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Spiritual Lineage & Devotional Mood

Disciple of / GuruInitiated directly by Srimati Radharani in a dream
Influenced byMadhurya Bhava of Vaishnavism
Associated SampradayaRadhavallabh Sampradaya
Devotional Mood (Bhav)Sahachari Bhava, Radha Dasya

Biography & History

Shri Hit Harivansh Mahaprabhu is the founding acharya of the Radhavallabh Sampradaya and is worshiped as the incarnation of Lord Krishna's divine flute (Vamshi). He brought the confidential path of "Sahachari Bhava" to the forefront, shifting the devotional focus to the supreme position of Shri Radha's lotus feet. He established the historical Radha Vallabh Temple in Vrindavan and discovered Seva Kunj (Nikunjavana) as the site where the Divine Couple performs their intimate nocturnal pastimes. His life and writings demonstrate that divine love transcends all scriptural rules, ritual restrictions, and social conventions.

Topical Connections

shri hit harivnsha Collected Verses

general

कौन चतुर जुवती प्रिया

भावार्थ - "(श्रीहित अलि ने कहा-) हे लाल ! ऐसी कौन चतुर युवती प्रेयसी है (जिससे) आप रात्रि में चोरी चोरी मिलते हैं ? [1] हे प्यारे ! आनन्द विलास रंजित ...

general

लावण्य सार रस, सार सुखैव सारे

श्री राधा सुंदरता, सुख, करुणा और आनंद का प्रतीक है।

general

चकई! प्रान जु घट रहैं

निज रसिकों के सिद्धांत एवं वृन्दावन रस के नित्य विहार में श्री राधा को स्वकीया और परकीया दोनों से पृथक माना जाता है। यहाँ एक क्षण का वियोग प्रियतम एवं...

general

दूरे स्निग्ध परम्परा विजयतां दूरे सुहन्मण्डली

जहां कुञ्ज-भवन के अभ्यन्तर भाग में परम-प्रेमी श्रीलालजी एवं श्रीवृषभानुनन्दिनीजू की रति-केलि होती रहती है, ब्रजपति श्रीलालजी के स्नेहीजनों की परम्परा ...

general

कालिन्दी-तट-कुञ्जे

वृंदावन में श्री यमुना तट के कुञ्ज में कोई अनिर्वचनीय रसामृत एवं अद्भुत केलि-निधान “श्रीराधा” नामक स्वरुप असीम रूप से उमड़ रहा है।

general

दृष्ट्वैव चम्पकलतेव चमत्कृताङ्गी

जो अपने प्रियतम श्रीलालजी को देखते ही चम्पकलता के समान अङ्ग-अङ्ग से चमत्कृत हो उठती हैं, और कभी मन्द-मन्द वेणु-ध्वनि को सुनकर जिनके समस्त अङ्ग विह्वल ...

general

मेरे प्राणनाथ श्रीश्यामा, सपथ करौं तिन छियें

"मेरे प्राणनाथ श्रीश्यामा, सपथ करौं तिन छियें । " - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री स्फुट वाणी मैं शपथ खा कर कहता हूँ कि मेरी प्राणनाथ, स्वामिनी श्र...

general

राधाकेलि कलासु साक्षिणि कदा वृन्दावने

मैं कब प्रेम-विवशाकृति होकर श्री राधा-केलि के साक्षी प्रकट उज्ज्वल-अद्भुत-रस-पूर्ण एवं पवित्र वृन्दावन में निवास करूँगी? तथा नेत्र-पिण्डों में स्थित त...

general

वृषभानु नंदिनी राजति हैं

श्रीवृषभानुनन्दिनी सुशोभित हो रही हैं। सुरत के रंग-रस से भरी हुई ये भामिनी सम्पूर्ण स्त्रियों को अपनी शोभा से पराजित करके उल्लसित हो रही हैं। [1] इध...

general

परस्परं प्रेमरसे

परस्पर प्रेम-रस में निमग्न एवं सौन्दर्य पूर्ण क्रीड़ाओं से सबको मोहित करने वाला वह गौर-श्याम युगल श्रीवृन्दावन के मध्य में स्थित नवीन कुंज गृह में प्र...

general

आशास्य-दास्यं-वृषभानुजाया

भानु-नन्दिनी श्रीयमुना के तट में अविचल भाव से स्थिर रहकर एवं वृषभानु-नन्दिनी के दास्य-भाव को मन में धारण करके मैं वृन्दावन की कुञ्ज-वीथियों में क्या क...

general

आजु बन राजत जुगल किसोर

आज श्रीवृन्दावन में युगलकिशोर श्रीश्यामाश्याम शोभायमान हैं। श्रीनन्दनन्दन और श्रीवृषभानुनन्दिनी सम्पूर्ण रात्रि प्रेम विहार करने के बाद उनींदी अवस्था ...

general

हा कालिन्दि त्वयि मम

हे यमुने ! तुम्हारे जल में मेरी निधि -स्वरूपा स्वामिनी को प्रियतम ने स्नान कराया है। उनके (श्रीराधा के) कर स्पर्श को प्राप्त करने वाले, हे अलौकिक और आ...

general

राधाकेलि-निकुञ्ज-वीथीषु

मैं श्री राधा के केलिभवन कुञ्ज-वीथियों [श्री वृंदावन] में कब विचरण करूँगी? कब केवल और केवल श्री राधा का ही नाम लेकर उनकी अनन्य भक्ति करूँगी और अपना प...

general

संकेतकुंजमनुकुंजरमन्दगामि न्यादाय

हे श्री राधे ! प्रेमविहार के आवेग से संकेत कुंज की ओर गज जैसी मन्द गति से प्रस्थान करती हुई आपके पीछे-पीछे, दिव्य और कोमल चन्दन तथा सुगन्धित माला लेक...

general

कृष्णामृतं चल विगाढुमितीरिताहं

जब श्री राधा मुझसे कहेंगी- "अरी सखि ! श्रीकृष्णामृत अवगाहन करने के लिए चल"। तब मैं हँसकर कहूँगी- "हे सखि ! तब तक धैर्य्य रखो जब तक रात्रि नहीं आ जाती।...

general

बैठे लाल निकुंज भवन

श्री हित सखी ने फिर कहा- “ हे मानिनि [श्री राधे] ! लाल ( तुम्हारी प्रतीक्षा करते हुए ) निकुञ्ज भवन में बैठे हैं। ( इस समय ) कैसी सुन्दर रुचि दायक रात...

general

चलत्कुटिल कुन्तलं तिलक

हे श्रीराधिके ! चंचल घुँघराली अलकों वाले, तिलक से शोभित भाल वाले, तिल के फूल के समान नासापुट में शोभित मोती वाले निष्कलंक चन्द्रमा से भी अत्यन्त उज्ज्...

general

प्रीतिरिव मूर्तिमती रससिन्धो

मूर्तिमान प्रीति जैसी, रस-समुद्र की सार-सम्पत्ति की भाँति निर्मल और चतुरता की सर्वस्व कोई अनिर्वचनीया श्रीवृन्दावन-स्वामिनी की जय हो।

general

सारस सर बिछुरंत कौ जो पल

भूमिकाः - (सारस के आक्षेप को सुनकर चकई अपने मन में विचार करती है कि) सारस का शरीर यदि सरोवर के अन्तर को एक क्षण के लिए भी सहन कर ले और उसकी पत्नी लक्ष...

general

राधापादसरोजभक्तिमचलामुद्वीक्ष्य निष्कैतवां

श्रीराधा के चरणकमलों में अचल और निष्कपट भक्ति देखकर मोहन (श्रीश्यामसुन्दर) अतिशय महाप्रेम से सर्वात्मना अपना भजन करने वालों से भी अधिक प्रसन्न होकर, ...

general

यह जु एक मन बहुत ठौर करि

यह पद श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने श्री हरिराम व्यास के प्रश्नों के उत्तर में कहा था, जिसके बाद श्री हरिराम व्यास जी उनके शिष्य बन गये थे। श्री हित महा...

general

कदा वृन्दारण्ये मधुर मधुरानन्द रसदे

मैं मधुर से भी मधुर आनंद-रस-प्रद श्रीवृन्दावन में प्रियेश्वरी श्रीराधा के केलि-भवन नव-कुञ्ज-पुञ्जों का कब अन्वेषण करूँगी ? और श्रीराधा चरण कमल मकरन्द ...

general

लावण्यसाररस सारसुखैकसारे कारुण्यसार

लावण्य के सार, रस के सार, सुख के एकमात्र सार, करुणा के सार, मधुर छवि वाले रूप के सार, चतुरता के सार, प्रेम-क्रीडाविलास के सार तथा समस्त सारों के सार श...

general

मंजुस्वभावमधिकल्पलतानिकुंजं व्यंजंतमद्भुतकृपारसपुंजमेव

हे मन, तू उस श्रीराधा नामक प्रेमामृत के अगाध और बाधा शून्य सागर का शीघ्र भलीभाँति आश्रय ग्रहण कर जो कोमल स्वभाव वाला (है), जो कल्पलता की कुंज में विर...

general

गत्वा कलिन्दतनयाविजनावतार

हे श्री राधे ! श्री यमुनाजी के निर्जन घाट पर जाकर कामदेव को जीवित कर देने वाले आपके अमृतमय श्री अंगों को उबटन लगाती हुई मैं, ऊँचे कदम्ब वृक्ष पर बैठे ...

general

भानु दसम्म, जनम्म निसापति

भूमिकाः इस सवैये में सम्पूर्ण शुभ माने जाने वाले ग्रहों का उल्लेख करके भक्ति शून्य व्यक्ति के लिए उनकी व्यर्थता प्रतिपादित की गई है। व्याख्याः दसव...

general

नंद के लाल हरयौं मन मोर

श्रीप्रियाजी ने कहा- “ सखि ! नन्द नन्दन ने तो मेरा मन हर लिया है। मैं अपने भवन में बैठी मुक्ता माल पिरो रही थी उन्होंने सबेरे सबेरे मुझ पर काँकरी फेंक...

general

तेरे नैंन करत दोऊ चारी

[हे राधे !] तेरी दोनों आँखें ही तो चारी (चुगल खोरी) कर रही हैं, बता रही हैं ! कितनी प्रसन्न है ये ? इनकी प्रसन्नता मानो कहीं समाती नहीं [इसी से विदित ...

general

राधादास्यमपास्य यः प्रयतते

‘श्रीराधा’ के कैंकर्य को छोड़कर जो गोविन्द के संग की चेष्टा करते हैं, वे बिना पूर्णिमा तिथि के पूर्णचन्द्र प्राप्त करना चाहते हैं। कृष्णप्रेम प्रवाह क...

general

आजु गोपाल रास रस खेलत

( श्रीहित सजनी ने कहा – ) अरी सजनी ! आज विमल कल्पवृक्ष के तीर यमुना पुलिन पर श्रीगोपाल लाल रास क्रीड़ा कर रहे हैं। सजनी ! जैसा निर्मल शरद का समय है व...

general

श्रीराधिकां निजविटेन सहालपन्तीम्

श्रीप्रियाजी अपने प्रियतम श्रीलालजी के साथ कुछ मधुर मधुर बातें कर रही हैं, जिससे उनके लाल-लाल ओठों से सौन्दर्य्य-राशि निकल निकलकर चारों ओर फैल रही है।...

general

श्रीराधिके सुरतरङ्गि नितम्ब भागे

हे श्रीराधिके ! हे सुरत-केलि-रंजीत नितम्ब-भागे ! अहा ! आपका यह काञ्ची-कलाप क्या है मानो कल हंसों का कल-कल अनुलाप है, और चरण-कमलों के नूपुरों की मन्द-म...

general

आज तू ग्वाल गोपाल सों खेलि री

सखी भावापन्न श्री हित हरिवंश श्रीराधा से कहते हैं “आज तुम गोपकुमार मदन गोपाल के साथ क्रीड़ा करो।” [1] हे भामिनी, अपना अत्यन्त मान छोड़कर शीघ्र वन में च...

general

आजु तौ जुवति तेरौ वदन

हे युवति ! तुम्हारा जो यह मुख आनन्द से प्रफुल्लित है उसी से तुम्हारे प्रियतम सङ्गम जनित सुख की सूचना मिल रही है। जैसे तुम्हारे बोल आलस्य से लटपटाये ह...

general

मैं जु मोहन सुन्यौ

मैंने मदनगोपाल के मोहक वेणुनाद को सुना है। [1] इस अद्भुत नाद को सुनकर आकाश में स्थित मुनियानों (विमानों) में बैठी हुई देवताओं की स्त्रियाँ थकित हो गई...

general

प्रीति न काहु की कानि बिचारै

प्रीति किसी की मर्यादा नहीं मानती। अरे ! प्रेम से विशेष विवश मन को किसी मार्ग कुमार्ग की ओर जाने से कौन निवारण कर सकता है ? [1] श्रावण मास के जल से उ...

general

आवति श्रीवृषभानु दुलारी

भावार्थ- श्रीहित सखी ने कहा- हे सखियो अत्यन्त चतुर शिरोमणि, रूप की राशि (अपार रूपवती) एवं अङ्ग–अङ्ग में परम सुकुमारी श्रीवृषभानु दुलारी आ रही हैं। [1...

general

तेरौई ध्यान राधिका प्यारी गोवर्द्धनधर लालहिं

यह मान का पद है। श्री हित सजनी श्री राधिका को सम्बोधित करते हुए कहती हैं: हे राधिका प्यारी, गोवर्धनलाल को सदा तुम्हारा ही ध्यान रहता है। (श्रीश्यामसु...

general

श्रीगोपेन्द्र-कुमार-मोहन

जो नन्दनन्दन को मोहित करने वाली महा विद्या रूपा हैं, जिनके नेत्रों की कोरों से उमड़ती हुई महा माधुरी के सार का उछलता हुआ रस-समुद्र सहज रूप से प्रवाहित ...

general

लाल की रूप माधुरी नैननि निरखि नेकु सखी

हे सखी, तू अपने नेत्रों से लाल की रूप माधुरी को तनिक देख तो सही। सुकुमारता की राशि श्रीश्यामसुन्दर की मुसकान कामदेव के मन को हरण करने वाली है। उनके नख...

general

प्रत्यङ्गोच्छलदुज्ज्वलामृत

प्रेम का एक अनुपम परिपूर्णतम सागर है। जिसके अङ्ग-प्रत्यङ्गों से नित्य-प्रति उज्ज्वल अमृत-रस उच्छलित होता रहता है। वह (प्रेममहानिधि ) लावण्य का भी अनुप...

general

लिखन्ति भुजमूलतो न खलु शंख-चक्रादिकं

श्री गुरु द्वारा दिए गए भजन के पराक्रम से युक्त वे कोई महाबुद्धिमान विरले ही अनन्य रसिक जन हैं, जो न तो भुजाओं में शंख चक्र आदि वैष्णव चिन्हों को धारण...

general

आनँद आजु नंद के द्वार

आज नंद के द्वार पर आनन्द छाया हुआ है। वहाँ अनन्य दासों के भजन-रस की निष्पत्ति के लिए मनोहर ग्वाल पुत्र प्रकट हुये हैं। [1] नन्दगाँव की सब गायों के शर...

general

श्री यमुनाष्टक

रसैकसीमराधिकापदाब्जभक्तिसाधिकांतदंगरागपिंजरप्रभातिपुंजमंजुलाम्। स्वरोचिषातिशोभितां कृतां जनाधिगंजनां-भजे कलिन्दनन्दिनीं दुरंतमोहभंजनीम्॥ [2] जो श्रृंग...

general

यज्जापः सकृदेव गोकुलपतेराकर्षकस्तत्क्षणाद्यत्र

जिसका एक बार मात्र उच्चारण गोकुल- पति श्रीकृष्ण को तत्क्षण आकर्षित करने वाला है, जिससे प्रेमियों के लिये अर्थ, धर्मादि समस्त पुरुषार्थों में तुच्छता क...

general

सदा गायं-गायं मधुरतर राधा-प्रिय यशः

मैं श्रीराधा के नव-निभृत केलि कुञ्ज कानन में स्थित रहती हुई, सदा मधुरतर श्रीराधा के प्रिय यशों का तथा घनीभूत नव-नव आनन्द-रस-दायी श्रीराधापति की कथाओं ...

general

सबसों हित निष्काम मति

श्री हित हरिवंश जी कहते हैं कि सबसे हितकारी बात यही है कि निष्काम भाव रखो, सदा वृन्दावन में वास करो, श्री राधावल्लभ लाल की छवि को हृदय में धारण रखो और...

general

अधर अरुन तेरे कैसे कै दुराऊँ

(हित सखि ने कहा -) हे रसिक वर लाल ! आपके अत्यन्त अरुण अधरों का राग किस प्रकार छिपाऊँ ? [1] यदि मैं कदाचित् उन अधरों की अद्भुतता कुसुम रंगों से रंजित ...

general

यस्यास्ते बत किंकरीषु

वृन्दाटवी कन्दर्प श्रीलालजी श्री राधिका के प्रसादोत्सव की इच्छा से उनकी किंकरियों की अत्यन्त हर्ष-पूर्वक अधिकाधिक सदा चाटुकारिता करते रहते हैं। आपके ज...

general

प्रेम्णः सन्मधुरोज्ज्वलस्य हृदयं श्रृंगारलीलाकला

जो मधुर और उज्ज्वल प्रेम की प्राण-स्वरूपा, श्रृंगार रस की लीला कलाओं की विचित्रता की सर्वोच्च अवधि, भगवान् श्रीकृष्ण की आराधनीया कोई अनिर्वचनीया शासन-...

general

तू रति रंगभरी देखियत है श्री राधे

हे श्रीराधे, आज तुम प्रेम-रंग भरी दिखलाई दे रही हो, मालूम होता है कि तुमने अपने मोहन प्रियतम के साथ रात्रि में एकान्त रमण किया है। [1] तुम्हारी गति अ...

general

आरती मदन गोपाल की कीजियै

आरती मदन - गोपाल की कीजियै। देव रिषि व्यास शुक दास सब कहत निज, क्यौं न बिनु कष्ट रस सिंधु कौं पीजियै। [1] अगर करि धूप कुंकुम मलय रंजित, नव वर्तिका घृत...

general

यल्लक्ष्मी शुक नारदादि

हे नव- कुञ्ज नागरि ! मैं आपके उस कैंकर्य प्राप्ति की आशा को धारण किये हुए हूँ जिससे क्षण-क्षण में अद्भुत रस की प्राप्ति होती है और जिसे उन अनुराग-उत्स...

general

सुधंग नाचत नवल किसोरी

नवल किशोरी राधिका आज सुधंग नृत्य नाच रही है और थेइ थेई कहते हुए अपने प्रियतम के मुख चन्द्र की ओर ऐसे देखती है जैसे ( रूप की ) प्यासी चकोरी। [1] नृत...

general

काहे कौं मान बढ़ावतु है

मानवती श्रीराधा के मान मोचन के लिये उनको विदग्धता पूर्वक समझाती हुई श्री हित सजनी कहती हैं “हे मृगछौना जैसे भोले एवं रसीले नेत्र वाली (श्रीप्रिया) मान...

general

तैं भाजन कृत जटित विमल

जैसे कोई विविध रत्नों से जटित स्वर्णपात्र में अमृत भरकर उसे चूल्हे पर चढ़ाकर चन्दन की लकड़ी से अग्नि प्रज्बलित करके उसमें सरसों की खली को रांधे, अर्था...

general

कर्मणि श्रुति बोधितानि नितरां कुर्वन्तु कुर्वन्तु मा, गूढाष्चर्य रसाः स्रगादि विषयान्गृह्णन्तु मुञ्चन्तु वा

गूढाष्चर्य श्री राधा रस में रंगे रसिक-गण वेदों द्वारा निर्मित कर्मकाण्ड का अनुष्ठान करें या न करें, माला, चन्दन आदि विषय भोग विलास के उपकरण गृहण करें ...

general

खंजन मीन मृगज मद मेंटत

हे प्रिया, मैं तुम्हारे नेत्रों की बात क्या कहूँ ? यह अपनी चंचलता से खंजन का, तिरछी गति से मीन का, और भोलेपन से मृगछोना का मद चूर चूर कर रहे हैं। सुन...

general

चलि सुंदरि बोली वृंदावन

(दूतिका ने श्रीप्रियाजी से कहा- ) हे सुन्दरि ! चलो !! तुम्हें ( प्रियतम ने ) वृंदावन में बुलाया है। हे कामिनि ! तुम तो हो दामिनि जैसी और मोहन नूतन घन ...

general

नैंननिं पर वारौं कोटिक खंजन

( हे राधे ! तुम्हारे ) नयनों पर मैं कोटि कोटि ख़ंजनों को भी न्यौछावर कर दूँ। ( कितने सुन्दर हैं तुम्हारे नयन ? ) चंचल हैं , अत्यन्त चपल हैं , अरुण है ...

general

बाद ग्राम, मथुरा

मथुरा में स्थित बाद ग्राम राधावल्लभ संप्रदाय प्रवर्तक श्री हित हरिवंश महाप्रभु की जन्म भूमि है। इसलिए यह स्थान राधावल्लभ सम्प्रदायानुगत वैष्णवों के लि...

general

मोहनलाल के रसमाती

हे राधे ! तू मोहन लाल के रस में उन्मत्त है। हे नव वधू ! उस एकान्त मिलन की गोप्य बात को क्यों मुझसे छिपा रही है? इसीलिये न कि प्रथम स्नेह के कारण संकोच...

general

कदा वा राधायाः पदकमल

मैं कब श्रीराधा के परम करुणायुक्त चरण कमलों को हृदय में धारण करके इस संसार के नियमित विधि निषेधों को पूर्ण रूप से त्याग दूंगी, और कब सर्व सुखद गोविन्द...

general

सुनि मेरो वचन छबीली राधा, तैं पायो रस सिंधु अगाधा

भावार्थ- "हे छविमयी राधे ! तू मेरी बात सुन ! तूने रस का गम्भीर समुद्र पाया है। यद्यपि तू वृषभानु गोप की ही बेटी है, फिर भी तूने प्रसन्नता पूर्वक रसिक ...

general

बैंनु माई बाजै बंसीवट

हे सखी! वंशीवट में श्री कृष्ण की वंशी की मधुर ध्वनि गूँज रही है। श्री धाम वृन्दावन के परम पावन एवं सुन्दर यमुना तट में सदा वसंत ही रहता है। [1] श्री ...

general

यत्पादाम्बुरुहेक रेणु-कणिकां

जिनके चरणकमलों की एक रज कण को ब्रह्मा, शिव आदि गोपी-भाव का आश्रय लेकर के भी प्राप्त नहीं कर पाये, वही प्रेमामृत रस-सागर की निधि श्री राधा महारानी समय ...

general

राधेति मई जीवनम

श्री राधा और उनका पवित्र नाम ही केवल मेरा जीवन है।

general

आज नीकी बनी श्रीराधिका नागरी

भावार्थ- “हे सखि ! आज नागरी राधिका बड़ी नीकी (सुन्दर) बनी हैं। वे समस्त ब्रज युवती समूह में रूप, चातुर्य शील श्रृंगार एव गुण सभी बातो में सबसे बढ़ी-चढ़...

general

दूराद्पास्य स्वजनान् सुखमर्थकोटि

मैंने अपने स्वजन सम्बन्धी वर्ग और कोटि कोटि सम्पतियों के सुख को दूर से ही त्याग दिया है, इतना ही नहीं परमार्थ सम्बन्धी समस्त श्रेष्ठ साधनों में भी मे...

general

नयौ नेह नव रंग नयौ रस

आज नवल श्याम और नवल वृषभानु किशोरी में (परस्पर) नवीन स्नेह, नवीन आनन्द एवं नया ही रस भर रहा है। यहाँ श्याम सुन्दर का नया पीत पट है तो वहाँ वृषभानु क...

general

हित हरिवंश प्रपंच बंच सब काल व्याल कौ खायौ

हित हरिवंश प्रपंच बंच सब काल व्याल कौ खायौ । यह जिय जानि स्याम स्यामा पद कमल संगि सिर नायौ । । - श्री हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (59) श्रीहि...

general

राधानामैव कार्यं ह्यनुदिन मिलितं साधनाधीश कोटि

अनुदिन श्रीराधा-नाम के श्रवण-कीर्तनादि के प्राप्त होने पर कोटि कोटि श्रेष्ठ साधन भी परित्याज्य हो जाते हैं। श्रीराधा-पद-कमल-सुधा पर कोटि-कोटि मोक्षादि...

general

बनी वृषभानु नंदिनी आजु

भावार्थ -आज श्रीवृषभानु नन्दिनी कैसी सुंदर बनी हैं। उन्होंने अपने प्रियतम मोहन के लिये विविध भूषण वस्त्र सज्जित करके आपने श्रीवपु में धारण कर रखे हैं।...

general

निज प्राणेश्वरर्य्या यद्पि दयनीयेयमिति मां

मेरी प्राणेश्वरी की यह दया पात्र है, ऐसी जानकर अद्भुत गति शोल प्रियतम मेरा बार-बार चुम्बन करते हैं, और सुरत-मदिरा से मुझे उन्मद बना देते हैं। यदपि वे ...

general

हरि रसना राधा-राधा रट

भूमिका- इस पद में श्री श्यामसुंदर के उत्कट विरह का वर्णन है। सूरदास जी, नन्ददास जी आदि रसिक महानुभावों ने सर्वत्र श्री राम एवं गोपी जनों के विरह के वर...

general

यत्किंकरीषु बहुशः खलु काकुवाणी

निश्चय ही; जिनकी दासियों से परम-पुरुष शिखण्ड-मौली श्रीश्यामसुन्दर नित्य-निरन्तर कातर-वाणी द्वारा भूरी-भूरी प्रार्थना करते रहते हैं, क्या मैं कभी उन रस...

general

आजु निकुंज मंजु में खेलत

सुन्दर निकुंज मंदिर में नवल किशोर श्याम एवं नवल किशोरी श्री राधा रस क्रीड़ा संलग्न हैं। दोनों का पारस्परिक अनुराग भी अति अनुपम है। यह अनोखी जोड़ी भूतल...

general

अति उदार विवि सुंदर

श्री हित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि हे अति उदार और परम सुन्दर युगल किशोर, हे सुरत क्रीड़ा के शूरवीर सुकुमार युगल वर! आप दोनों दिन-रात (नित्य न...

general

केनापि नागरवरेण पदे निपत्य

हे श्री राधिके कोई चतुर-शिरोमणि किशोर आपके श्री चरणों में बारम्बार गिरकर आपसे परिरम्भण सुखोत्सव की याचना कर रहे हों और आप अपनी भ्रूलताओं को विभंगित कर...

general

चन्द्र मिटै दिनकर मिटै

चन्द्रमा नष्ट हो सकता है, सूर्य नष्ट हो सकता है, तीन प्रकार के भौतिक संसार (यानी नरक, स्वर्ग और पृथ्वी) भी नष्ट हो सकते हैं, किन्तु श्री हित हरिवंश म...

general

रसघन मोहन मूर्ति, विचित्रकेलि-महोत्सवोल्लसितम्

मैं उन रस-घन-मोहन-मूर्ति हरि (श्रीकृष्ण) की वन्दना करती हूँ जो विचित्र केलि-महोत्सव से उल्लसित हैं, जिनका मोर पंख इस समय श्री राधा चरणों में लुंठित हो...

general

न जानीते लोकं न च निगमजातं कुल-परं- परां

जो महानुभाव इस एकान्त देश में ब्रज-मणि श्रीकृष्ण और श्रीराधा के भाव और रस का निश्चय रूप से भजन करते हैं। अहो ! वे न तो लोक को जानना चाहते है, न निगम ...

general

यद्राधापदकिंकरीकृतहृदा

पवित्र श्री वृंदावन धाम केवल उन लोगों के लिए सुलभ है जो अपने ह्रदय में श्री राधा जी के चरण कमलों की सेवा का भाव रखते हैं। यह कभी भी उनके अनुग्रह के स्...

general

रसना कटौ जो अन रटौ निरखि अन फुटौ नैन

श्रीहितहरिवंश महाप्रभु की अनन्य निष्ठा श्रीराधा के प्रति इस वाणी में स्पष्ट रूप से प्रकट होती है। वे कहते हैं — मेरी जिह्वा कट जाए यदि यह श्रीराधा के ...

general

आजु प्रभात लता मंदिर में

मंगल प्रभात की वेला में हर्षोन्मादित युगल किशोर अलसाये हुए लटक लटक कर लता भवन की मंजुल भूमि पर मादक गति से चलते हैं। [1 & 2] वृन्दावन निकुञ धाम में स...

general

सुधाकरमुधाकरं प्रतिपदस्फुरन्माधुरी

जो सुधाकर (चन्द्र) को भी असत् कर दिखाने वाला है, जो पद-पद पर देदीप्यमान् माधुरी के श्रेष्ठतम् सार-रूप नवीन किरणों के समुद्र से पूरित है, जो श्रीहरि अत...

general

द्वादश चन्द्र, कृतस्थल मंगल

व्याख्याः - श्रीहित हरिवंश महाप्रभु कहते हैं कि जन्मकुंडली में चाहे बारहवें चन्द्रमा, चौथे मंगल, विरुद्ध बुद्ध, वृहस्पति वक्री, दशवें शुक्र, केतु और श...

general

अन्योन्यहास परिहास विलास केली वृन्दावने

अहो परस्पर हास-परिहास युक्त विलास केली क्रीड़ाओं की विचित्रता से प्रवृद्ध (उमड़े हुए) महारस के वैभव के साथ श्रीवृन्दावन में विहार करने वाले किसी (अनिर...

general

कदा मधुर सारिका: स्वरस पद्यमध्यापय

कभी मधुर - स्वरा सारिकाओं को निज रस सम्बन्धी पदों का अध्यापन कराते हुए, कभी ताली बजा-बजाकर मयूरों को नचाते हुए, तो कहीं कनक-लता से आवृत तमाल के लीला-...

general

सान्द्र प्रेम-रसौघ-वर्षिणि

हे घनीभूत प्रेम रस-प्रवाह-वर्षिणी ! हे नवीन विकसित महामाधुरी साम्राज्य की सर्व-श्रेष्ठ केलि-विभव - युक्त करुणा - कल्लोलिनि ! (सांरते !) हे श्रीवृन्दाव...

general

देखौ माई सुंदरता की सीवाँ

भावार्थ- श्रीहित सखी (श्री हित हरिवंश महाप्रभु) कहती हैं- हे सखियों ! सुन्दरता की सीमा (श्रीराधा) को तो देखो !जिस नागरी को देख कर समस्त व्रज की नव युव...

general

चलौ वृषभानु गोप के द्वार

वृषभानु गोप के द्वार पर चलो जहाँ सुकुमार आनन्द निधि स्वरूपा श्रीश्यामा ने मोहन के हित के लिए जन्म लिया है [1] जहाँ मुदित ब्रज युवतियाँ मिलकर उच्च औ...

general

हित हरिवंश विचारि कैं

श्री हित हरिवंश महाप्रभु विचार पूर्वक कहते हैं कि इस दुर्लभ मानव देह को पाकर रसिक-गुरु के चरणों की शरण ग्रहण करो। यदि संभव हो, तो संसार के समस्त प्रपं...

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सुन मेरो वचन छबीली राधा, तें पायो रस सिंधु अगाधा

हे छविमयी राधे ! तू मेरी बात सुन ! तूने रस का गम्भीर समुद्र पाया है। जिस श्रीकृष्ण (परम पुरुष भगवान) के रस (लीला, प्रभाव, गुण माहात्म्य आदि) के लिये ...

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सद्योगीन्द्र सुद्दश्य सान्द्र रसदानन्दक सन्मूर्तय

जिनका संग अद्भुत महिमा पूर्ण मधुर वृन्दावन से है, वे भले ही क्रूर पापी और सज्जनों के दर्शन सम्भाषण के अयोग्य व्यक्ति क्यों न हों किन्तु वे सभी लोग महा...

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यो ब्रह्म रुद्र शुक नारद भीष्म मुख्यै

जो परम पुरुष श्री कृष्ण ब्रह्मा, शंकर, शुकदेव, नारद और भीष्म जैसे प्रमुख भागवतों को भी सहसा अलक्षित नहीं होते, उन्ही श्री कृष्ण को तत्काल वश में करने...

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वृन्दानि सर्वमहतामपहाय दूराद्

ए मेरे मन तू समस्त महत वृन्दों (महापुरुषों) को दूर से ही छोड़कर प्रीति पूर्वक श्री वृन्दावन में जा, जहाँ श्री राधा नामक एक दिव्य निधि विराजमान है, जो...

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सत्प्रेम राशि सरसो विकसत्सरोजं

हे श्रीराधिके, आपका यह श्रीमुख पवित्र प्रेम-राशि-सरोवर का विकसित सरोज है अथवा आपके अपने जनों को आनन्द देने वाला अमृत है एवं रससिधु का विवर्द्धन करने व...

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जय श्री हित हरिवंश असीस देत मुख

“ जय श्री हित हरिवंश असीस देत मुख, चिरजीवो भूतल यह जोरि । ” - श्री हित हरिवंश महाप्रभु श्री हित हरिवंश महाप्रभु अपने मुख से आशीष देते हैं कि राधा कृ...

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राधा करावचित पल्लव वल्लरी के, राधा पदाङ्कविलसन्म मधुरस्थलीके

हे मेरे मन तू, श्री राधा करों द्वारा स्पर्श की हुई पल्लव वल्लरी, श्री राधा चरणों से सुशोभित मनोहर स्थली, श्री राधा यशोगान से मुखरित मत्त खगावली सेवित...

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यस्याः कदापि वसनाञ्चलखेलनोत्थ

किसी समय जिनके नीलाचल के हिलने से उठे हुए धन्यातिधन्य पवन को स्पर्श करके योगिन्द्रों के लिए अति दुर्गम गति मधुसूदन श्री कृष्ण ने भी अपने आपको कृतार्थ...

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अति नागरी वृषभानु किसोरी

श्री कृष्ण बोले - हे दूतिका! वृषभानु किशोरी अत्यंत चतुर हैं, जब वह चपल मृगलोचनि गोरी अपने मनोहर नेत्रों से अवलोकन करती हैं तो मानो उसी क्षण देखते ही च...

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(जै श्री) हित हरिवंश प्रताप रूप गुन वय बल स्याम उजागर

श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु) कहते हैं, मैं इतना ही कहूं -"श्रीश्याम सुन्दर तो प्रताप, रूप, गुण, आयु (वय) एवं बल सभी बातों में उजागर हैं -प्रगट है...

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नागरता की रासि किसोरी

भावार्थ- किशोरी राधिका सुन्दरता की राशि हैं। इन्होंने नव नागर समूह के भी सिरमौर श्याम सुन्दर को अपनी चितवन और ललितभाव से मुख मोड़ने की क्रिया से ही ...

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प्रीति की रीति रंगीलो ही जाने

प्रीति की रीति रंगीलो ही जाने, यदपि सकल लोक चूणामणि दीन अपन पो माने । - मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चतुरसी (41) प्रीति की रीति त...

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कालिन्दी-कूल-कल्प-द्रुम-तल निलय प्रोल्लसत्केलिकन्दा

जो कालिन्दी- कूल-वर्ती कल्पद्रुम तल-स्थित भवन में उल्लसित केलि-विलास की मूल स्वरूप हैं, जो श्री वृन्दावन में सदा-सर्वदा प्रकटतर रूप से विराजमान् हैं,...

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वृन्दावनेश्वरी तवैव पदारविन्दं

हे वृन्दावनेश्वरि आपके चरण-कमल एक मात्र प्रेमामृत-मकरन्द रस-राशि से परिपूर्ण हैं, जिन्हें हृदय में धारण करते ही मधुपति श्रीलालजी का तीक्ष्ण स्मरताप (...

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बनी श्रीराधा मोहन की जोरी

भावार्थ-अति अनुपम जोड़ी है श्री राधा मोहन की। मनोहर श्याम सुन्दर इन्द्र नील मणि की भाँति हैं। तो वृषभानु किशोरी श्रीराधा काञ्चन तनु हैं।लाल के विशाल भ...

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वेणु: करानञि पतित: स्खलितं शिखंडं

जिनके नयन बाणों की चोट से श्री ब्रजराज कुमार की मुरली हाथ से छूट गिरती है। सिर का मोर मुकुट खिसक चलता है और पीताम्बर भी स्थान च्युत हो जाता है, यहाँ त...

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कहा कहौं इन नैंननि की बात

भावार्थ - श्री लालजी अपनी प्रिय सखी हित सजनी से कहते है - सखी, मैं अपने इन नयनों की क्या बात कहूँ ? ये मेरे नयन भ्र्मर श्रीप्रिया मुख कमल के रस में अट...

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रहो दास्यं तस्याः किमपि वृषभानोरव्रर्ज्रवरी

यदि व्रज वरीयान वृषभानुराय की पूर्ण प्रेम रस मूर्ति पुत्री श्री राधा का हमें एकांत दास्य लाभ हो जाए तो फिर हमें धर्म से, देवता गणों से, ब्रह्मा और शं...

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राधा प्यारी तेरे नैंन सलोल

हित सखी (श्री हरिवंश महाप्रभु) भाव-विभोर होकर कहती हैं— हे प्यारी राधे! आज तुम्हारे नेत्र अत्यंत चंचल और मदमाते हैं। तुमने अपनी अनन्य प्रीति, अनुराग औ...

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वृन्दारण्य निकुंजसीमसु सदा स्वॉँग रंगोत्सवै

जो सर्वदा श्रीवृन्दावन निकुंज सीमा में अपने अंग रंगोस्तव के द्वारा माधव की अति अद्भुत अधर सुधा का आस्वादन करके उन्मत हो रही हैं, और जो गोविन्द के प्र...

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उपास्य चरणाम्बुजे व्रज-भ्रतां किशोरीगणे

हे ब्रज श्रेष्ठ किशोरी गणाराध्य चरणाम्बुजे श्री राधा (ब्रज की स्त्रियां जिनके चरणों का निरंतर पूजन करती हैं), हे नारदादि महत्पुरुषो से भी अचिन्त्य भाव...

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ब्रह्मेश्वरादिसुदुरूहपदारविन्द

मैं श्री राधा रानी का निरन्तर स्मरण करता रहता हूं जिनके सहयोग और चरणों की रज को प्राप्त करना महान व्यक्तित्वों ब्रह्मा, शिव,शुकदेव, नारद और भीष्म के ...

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देखौ माई सुंदरता की सीवाँ

हे सखि, सुंदरता की सीमा श्री राधा की ओर देखो।

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वैदग्ध्य सिन्धु अनुराग-रसैक सिंधु

कला विलास की सिंधु, अनुराग रस की एक मात्र सिंधु, अतिशय ममत्व एवं वात्सल्य की सिंधु, अत्यंत प्रगाढ़ कृपा की सिंधु , अत्यंत मोहिनी एवं लावण्य सिंधु, अमृ...

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रसना कटौ जो अन रटौ

श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी के शब्दों में: "मेरी जिह्वा कट जाए यदि मैं श्री राधा रानी के अलावा कुछ और रटूँ। मेरे नयन फूट जाएँ यदि मैं राधारानी के रूप...

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प्रथम जथामति प्रनऊँ श्री वृन्दावन अति रम्य

मैं सबसे प्रथम अतिरमणीय श्री वृन्दावन को प्रणाम एवं वर्णन करता हूँ, जो एकमात्र किशोरी श्री राधिका की कृपा के बिना सर्वथा अगम्य (प्रवेश न पा सकने योग्य...

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ब्रह्मेश्वरादि सुदुरूह पदारविन्द, श्रीमत्पराग परमाद्भुत वैभवाया

जिनके चरण कमल ब्रह्मा, शंकर आदि के लिए भी अत्यंत दुरूह हैं, जिन चरण कमलों का शोभामय पराग परम अद्बुध वैभवशाली है, एवं जिनकी कृपा दृष्टि मात्र से प्रेम ...

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न देवैर्ब्रह्माद्यैर्न खलु हरिभक्तैर्न सुहृदा

श्रीराधा-मधुसूदन का रहस्य न तो ब्रह्मादि देवताओं को ही विदित है न हरि-भक्तों को ही। और तो और श्यामसुन्दर के सखा आदिकों को भी वह सुविदित नहीं है किन्तु...

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दोऊ जन भीजत अटके बातन

भूमिका :- वर्षा विहार का वर्णन करने वाले इस पद में श्रीहिताचार्य ने श्रीश्यामा श्याम की परस्पर निरतिशय आसक्ति का प्रदर्शन बड़े सुंदर ढंग से किया है। स...

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यद्गोविन्द-कथा-सुधा-रस-हृदे

जो कुछ भी मैंने गोविन्द के कथा-सुधा-रस-सरोवर में अपने चित्त को डुबाया है अथवा उनके गुण-कीर्त्तन, चरणार्चन, विभूषणादि-विभूषित करने में दिन लगाये हैं कि...

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देखौ माई अबला के बल रासि

(श्री हित सजनी ने अपनी सखियों से कहा ) "हे माई ! देखो ! अबला ( श्रीराधा ) के बल राशि को तो देखो ! जिन श्रीराधा को देखते ही अत्यंत मतवाले एवं निरंकुश ग...

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यदि स्नेहाद्राधे दिशसि

हे राधे रति लाम्पट्य पदवी प्राप्त अपने प्रियतम के प्रति आप स्नेहवश मुझे सौंप देंगी तब भी मेरी निष्ठा क्या होगी, उसे सुनिए - "मैं मंद मंद मुस्कान के सा...

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करे कमलमद्भुतं

अद्भुत कमल को हाथों में घुमाते हुए, एवं परस्पर स्कन्धों पर पुलकित भुजलता अर्पित किये हुए, कामोन्मत्त, वृन्दावन-विहारी-रसिक युगल की सहास-रस-सुन्दर, शत-...

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सत्प्रेम सिन्धु मकरन्द रसौघ धारा

हे राधे, आपके चरण कमल, जो अपने आश्रित जनों पर सत्प्रेम (महाप्रेम) समुद्र के मकरंद रस की प्रबल धारा अनवरत रूप से चारों और से बरसाती रहती हैं, तथा जो गो...

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लावण्यामृतवार्त्तया जगदिदं संप्लावयंती

(अपने) रोचक एवं रसपूर्ण वार्तालाप से इस जगत को आप्लावित (सराबोर) करती हुई (एवं) मुखचन्द्र की चाँदनी से शरद ऋतु के अनन्त पूर्ण चन्द्रों का विस्तार करती...

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प्रेमोल्लासैकसीमा परम रसचमत्कार वैचित्र्य सीमा

प्रेमोल्लास की चरम सीमा, परम रस( प्रेम) चमत्कार विचित्रता की सीमा, सौन्दर्य्य की अंतिम सीमा, अनिर्वचनीय नवीन वय, रूप एवं लावण्य की सीमा; निजजनों के प्...

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अति नागरि वृषभानु किसोरी

भावार्थ - (श्रीलालजी ने कहा-) हे दूतिके !सुन; वृषभानु किशोरी अत्यन्त चतुर है, जब वह चपल मृगलोचनि गोरी अपने मनोहर नेत्रों से अवलोकन करती है तो मानो उसी...

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मन्दीकृत्य मुकुन्द सुन्दर पदद्वन्द्वारविन्दामल,

श्री कृष्ण के सुन्दर चरणों का अमल प्रेमानन्द देवी देवताओं और शिवजी आदि के लिये आनंद का ही मूल स्त्रोत है, किन्तु मेरा मन उसको भी शिथिल करके श्रीराधा-क...

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वृन्दारण्ये नव रस-कला-कोमल प्रेम-मूर्ति

कोमल-मूर्ति श्री राधा, जिनके चरणों में एक अद्भुत दिव्य रस बरसता है, जिनका पूर्ण, नित्य नवीन, किशोर स्वरुप एवं दिव्य प्रेम केवल श्री वृन्दावन धाम में न...

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रहौ कोऊ काहू मनहि दिये

प्रस्तुत पद में श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने श्री राधारानी के प्रति निष्ठा को शपथ खा कर व्यक्त किया है एवं श्री वृन्दावन धाम की उनकी एकमात्र निष्ठा को ...

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किं रे धूर्त्त-प्रवर निकटं यासि न: प्राण-सख्या

''क्यों रे धृर्त्त श्रेष्ठ ! हमारी प्राण-प्यारी सखी के निकट क्यों चला आता है ? दूर ही रह। तू नहीं जानता कि सुकुमारी बाला की कुच-तटी का स्पर्श करने मात...

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जाग्रत्स्वप्न सुषुप्तिषु स्फुरतु में राधापदाब्जच्छटा

श्रीराधा-केलि-कथा-सुधा-समुद्र की महान् लहरियों से आन्दोलित मेरा मन कालिन्दी- कूलवर्त्ती श्रेष्ठ लता मन्दिर के प्राङ्गण में ही आनन्द पाता रहे और जागृत,...

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प्रीति की रीति रँगीलोइ जानै

भावार्थ-प्रीति की रीति तो केवल रँगीले गीले (प्रेमी) श्रीलालजी ही जानते हैं, अन्य कोई नहीं; तभी तो वे समस्त लोकों के अधिनायक-सिर मौर होकर भी अपने आप को...

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करं ते पत्रार्लि किमपि कुचयो: कर्त्तुमुचितं

हे श्रीराधे ! मेरा ऐसा शुभ-दिन कब होगा, जब मैं आपके कुच-तटों पर अनिर्वचनीय पत्र-रचना करने के योग्य अपने हाथों को, कुञ्जों में प्रियतम के प्रति अभिसरण ...

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येषां प्रेक्षा वितरति नवोदार गाढ़ानुरागान्

जिन चरणार विन्दों की महिमा श्रीवृन्दा कानन में चमत्कृत हो रही है। जो रस के अद्भुत निधान हैं एवं नवीन और उदार अनुराग-पूर्ण मधुर-मधुरानन्द-मूर्ति घनश्या...

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ययोन्मीलत्केली विलसित कटाक्षैक कलया

जिन्होंने किञ्चित विकसित केली-विलास जन्य कटाक्षों की एक ही कला से श्रीवृंदावन के मदोन्मत्त गजराज किशोर (श्री लाल जी) को बंदी बना लिया और ऐसे बन्दी कि ...

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उच्छिष्टामृत भुक्तवैव चरितं श्रृण्वंस्तवैव स्मरन्

हे श्रीराधे! हे रसदे ! तुम्हारी ही उच्छिष्ट अमृत भोजन करने वाली मैं, तुम्हारे ही चरित्रों का श्रवण करती हुई, तुम्हारे ही कुञ्ज भवन में विचरण करती हुई,...

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क्वासौ राधा निगम पदवीदुरगा कुत्र चासौ कृष्णस्तस्याः कुचकमलयोरन्तरै कान्तवासः ।

कहाँ तो वैदिक मार्ग से दूर वे श्री राधा, कहाँ उनके कुच-कमलों के मध्य में एकान्त निवास करने वाले वे श्री कृष्ण और कहाँ मैं तुच्छ, परम अधम और निन्दनीय क...

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लुलित नव लवङ्गोदार कर्पूरपूरं

कपूर की शीतलता के कारण जिनके कपोलों पर पुलक का उदय हो रहा है और जो अनिर्वचनीय रूप से दासी-वत्सला हैं। ऐसी श्रीराधा प्रियतम श्रीकृष्ण के मुख-चन्द्र द्व...

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हौं बलि जाँउ नगरी श्याम

भावार्थ - श्री हित सजनी आशीर्वाद देती हैं - "हे नागरी ! (श्री राधा) हे श्री श्याम (श्री कृष्ण) मैं आप पर बलिहार जाऊं।(आप दोनों) वृंदावन की सुंदर कुंज ...

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बनी श्रीराधा मोहन की जोरी

अति अनुपम जोड़ी है श्रीराधा मोहन की। मनोहर श्याम सुन्दर इन्द्र नील मणि की भाँति हैं। तो वृषभानु किशोरी श्रीराधा काञ्चन तनु हैं। [1] लाल के विशाल भाल प...

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तन्नः प्रतिक्षण चमत्कृत चारूलीला

जिस आनन-कमल से प्रतिक्षण महामोहन माधुर्य्य के विविध अङ्गों की भङ्गिमा युक्त सुन्दर-सुन्दर लीलाओं का लावण्य चमत्कृत होता रहता है और जो माधुर्य्य के अङ्...

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अप्रेक्षे कृत निश्चयापि

यद्यपि [श्रीप्रियाजी ने प्रियतम की ओर] न देखने का निश्चय कर लिया है, फिर भी नेत्र-कोणों से [उनकी ओर] देर तक देखती ही रहती हैं। अहो ! [आश्चर्य है] मौन ...

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यस्याः स्फूर्जत्पदनखमणि ज्योति

जिनकी प्रकाशमान् पद-नख-मणि-ज्योति की एक छटा का विलास सघन प्रेमामृत-रस के कोटि-कोटि सिन्धुओं के समान है। वे श्रीराधा यदि कदाचित् मुझ पर कृपा-दृष्टि-पात...

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किवं वैकुण्ठ लक्ष्म्याप्यहह परमया यत्र में नास्ति राधा

"वैकुण्ठ" निवास के साथ हमारा क्या प्रयोजन एवं उद्देश्य है जहां महालक्ष्मी रहती है लेकिन श्री राधा नहीं?

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अहो तेमी कुञ्जास्तदनुपम रासस्थलमिदं

अहो ! बड़े आश्चर्य की बात है ! यह सब वही कुंजें ! वही अनुपम रासस्थल तथा रति-रङ्ग-प्रणयिनी गिरि ( गोवर्धन ) गुहाएँ हैं !! किन्तु हाय ! हाय !! बड़ा खेद ...

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प्यारे बोली भामिनी, आजु नीकी जामिनी

(श्री हित अली ने कहा-) हे भामिनि। (तुम्हें) प्यारे (श्रीकृष्ण) ने बुलाया है। (देखो) आज (कैसी) सुन्दर रात्रि है ? अतः आप नवीन मेघ रूप (श्रीलालजी) से ऐस...

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यन्नारदाजेश शुकैरगम्यं वृन्दावने

यहीं श्री वृंदावन में मनोहर वेतस्-कुञ्ज में नारद, ब्रह्मा, शिव, और शुकदेव आदि के द्वारा भी सर्वथा अगम्य, श्री कृष्ण के चित्त का हरण करने में एकमात्र ...

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मोहन लाल के रंग राँची

प्रस्तुत पद में सखि भावापन्न श्री हित हरिवंश जी कहते हैं कि मैं मोहन लाल के रंग में रँगी हुई हूँ।अथवा मोहन लाल जिस रंग में रँगे हैं उसी श्री श्यामा ज...

general

भोः श्रीदामन्सुबल वृषभस्तोक कृष्णार्जुनाद्याः

[श्यामसुन्दर ने कहा]"हे श्रीदाम, सुबल, वृषभ, स्तोक-कृष्ण, अर्जुन आदि सखाओ ! तुमने क्या देखा? मेरी चकित दृष्टि ने कुञ्ज में प्रवेश न करने पर भी जो देखा...

general

मानुष कौ तन पाइ भजौ ब्रजनाथ कौं

व्याख्याः - मनुष्य का शरीर पाकर ब्रजनाथ का भजन करो। [1] अरे मूढ़, तू कलछी के समान मनुष्य शरीर पाकर भी संसार की अग्नि में अपने हाथ को जला रहा है। [2] श...

general

किंवा नस्तैः सुशास्त्रैः किमथ

जिनमें प्रेम-मूर्ति श्रीराधा की महिमा-सुधा एवं उनके भाव का वर्णन नहीं है उन सुशास्त्र समूहों से अथवा उन शास्त्र-विहित, साधुजन, उनके द्वारा गृहीत मार्ग...

general

निकसि कुंज ठाडे भये

श्री हित हरिवंश महाप्रभु कहते हैं कि प्रिया-प्रीतम निकुञ्ज से बाहर निकलकर खड़े हुए हैं, और दोनों ने परस्पर एक-दूसरे के कंधों पर अपनी भुजाएँ रखी हुई हैं...

general

तनहिं राखि सत्संग में

अपने तन को सत्संग में रखो और मन को प्रेम-रस में डुबाओ। यदि वास्तविक सुख चाहते हो, तो श्रीकृष्ण रूपी कल्पतरु का सेवन करो।

general

श्री राधे श्रुतिभिर्बुधैर्भगवताप्यामृग्यसद्वैभवे

वेद, पण्डितगण तथा भगवान के द्वारा भी अन्वेषणीय (ढूँढ़े जाने योग्य) श्रेष्ठ वैभव वाली हे श्री राधे ! आपने अपनी कृपा के ही द्वारा पद्य रूप में अपने स्तोत...

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दिव्यप्रमोदरससारनिजांगसंग

अलौकिक आनन्द स्वरूप रस के सारभूत अपने श्रीअंगों के संगरूपी अमृत तरंगों के समूह से सींचकर, कोटि-कोटि कामदेवों के बाणों से व्यथित नन्दकुमार को संजीवित क...

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आजु देखि व्रज सुन्दरी मोहन बनी केलि

भावार्थ - (श्रीहित सजनी कहती हैं-) "सखियों! देखो आज ब्रज सुंदरी श्रीराधा और मोहन की क्रीड़ा (कैसी भली) बनी है। [1] रूप की राशि युगल किशोर परस्पर एक के...

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पादांगुलीनिहितदृष्टिमपत्रपिष्णुं

अपने प्रियतम रसिक-शेखर श्रीलाल जी के मुखचन्द्र मण्डल को दूर से ही देखकर जिन्होंने लज्जा से भरकर अपनी दृष्टि को अपने ही चरणों की अंगुलियों में निहित कर...

general

चिन्तामणिः प्रणमतां व्रजनागरीणां

जो प्रणाम मात्र करने वालों की चिन्तामणि (सम्पूर्ण चिन्तित पदार्थों को प्राप्त कराने वाली), ब्रज सुन्दरियों की शिरोमणि, श्रीवृषभानु के कुल की मणि (प्रक...

general

आजु नागरी किसोर, भाँवती विचित्र जोर

आज रस विदग्धा श्रीराधा एवं ललित नायक श्याम सुन्दर अनुपम छटा से शोभित हैं। अंग प्रत्यंग से प्रस्फुट रूप माधुर्य्य अवर्णनीय है। [1] सहचरि परिकर में अन...

general

उज्जागरं रसिकनागरसंगरंगैः

हे श्री राधे ! तुमने अपने प्रियतम रसिक नागर श्रीलालजी के संग कुञ्ज-भवन में आनंद-विहार करते हुए मोद में ही सम्पूर्ण रात्रि जागरण कर व्यतीत कर दी हो तब ...

general

तातैं भैया मेरी सौं कृष्ण-गुण संचु

श्री हित हरिवंश महाप्रभु कह रहें हैं "अरे मन्दमति! तुम व्यर्थ ही के घृणित वाद-विवाद में क्यों पड़े हो? दूसरों के साथ वाद-विवाद करने, पराये धन एवं पराई...

general

क्वाहं मूढ़मतिः क्व नाम

कहाँ मन्द बुद्धि मैं और कहाँ श्री राधा चरणों के प्रभाव की कथा द्वारा निश्चित रूप से (नाम) परमानन्द के एकमात्र सार रस को प्रवाहित करने वाली (मेरी) वाणी...

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तस्या अपार रस सार विलास

जो सभी रसों की सार हैं और जिनके रस विलास की सीमा की कोई कल्पना नहीं, जिनका मुख-कमल चंद्र की सुंदरता को लज्जित कर रहा है एवं जो मूर्तिमान मंगल स्वरूप ह...

general

राधे देखि वन की बात

प्यारी राधे ! श्रीवृन्दावन की छटा तो देखो ! बसंत ऋतु अनन्त पुष्प फल और पत्रों से मुकुलित है-खिली हुई है। [1] (ऐसे समय में) वेणु ध्वनि के द्वारा श्रीन...

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श्रीराधिके सुरतरंङ्गिणि दिव्यकेलि

हे दिव्यकेलि तरङ्गमाले ! हे शोभमान् वदनारविन्दे ! हे श्रीश्यामसुंदर-सुधा-सागर-सङ्गमार्थ तीव्र वेगवती ! हे रुचिर नाभिरूप गम्भीर भँवर से शोभायमान् सुरत-...

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राधा नाम सुधारसं रसयितुं जिद्वास्तु मे विह्वला

मेरी जिह्वा धीराधा-नामामृत-रस के आस्वादनार्थ सदा विह्वल (लालचवती) रही आवे। चरण श्रीराधा-पादाङ्कित वृन्दावन-वीथियों में ही विचरण करते रहें। दोनों हाथ उ...

general

दूरे सृष्ट्यादिवार्त्ता न कलयति

सृष्टि-रचना आदि की बात तो दूर रही अपने नारद आदि भक्तों को भी नहीं पहचानते, श्रीदामा आदि मित्रों से नहीं मिलते तथा अपने माता-पिता के स्नेह को भी बढ़ावा...

general

लावण्यं परमाद्भुतं रतिकला

जिनका लावण्य परमाद्भुत है, जिनकी रति-कला-चातुरी अति अद्भुत है, जिन श्रेष्ठ वपु की कोई अवर्णनीय कांति भी महा अद्भुत है, एवं जिनकी लीला पूर्ण गति भी अति...

general

लक्ष्म्या यश्च न गोचरीभवति यन्नापुः

लक्ष्मी को भी जिसका साक्षात्कार नहीं होता, जिसे श्रीदामा आदि सखागण भी प्राप्त नहीं कर सके, जो ब्रह्मा, नारद, शिव, सनकादि के द्वारा कल्पनीय नहीं है, ज...

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आधाय मूर्द्धनि यदापुरुदारगोप्यः

उदार गोपियों ने जिस चरण-धूलि को मस्तक पर चढ़ाकर मोरमुकुट वाले श्यामसुन्दर के लिए भी कामना करने योग्य पद (श्रीप्रियाजी के दास्यभाव की पदवी) को प्रिय गु...

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"हित हरिवंश अनत सचु नाँहि बिनु या रज ही लीजे ||"

रसिक संत हित हरिवंश महाप्रभु का कहना है कि ब्रज की इस रज के बिना कहीं और कोई आनंद नहीं है।

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मेरे प्राणनाथ श्रीश्यामा, सपथ करौं तिन छियें

मैं शपथ खा कर कहता हूँ कि मेरी प्राणनाथ, स्वामिनी श्री लाड़ली जू महाराज, श्री राधा ही हैं।

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दूरे स्निग्ध परम्परा विजयतां दूरे सुहन्मण्डली

जहां कुञ्ज-भवन के अभ्यन्तर भाग में परम-प्रेमी श्रीलालजी एवं श्रीवृषभानुनन्दिनीजू की रति-केलि होती रहती है, ब्रजपति श्रीलालजी के स्नेहीजनों की परम्परा ...

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रहो दास्यं तस्याः किमपि वृषभानोरव्रर्ज्रवरी

रहो दास्यं तस्याः किमपि वृषभानोरव्रर्ज्रवरी, यसः पुत्रयाः पूर्ण प्रणय रस मूर्ति यदि लभे | तदा नः किं धर्मै: किमु सुर गणै: किं च विधिना, किमीशेन श्याम ...

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जय श्री हित हरिवंश असीस देत मुख

श्री हित हरिवंश महाप्रभु अपने मुख से आशीष देते हैं कि राधा कृष्ण की यह जोड़ी श्री वृन्दावन धाम में क्रीड़ा करती हुई चिरजीवी रहे।

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प्रीति की रीति रंगीलो ही जाने

प्रीति की रीति तो केवल श्याम सुंदर ही जानते हैं। समस्त ब्रह्मांडों के चूड़ामणि होते हुए भी अपने को सबसे दीन मानते हैं।

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ब्रह्मेश्वरादि सुदुरूह पदारविन्द, श्रीमत्पराग परमाद्भुत वैभवाया

ब्रह्मेश्वरादि सुदुरूह पदारविन्द, श्रीमत्पराग परमाद्भुत वैभवायाः | सर्वार्थ साररस वर्षि कृपार्द्रदृष्टे, तस्या नमोऽस्तु वृषभानुभुवो महिम्ने | | - श्री...

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अनुल्लिख्यानन्तानपि सदपराधान्मधुपति

अनुल्लिख्यानन्तानपि सदपराधान्मधुपति - महाप्रेमाविष्टस्तव परमदेयं विमृशति  | तवैकं श्रीराधे गृणत इह नामामृत रतं, महिम्नः कः सीमां स्पृशति तव दास्यैक मन...

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नयौ नेह नव रंग नयौ रस

आज नवल श्याम और नवल वृषभानु किशोरी में (परस्पर) नवीन स्नेह, नवीन आनन्द एवं नया ही रस भर रहा है। यहाँ श्याम सुन्दर का नया पीत पट है तो वहाँ वृषभानु किश...

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दिव्यप्रमोदरससारनिजांगसंग

अलौकिक आनन्द स्वरूप रस के सारभूत अपने श्रीअंगों के संगरूपी अमृत तरंगों के समूह से सींचकर, कोटि-कोटि कामदेवों के बाणों से व्यथित नन्दकुमार को संजीवित क...

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चन्द्र मिटै दिनकर मिटै

चन्द्रमा नष्ट हो सकता है, सूर्य नष्ट हो सकता है, तीन प्रकार के भौतिक संसार (यानी नरक, स्वर्ग और पृथ्वी) भी नष्ट हो सकते हैं, किन्तु श्री हित हरिवंश मह...

general

ब्रह्मानन्दैकवादा: कतिचन्

कोई ब्रह्मानन्द वादी हैं, तो कोई भगवद्वन्दना ( दास्य-भाव ) में ही उन्मत्त हैं। कुछ लोग गोविन्द के सख्यादि (मैत्त्रि भाव) को ही परमानन्द मानकर उसके आस्...

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वन की लीला लालहिं भावै

श्रीलालजी को वन की लीला बड़ी प्यारी लगती है, तभी तो उन्हें वहाँ के फूल पत्तों पर पड़े हुए प्रति बिम्बों में भी नख सिख प्रिया रूप ही ज्ञात होता रहता है...

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यस्यास्तत्सुकुमार सुन्दर पदोन्मीलन्नखेन्दुच्छटा

शुद्ध प्रेम-विलास मूर्तिरधिकोन्मीलन्महा माधुरी, धारा-सार-धुरीण-केलि-विभवा सा राधिका मे गतिः || - मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री राधा सुधा...

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सत्प्रेम सिन्धु मकरन्द रसौघ धारा

सत्प्रेम सिन्धु मकरन्द रसौघ धारा, सारानजस्रमभितः स्रवदाश्रितेषु || श्रीराधिके तव कदा चरणारविन्दं , गोविन्द जीवनधनं शिरसा वहामि || - मुरली अवतार श्री ह...

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उपास्य चरणाम्बुजे व्रज

उपास्य चरणाम्बुजे व्रज-भ्रतां किशोरीगणे, मंहदिभरपी पुरुषै परिभाव्य भावोत्सवे  || अगाध रस धामनि स्वपद-पद्म सेवा विधौ, विधेहि मधूरोज्जवलामिव-कृतिं ममाधी...

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अति उदार विवि सुंदर

श्री हित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं कि हे अति उदार और परम सुन्दर युगल किशोर, हे सुरत क्रीड़ा के शूरवीर सुकुमार युगल वर! आप दोनों दिन-रात (नित्य न...

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उन्मीलनमुकुटच्छटा परिल सच्छिकच्रकवालं स्फुरत

उन्मीलनमुकुटच्छटा परिल सच्छिकच्रकवालं स्फुरत, केयूराँग दहार कंकणघटा निर्धूत रत्नच्छवि । श्रोणी-मण्डल किंकणी कलरवं मञ्जीर-मञ्जुध्वनिं, श्री मतपादसरोरुह...

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किं रे धूर्त्त

किं रे धूर्त्त-प्रवर निकटं यासि न: प्राण-सख्या, नुनंवाला कुच-तट-कर-स्पर्श मात्राद्विमुह्ययेत । इत्थं राधे पथि-पथि रसात्रागरं तेनुलग्नं, क्षीपत्वा भङ्ग...

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जाग्रत्स्वप्न सुषुप्तिषु स्फुरतु में राधापदाब्जच्छटा

श्रीराधा-केलि-कथा-सुधा-समुद्र की महान् लहरियों से आन्दोलित मेरा मन कालिन्दी- कूलवर्त्ती श्रेष्ठ लता मन्दिर के प्राङ्गण में ही आनन्द पाता रहे और जागृत,...

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रसना कटौ जो अन रटौ निरखि अन फुटौ नैन

श्री हित हरिवंश महाप्रभु, जो श्री राधारानी की भक्ति के अनन्य उपासक हैं, उनकी अनन्यता किशोरीजी के प्रति उनके इस पद में वर्णित है। श्री हित हरिवंश महाप्...

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कर्मणि श्रुति बोधितानि नितरां कुर्वन्तु कुर्वन्तु मा, गूढाष्चर्य रसाः स्रगादि विषयान्गृह्णन्तु मुञ्चन्तु वा

कर्मणि श्रुति बोधितानि नितरां कुर्वन्तु कुर्वन्तु मा, गूढाष्चर्य रसाः स्रगादि विषयान्गृह्णन्तु मुञ्चन्तु वा। कैव भाव-रहस्य पारग-मतिः श्रीराधिका प्रेयस...

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काहे कौं मान बढ़ावतु है

मानवती श्रीराधा के मान मोचन के लिये उनको विदग्धता पूर्वक समझाती हुई श्री हित सजनी कहती हैं “हे मृगछौना जैसे भोले एवं रसीले नेत्र वाली (श्रीप्रिया) मान...

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जोई जोई प्यारो करे सोई मोहि भावे

श्री हित चौरासी जी के इस प्रथम पद में श्री राधा, श्याम सुन्दर के हृदय और नेत्रों में विराजमान परस्पर अद्बुध प्रेम का संक्षिप्त एवं अत्यंत मार्मिक वर्ण...

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राधा करावचित पल्लव वल्लरी के, राधा पदाङ्कविलसन्म मधुरस्थलीके

“ राधा करावचित पल्लव वल्लरी के, राधा पदाङ्कविलसन्म मधुरस्थलीके | राधा यशोमुखरमत्त खगावली के, राधा विहारविपिने रमतां मनो मे || ” - श्री हित हरिवंश महाप...

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सद्योगीन्द्र सुद्दश्य सान्द्र रसदानन्दक सन्मूर्तय

जिनका संग अद्भुत महिमा पूर्ण मधुर वृन्दावन से है, वे भले ही क्रूर पापी और सज्जनों के दर्शन सम्भाषण के अयोग्य व्यक्ति क्यों न हों किन्तु वे सभी लोग महा...

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प्रथम जथामति प्रनऊँ श्री वृन्दावन अति रम्य

मैं सबसे प्रथम अतिरमणीय श्री वृन्दावन को प्रणाम एवं वर्णन करता हूँ, जो एकमात्र किशोरी श्री राधिका की कृपा के बिना सर्वथा अगम्य (प्रवेश न पा सकने योग्य...

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यत्र

यत्र-यत्र मम जन्म कर्मभिर्नारकेऽथ परमे पदेऽथवा। राधिका-रति-निकुञ्ज-मण्डली तत्र-तत्र हृदि मे विराजताम् ॥ - मुरली अवतार श्री हित हरिवंश महाप्रभु - श्री ...

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यद् वृन्दावन मात्र गोचरमहो यन्न श्रुतीकं शिरो

प्यारोढूं क्षमते न यच्छिव शुकादीनां तु यद् ध्यानगम्। यत्प्रेमामृत माधुरी रसमयं यन्नित्य कैशोरकं, तद्रूपं परिवेष्टुमेव नयनं लोलायमानं मम ॥ - मुरली अवता...

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मन्दीकृत्य मुकुन्द सुन्दर पदद्वन्द्वारविन्दामल,

मन्दीकृत्य मुकुन्द सुन्दर पदद्वन्द्वारविन्दामल, प्रेमानन्दममन्दमिन्दु-तिलकाद्युन्माद कन्दं परम्  || राधा-केलि-कथा-रसाम्बुधि चलद्वीचीभिरान्दोलितं, वृन्...

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हित हरिवंश विचारि कैं

श्री हित हरिवंश महाप्रभु उपदेश देते हैं कि इस नश्वर मानव शरीर को व्यर्थ न जाने दो—इसे सार्थक बनाओ रसिक गुरु के चरणों की शरण लेकर। यदि संभव हो तो समस्त...

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अति नागरी वृषभानु किसोरी

श्री कृष्ण बोले - हे दूतिका! वृषभानु किशोरी अत्यंत चतुर हैं, जब वह चपल मृगलोचनि गोरी अपने मनोहर नेत्रों से अवलोकन करती हैं तो मानो उसी क्षण देखते ही च...

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रसना कटौ जो अन रटौ

श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी के शब्दों में: "मेरी जिह्वा कट जाए यदि मैं श्री राधा रानी के अलावा कुछ और रटूँ। मेरे नयन फूट जाएँ यदि मैं राधारानी के रूप ...

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रहौ कोऊ काहू मनहि दिये

प्रस्तुत पद में श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने श्री राधारानी के प्रति निष्ठा को शपथ खा कर व्यक्त किया है एवं श्री वृन्दावन धाम की उनकी एकमात्र निष्ठा को ...

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यो ब्रह्म रुद्र शुक नारद भीष्म मुख्यै

यो ब्रह्म रुद्र शुक नारद भीष्म मुख्यै, रालक्षितो न सहसा परुुषस्य तस्य  | सद्यो वशीकरण चूर्ण मन्त्र शक्तिं, तं राधिका चरण रेणुमनुस्मरामि  | | - श्री हि...

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सुनि मेरो वचन छबीली राधा, तैं पायो रस सिंधु अगाधा

(राग आसावरी) सुनि मेरो वचन छबीली राधा, तैं पायो रस सिंधु अगाधा ।। तूँ वृषभानु गोप की बेटी, मोहनलाल रसिक हँसि भेंटी । जाहि बिरंचि उमापति नाये, तापै तैं...

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प्रीति की रीति रँगीलोइ जानै

भावार्थ-प्रीति की रीति तो केवल रँगीले गीले (प्रेमी) श्रीलालजी ही जानते हैं, अन्य कोई नहीं; तभी तो वे समस्त लोकों के अधिनायक-सिर मौर होकर भी अपने आप को...

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कालिन्दी

कालिन्दी-कूल-कल्प-द्रुम-तल निलय प्रोल्लसत्केलिकन्दा, वृंदातव्यं सदैव प्रकटतर रहो बल्लवी भाव भयो | भक्तानां हृतसरोजे मधुर रस-सुधा-स्यंदि पादारविन्दा, स...

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वेणु: करानञि पतित: स्खलितं शिखंडं

जिनके नयन बाणों की चोट से श्री ब्रजराज कुमार की मुरली हाथ से छूट गिरती है। सिर का मोर मुकुट खिसक चलता है और पीताम्बर भी स्थान च्युत हो जाता है, यहाँ त...

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वृन्दावनेश्वरी तवैव पदारविन्दं

वृन्दावनेश्वरी तवैव पदारविन्दं, प्रेमामृत मकरंद रसौघपूर्णम्  | हृदय पतं मधुपतेः स्मरतापमुग्रं,निर्वापयत्परमशीतलमाश्रयामि  | | - मुरली अवतार श्री हित ह...

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वैदग्ध्य सिन्धु अनुराग

“ वैदग्ध्य सिन्धु अनुराग-रसैक सिंधु, वात्सल्य सिंधु, अतिसान्ध्र कृपैक सिंधु || लावण्य सिन्दु अमृतछवि रूप सिंधु, श्री राधिका स्फुरतु मे हृदय केलि सिंधु...

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उज्जृम्भमाणरस

जिनके नेत्र प्रणय-रस से चञ्चल हो रहे हैं और जिनके अङ्ग उत्फुल्लमान् रस-सागर की तरङ्गों के समान हैं, उन श्रीवृन्दाटवी नव- निकुञ्ज भवन की अधिष्ठात्री दे...

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तू बालक नहिं

तू बालक नहीं है और चतुरता से भरा हुआ है तो श्रीकृष्ण को भली प्रकार क्यों नही भजता? [1] तू गाय के सुमधुर दूध को छोड़कर चावल के फीके पानी में अपने मन को...

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यत्पादपद्मनखचन्द्रमणिच्छटाया

जिनके पाद-पद्म-नख रूप चन्द्रमणि की किसी अनिर्वचनीय छटा का प्रकाश गोप-वधुओं में देखा जाता है, वही परिपूर्ण अनुराग-रस-समुद्र की सार-मूर्त्ति श्रीराधिका ...

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प्रात समै दोऊ रस लंपट

भावार्थ - प्रातः काल दोनों रस लम्पट सुरत-युद्ध में विजय एवं प्रसन्नता पूर्वक संलग्न हैं। [1] मुख पर श्रम वारि (प्रस्वेद) की सघन बूँदें शुभ्र मौक्तिक ज...

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अति ही अरुन तेरे नयन नलिन री

भावार्थ - अरी सखि ! आज तुम्हारे नयन कमल बड़े अरुणिम हैं। [1] रात्रि भर विलास एवं जागरण के चाव से अत्यन्त आलस्य युक्त हो रहे हैं। मिलन के गौरव से गर्वि...

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क्षरन्तीव प्रत्यक्षरमनुपम

अहा ! जिसके अक्षर-अक्षर से अनुपम प्रेम-जलधि निर्झरित हो रहा है ! जो कर्ण-पुटों में मानों अमृत-धारा-वृष्टि विधान करता है, एवं जो रस से सिक्त, परम कोमल,...

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अलिन्दे कालिन्दनी- तट नवलता-मन्दिरवरे

अहा ! कालिन्दी कुल वर्ती नव-लता-मन्दिर-गत-प्राङ्गण में रति-केलि-मर्दन से उद्भूत (प्रकट हुए) श्रम-जल-प्रवाह से परिपूरित शरीर और सुख-स्पर्श से आमिलित ( ...

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यस्याः कदापि वसनाञ्चलखेलनोत्थ

“ यस्याः कदापि वसनाञ्चलखेलनोत्थ, धन्यातिधन्यपवनेन कृतार्थमानी | योगीन्द्रदुर्गमगतिर्मधुसूदनोऽपि, तस्या नमोऽस्तु वृषभानुभुवो दिशेऽपि || (1) ” - श्री हि...

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आज नीकी बनी श्रीराधिका नागरी

भावार्थ- “हे सखि ! आज नागरी राधिका बड़ी नीकी (सुन्दर) बनी हैं। वे समस्त ब्रज युवती समूह में रूप, चातुर्य शील श्रृंगार एव गुण सभी बातो में सबसे बढ़ी-चढ़...

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केनापि नागरवरेण पदे निपत्य

केनापि नागरवरेण पदे निपत्य, संप्राथितैक परिरम्भ रसोत्सवायाः | सभ्रूविभङ्गम अतिरंग निधेः कदा ते, श्रीराधिके नहिनहीति गिरः शृणोमि || - मुरली अवतार श्री ...

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वृन्दारण्ये नव रस

वृन्दारण्ये नव रस-कला-कोमल प्रेम-मूर्ति:, श्रीराधायाश्चरण-कमलामोद - माधुर्य्य - सीमा । राधा ध्यायन् रसिक-तिलकेनात्त केली-विलासां, तामेवाहं कथमिह तनुं ...

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प्रेमोल्लासैकसीमा परम रसचमत्कार वैचित्र्य सीमा

प्रेमोल्लासैकसीमा परम रसचमत्कार वैचित्र्य सीमा, सौन्दर्य्यस्यैक-सीमा किमपि नव-वयो-रूप-लावण्य सीमा । लीला-माधुर्य्य सीमा निजजन परमोदार वात्सल्य सीमा, स...

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अति नागरि वृषभानु किसोरी

(राग सारंग) अति नागरि वृषभानु किसोरी। सुनि दूतिका चपल मृगनैंनी, आकरषत चितवत चित गोरी।। श्रीफ़ल उरज कंचन सी देही, कटि केहरि गुन सिंधु झकोरी। बैंनी भुजंग...

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(जै श्री) हित हरिवंश प्रताप रूप गुन वय बल स्याम उजागर

श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु) कहते हैं, मैं इतना ही कहूं -"श्रीश्याम सुन्दर तो प्रताप, रूप, गुण, आयु (वय) एवं बल सभी बातों में उजागर हैं -प्रगट हैं...

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सत्प्रेम राशि सरसो विकसत्सरोजं

सत्प्रेम राशि सरसो विकसत्सरोजं, स्वानन्द सीधु रससिन्धु विवर्धनेन्दुम् | तच्छ्री मुखं कुटिल कुन्तल भृङ्ग जुष्टं, श्री राधिके तव कदा नु विलोकयिष्ये || -...

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वृन्दारण्य निकुंजसीमसु सदा स्वॉँग रंगोत्सवै

जो सर्वदा श्रीवृन्दावन निकुंज सीमा में अपने अंग रंगोस्तव के द्वारा माधव की अति अद्भुत अधर सुधा का आस्वादन करके उन्मत हो रही हैं, और जो गोविन्द के प्रि...

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नागरता की रासि किसोरी

भावार्थ- किशोरी राधिका सुन्दरता की राशि हैं। इन्होंने नव नागर समूह के भी सिरमौर श्याम सुन्दर को अपनी चितवन और ललितभाव से मुख मोड़ने की क्रिया से ही वश...

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धर्माद्यर्थ चतुष्टयं विजयतं किं तदवृथा वार्त्तया

धर्माद्यर्थ चतुष्टयं विजयतं किं तदवृथा वार्त्तया, सैकान्तेश्वर भक्तियोग पदवी त्वारोपिता मूर्द्धनि । यो वृन्दावन सीम्नि कञ्चन घनाश्चयःर्य किशोरीमणि- स्...

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श्री राधे श्रुतिभिर्बुधैर्भगवताप्यामृग्यसद्वैभवे

वेद, पण्डितगण तथा भगवान के द्वारा भी अन्वेषणीय (ढूँढ़े जाने योग्य) श्रेष्ठ वैभव वाली हे श्री राधे ! आपने अपनी कृपा के ही द्वारा पद्य रूप में अपने स्तोत...

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कहा कहौं इन नैंननि की बात

भावार्थ - श्री लालजी अपनी प्रिय सखी हित सजनी से कहते है - सखी, मैं अपने इन नयनों की क्या बात कहूँ ? ये मेरे नयन भ्र्मर श्रीप्रिया मुख कमल के रस में अट...

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बनी श्रीराधा मोहन की जोरी

भावार्थ-अति अनुपम जोड़ी है श्री राधा मोहन की। मनोहर श्याम सुन्दर इन्द्र नील मणि की भाँति हैं। तो वृषभानु किशोरी श्रीराधा काञ्चन तनु हैं।लाल के विशाल भ...

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सबसौं हित निहकाम, मन वृन्दावन विश्राम, राधावल्लभलाल कौ, हृदय ध्यान, मुख नाम

श्री हित हरिवंश जी कहते हैं कि आत्मा का सच्चा लाभ यह है कि, "आत्मा के साथ निस्वार्थ सेवा करते हुए हमेशा बृज वृंदावन में रहो, श्री राधावल्लभ लाल की छवि...

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हित हरिवंश प्रपंच बंच सब काल व्याल कौ खायौ

श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद कहते हैं यह विश्व प्रपञ्च एक दम झूठा है – असत् है और काल सर्प से ग्रसित है ( अर्थात् अवश्य विनाशी है , ) ऐसा अपने हृ...

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दूराद्पास्य स्वजनान् सुखमर्थकोटि

“ दूराद्पास्य स्वजनान् सुखमर्थकोटिं, सर्वेषु साधनवरेषु चिरं निराशः | वर्षन्तमेव सहजाद्भुत सौख्य धारां, श्रीराधिका चरणरेणु महं स्मरामि ” || - श्री हित ...

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आजु निकुंज मंजु में खेलत

सुन्दर निकुंज मंदिर में नवल किशोर श्याम एवं नवल किशोरी श्री राधा रस क्रीड़ा संलग्न हैं। दोनों का पारस्परिक अनुराग भी अति अनुपम है। यह अनोखी जोड़ी भूतल ...

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Lakshmya Yasch Na Gocharibhavati Yannapuh

Lakshmya Yasch Na Gocharibhavati Yannapuh Sakhayah Prabhoh. Sambhavyopi Viranchinaradashivswayambhuvadyairn Yah.Yo Vrindavannagaripashupatistribhavala...

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Radha Pyari Tere Nain Salol

(Raag Dhanashri)Radha Pyari Tere Nain Salol. Tain Niju Bhajan Kanak Tan Jovan, Liyau Manohar Mol. [1] Adhar Nirang Alak Lat Chhuti, Ranjit Pik Kapol. ...

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Yasyah Sphurjatpadanakhamani Jyoti

Yasyah Sphurjatpadanakhamani Jyotirekachchatayah Sandra Premamrritarasa Mahasindhu Kotivilasah. Sa Chedradha Rachayati Krripa Drrishtipatam Kadachin, ...

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Bainu Mai Baaje Bansivat

(Raag Gauri)Bainu Maai Baajai Bansivat.Sada Basant Rahat Vrindavan Pulin Pavitra Subhag Yamuna Tat. [1]Jatit Kreet Makarakrit Kundal Mukhaarvind Bhanv...

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Yasyah Sphurjatpadanakhamani Jyoti

Yatpadamburuhek Renu-kanikan Mudhrna Nidhatun Na Hi Prapurabrahm Shivadayopyadhikrtin Gopyaik Bhavashrayah.Sapi Premasudha Rasambudhinidhi Radhapi Sad...