सन्तग्रन्थरागश्लोकस्तोत्रकविता
मुख्यपृष्ठग्रन्थसिद्धान्त की साखी
सभी ग्रन्थ
Sacred Scripture

सिद्धान्त की साखी

ग्रन्थ के पद एवं श्लोक

136 items
general

देखै तौ निजु केली कौं

चतुर-चूड़ामणि रसिकों की आसक्ति केवल युगल की निज केली में ही रहती है, जैसे मछली की आसक्ति पानी में होती है।

general

जामैं मरैं न बीछुरैं

श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि सर्वोपरि नित्य-विहारिणी हमारी श्री स्वामिनीजू न तो कभी प्रकट होती हैं, न कभी अन्तर्धान होती हैं, न कभी रूठती हैं और न ...

general

निहचै भजै बिहार कों

अपने तन, मन और सर्वस्व को रसिक गुरु को अर्पण करके, निर्भय होकर नित्य-विहार का ऐसी दृढ़ अनन्यता से भजन करो कि स्वप्न में भी किसी अन्य देवता का परिचय न ...

general

जब प्रिया मानैं अपनपौ

जिसे श्री नित्य-विहारिणी जू (श्री राधा) अपना स्वीकार कर लेती हैं, श्री लाल जू (श्री कृष्ण) सदैव उसी के अधीन रहते हैं। वह जीव निरंतर सुखपूर्वक विहार क...

general

प्रेम-सार सुख-सार है

(प्रेम-धाम श्रीवृन्दावन में) निरन्तर चलता रहने वाला यह नित्य-विहार प्रेम का सार है, सुख का सार है, रूप-सौन्दर्य का सार है और रस का भी सार है। यही नित...

general

जब जागै तब प्रिया भजे

जब तक साधक जागता रहे, तब तक उसे चाहिए कि वह डटकर प्राणप्यारी श्री किशोरी जी का भजन करे; और जब नींद आए, तब पैर फैलाकर (समस्त चिंताओं से मुक्त होकर) सो ...

general

प्राप्ति में संसै नहीं

तन, मन और वाणी से हमारा यह अटूट संकल्प है कि हम कुंज-बिहारिणी श्री लाड़िली जू (श्री राधा) को निश्चित ही प्राप्त करेंगे।

general

श्रुति स्मृति बिचारत तत्व सब

जिस अद्भुत रस-तत्त्व का श्रुति और स्मृतियाँ निरन्तर विचार करती रहती हैं, परन्तु जिसका पार नहीं पा सकीं—उस सर्वोपरि नित्य-विहार को जगत में ललिता अवतार ...

general

लड़ैती कहै लड़ैतीय कहावै

हम सदा काल लड़ैतीजू [श्री राधा] का ही नाम-गुण गाते हैं और अन्य जनों से भी श्री राधा का ही नाम-गुण गवाते हैं। हमारे मन को एकमात्र श्री लाड़ली जू ही भा...

general

श्री बिहारी दास जल जंतु ज्यौं

श्री बिहारिनदास जी कहते हैं कि जैसे जल के बिना मछली अपने प्राण त्याग देती है, उसी प्रकार श्री श्यामा-श्याम का नित्य-विहार ही मेरे जीवन के प्राण हैं; ...

general

प्रिय हमरे अंतर रहै

हमारा श्री राधा जू से ऐसा घनिष्ठ संबंध है कि वे हमारे तन, मन और प्राण सहित हमारे रोम-रोम में समाई हुई हैं; और हम भी उनके भीतर ही समाए हुए हैं तथा उनके...

general

श्री स्वामी हरिदास की, सरि नहिं दूजो कोई

ललिता-अवतार श्री स्वामी हरिदास जी महाराज के समान कोई नहीं है; इसका कारण यह है कि वे जिसे अपना बना लेते हैं, उसे अपने समान अधिकार दे देते हैं अर्थात् व...

general

ते अनन्य निजु जान

वास्तव में वही श्री स्वामी हरिदास जी महाराज के अनन्य निज-जन हैं, जिनका हृदय श्यामा-श्याम की अद्भुत निकुंज-रस-माधुरी के अतिरिक्त और कुछ स्पर्श नहीं करत...

general

बिगरी लेहि सँवारि कै

नित्य निकुञ्जेश्वरी श्री श्यामा प्यारी का यह स्वभाव है कि वे अपने आश्रित जनों की बिगड़ी हुई बात को भी सुधारकर उसे स्वीकार कर लेती हैं। अपने जनों का इस...

general

श्रीबिहारीदास संतोष गहि, बैठयौ सिखर सुमेरु

मैंने समस्त परमार्थ-संबंधी साधनाओं एवं संबंधों से अपने मन में भली भाँति संतोष करके ही श्री स्वामीजी (ललिता अवतार श्री हरिदास) महाराज की सुमेरु-शिखर की...

general

भूल छुड़ावो लाड़िली, समझ देउ भर-पूरि

हे लाड़िली! मेरी समस्त भूलों और अज्ञानता को दूर कर मुझे पूर्ण विवेक प्रदान कीजिए। हे मेरी प्राण-रसायन श्री किशोरीजी, यह कार्य केवल आपके ही हाथ में है ...

general

झूठो है संसार यह, झूठी है यह देह

यह संसार असत्य है और यह शरीर भी सदा साथ नहीं रहता। यदि तुम सच्चे सुख की चाह रखते हो, तो सांसारिक सुखों और जीवों से अपना स्नेह हटाकर श्री बिहारी-बिहारि...

general

कोटि भजन एकादसी

चाहे कोई करोड़ों बार एकादशी का व्रत और भजन कर ले, या करोड़ों तीर्थों में स्नान कर ले, परंतु यदि वह किसी संत (भक्त) का दिल दुखाता है, तो श्री हरि उसकी ...

general

श्रीराधे राधे जो जन कहै

जो जन सच्चे मन से सर्वोपरि नित्यविहारिनी जू के ‘श्री राधे-राधे’ नाम का ही नित्य रटन करते हैं, वही श्री निकुञ्ज-मन्दिर के सर्वोपरि विहार के प्रेम-रस क...

general

श्री बिहारी दास विहार कौं

नित्य-विहार रूपी यह दुर्लभ रस ऐसा है कि इसके लिए साक्षात भगवान विष्णु भी तरसते हैं। जीव यहाँ पितरों और देवताओं की भक्ति में लगे रहते हैं, जबकि निकुञ्...

general

नैना निरखैं रूप कों

मेरे नैना नित्य ही युगल-रूप का पान करें, और जीभ नित्य ही उनके निज-नाम का रटन करे। जहाँ श्री राधा-कृष्ण के अंग नित्य परस्पर मिले रहते हैं—अर्थात् युगल-...

general

देस विदेश भिखारिया

भिखारी की भाँति विषयों के लिए देश-विदेश भटकने से भीखरूपी दुःख ही प्राप्त होगा और श्री वृन्दावन की रज का सेवन किए बिना बैकुण्ठ की प्राप्ति भी दुःख देने...

general

राग-द्वेष हमरे नहीं

किसी से राग या द्वेष करना हमारा धर्म नहीं है, और न ही देह का अभिमान करना यहाँ की रीति है। यहाँ तो बस भाव के साथ सदा प्रियाजी (श्री राधा) से मिले रहो।...

general

कोऊ गोबर पाथनी, कोऊ ढोवै पाई

श्री स्वामिनी जू के विविध स्वरूपों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि किसी ने उन्हें साधारण गोबर थापने वाली गोपी के रूप में देखा, किसी ने जल-ढोने वाली क...

general

तन छूटै तो परम सुख, रहै तो भजन अपार

जिन साधकों ने श्री कुंजबिहारिनी लाड़िली जू श्री राधा को अपने जीवन और प्राणों का आधार बना लिया है, उनके लिए देह-त्याग परम आनंद का कारण बनता है; और जब त...

general

मन मनसा आसा मगन, तन की कछु न सम्हार

श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि यद्यपि हम मुख से नाम का उच्चारण नहीं करते, तथापि श्री बिहारी-बिहारिनी जू के उस दिव्य नित्य-विहार का निरंतर ऐसा चिंतन औ...

general

माला जनेऊ घालि गरै

कुछ लोग गले में कंठी और जनेऊ धारण कर अपने को उच्च कुल का बताकर परिचय देते हैं, किंतु उनकी वृत्ति और कृत्य से ही स्पष्ट हो जाता है कि वे वास्तव में किस...

general

रहनी कहनी एक सी, जयौं की त्यौं जो होइ

जिन साधकों की रहनी और कहनी एक समान होती है, वे बड़भागी जन चाहे जागें या सोएँ, उन्हें परम वस्तु (प्रेम-रस) निश्चित ही प्राप्त हो जाती है।

general

सहज स्नेही श्याम के बन बसि अनत न जाँइ

जिन भक्तों के हृदय में श्री बिहारीजी के प्रति सहज और गाढ़ प्रेम बस जाता है, वे वृंदावन धाम को त्यागकर कहीं और नहीं जाते। जिनका प्रेम अनन्य नहीं होता, ...

general

सुख की संधि समझे बिना

सुख की संधि (श्रीधाम वृन्दावन) में अहर्निश चलने वाले नित्यविहार का ज्ञान न होने के कारण ही लोग सुख-दु:ख, लाभ-हानि और मान-अपमान जैसे द्वंद्वों के सागर ...

general

जे पैसनि माँनत भलौ

जो लोग धन में महत्त्व-बुद्धि रखते हैं, उनसे प्रेम बहुत दूर रहता है। पैसा पाकर तो केवल बहिर्मुख जीव ही फूला (अहंकार से भर) करता है, क्योंकि पैसे के प्र...

general

सुरति समानी रूप में

प्रेम साक्षात रूप में समाहित है और रूप प्रेम में; दोनों एक-दूसरे में पूर्णतः ओतप्रोत हैं। श्रीचतुरदास जी कहते हैं कि रूप और प्रेम की पराकाष्ठा श्रीकुं...

general

जा मारग मेरौ गुरु चलयौ, ता मारग हौं जाऊँ

जिस मार्ग पर मेरे सद्गुरु चले हैं, मैं भी उसी मार्ग का अनुसरण करूँगा। उनके बताए हुए स्वामी हरिदास जी के रस-उपासना-मार्ग के अतिरिक्त संसार में जितने भी...

general

श्री कुंजबिहारिनी लाडिली, श्री स्वामी हरिदास

श्री कुंजबिहारिनी लाड़िली जू और ललिता-अवतार स्वामी हरिदास जी वस्तुतः अभिन्न स्वरूप हैं। दोनों एक प्राण, एक रस होकर नित्य-विहार रूपी प्रेम-विलास में सत...

general

कुटिल लम्ब कल चीकने

श्री श्यामा-कुंजबिहारी के घुँघराले, लंबे, कोमल और कानों तक झूलते सुंदर घने केशों को निहारकर चतुर सखी ऐसी मोहित हो जाती है कि वह अपने प्राणों तक को उन ...

general

सेवा करत निकट रहत मन में दूरी दुरास

यदि कोई श्री बिहारीजी महाराज के अति निकट भी रहे और उनकी सेवा भी करता रहे, परन्तु यदि उसने मन से ही बिहारीजी से दूरी बना रखी है—अर्थात् मन में सांसारिक...

general

भजन करै हरिदास को पावै नित्य बिहार

श्री स्वामी हरिदास जी का भजन करने से सर्वोपरि नित्यविहार रस सहज ही प्राप्त हो जाता है और स्वयं नित्य विहारिणी जू (श्री राधा) सदाकाल अपने हृदय का हार ब...

general

नहिं चाहों बैकुंठ नहिं चहौं ब्रह्मानंद कौं

न तो मुझे वैकुण्ठ चाहिए, न ही ब्रह्मानंद चाहिए। न मुझे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम चाहिए, न ही नंदलाल श्री कृष्ण। [1] न ही मुझे कुंजों कुंजों का रास...

general

अलकैं छूटीं वदन पर श्रम जल

सखी भावापन्न श्रीस्वामी चतुरदासजी कहते हैं कि श्यामा कुंजबिहारी की उस सुरतान्त छवि का मैं अहर्निश निरन्तर अवलोकन किया करता हूँ, जिसमें काली घुँघरारी ल...

general

आरति करत बिहार की, सब आरति बिसराई

अखंड नित्य-विहार के अनन्य उपासक के लिए बाह्य आरती गौण हो जाती हैं; उसका मन तो केवल प्रिया-प्रियतम के विहार के लिए ही निरंतर व्याकुल रहता है। इसी प्रेम...

general

राग द्वेष हमरे नहीं

ललित रस के जो सुजान रसिक होते हैं उनके राग द्वेष एवं देहाभिमान लेशमात्र भी नहीं होता क्योंकि वे तो सदाकाल अपने सरस भाव द्वारा श्री प्रिया जू (श्री राध...

general

प्रेम प्रेम ही उपजै

जब जीव का संग बाड़ स्वरूप (सीमा रूप से) एक मात्र प्रेमी जनों से हो जाता है तभी ह्रदय में प्रेम का अंकुर उदय होकर फूलता फलता है, इसी बात को सभी प्रेमीजन...

general

श्रीस्वामी हरिदास भज

श्री चतुर दास जी अपने मन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे मन, स्वामी हरिदास जी का भजन कर एवं श्री प्रिया प्रियतम के नित्य विहार का अखंड चिंतन कर। यह...

general

श्री स्वामी हरिदास भजो मन, श्री हरिदास भजौ

श्री चतुर दास जी अपने मन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे मन, स्वामी हरिदास जी का भजन कर एवं श्री प्रिया प्रियतम के नित्य विहार का अखंड चिंतन कर। दू...

general

भक्ति साधारन जगत में, हरि कीनों सिष्टाचार

श्रीहरि ने जगत में अवतार ले-लेकर सृष्टि अनुसार अनेक प्रकार की भक्ति एवं रसों का विस्तार किया है। साधारनतया भक्त प्रायः उसी अनुसार भक्ति करता है। परंतु...

general

सो सुख वृन्दाविपिन है मूल आदिद्रुम जैस

संसार में जो भी सुख दिखाई पड़ता है उसका मूल स्रोत श्री वृंदावन ही है। श्री चतुरदास जी कहते हैं कि उसे लालितादिक सहचरियाँ नित नव कैशोर-मंडित श्री श्याम...

general

जाकौं चाहैं लाडिली

जिसको श्री कुंजबिहारिनी लाड़ली जू [श्री राधा] चाहती हैं उसको ही सब सुख सहजता से प्राप्त हो जाता है। यह बात को सब जानते हैं कि प्रिया प्रियतम के निजमहल...

general

राख्यौ कहत न मैं कछू

सर्वोपरि नित्य बिहारिनी जू (श्री राधा) का महामधुर रसमय विहार ही हमारे जीवन के प्राणों का आहार (सर्वस्व) है। परमार्थ के सारों का सार यही विहार है, जिसे...

general

प्राण पालित पाइनि परें परसें होत निहाल

श्रीलालजी (श्रीकृष्ण) की अद्भुत प्रेमासक्ति का वर्णन कैसे किया जाए? जिनके प्राणों का पालन एकमात्र श्री प्यारीजू (श्रीराधा) के चरणकमलों में सदा पड़े रह...

general

ललितमोहिनी कृपा करी

श्री चतुरदास जी कहते हैं कि उनके गुरुदेव श्री ललित मोहिनीदास जी की कृपा से, वे नित्य विहार पारायण श्यामा कुंजबिहारी को निरखते हैं। समस्त सांसारिक द्वन...

general

श्रीस्वामी हरिदास के

श्री स्वामी हरिदास जी के जो अनन्य जन हैं, उनका यह यश जगत में विख्यात है कि वे लोक-वेद की समस्त मर्यादाओं को त्यागकर, सदैव एकमात्र सर्वोपरि नित्यविहार...

general

रसिक सिरोमनी लाड़िली सो हमरे अंग संग

रसिक शिरोमणि कुंज बिहारिनी, श्री लाड़ली जू (श्री राधा) सदा हमारे अंग-संग रहती हैं, इसी कारण हम कुंज महल में विराजते हुए, उनकी अखंड केलि को सदा निहारते...

general

मूँड मुंडायें कहा भयो, जो मन न मुंडायौ

यदि मन की वासनाओं को नहीं मुड़ाया, तो केवल मूँड के मुड़ाने से कोई लाभ नहीं क्योंकि बिना सच्चे भाव के, मन में संतोष आ ही नहीं सकता।

general

आये तैं हर्षे नहीं, गये करें नहिं सोग

कोई व्यक्ति या वस्तु आए, हमें कोई हर्ष नहीं; कोई व्यक्ति या वस्तु छिन जाए, हमें कोई शोक नहीं क्योंकि हम तो गौर-श्यामल वर्ण वाले श्यामा कुंज बिहारी के ...

general

श्रीस्वामी हरिदास भजि, सिद्ध होइ सब काम

श्री चतुरदास जी अपने मन को समझाते हुए कहते हैं, “हे मन, तुम श्री स्वामी हरिदास जी महाराज का भजन करो (अर्थात् अखंड नित्य विहार उपासना करो), जिससे समस्त...

general

सदा बसै वृन्दाबिपिन तजे न कबहूँ खेत

जो बड़भागी महतजन ऐसे अनन्य भाव से श्रीवृन्दावन में वास करते हैं कि वे एक क्षण को भी वृंदावन को त्याग कर नहीं जाते, वे ही महतजन साक्षात श्रीप्रियाजू (...

general

जा सुख नैना सुख ढके

जिस रस से नैनों को सुख प्रदान करने वाला सुख ही नष्ट हो जाय, वह सुख सच्चा सुख नहीं है। सच्चा सुख तो वह है जिससे वियोग की व्यथा सदा-सदा के लिए मिट जाय ।

general

नाम रूप विन गुन कहा

नाम रूप विन गुन कहा, केसर कुसुम कसूँभ। श्रीबिहारीदास बिनही कसैं, दोऊ दीसैं ऊंभ॥ - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी ...

general

नेष्ठा गर बंधन भये

यदि अन्य अन्य निष्ठाएँ ह्रदय में पड़ी हुई हैं, तो वह निष्ठाएँ ही गले का बंधन बन जाती हैं। जिनका मन आचार-विचार में फँसा हुआ है, जो नख से सिख तक विधि-नि...

general

अति टोंडिकु अति चिकनियाँ

ब्रज रस क्षेत्र के ठाकुर (श्री कृष्ण) अपने स्वाभाविक ठाठ-बाठ, अति टोडिक, छैल-छबीले एवं सिरताज स्वरूप से ऐंठ में भरे रहते हैं, परंतु निकुंज के (कुंज बि...

general

श्री स्वामी हरिदास को धर्म सुमेर समान

प्रिया-प्रियतम के एकान्तिक एवं अखंड नित्य विहार रस रूपी भक्ति-भाव का सतत पालन करने वाला स्वामी श्री हरिदास जी का सर्वोपरि प्रेम-धर्म, सुमेरु पर्वत के ...

general

श्री बिहारीदास मन सौं कहै

श्री बिहारिन देव अपने मन से उपदेश करते हैं — “अब तू सब ओर से भलीभांति स्वयं को हटा कर, केवल स्वामी श्री हरिदास जी के रस-यश में, अर्थात् युगल सरकार के ...

general

जेतो अन्तर वास में तेतो जानि उपास

श्री वृन्दावन धाम की प्राप्ति साक्षात् इष्ट की प्राप्ति ही है। जितना हम श्री वृंदावन धाम वास से पृथक हैं, उतना ही हम अपने उपास्य तत्व से भी विलग हैं। ...

general

श्रीबिहारीदास ब्रज में बसत

प्रेमधाम श्रीब्रजमंडल में बसने से हमें वे श्री बाँकेबिहारीजी महाराज प्राप्त हुए हैं, जो एक मात्र प्रेमी भक्तों से प्रेम के कारण ही सपरस (स्पर्श/आलिंगन...

general

कोई कहै बैकुंठ, कोई कहै ब्रह्म है

कोई भगवान का निज स्वरूप वैकुंठनाथ को बताता है, कोई ब्रह्म को बताता है। कोई अयोध्यानाथ श्री राम को बताता है तो कोई स्वयं भगवान श्री कृष्ण को बताता है। ...

general

पाँडे माटी में सनैं

पंडित निपट-कोरे मिट्टी के समान इस कर्मकाण्ड में ऐसे उलझे रहते हैं जिसका कोई ओर-छोर ही नहीं है। ऐसे बाह्य आडम्बरों से युक्त कर्मकाण्डी लोग सर्वोच्च प्र...

general

रसिकन सों ऐंठे फिरें बिमुखति भेंटत धाइ

कुछ लोग ऐसे स्वभाव के होते हैं जो रसिक उपासकों से तो सदाकाल अपनी अकड़ में भरकर रहते हैं और विमुखों (सांसारिक जीवों) से बड़े प्रेमपूर्वक मिलते हैं, उनक...

general

काम न आवै कौन हूँ

बहुत से लोग जन्मभर अपरस-सपरस अथवा बाह्य आचार-विचार में उलझे रहते हैं। मृत्यु के समय जब जीव खाट छोड़कर आगे की यात्रा पर जाता है, तब केवल भगवान से किया ...

general

विभचारनि कौ संग तजि

यदि तुम व्यभिचारियों के संग को सर्वथा त्याग दो, एकमात्र निष्काम और अनन्य भाव से प्रिया-प्रियतम का भजन करो, केवल उनके सुख में ही सुखी रहो, तो तुम्हारे ...

general

मनसा बाचा कर्मना

मन, वाणी और कर्म—तथा सम्पूर्ण आत्मभाव से श्री नित्यविहारिणी जू को ही अपना सर्वस्व मानो। इसी दिव्य रस के प्रभाव से श्रीविहारिणी जू की दासी बनकर, उनके प...

general

बिछुरन रहित सुबस्तु है

हे रस के अनुरागी रसिक जनों! चित्त लगाकर इस दुर्लभ नित्य-विहार-रस को सुनो। इस रस में श्री प्रिया–प्रियतम एक क्षण के लिए भी वियोग को प्राप्त नहीं होते। ...

general

निजु प्रिय कीनी अपनपौ

रिझवार-चूड़ामणि श्री स्वामिनी जू ने मुझे अपनी निज कर लिया और वे मेरे तन-मन में समा गईं। मेरे मन के भावों का पोषण कर मुझसे बोलीं— “तू तो मेरी प्राण-सखी...

general

नित ही राधाकृष्ण हैं

श्री राधा-कृष्ण नित्य हैं और श्री वृन्दावन भी नित्य है। अनंत-कोटि गोलोक भी श्री वृन्दावन के एक पत्र के प्रकाश की समानता नहीं कर सकते।

general

व्यास रसिक निर्णय कियौ श्रीवृंदावन माँहिं

श्रीधाम वृन्दावन में रसिक-समाज के मध्य गहन विचार के उपरांत, श्री हरिराम व्यास जी ने यह निष्कर्ष स्थापित किया कि रसिक अनन्य नृपति श्री स्वामी हरिदास जी...

general

व्याकुल बिरह बिहार बिनु

हे सखी! रसिक-शिरोमणि लाल जी रस-बिहार के नख से शिख तक लोभी होकर ऐसे आधीन रहते हैं कि यदि थोड़ा-सा भी विहार में व्यवधान पड़ जाए तो वे व्याकुल हो उठते हैं...

general

आदि अंत वृन्दाविपिन, निरदोषिक करि बास

सृष्टि की रचना से पूर्व और प्रलय के पश्चात भी जो सतत एकरस भूतल पर विद्यमान रहता है, वह केवल श्रीवृन्दावन धाम ही है। वहाँ जो जन समस्त अपराधों से रहित ह...

general

हमरी बात भली बनी भई लडैती प्रान

जगत में हमारी बात बहुत ही सुन्दर बन गई क्योंकि स्वयं सर्वोपरि श्रीनित्यविहारिनीजू (श्री राधा) हमारी प्राण-स्वरूप हो गई हैं। रसिक-शिरोमणि श्यामा प्यारी...

general

मेरी प्रिय है लाडिली

मेरी प्राणप्यारी तो श्री लाडिली जू ही हैं। वे क्षण-क्षण नई-नई प्रीति करती हुई मेरे सुख में ही अति सुखी होती हैं, और मैं भी उनके ही सुख में नित्य लीन र...

general

तनु की मनु की बचन की करी अविद्या दूरि

तनु की मनु की बचन की, करी अविद्या दूरि। कुंजबिहारिनी लाडिली, भरयौ प्रेम भरपूरि॥ - श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की सा...

general

कोऊ नेष्ठा नाम की

श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि कोई-कोई बिना स्वरूप, सुख और सम्बन्ध का विचार किए केवल नाम-जप में ही निष्ठा रखता है; किसी की निष्ठा नामी के ध्यान में ...

general

बलिहारी जाऊँ जक परी

हे बिहारीदास! श्रीमद्भागवत् के वर्तमान वक्ता मुख से तो अत्यंत सरस व्याख्यान करते हैं और बार-बार दण्डवत कर विनम्रता का प्रदर्शन भी करते हैं, किन्तु जो ...

general

अनहाये कबहूँ नहीं

ऐसे रसिक, जिनकी एकमात्र मित्रता निकुञ्ज-विहारिणी श्री किशोरीजी से ही है, वे कभी भी अनहाये [अपवित्र अवस्था] में नहीं रहते। वे तो सदा ही नहाये हुए रहते...

general

लाल लड़ायें लाडियें

संसार के समस्त सुखों को भलीभाँति त्यागकर एकमात्र स्वामिनी जू और उनके प्राण-जीवन लाडिले लाल जू को लाड़ लड़ाओ।

general

श्री बिहारीदास परमारथी मिली

सच्चे परमार्थी जन को परस्पर श्री युगल रस एवं युगल यश को ही कहना, सुनना एवं चिंतन करना चाहिए। यह रस इतना दुर्लभ है कि संसारी लोगों को यह सुनकर सुहाएगा ...

general

रसिक अनन्य सौं मिलै

परम रसिक आचार्य श्रीबिहारिनदेवजी महाराज बोध कराते हैं कि निरंतर रसिक अनन्यों का सत्संग करें और उनके मध्य ही इस 'रसोपासना' के रहस्यों का अनुशीलन करें। ...

general

नित्य विहार सार सबको

'नित्य विहार' सभी ग्रंथों, वेदों आदि का सार है, जिसका न आदि है न अंत—जो अत्यंत दुर्लभ है।

general

रसिक अनन्य की सभा

युगल के अनन्य रसिकों की सभा में कर्मकांडी लालची-लोग लज्जित हो जाते हैं, क्योंकि जहाँ प्रेम की प्रधानता में श्रीश्यामा-श्याम के नित्य-विहार की चर्चा ह...

general

जा रज सौं जग रज कहै

साधारणतः यह जीव संसारी माया और नश्वर सुखों की खोज में भटकता हुआ अथक प्रयास करता है। वह केवल उस माया-रूपी रज (धूल) का ही संचय करता है, जो उसके मिथ्या अ...

general

एक दसा एकादसी एक इष्ट व्रत एक

श्री स्वामी हरिदास जी की अखंड नित्य विहार उपासना में सदा काल एक ही इष्ट (श्री बिहारी बिहारिनी) की अनन्य उपासना है एवं एक ही दशा की एकादशी रहती है। अर्...

general

कूँची नित्य विहार की

वह परम रसमय 'नित्य-विहार', जिसकी प्राप्ति बड़े-बड़े साधकों एवं सिद्धों के लिए भी अत्यंत दुर्लभ है, उस निकुंज-धाम की चाबी रसिकेश्वर श्रीस्वामी हरिदासज...

general

निश्चय तन मन प्रेम सों

मैं तुमसे स्पष्ट कहता हूँ कि तुम तन-मन-प्राण से सर्वोपरि नित्य-विहारिनी जू के सुमिरन का लाभ आज ही ले लो, कल का दिन किसने देखा है।

general

दूल्ह नित्य विहार है

जैसे विवाह में एकमात्र दुल्हा-दुल्हन का ही मान-सम्मान और गौरव होता है और उन्हें ही सब निहारते हैं, वैसे ही रसिकों द्वारा रसोपासना-पद्धति में निज महल क...

general

अवध उड़ीसा द्वारिका

नित्य विहार-रूपी दुर्लभ रस, जिसे ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी ने बरसाया एवं स्वीकार किया है, उसकी तुलना अवध, उड़ीसा, द्वारिका, बद्रीनाथ, केदारनाथ ...

general

बिछुरन मिलन जहाँ रहै

जहाँ विरह (बिछुड़ना) और मिलन का चक्र बना रहता है, वहाँ प्रेम की पराकाष्ठा 'विशुद्ध प्रेम' नहीं होता। इसके विपरीत, प्रतिक्षण साथ रहते हुए भी मिलने की उ...

general

श्री स्वामी हरिदास को

श्री ललित किशोरी देव जी कहते हैं— “जिसने श्री स्वामी हरिदास जी महाराज को अपना जीवन समर्पित कर दिया है, वह अपने देह की सुध-बुध भूल जाता है और श्री प्रि...

general

सोई जगत में जानि

जिसको ‘मैं–मेरी’ की आसक्ति लगी हुई है, जो मैं-मेरापन से युक्त है, वही संसार है और वही संसार-माया के जाल में गँसा-जकड़ा हुआ है। किंतु भक्त-रसिक-संत महा...

general

कुंज बिहारिनि लाडिली

परम प्रवीण रसिक-शिरोमणि साक्षात् श्री नित्य-विहारिणी लाड़िली जिसे अपना बना लेती हैं, उसका हाथ वह कभी नहीं छोड़तीं।

general

रोम रोम आनंद भयो

हमारे रोम-रोम में आनंद भर रहा है और क्षण-क्षण हृदय उल्लास से परिपूर्ण हो रहा है, क्योंकि श्री कुञ्ज-विहारिणी लाड़िली श्री राधारानी सदा हमारे साथ विराज...

general

कुंज बिहारीनि बाल कों

जो बड़भागी जन बड़े ही हित से (प्रेमपूर्वक) श्री कुञ्ज-विहारिणी बाल—श्री राधारानी—की सतत सेवा करते हैं, उनके तन, मन और चित्त में किसी प्रकार का विघ्न न...

general

बैकुंठ महा बैकुंठ तै

जहाँ श्री वृन्दावन में युगल सरकार नित्य-विहार करते हैं, वह नित्य धाम वैकुण्ठ, महा-वैकुण्ठ और गोलोक धाम आदि सभी से परे है—जिनका नित्य सेवन यह सभी धाम भ...

general

नामी नाम न भावई

स्वामी हरिदास जी की रस-उपासना में हमारे रसिक-शेखर श्रीयुगल तन, मन, मनसा, एवं रोम-रोम से एकमात्र अखंड नित्य-विहार में ऐसे वशीभूत हुए रहते हैं कि इस विह...

general

बातें कहत बिहार की

कुछ लोग नित्य-विहार की बातें तो करते रहते हैं, पर उनके हृदय में व्यवहार तथा अनेकानेक उपासनाओं के जंजाल भरे रहते हैं। श्री बिहारिन देव जी कहते हैं— “मह...

general

सेवैं नित्य सरुप कौं

हम सदाकाल श्री वृन्दावन-चन्द्र में अखण्ड वास करते हुए नित्य-स्वरूप श्री लाड़ली–लाल की केलि-सुख का निरन्तर सेवन कर सतत आनन्द में निमग्न रहते हैं।

general

सोई रसिक प्रवीन

जगत में वही चतुर-चूड़ामणि, अति प्रवीण तथा उच्च कोटि के रसिक हैं, जो दृढ़ अनन्य-भाव से एकमात्र सर्वोपरि नित्य-विहार-रस का ही सेवन करते हैं और साक्षात् ...

general

चरन कमल रज सेइयौं

अपनी वाणी के शुभारंभ से पूर्व मेरी एकमात्र अभिलाषा है कि मैं श्री नित्य विहारिणी (श्री राधा), श्री नित्य विहारी (श्री कृष्ण), श्री स्वामी हरिदास जी अथ...

general

सेवै नित्य बिहार कों

जो बड़भागी जन नित्य-विहार के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं जानते, उन्हें प्राण-प्यारी नित्य-निकुंजेश्वरी श्री राधा रानी अपने तन, मन और प्राणों में समेटे रखत...

general

कुंवरी लडैती लाडिली

हमारी कुँवरि प्राण-प्यारी श्री राधा महारानी अति सुकुमारी ऐसी लाड़िली हैं, जो महाप्रेम के सुख-सार स्वरूप अंग-संग केलि-रस को ही सदा सर्वदा प्रदान करती र...

general

अनेक जन्म की भूल कों

परम प्रवीण रसिक-शिरोमणि श्री कुञ्जबिहारिणी लाड़िली-जू जिसे अपना निज बना लेती हैं, उसकी वे समस्त प्रकार से रक्षा करती हैं। फिर किसी भी प्रकार से उसका ह...

general

कब देखौं भरि नैन

जो गौर-श्याम दोऊ लाड़िले श्री स्वामी हरिदास जी महाराज की गोदी में अनादिकाल से विहार कर रहे हैं, उन्हें मैं आँखें भर-भर कर कब देख पाऊँगा?

general

श्री बिहारीदास हरिदास कौ, संतत सुखद विहार

हे बिहारीदास! तुम भली-भाँति सोच-विचार कर देख लो कि एक श्री स्वामीजू (हरिदास जी) का नित्य-विहार ही अखंड रूप से समस्त भाँति, सदाकाल सर्वोपरि सुखदायी रस ...

general

सदा हमारे पास है

श्री कुञ्जबिहारिणी श्री राधाजू सदा हमारे समीप रहती हैं। हमारे भावों का पोषण करने के लिए वे क्षण-क्षण हमें निहाल करती रहती हैं।

general

निंदा बिंदा भै नहीं

नित्य-विहार के अनन्य उपासक श्री बिहारिन देव जी महाराज का मनभावन दृढ़ व्रत ऐसा है कि अपनी प्राण-जीवन स्वरूप श्री नित्य-विहारिणी जू (श्रीराधा) के श्रीमु...

general

चतुरदास चित चौंप सों

श्री चतुरदास जी के अनुसार, हृदय में परम उल्लास संजोकर श्री वृन्दावन धाम में निवास करना चाहिए और निरंतर युगल सरकार के दिव्य केलि-विहार का दर्शन करना चा...

shloka

श्रीस्वामी के पद कमल

ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी के चरण-कमलों को हृदय रूपी शुभ स्थान में बड़े ही प्रेम से विराजमान कर गौर और श्यामल वर्ण की आभा से युक्त श्री युगल-सर...

general

बूडत ही विषधार में

हमारी कुंज-बिहारिणी श्री राधारानी से ऐसी अद्भुत प्रीति और स्नेह है कि मैं विषय-रूपी महाविष की नदी में डूब रहा था, परंतु उन्होंने स्वयं अपने हाथ पसारकर...

general

हम हमरी है लाडली

हमारी प्राण श्रीलाड़िली राधा ही हैं, इसीलिए हम चित् लगाकर सदाकाल उनके ही केवल गुण गाते हैं एवं श्रवण करते हैं। उन्हीं की निकुंज-केलि नित्य-विहार का सद...

general

सरन गहौ श्री हरिदास की

श्री हरि की माया उन लोगों को छू भी नहीं सकती, जो श्री हरिदास (ललिता-अवतार) के चरण-कमलों की शरण ग्रहण कर लेते हैं। ऐसा इसलिए है कि श्री कुंजबिहारिणी ला...

general

श्रीबिहारीदास बिहार मैं

नित्य विहार का रस वेद भी नहीं जान सकते। इसे तो केवल वही जान सकते हैं, जिन्हें सखियाँ महा-मधुर रस को छानकर प्रेमपूर्वक जना दें।

general

अनंत जनम की भूलि कौं

हे श्री राधा! सर्वसमर्थ प्राणप्यारी जू, आप ऐसी कृपामयी स्वामिनी हैं कि अनंत जन्मों की भूल को भी एक क्षण में मिटा देती हैं। मुझमें कोई साधन-बल नहीं है;...

general

कुंज बिहारिनि लाडिली

रसिक-शिरोमणि की भी सिरमौर हमारी श्री कुंजबिहारिनि लाड़िली, अपने निज जनों के स्वभाव को जानकर क्षण-क्षण उनके भावों का पोषण करती रहती हैं।

general

Ati Tondik Ati Chikniyan

Ati Tondik Ati Chikniyan, Adhik Chatur Itarai.Kitahi Vibhau Kit Thakurai, Juthani Kaun Lalachai.- Shri Biharin Dev Ji, Shri Biharin Dev Ji Ki Vani, Si...

general

Rakhyo Kahat Na Main Kachu

Rakhyo Kahat Na Main Kachu, Tokon Sarvasu Saar.Shreekunjbiharini Kau Bhajan, Jeevan Ahaar Bihar.- Shri Biharin Dev Ji, Shri Biharin Dev Ji Ki Vani, Si...

general

Pandit Ya Ras Tain Bache

Pandit Ya Ras Tain Bache, Jyon Bijhukai Mrig Rojh.Navai Na Achavan Paavahi, Ved Ladai Sir Bojh.- Shri Biharin Dev Ji, Shri Biharin Dev Ji Ki Vani, Sid...

general

Shri Swami Haridas Ko Dharm Sumer Saman

Shri Swami Haridas Ko, Dharma Sumer Samaan.Aur Dharma Sab Doongri, Yahi Baat Parmaan.- Shri Lalit Kishori Dev, Shri Lalit Kishori Dev Ju Ki Vani, Sidd...

general

Shri Biharidas Man Son Kahai

Shri Biharidas Man Soun Kahai, Ab Na Lagaun Tohi.Jas Gaaun Haridas Kau, Tain Sukh Deenon Mohi.- Shri Biharin Dev Ji, Shri Biharin Dev Ji Ki Vani, Sidd...

general

तुम बिन नैंना ना सुखी

हे प्राणप्यारी श्री कुंजबिहारिनी जू! आपको देखे बिना मेरे नेत्र कहीं भी सुख नहीं पाते। मेरे हृदय की व्यथा आप सब जानती हैं, फिर और मैं क्या कहूँ?

general

Koi Kahai Baikuntha

Koi Kahai Baikuntha, Koi Kahai Brahma Hai.Koi Kahai Iha Rama, Koi Kahai Krishna Hai. [1]Koi Kahai Yaha Kunjani-Kunjani, Raas Kiyau Niradhara Hai.Hari ...

general

Kaam Na Aave Kaun Hu

Kaam Na Aavai Kaun Hoon, Ati Aparas Aachaar.Ant Nibaahai Prem Heen, Chhaande Khaat Kau Dwar.- Shri Biharin Dev Ji, Shri Biharin Dev Ji Ki Vani, Siddha...

general

Vyas Rasik Nirnay Kiyo

Vyas Rasik Nirnay Kiyo, Shrvrindavan Maanhi.Shri Swami Ke Dharm Kon, Patatar Kon Koi Nahin.- Shri Lalit Kishori Dev, Shri Lalit Kishori Dev Ju Ki Vani...

general

Balihari Jaun Jak Par

Balihari Jaun Jak Pari, Baatan Bahut Dandaut.Palat Deh Kutumb Kon, Bhale Samajh Bhagot.- Shri Biharin Dev Ji, Shri Biharin Dev Ji Ki Vani, Siddhant Ki...

general

Humri Baat Bhali Bani

Humri Baat Bhali Bani, Bhai Ladaiti Praan.Tahi Ten Ati Sukh Bhayo, Mili Su Rasik Sujaan.- Shri Lalit Kishori Dev, Shri Lalit Kishori Dev Ju Ki Vani, S...

general

Nami Nam Na Bhave

Naami Naam Na Bhavai, Tan-Man-Mansa Praan.Aasa Daasi Vihar Ki, Yon Basi Rasik Nidaan.- Shri Biharin Dev Ji, Shri Biharin Dev Ji Ki Vani, Siddhant Ki S...

general

Paande Maati Mein Sane

Paande Maati Mein Sanain, Karmath Nipat Nikor.Prem Padarath Kyon Gahein, Arujhe Lahai Na Chhor.- Shri Biharin Dev Ji, Shri Biharin Dev Ji Ki Vani, Sid...

general

Aadi Anta Vrindavipin Nirdoshik Kari Baas

Aadi Anta Vrindavipin, Nirdoshik Kari Baas.Adbuta Sukhad Bihar Kon, Det Tinhein Haridas.- Shri Lalit Kishori Dev, Shri Lalit Kishori Dev Ju Ki Vani, S...

general

Vibhcharani Ko Sang Taji

Vibhcharani Ko Sang Taji, Bhaji Ananya Nihkam.Shri Biharidas Sukh Mein Sukhi, Dampati Rati Dhan Dham.- Shri Biharin Dev Ji, Shri Biharin Dev Ji Ki Van...

general

Mansa Baacha Karmana

Manasa Baacha Karmana, Sarva Aatama Jaani.Shri Biharinidasi Basikaran, Fabi Priya Sukh Daani.- Shri Biharin Dev Ji, Shri Biharin Dev Ji Ki Vani, Siddh...