर्लभ पद को प्राप्त करने की आशा हृदय ...
लक्ष्म्या यश्च न गोचरीभवति यन्नापुः
लक्ष्मी को भी जिसका साक्षात्कार नहीं होता, जिसे श्रीदामा आदि सखागण भी प्राप्त नहीं कर सके, जो ब्रह्मा, नारद, शिव, सनकादि के द्वारा कल्पनीय नहीं है, ज...
लावण्यं परमाद्भुतं रतिकला
जिनका लावण्य परमाद्भुत है, जिनकी रति-कला-चातुरी अति अद्भुत है, जिन श्रेष्ठ वपु की कोई अवर्णनीय कांति भी महा अद्भुत है, एवं जिनकी लीला पूर्ण गति भी अति...
दूरे सृष्ट्यादिवार्त्ता न कलयति
सृष्टि-रचना आदि की बात तो दूर रही अपने नारद आदि भक्तों को भी नहीं पहचानते, श्रीदामा आदि मित्रों से नहीं मिलते तथा अपने माता-पिता के स्नेह को भी बढ़ावा...
राधा नाम सुधारसं रसयितुं जिद्वास्तु मे विह्वला
मेरी जिह्वा धीराधा-नामामृत-रस के आस्वादनार्थ सदा विह्वल (लालचवती) रही आवे। चरण श्रीराधा-पादाङ्कित वृन्दावन-वीथियों में ही विचरण करते रहें। दोनों हाथ उ...
क्वाहं मूढ़मतिः क्व नाम
कहाँ मन्द बुद्धि मैं और कहाँ श्री राधा चरणों के प्रभाव की कथा द्वारा निश्चित रूप से (नाम) परमानन्द के एकमात्र सार रस को प्रवाहित करने वाली (मेरी) वाणी...
तस्या अपार रस सार विलास
जो सभी रसों की सार हैं और जिनके रस विलास की सीमा की कोई कल्पना नहीं, जिनका मुख-कमल चंद्र की सुंदरता को लज्जित कर रहा है एवं जो मूर्तिमान मंगल स्वरूप ह...
श्रीराधिके सुरतरंङ्गिणि दिव्यकेलि
हे दिव्यकेलि तरङ्गमाले ! हे शोभमान् वदनारविन्दे ! हे श्रीश्यामसुंदर-सुधा-सागर-सङ्गमार्थ तीव्र वेगवती ! हे रुचिर नाभिरूप गम्भीर भँवर से शोभायमान् सुरत-...
दूरे स्निग्ध परम्परा विजयतां दूरे सुहन्मण्डली
जहां कुञ्ज-भवन के अभ्यन्तर भाग में परम-प्रेमी श्रीलालजी एवं श्रीवृषभानुनन्दिनीजू की रति-केलि होती रहती है, ब्रजपति श्रीलालजी के स्नेहीजनों की परम्परा ...
रहो दास्यं तस्याः किमपि वृषभानोरव्रर्ज्रवरी
रहो दास्यं तस्याः किमपि वृषभानोरव्रर्ज्रवरी, यसः पुत्रयाः पूर्ण प्रणय रस मूर्ति यदि लभे | तदा नः किं धर्मै: किमु सुर गणै: किं च विधिना, किमीशेन श्याम ...
ब्रह्मेश्वरादि सुदुरूह पदारविन्द, श्रीमत्पराग परमाद्भुत वैभवाया
ब्रह्मेश्वरादि सुदुरूह पदारविन्द, श्रीमत्पराग परमाद्भुत वैभवायाः | सर्वार्थ साररस वर्षि कृपार्द्रदृष्टे, तस्या नमोऽस्तु वृषभानुभुवो महिम्ने | | - श्री...
अनुल्लिख्यानन्तानपि सदपराधान्मधुपति
अनुल्लिख्यानन्तानपि सदपराधान्मधुपति - महाप्रेमाविष्टस्तव परमदेयं विमृशति | तवैकं श्रीराधे गृणत इह नामामृत रतं, महिम्नः कः सीमां स्पृशति तव दास्यैक मन...
दिव्यप्रमोदरससारनिजांगसंग
अलौकिक आनन्द स्वरूप रस के सारभूत अपने श्रीअंगों के संगरूपी अमृत तरंगों के समूह से सींचकर, कोटि-कोटि कामदेवों के बाणों से व्यथित नन्दकुमार को संजीवित क...
ब्रह्मानन्दैकवादा: कतिचन्
कोई ब्रह्मानन्द वादी हैं, तो कोई भगवद्वन्दना ( दास्य-भाव ) में ही उन्मत्त हैं। कुछ लोग गोविन्द के सख्यादि (मैत्त्रि भाव) को ही परमानन्द मानकर उसके आस्...
यस्यास्तत्सुकुमार सुन्दर पदोन्मीलन्नखेन्दुच्छटा
शुद्ध प्रेम-विलास मूर्तिरधिकोन्मीलन्महा माधुरी, धारा-सार-धुरीण-केलि-विभवा सा राधिका मे गतिः || - मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा...
सत्प्रेम सिन्धु मकरन्द रसौघ धारा
सत्प्रेम सिन्धु मकरन्द रसौघ धारा, सारानजस्रमभितः स्रवदाश्रितेषु || श्रीराधिके तव कदा चरणारविन्दं , गोविन्द जीवनधनं शिरसा वहामि || - मुरली अवतार श्री ह...
उपास्य चरणाम्बुजे व्रज
उपास्य चरणाम्बुजे व्रज-भ्रतां किशोरीगणे, मंहदिभरपी पुरुषै परिभाव्य भावोत्सवे || अगाध रस धामनि स्वपद-पद्म सेवा विधौ, विधेहि मधूरोज्जवलामिव-कृतिं ममाधी...
उन्मीलनमुकुटच्छटा परिल सच्छिकच्रकवालं स्फुरत
उन्मीलनमुकुटच्छटा परिल सच्छिकच्रकवालं स्फुरत, केयूराँग दहार कंकणघटा निर्धूत रत्नच्छवि । श्रोणी-मण्डल किंकणी कलरवं मञ्जीर-मञ्जुध्वनिं, श्री मतपादसरोरुह...
किं रे धूर्त्त
किं रे धूर्त्त-प्रवर निकटं यासि न: प्राण-सख्या, नुनंवाला कुच-तट-कर-स्पर्श मात्राद्विमुह्ययेत । इत्थं राधे पथि-पथि रसात्रागरं तेनुलग्नं, क्षीपत्वा भङ्ग...
जाग्रत्स्वप्न सुषुप्तिषु स्फुरतु में राधापदाब्जच्छटा
श्रीराधा-केलि-कथा-सुधा-समुद्र की महान् लहरियों से आन्दोलित मेरा मन कालिन्दी- कूलवर्त्ती श्रेष्ठ लता मन्दिर के प्राङ्गण में ही आनन्द पाता रहे और जागृत,...
कर्मणि श्रुति बोधितानि नितरां कुर्वन्तु कुर्वन्तु मा, गूढाष्चर्य रसाः स्रगादि विषयान्गृह्णन्तु मुञ्चन्तु वा
कर्मणि श्रुति बोधितानि नितरां कुर्वन्तु कुर्वन्तु मा, गूढाष्चर्य रसाः स्रगादि विषयान्गृह्णन्तु मुञ्चन्तु वा। कैव भाव-रहस्य पारग-मतिः श्रीराधिका प्रेयस...
राधा करावचित पल्लव वल्लरी के, राधा पदाङ्कविलसन्म मधुरस्थलीके
“ राधा करावचित पल्लव वल्लरी के, राधा पदाङ्कविलसन्म मधुरस्थलीके | राधा यशोमुखरमत्त खगावली के, राधा विहारविपिने रमतां मनो मे || ” - श्री हित हरिवंश महाप...
सद्योगीन्द्र सुद्दश्य सान्द्र रसदानन्दक सन्मूर्तय
जिनका संग अद्भुत महिमा पूर्ण मधुर वृन्दावन से है, वे भले ही क्रूर पापी और सज्जनों के दर्शन सम्भाषण के अयोग्य व्यक्ति क्यों न हों किन्तु वे सभी लोग महा...
यत्र
यत्र-यत्र मम जन्म कर्मभिर्नारकेऽथ परमे पदेऽथवा। राधिका-रति-निकुञ्ज-मण्डली तत्र-तत्र हृदि मे विराजताम् ॥ - मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री ...
यद् वृन्दावन मात्र गोचरमहो यन्न श्रुतीकं शिरो
प्यारोढूं क्षमते न यच्छिव शुकादीनां तु यद् ध्यानगम्। यत्प्रेमामृत माधुरी रसमयं यन्नित्य कैशोरकं, तद्रूपं परिवेष्टुमेव नयनं लोलायमानं मम ॥ - मुरली अवता...
मन्दीकृत्य मुकुन्द सुन्दर पदद्वन्द्वारविन्दामल,
मन्दीकृत्य मुकुन्द सुन्दर पदद्वन्द्वारविन्दामल, प्रेमानन्दममन्दमिन्दु-तिलकाद्युन्माद कन्दं परम् || राधा-केलि-कथा-रसाम्बुधि चलद्वीचीभिरान्दोलितं, वृन्...
यो ब्रह्म रुद्र शुक नारद भीष्म मुख्यै
यो ब्रह्म रुद्र शुक नारद भीष्म मुख्यै, रालक्षितो न सहसा परुुषस्य तस्य | सद्यो वशीकरण चूर्ण मन्त्र शक्तिं, तं राधिका चरण रेणुमनुस्मरामि | | - श्री हि...
कालिन्दी
कालिन्दी-कूल-कल्प-द्रुम-तल निलय प्रोल्लसत्केलिकन्दा, वृंदातव्यं सदैव प्रकटतर रहो बल्लवी भाव भयो | भक्तानां हृतसरोजे मधुर रस-सुधा-स्यंदि पादारविन्दा, स...
वेणु: करानञि पतित: स्खलितं शिखंडं
जिनके नयन बाणों की चोट से श्री ब्रजराज कुमार की मुरली हाथ से छूट गिरती है। सिर का मोर मुकुट खिसक चलता है और पीताम्बर भी स्थान च्युत हो जाता है, यहाँ त...
वृन्दावनेश्वरी तवैव पदारविन्दं
वृन्दावनेश्वरी तवैव पदारविन्दं, प्रेमामृत मकरंद रसौघपूर्णम् | हृदय पतं मधुपतेः स्मरतापमुग्रं,निर्वापयत्परमशीतलमाश्रयामि | | - मुरली अवतार श्री हित ह...
वैदग्ध्य सिन्धु अनुराग
“ वैदग्ध्य सिन्धु अनुराग-रसैक सिंधु, वात्सल्य सिंधु, अतिसान्ध्र कृपैक सिंधु || लावण्य सिन्दु अमृतछवि रूप सिंधु, श्री राधिका स्फुरतु मे हृदय केलि सिंधु...
Jag Uphasan Saun Raakhat Na Kaaj Kachhu
(Kavitt)Jag Uphasan Saun Raakhat Na Kaaj Kachhu,Naradadi Bhaktan Ki Sudhi Samharai Na. [1]Subalaadi Sakhan Kaun Bhetat Na Dekhyau Kahun,Nand Au Jasoda...
Shri Radhe Tvapadambhoja
Shri Radhe Tvapadambhoja Parag-Pariranjite.Vrindaranye Rasamaye Dehi Me Nischala Ratim.- Shri Hita Krishn Chandra, Shri Radha Upsudha Nidhi (47)O Shri...
उज्जृम्भमाणरस
जिनके नेत्र प्रणय-रस से चञ्चल हो रहे हैं और जिनके अङ्ग उत्फुल्लमान् रस-सागर की तरङ्गों के समान हैं, उन श्रीवृन्दाटवी नव- निकुञ्ज भवन की अधिष्ठात्री दे...
यत्पादपद्मनखचन्द्रमणिच्छटाया
जिनके पाद-पद्म-नख रूप चन्द्रमणि की किसी अनिर्वचनीय छटा का प्रकाश गोप-वधुओं में देखा जाता है, वही परिपूर्ण अनुराग-रस-समुद्र की सार-मूर्त्ति श्रीराधिका ...
क्षरन्तीव प्रत्यक्षरमनुपम
अहा ! जिसके अक्षर-अक्षर से अनुपम प्रेम-जलधि निर्झरित हो रहा है ! जो कर्ण-पुटों में मानों अमृत-धारा-वृष्टि विधान करता है, एवं जो रस से सिक्त, परम कोमल,...
अलिन्दे कालिन्दनी- तट नवलता-मन्दिरवरे
अहा ! कालिन्दी कुल वर्ती नव-लता-मन्दिर-गत-प्राङ्गण में रति-केलि-मर्दन से उद्भूत (प्रकट हुए) श्रम-जल-प्रवाह से परिपूरित शरीर और सुख-स्पर्श से आमिलित ( ...
यस्याः कदापि वसनाञ्चलखेलनोत्थ
“ यस्याः कदापि वसनाञ्चलखेलनोत्थ, धन्यातिधन्यपवनेन कृतार्थमानी | योगीन्द्रदुर्गमगतिर्मधुसूदनोऽपि, तस्या नमोऽस्तु वृषभानुभुवो दिशेऽपि || (1) ” - श्री हि...
केनापि नागरवरेण पदे निपत्य
केनापि नागरवरेण पदे निपत्य, संप्राथितैक परिरम्भ रसोत्सवायाः | सभ्रूविभङ्गम अतिरंग निधेः कदा ते, श्रीराधिके नहिनहीति गिरः शृणोमि || - मुरली अवतार श्री ...
वृन्दारण्ये नव रस
वृन्दारण्ये नव रस-कला-कोमल प्रेम-मूर्ति:, श्रीराधायाश्चरण-कमलामोद - माधुर्य्य - सीमा । राधा ध्यायन् रसिक-तिलकेनात्त केली-विलासां, तामेवाहं कथमिह तनुं ...
प्रेमोल्लासैकसीमा परम रसचमत्कार वैचित्र्य सीमा
प्रेमोल्लासैकसीमा परम रसचमत्कार वैचित्र्य सीमा, सौन्दर्य्यस्यैक-सीमा किमपि नव-वयो-रूप-लावण्य सीमा । लीला-माधुर्य्य सीमा निजजन परमोदार वात्सल्य सीमा, स...
सत्प्रेम राशि सरसो विकसत्सरोजं
सत्प्रेम राशि सरसो विकसत्सरोजं, स्वानन्द सीधु रससिन्धु विवर्धनेन्दुम् | तच्छ्री मुखं कुटिल कुन्तल भृङ्ग जुष्टं, श्री राधिके तव कदा नु विलोकयिष्ये || -...
वृन्दारण्य निकुंजसीमसु सदा स्वॉँग रंगोत्सवै
जो सर्वदा श्रीवृन्दावन निकुंज सीमा में अपने अंग रंगोस्तव के द्वारा माधव की अति अद्भुत अधर सुधा का आस्वादन करके उन्मत हो रही हैं, और जो गोविन्द के प्रि...
धर्माद्यर्थ चतुष्टयं विजयतं किं तदवृथा वार्त्तया
धर्माद्यर्थ चतुष्टयं विजयतं किं तदवृथा वार्त्तया, सैकान्तेश्वर भक्तियोग पदवी त्वारोपिता मूर्द्धनि । यो वृन्दावन सीम्नि कञ्चन घनाश्चयःर्य किशोरीमणि- स्...
श्री राधे श्रुतिभिर्बुधैर्भगवताप्यामृग्यसद्वैभवे
वेद, पण्डितगण तथा भगवान के द्वारा भी अन्वेषणीय (ढूँढ़े जाने योग्य) श्रेष्ठ वैभव वाली हे श्री राधे ! आपने अपनी कृपा के ही द्वारा पद्य रूप में अपने स्तोत...
दूराद्पास्य स्वजनान् सुखमर्थकोटि
“ दूराद्पास्य स्वजनान् सुखमर्थकोटिं, सर्वेषु साधनवरेषु चिरं निराशः | वर्षन्तमेव सहजाद्भुत सौख्य धारां, श्रीराधिका चरणरेणु महं स्मरामि ” || - श्री हित ...
Vaikunthadi Padam Kamyamapi
Vaikunthadi Padam Kaamyamapi Tuchchham Matam Mama.Na Yatra Tvaamaham Vikshe Vrindaranya-Vilasini.- Shri Hita Krishn Chandra, Shri Radha Upsudha Nidhi ...
Kim Karomi Kka Gachhami
Kim Karomi Kka Gachhami Kasya Pade Luthamyaham.Katham Wa Labhate Radhe Tav Dasya Rasotsavam.- Shri Hita Krishn Chandra, Shri Radha Upsudha Nidhi (43)O...
Lakshmya Yasch Na Gocharibhavati Yannapuh
Lakshmya Yasch Na Gocharibhavati Yannapuh Sakhayah Prabhoh. Sambhavyopi Viranchinaradashivswayambhuvadyairn Yah.Yo Vrindavannagaripashupatistribhavala...
Yahi Rasmay Nam Sau Rakhat Prem Apar
Yahi Ras-may Nam Sau, Rakhat Prem Apar. Lagat Tuchchh Purusharth Sab, Yeh Aagein Sukumar.- Shri Hit Kishori Lal, Radha Sudha Nidhi Stva (94.2)Before t...
Log Kutum Sukh Arth Anantahi
Log Kutum Sukh Arth Anantahi, Durahi Som Duriyayau.Jap Vritadi Sadhanan Yugan Saun, Hvay Nirash Bisarayau. [1] Adbhut Anand-Dhar Sahaj Hi, Shravat Pur...
Yasyah Sphurjatpadanakhamani Jyoti
Yasyah Sphurjatpadanakhamani Jyotirekachchatayah Sandra Premamrritarasa Mahasindhu Kotivilasah. Sa Chedradha Rachayati Krripa Drrishtipatam Kadachin, ...
Premamrrita Rasananda
Premamrrita Rasananda Makarandaugha Varshinim.Kada Padaravindeham Vinde Dasyam Taveshvari.- Shri Hita Krishn Chandra, Shri Radha Upsudha Nidhi (29)O S...
Dharm Arth Phal Kaam Moksh Sab Dur Viraje
(Chappay)Dharm Arth Phal Kaam Moksh Sab Door Virajen.Kaha Tin Ki Batran Vritha Kijai Bin Kajen. [1]Hari Ki Bhakti Ananya Maha Padavi Kahi Gai.Sir Math...
Yasyah Sphurjatpadanakhamani Jyoti
Yatpadamburuhek Renu-kanikan Mudhrna Nidhatun Na Hi Prapurabrahm Shivadayopyadhikrtin Gopyaik Bhavashrayah.Sapi Premasudha Rasambudhinidhi Radhapi Sad...