shri biharin deva
Biography & History
shri biharin deva Collected Verses
मेरे विषै विसन वर वाम
श्री बिहारिनदेव जी कह रहे हैं कि प्रेमी रसिको की चरण रज के प्रताप से मेरे प्राण और मन के विष (दुर्गुण) एवं व्यसन (दुराचरण) सर्वसिरोमनि, सर्वश्रेष्ठ एक...
कृष्ण चरित्र त्रिधा त्रिभुवन में
श्री बिहारी दास जी कहते है कि कृष्ण चरित्र को ही लें। ब्रज लीला, मथुरा लीला, एवं द्वारका लीला के आधार पर तीन प्रकार का है। उनकी भक्ति का रस भी अलग अलग...
साधन श्रम न कछु किये न कछु करने जोग
न तो मैंने कोई साधन किया है, और न ही करने योग्य हूँ। यह तो एकमात्र बिहारिनी श्री राधा रानी की कृपा है कि सहज ही वृन्दावन रस अर्थात् नित्य विहार रस का ...
जामैं मरैं न बीछुरैं
श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि सर्वोपरि नित्य-विहारिणी हमारी श्री स्वामिनीजू न तो कभी प्रकट होती हैं, न कभी अन्तर्धान होती हैं, न कभी रूठती हैं और न ...
मेरे गति ब्रजपति कैं ब्रजवासी
ब्रजवासी जन ही मेरे जीवन के एकमात्र शरण्य हैं, जो श्री राधा कृष्ण के निजी जन हैं। उनकी प्राण जीवन धन श्री राधा हैं, जो सदैव श्री वृंदावन में विलास परा...
प्यारी जू सुंदर वदन
हे प्यारी जू [श्री राधा] आपका रूप सौंदर्य अत्यंत सुंदर एवं मनोरम है। इस रूप को निहार निहार कर प्रीतम [श्री कृष्ण] अत्यंत सुख का अनुभव करते हैं, एवं ए...
प्रीति न भली भजन बिन और
भजन के अतिरिक्त कहीं और प्रीति करना जीव की भलाई नहीं है। ऐसा कौन है जो एक मन को दो ठौर [जगह] लगाकर सुख प्राप्त कर सका है [ठौर अर्थात या तो संसार की भक...
ता व्रज के आवरण सुनि गोपी
जहां ब्रज में गोपी, गाय एवं ग्वाल इत्यादि का प्रवेश है, वहीं निज महल नित्य विहार रस में इन सब का प्रवेश नहीं जहां रसिक सहचरी ही केवल श्यामा श्याम को ...
श्री बिहारी दास जल जंतु ज्यौं
श्री बिहारिनदास जी कहते हैं कि जैसे जल के बिना मछली अपने प्राण त्याग देती है, उसी प्रकार श्री श्यामा-श्याम का नित्य-विहार ही मेरे जीवन के प्राण हैं; ...
झूठो है संसार यह, झूठी है यह देह
यह संसार असत्य है और यह शरीर भी सदा साथ नहीं रहता। यदि तुम सच्चे सुख की चाह रखते हो, तो सांसारिक सुखों और जीवों से अपना स्नेह हटाकर श्री बिहारी-बिहारि...
श्रीबिहारीदास संतोष गहि, बैठयौ सिखर सुमेरु
मैंने समस्त परमार्थ-संबंधी साधनाओं एवं संबंधों से अपने मन में भली भाँति संतोष करके ही श्री स्वामीजी (ललिता अवतार श्री हरिदास) महाराज की सुमेरु-शिखर की...
अब हौं कासौं बैर करौं
श्री बिहारीजी स्वयं अपने श्रीमुख से पुकार-पुकार के इस बात को कह रहे हैं कि "प्राणिमात्र के घट-घट में सदाकाल मैं ही विराजता हूँ ", तब हम किससे वैर कर ...
को सरि करै हमारी राधा
[यह पद बहुत महत्वपूर्ण है स्वामी हरिदास जी की नित्य विहार उपासना को समझने के लिए] हमारी सर्वोपरि नित्यबिहारिनी स्वामिनी स्वरूपा श्री राधा की समानता कौ...
ते अनन्य निजु जान
वास्तव में वही श्री स्वामी हरिदास जी महाराज के अनन्य निज-जन हैं, जिनका हृदय श्यामा-श्याम की अद्भुत निकुंज-रस-माधुरी के अतिरिक्त और कुछ स्पर्श नहीं करत...
चाँपति चुपरति सेज पर बिहारीदास मुख मौन
श्री प्रिया प्रियतम सेज पर विराजमान हैं, जिनके चरणों को सखी प्रेमपूर्वक अभ्यंजन (दबा) कर रही है। विहार की पराकाष्ठा के रस में सब मौन हैं। श्री प्रिया ...
मेरौ मन श्रीवृन्दावन अटक्यौ
मेरा मन श्री वृंदावन धाम में अटक गया है।स्वामी श्रीहरिदास जी और श्री विट्ठल विपुल देव जी की कृपा से अब यह भूल कर भी इस निज महल श्री वृन्दावन धाम को छो...
श्री बिहारीदास ब्रज यौं बसौ
हे बिहारीदास! ब्रज में प्रसिद्ध करुवा और कामरी की रहनी से ही बसना चाहिए। ब्रजवासियों के घर से जो टूक-भात मिले, उसी में संतोष रखो।
माला जनेऊ घालि गरै
कुछ लोग गले में कंठी और जनेऊ धारण कर अपने को उच्च कुल का बताकर परिचय देते हैं, किंतु उनकी वृत्ति और कृत्य से ही स्पष्ट हो जाता है कि वे वास्तव में किस...
मन मनसा आसा मगन, तन की कछु न सम्हार
श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि यद्यपि हम मुख से नाम का उच्चारण नहीं करते, तथापि श्री बिहारी-बिहारिनी जू के उस दिव्य नित्य-विहार का निरंतर ऐसा चिंतन औ...
वृन्दावन रस भूमि यह पेंड पेंड पर भेद
वृन्दावन की यह भूमि रस-सिद्ध और अत्यंत गूढ़ है, जहाँ रस-उपासना में प्रत्येक चरण पर सूक्ष्म भेद प्रकट होते हैं। किसी को कोई रस खारा प्रतीत होता है, किस...
नस्वर रज लगि जूझई, नस्वर पूत कहाइ
नाशवान धन-संपत्ति एवं पुत्र आदि के लिए ही संसार में लोग मरे जा रहे हैं, जबकि वे वास्तव में स्थायी नहीं हैं। किन्तु जो लोग समस्त आपदा-विपत्ति सहकर भी व...
प्यारी तेरे तन की सोभा बरनी न जाइ
हे प्यारी जू, आपके अंग की शोभा अवर्णनीय है, क्यूंकि आपके जिस अंग का दर्शन मेरी आंखें करती हैं, वहीँ पर लुभायमान होकर अपलक टिक जाती हैं। [1] श्री बिहा...
रज छाँड़ै रज पाइयै
जो साधक रजोगुण का त्याग कर देता है, वही नित्य-विहारिणी श्री राधा की इस अद्भुत वृन्दावन-रज का अधिकारी बनता है; और जो इस वृन्दावन-रज को अपने पास रखता है...
कोऊ गोबर पाथनी, कोऊ ढोवै पाई
श्री स्वामिनी जू के विविध स्वरूपों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि किसी ने उन्हें साधारण गोबर थापने वाली गोपी के रूप में देखा, किसी ने जल-ढोने वाली क...
आरति करत बिहार की, सब आरति बिसराई
अखंड नित्य-विहार के अनन्य उपासक के लिए बाह्य आरती गौण हो जाती हैं; उसका मन तो केवल प्रिया-प्रियतम के विहार के लिए ही निरंतर व्याकुल रहता है। इसी प्रेम...
जप संजम नेम निषेध विधी व्रत
कोई व्यक्ति विभिन्न नियम जैसे जप, तप, व्रत, संयम, विधि-निषेध का पालन केवल तब तक कर सकता है, जब तक उसके हृदय ने विशुद्ध प्रेमरस का स्पर्श नहीं किया। [1...
सेवा करत निकट रहत मन में दूरी दुरास
यदि कोई श्री बिहारीजी महाराज के अति निकट भी रहे और उनकी सेवा भी करता रहे, परन्तु यदि उसने मन से ही बिहारीजी से दूरी बना रखी है—अर्थात् मन में सांसारिक...
श्री हरिदास के गर्व भरे
हम श्री हरिदास जी के गर्व से पूर्ण हैं और अनन्य भाव से प्रिया-प्रियतम के नित्य विहार-रस, जो महा-मधुर रस का सार है, को सतत पान करते रहते हैं। जो रसिक ज...
जे पैसनि माँनत भलौ
जो लोग धन में महत्त्व-बुद्धि रखते हैं, उनसे प्रेम बहुत दूर रहता है। पैसा पाकर तो केवल बहिर्मुख जीव ही फूला (अहंकार से भर) करता है, क्योंकि पैसे के प्र...
नित्यविहार अधार दुरयौ
इसको कर्म, ज्ञान, भक्ति, मुक्ति एवं वैकुण्ठ की इच्छा रखकर प्राप्त नहीं किया जा सकता। [2] इन सबकी तो बात ही जाने दो, क्योंकि यह तो ब्रज की रस रीति वाल...
सहज स्नेही श्याम के बन बसि अनत न जाँइ
जिन भक्तों के हृदय में श्री बिहारीजी के प्रति सहज और गाढ़ प्रेम बस जाता है, वे वृंदावन धाम को त्यागकर कहीं और नहीं जाते। जिनका प्रेम अनन्य नहीं होता, ...
काहूँ कैं बल बाँह कौ
श्री बिहारिन देव जी विनम्र भाव से कहते हैं कि कोई अपने बाहुबल पर गर्व करता है, कोई अपने अनेक शिष्यों पर; किंतु मेरा तो एकमात्र आधार अनन्य नृपति स्वामी...
राख्यौ बंस बिहार कौ
रसिक अनन्य चूड़ामणि श्री स्वामी हरिदास ने इस संसार में प्रकट होकर नित्य विहार की अखंड उपासना को प्रवाहित किया है। उनके बिना ऐसा कौन है जिन्होनें अपने ...
प्रेम प्रेम ही उपजै
जब जीव का संग बाड़ स्वरूप (सीमा रूप से) एक मात्र प्रेमी जनों से हो जाता है तभी ह्रदय में प्रेम का अंकुर उदय होकर फूलता फलता है, इसी बात को सभी प्रेमीजन...
बारक श्रीहरिदास विलोकत
श्री स्वामी हरिदास जी की कृपा-भरी दृष्टि से एक बार निहार लेने पर साधक सर्वोपरि नित्यबिहार रस को सहजता से ऐसे प्राप्त कर लेता है, जैसे तेल की बूंद सहज ...
साधन आन कोटि तप तीरथ
कोटि कोटि साधन, तप, तीरथ आदि करने से क्या लाभ यदि भक्ति रूपी सूर्य का ह्रदय में उजाला ही नहीं हो रहा। [1] भक्ति से विहीन होकर, अन्य साधन में लग लग कर...
जो करै भजन में अंतरौ
जो तुम्हारी नित्य विहार उपासना में अंतर डाल दे, उन सब से तुमको भली भाँति वैराग्य कर लेना चाहिए। सम्मिलित साधना करने से तो केवल परिश्रम ही होगा, तुम्हा...
भक्ति साधारन जगत में, हरि कीनों सिष्टाचार
श्रीहरि ने जगत में अवतार ले-लेकर सृष्टि अनुसार अनेक प्रकार की भक्ति एवं रसों का विस्तार किया है। साधारनतया भक्त प्रायः उसी अनुसार भक्ति करता है। परंतु...
नांम न कछू बिहार बिनु
नित्य विहार रसमय उपासना में भाव से विहीन ख़ाली (केवल) नाम लेना तुम छोड़ दो क्योंकि भाव के बिना केवल नाम लेना ऐसे है जैसे बिना दूध की बांझ गैया। श्री य...
प्राण पालित पाइनि परें परसें होत निहाल
श्रीलालजी (श्रीकृष्ण) की अद्भुत प्रेमासक्ति का वर्णन कैसे किया जाए? जिनके प्राणों का पालन एकमात्र श्री प्यारीजू (श्रीराधा) के चरणकमलों में सदा पड़े रह...
संग न अब काहू कौ कीजै
हे भाई! जगत में अब संग करने योग्य कोई नहीं रहा है। आज कल आध्यात्मिक जगत के जीव, अपने हाथों में माला लेकर नाम जप तो करते रहते हैं परंतु उनका उद्देश्य ए...
नाम रूप विन गुन कहा
नाम रूप विन गुन कहा, केसर कुसुम कसूँभ। श्रीबिहारीदास बिनही कसैं, दोऊ दीसैं ऊंभ॥ - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी ...
मूँड मुंडायें कहा भयो, जो मन न मुंडायौ
यदि मन की वासनाओं को नहीं मुड़ाया, तो केवल मूँड के मुड़ाने से कोई लाभ नहीं क्योंकि बिना सच्चे भाव के, मन में संतोष आ ही नहीं सकता।
श्रीबिहारी बिहारिनि कौ जस गावत
जो जीव अनन्य भाव से श्री बिहारी-बिहारिनी का प्रेमपूर्वक यशोगान करता है, उस पर अनन्य नृपति रसिक शिरोमणि स्वामी श्री हरिदास जी अत्यंत प्रसन्न होकर विवशत...
कोऊ विद्या विधि वेद बँध्यौं बल
कोई तो विद्या, वेद, विधि-विधान में, कोई धन, धर्म, कर्मकांड आदि कार्यों के जाल में जकड़े हुए हैं। [1] कोई यम-नियम, संयम-व्रत तथा जप-तप आदि में, तो कोई...
रुचे मोहिं ब्रजबासिन के टूक
अब हमें इन ब्रजबासियों के ही घर-घर के टूक रुचते हैं, जो अभिमान अविद्या रूपी तृण के लिए मानो साक्षात अग्नि की ज्वाला स्वरूप हैं। [1] अब हमें किसी करकच...
काहू कै पूजा को आस
कोई तो पूजा में ही सतत आशा लगाये हुए है, कोई बेचारे इस लोक एवं स्वर्ग आदि के विषय विलास लालसाओं में लगे हुए हैं। कोई घर में, कोई जहां तहाँ वन में जाकर...
नेष्ठा गर बंधन भये
यदि अन्य अन्य निष्ठाएँ ह्रदय में पड़ी हुई हैं, तो वह निष्ठाएँ ही गले का बंधन बन जाती हैं। जिनका मन आचार-विचार में फँसा हुआ है, जो नख से सिख तक विधि-नि...
राख्यौ कहत न मैं कछू
सर्वोपरि नित्य बिहारिनी जू (श्री राधा) का महामधुर रसमय विहार ही हमारे जीवन के प्राणों का आहार (सर्वस्व) है। परमार्थ के सारों का सार यही विहार है, जिसे...
उद्धव आदि ब्रह्मादिक दुर्लभ
श्री ब्रज की रज का प्रभाव अत्यंत अलौकिक और विलक्षण है। इसका गुणगान स्वयं श्री शुकदेव परमहंस जी ने करते हुए कहा कि यह रज उद्धव, ब्रह्मा और अन्य देवों क...
सुनि अहंकार भलौ न भिया
हे भाई! मैं तुम्हें सत्य बता रहा हूँ कि किसी भी बात का अहंकार अच्छा नहीं होता। प्रभु के द्वारा दिए बिना, किसी को कुछ भी प्राप्त नहीं होता। अतः अपने या...
हरि मोहिं यों अपनाय लियौ
हे हरि! आपने मुझे ऐसे अपनाया कि जहाँ-जहाँ भी आपने मेरे जीवन में बाधाएँ देखीं, वहाँ-वहाँ आपने स्वयं ही उनका निवारण किया है। [1] मैं तो अत्यंत पतित और ...
अति टोंडिकु अति चिकनियाँ
ब्रज रस क्षेत्र के ठाकुर (श्री कृष्ण) अपने स्वाभाविक ठाठ-बाठ, अति टोडिक, छैल-छबीले एवं सिरताज स्वरूप से ऐंठ में भरे रहते हैं, परंतु निकुंज के (कुंज बि...
स्याम सब ही के जिय की जानत हैं
सबके स्वामी और सबके भीतर विराजमान श्रीबांके बिहारीजी सबके हृदय की बात भली भाँति जानते हैं। वे प्रत्येक व्यक्ति के अंतर्मन में उठने वाले सूक्ष्म से सूक...
रहैं अंग संग अनंग हरैं मनु
श्री कुंज बिहारी एवं कुंज बिहारिणी सदा एक संग रहते हैं। उनका सौंदर्य स्वयं कामदेव के मन को भी मोहित कर लेता है। श्रीकृष्ण का रूप नव-वर्षा के मेघ के सम...
श्री बिहारीदास मन सौं कहै
श्री बिहारिन देव अपने मन से उपदेश करते हैं — “अब तू सब ओर से भलीभांति स्वयं को हटा कर, केवल स्वामी श्री हरिदास जी के रस-यश में, अर्थात् युगल सरकार के ...
जेतो अन्तर वास में तेतो जानि उपास
श्री वृन्दावन धाम की प्राप्ति साक्षात् इष्ट की प्राप्ति ही है। जितना हम श्री वृंदावन धाम वास से पृथक हैं, उतना ही हम अपने उपास्य तत्व से भी विलग हैं। ...
श्रीबिहारीदास ब्रज में बसत
प्रेमधाम श्रीब्रजमंडल में बसने से हमें वे श्री बाँकेबिहारीजी महाराज प्राप्त हुए हैं, जो एक मात्र प्रेमी भक्तों से प्रेम के कारण ही सपरस (स्पर्श/आलिंगन...
पाँडे माटी में सनैं
पंडित निपट-कोरे मिट्टी के समान इस कर्मकाण्ड में ऐसे उलझे रहते हैं जिसका कोई ओर-छोर ही नहीं है। ऐसे बाह्य आडम्बरों से युक्त कर्मकाण्डी लोग सर्वोच्च प्र...
रसिकन सों ऐंठे फिरें बिमुखति भेंटत धाइ
कुछ लोग ऐसे स्वभाव के होते हैं जो रसिक उपासकों से तो सदाकाल अपनी अकड़ में भरकर रहते हैं और विमुखों (सांसारिक जीवों) से बड़े प्रेमपूर्वक मिलते हैं, उनक...
व्याकुल बिरह बिहार बिनु
हे सखी! रसिक-शिरोमणि लाल जी रस-बिहार के नख से शिख तक लोभी होकर ऐसे आधीन रहते हैं कि यदि थोड़ा-सा भी विहार में व्यवधान पड़ जाए तो वे व्याकुल हो उठते हैं...
श्री वृन्दावन जब देखौं तबहिं
हर बार जब भी मैं वृन्दावन को देखता हूँ, मुझे परमानन्द की प्राप्ति होती है। मेरा मन दैविक रस में जब भी डगमगाता है, वृन्दावन का दैविक प्रभाव मेरे जीवन ...
काम न आवै कौन हूँ
बहुत से लोग जन्मभर अपरस-सपरस अथवा बाह्य आचार-विचार में उलझे रहते हैं। मृत्यु के समय जब जीव खाट छोड़कर आगे की यात्रा पर जाता है, तब केवल भगवान से किया ...
सब सारनि को सार सुनि
रसिक अनन्य श्रीबिहारिनदेवजी का परम सिद्धांत है कि समस्त शास्त्रों का सार और भक्ति के समस्त तत्त्वों का चरम निष्कर्ष यही है कि अनन्य भाव और पूर्ण ममता...
नवल वृन्दावन नवल बसंत
श्री बिहारिन देव जी के शब्दों में नित्य ही नया वृन्दावन है, नयी बसंत है, नित्य नया युगल वृन्दावन रस है , नित्य नया आनंद है और अनंत काल तक इसका अंत नह...
मनसा बाचा कर्मना
मन, वाणी और कर्म—तथा सम्पूर्ण आत्मभाव से श्री नित्यविहारिणी जू को ही अपना सर्वस्व मानो। इसी दिव्य रस के प्रभाव से श्रीविहारिणी जू की दासी बनकर, उनके प...
सुनि मन मधुकर ज्ञान सिखाऊँ
हे मन रूपी भँवरे! तू ठौर-ठौर पर डोल रहा है, अब मेरी बात सुन। मैं तुझे ऐसा ज्ञान दूँगा जिससे तेरी रुचि श्री चरण-कमलों में उत्पन्न होगी और तू अगाध सुख क...
ऐसी स्वामिनी साहिबिनी
श्री बिहारिन देव के शब्दों में स्वामिनी श्री राधारानी अत्यन्त उदार हैं एवं रसिक अनन्य की नित्य सहायता करने वाली हैं। श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि म...
विभचारनि कौ संग तजि
यदि तुम व्यभिचारियों के संग को सर्वथा त्याग दो, एकमात्र निष्काम और अनन्य भाव से प्रिया-प्रियतम का भजन करो, केवल उनके सुख में ही सुखी रहो, तो तुम्हारे ...
तीरथ सकल लोक बंकुण्ठ तैं
इसमें कोई संदेह नहीं है कि समस्त तीर्थों से, वैकुण्ठ से भी श्रेष्ठ मथुरा है क्योंकि यह भगवान श्री कृष्ण की जन्म भूमि है। [1] इससे भी अधिक श्रेष्ठ ब्र...
कोऊ नेष्ठा नाम की
श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि कोई-कोई बिना स्वरूप, सुख और सम्बन्ध का विचार किए केवल नाम-जप में ही निष्ठा रखता है; किसी की निष्ठा नामी के ध्यान में ...
तहाँ नहीं कछु श्रम
तहाँ नहीं कछु श्रम तम न ग़म विरह भ्रम मान लवलेश प्रवेश न प्रसंगी। - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (160) अखंड नित्य विह...
जब तें प्रभुहिं नवायो माथ
जो भी व्यक्ति सच्चे हृदय से एक बार श्रीबिहारीजी महाराज की शरण में आ जाता है, उसकी भविष्य की सारी जिम्मेदारी ये अपने ऊपर ले लेते हैं और उसका हाथ पकड़ क...
बलिहारी जाऊँ जक परी
हे बिहारीदास! श्रीमद्भागवत् के वर्तमान वक्ता मुख से तो अत्यंत सरस व्याख्यान करते हैं और बार-बार दण्डवत कर विनम्रता का प्रदर्शन भी करते हैं, किन्तु जो ...
बांके विरदनि विदित बिहारी
श्री बिहारीजी अपने 'बाँके' इस विरद से प्रसिद्ध हैं। [1] यद्यपि श्री बांके बिहारी के अंश से ही समस्त अवतार होते हैं तथापि नित्य विहार लीला आस्वादन हेत...
एक दसा एकादसी एक इष्ट व्रत एक
श्री स्वामी हरिदास जी की अखंड नित्य विहार उपासना में सदा काल एक ही इष्ट (श्री बिहारी बिहारिनी) की अनन्य उपासना है एवं एक ही दशा की एकादशी रहती है। अर्...
सब ठाकुर कौ ठाकुर हरि
यद्पि श्री कृष्ण समस्त ठाकुरों के भी ठाकुर हैं, परन्तु उनकी ठाकुर ठकुरानी श्री राधा रानी हैं।
किये रहै एैंड बिहारी हूँ सौं
“ किये रहै एैंड बिहारी हूँ सौं, हम बेपरवाह विहारिनि के । ” - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (111) हम सदा...
मेरे नित्य किशोर अजन्मा
श्री बिहारिन देव कहते हैं कि हमारे राधा कृष्ण का जन्म नहीं होता, और वो नित्य ही किशोर अवस्था में रहते हैं, यूँ तो वह दो तन धारी हैं, परन्तु प्राण एक ह...
बसीवो श्री वृन्दावन को नीकौ
श्री वृन्दावन में निवास करना अत्यंत सुंदर है। प्रत्येक क्षण श्री बिहारीजी के दर्शन से प्रेम निरंतर बढ़ता रहता है। [1] नेत्र, कान और जिह्वा श्री राधा-क...
रसिक अनन्य की सभा
युगल के अनन्य रसिकों की सभा में कर्मकांडी लालची-लोग लज्जित हो जाते हैं, क्योंकि जहाँ प्रेम की प्रधानता में श्रीश्यामा-श्याम के नित्य-विहार की चर्चा ह...
श्रीबिहारिनदास को यह बिसन राधा नाम हृदय धरि वसि रहैं वृन्दावन
श्रीबिहारिनदास को यह बिसन राधा नाम हृदय धरि वसि रहैं वृन्दावन । - श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी श्री बिहारिन दास जी कहते हैं कि जीव अत्य...
सर्वोपरि कुँजबिहारिनी रानी
अकेले श्री राधा और राधा सर्वोच्च रानी हैं, जो निकुंज में हमेशा के लिए रहती है। यद्यपि श्री कृष्ण ब्रज के राजा हैं, लेकिन वह उनके द्वारा शासित हैं और ...
रसिक अनन्य सौं मिलै
परम रसिक आचार्य श्रीबिहारिनदेवजी महाराज बोध कराते हैं कि निरंतर रसिक अनन्यों का सत्संग करें और उनके मध्य ही इस 'रसोपासना' के रहस्यों का अनुशीलन करें। ...
देत आसीस विहारिनि दासी करहुं नवल नित रलियां
श्री बिहारीन देव श्री युगल सरकार को आशीर्वाद देते हैं और कहते हैं, की आप हमेशा श्री वृंदावन में नए-नए अद्भुत 'नित्य विहार' लीला का प्रदर्शन करते रहें...
श्री बिहारीदास परमारथी मिली
सच्चे परमार्थी जन को परस्पर श्री युगल रस एवं युगल यश को ही कहना, सुनना एवं चिंतन करना चाहिए। यह रस इतना दुर्लभ है कि संसारी लोगों को यह सुनकर सुहाएगा ...
लाल लड़ायें लाडियें
संसार के समस्त सुखों को भलीभाँति त्यागकर एकमात्र स्वामिनी जू और उनके प्राण-जीवन लाडिले लाल जू को लाड़ लड़ाओ।
दरसें परसें अंग अंग लसैं विलसैं सुख सिंधु न प्रेम अघैहूँ
जहां जहाँ भी कोई देखता है, श्री प्रेम रस सिंधु समुद्र श्री राधाकृष्ण के प्रत्येक अंग से रस ही रस बरसता है। श्री बिहारिन देव कहते हैं कि हम रसिकों के ज...
स्वर्ग नर्क की आस न त्रास
इस दुर्लभ नित्य विहार रस जो रसिकों द्वारा बताया गया है, उसके आगे न तो स्वर्ग का लालच है न नरक का भय है ।
अम्बर सम्बर बास बसे
जैसे घनघोर बादल आकाश में छा जाते हैं और फिर जल बरसाते हैं। यद्यपि वह जल नदियों को उमड़ाकर उनके किनारों और टीलों को ढहा देता है, फिर भी वह पुल के नीचे ...
जो चाहे चित दै, महिलन के अंग संग अनुसार
“ जो चाहे चित दै, महिलन के अंग संग अनुसार । ” - श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी श्री बिहारिन देव जी कहते हैं की जो निज महल अर्थात राधा रान...
प्यारी जू मोकों कृपा करो
हे प्यारी जू (श्री राधा)! मुझ पर कृपा करें कि मेरे हृदय में ऐसी प्रेम-रुचि उत्पन्न हो जाए कि आप कभी भी, क्षणमात्र के लिए भी, विस्मृत न हों। [1] आप स्...
जै श्रीवृन्दावन नव निकुंज में संतत सहज बिराजत जोरी
श्री वृन्दावन के नित्य नव निकुंज में सहज ही युगल सरकार बिराजते हैं और अत्यंत रहस्मय रस बरसाते हैं। यह रस अगाध है और इसकी महिमा का वर्णन करना असंभव है,...
एक आस एक वास करि
अपने हृदय में केवल एक ही आसरा रखो, एक ही धाम का आश्रय लें और एक ही इष्टदेव का अनन्य भजन करें। श्रीबिहारिनदेवजी का परम सिद्धांत है कि जब साधक एकनिष्ठ ह...
नामी नाम न भावई
स्वामी हरिदास जी की रस-उपासना में हमारे रसिक-शेखर श्रीयुगल तन, मन, मनसा, एवं रोम-रोम से एकमात्र अखंड नित्य-विहार में ऐसे वशीभूत हुए रहते हैं कि इस विह...
कूँची नित्य विहार की
वह परम रसमय 'नित्य-विहार', जिसकी प्राप्ति बड़े-बड़े साधकों एवं सिद्धों के लिए भी अत्यंत दुर्लभ है, उस निकुंज-धाम की चाबी रसिकेश्वर श्रीस्वामी हरिदासज...
कोऊ मदमाते भांग के, कोउ अमल अफीम
श्री बिहारी दास जी कहते हैं कि संसार में कोई भाँग के नशे में मदमस्त है, तो कोई अफीम के अमल में डूबा हुआ है। परंतु जो रसिक जन हैं, वे तो केवल श्री प्रि...
अवध उड़ीसा द्वारिका
नित्य विहार-रूपी दुर्लभ रस, जिसे ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी ने बरसाया एवं स्वीकार किया है, उसकी तुलना अवध, उड़ीसा, द्वारिका, बद्रीनाथ, केदारनाथ ...
मेरौ मन श्री वृन्दावन अटक्यो, राख्यो श्री हरिदास विपुल बल, भूली न इत उत भटक्यो।
मेरौ मन श्री वृन्दावन अटक्यो, राख्यो श्री हरिदास विपुल बल, भूली न इत उत भटक्यो। - श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (154) श्...
नित्य बिहारिनि दासी कहत श्यामा के रस बस
नित्य बिहारिनि दासी कहत श्यामा के रस बस, संतत श्याम अधीन दीन मन मोहन मृदु रस। - श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी नित्य बिहारिनि श्री राधारा...
अष्ट सिद्धि, नव निद्धि मुक्ति पद दें बौरावत दीख
अष्ट सिद्धि, नव निद्धि मुक्ति पद दें बौरावत दीख। श्री बिहारी दास अनन्य न टरि हैं, तजि वृन्दावन बीख। - श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी, सिद...
मन मेरे भज ले श्री कुंजबिहारी
(राग कलिंगडा) मन मेरे भज ले श्री कुंजबिहारी। सब सुख सागर रूप उजागर अंग संग प्रीतम प्यारी। श्री वृन्दावन घन नव निकुंज में करत केली भुजचारी। श्री बिहारी...
मेरे गति ब्रजपति के ब्रजवासी
मेरी गति तो साक्षात् श्री बिहारी बिहारिनि जू के दृढ़ उपासक श्री ब्रजवासी ही हैं, जिनकी प्राण जीवनी धन एक मात्र श्री वृन्दाविपिन विलासिनी प्यारी जू श्री...
मेरे विषै विसन वर वाम
मेरे विषै विसन वर वाम, तन गोरी मन भोरी नवल किशोरी राधा नाम । निस बासर जागत सोवत चितवत अंग अंग अभिराम । - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की ब...
जै श्रीवृन्दावन घन नव निकुंज
श्री वृन्दावन के नित्य नव निकुंज में सहज ही युगल सरकार बिराजते हैं और अत्यंत रहस्मय रस बरसाते हैं। यह रस अगाध है और इसकी महिमा का वर्णन करना असंभव है,...
मोहिं ब्रजबासिन सों बनि आई
श्री बिहारिन देव जी कहते हैं, कि ब्रजबासिन से हमारा प्रेम पुराना है, जिनके तन, मन में निरंतर एकमात्र श्री बिहारी-बिहारिनीजू ही बसे हुए हैं। [1] नका ह...
मोतिन के बोरे नहीं हंसन की नहि पांत
हीरे बोरे भरकर नहीं मिलते, न ही हंस पंक्तियों में चलते हैं। शेरों की भी भेड़ों-सी भीड़ नहीं होती, वैसे ही वास्तविक रसिकों की कोई जमात नहीं होती —वे अत...
श्री बिहारीदास हरिदास कौ, संतत सुखद विहार
हे बिहारीदास! तुम भली-भाँति सोच-विचार कर देख लो कि एक श्री स्वामीजू (हरिदास जी) का नित्य-विहार ही अखंड रूप से समस्त भाँति, सदाकाल सर्वोपरि सुखदायी रस ...
नवल वृन्दावन नवल बसन्त
श्री बिहारिन देव जी कहते हैं, श्री वृंदावन धाम नित्य नवीन है एवं नवीन ही यहाँ बसंत है। [1] जहां नव-नव द्रुम, लता-पताएं, बेल, कुंज आदि में प्रिया-प्रिय...
लक्ष्मीपति ब्रजपति को दुर्लभ, इनते कौन बड़ो अधिकारी
“लक्ष्मीपति ब्रजपति को दुर्लभ, इनते कौन बड़ो अधिकारी। ” - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी नित्य विहार रस तो ब्रजपति और लक्ष्मीपति को ...
पिता सुत बंधु कहा सम्बंध
हे भाई! यह सर्वथा अकाट्य सिद्धांत है कि इहलोक-परलोक दोनों में ही प्रेम के बिना कोई नाता नहीं हुआ करता। इस संसार में माता, पिता, पुत्र और भ्राता आदि के...
निंदा बिंदा भै नहीं
नित्य-विहार के अनन्य उपासक श्री बिहारिन देव जी महाराज का मनभावन दृढ़ व्रत ऐसा है कि अपनी प्राण-जीवन स्वरूप श्री नित्य-विहारिणी जू (श्रीराधा) के श्रीमु...
रसिक अनन्य की सभा
रसिक अनन्य (श्री युगल के निष्काम, अनन्य भक्तों) की सभा में कर्मकांडी लालची लोग लज्जित हो जाते हैं, क्योंकि जहाँ प्रेम की प्रधानता में श्री श्यामा-श्या...
रसिक अनन्य सौं मिलै
श्री बिहारिन देव जी कहते हैं, "रसिकों से मिलें और 'रसोपासना' (आनंदमय भक्ति) पथ के बारे में चर्चा करें। केवल और केवल श्री कुँजबिहारिणी श्री राधा का भजन...
जो चाहे चित दै, महिलन के अंग संग अनुसार
- श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी श्री बिहारिन देव जी कहते हैं की जो निज महल अर्थात राधा रानी के महल में निवास करती हैं ऐसी सखियों के अंग सं...
देत आसीस विहारिनि दासी करहुं नवल नित रलियां
- श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी श्री बिहारीन देव श्री युगल सरकार को आशीर्वाद देते हैं और कहते हैं, की आप हमेशा श्री वृंदावन में नए-नए अद्भ...
नित्य बिहारिनि दासी कहत श्यामा के रस बस
नित्य बिहारिनि दासी कहत श्यामा के रस बस, संतत श्याम अधीन दीन मन मोहन मृदु रस। - श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी नित्य बिहारिनि श्री राधारानी...
जै श्रीवृन्दावन नव निकुंज में संतत सहज बिराजत जोरी
जै श्रीवृन्दावन नव निकुंज में संतत सहज बिराजत जोरी | अति अगाध महिमा रस जिनको सो पीवत इक कृपा किसोरी || - श्री बिहारिन देव - श्री बिहारिन देव जी की व...
किये रहै एैंड बिहारी हूँ सौं
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (111) हम सदा बिहारीजी से भी बेपरवाह रहते हैं क्यूंकि हम विहारिनि श्री राध...
श्रीबिहारीदास बिहार मैं
नित्य विहार का रस वेद भी नहीं जान सकते। इसे तो केवल वही जान सकते हैं, जिन्हें सखियाँ महा-मधुर रस को छानकर प्रेमपूर्वक जना दें।
श्रीवृन्दावन निधि सब सुख धांम
जब तक ज्ञान-विवेक द्वारा मन से भली प्रकार विचार करके अद्भुत रसमय भूमि श्री वृन्दावन-निधि की शरण नहीं ली हैं, तब तक आपको वास्तविक बल, बुद्धि और विश्राम...
अष्ट सिद्धि, नव निद्धि मुक्ति पद दें बौरावत दीख
अष्ट सिद्धि, नव निद्धि मुक्ति पद दें बौरावत दीख। श्री बिहारी दास अनन्य न टरि हैं, तजि वृन्दावन बीख। - श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्ध...
जा रज सौं जग रज कहै
प्रायः जीव संसारी माया की तलाश में कहाँ-कहाँ जाता है और दिन-रात प्रयत्न करता है, एवं माया-रूपी रज का ही सेवन करता है जो अहंकार को पुष्ट करती है। परन्त...
प्यारी जू मोकों कृपा करो
हे प्यारी जू (श्री राधा)! मुझ पर कृपा करें कि मेरे हृदय में ऐसी प्रेम-रुचि उत्पन्न हो जाए कि आप कभी भी, क्षणमात्र के लिए भी, विस्मृत न हों। [1] आप स्व...
श्रीबिहारिनदास को यह बिसन राधा नाम हृदय धरि वसि रहैं वृन्दावन
- श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी श्री बिहारिन दास जी कहते हैं कि जीव अत्यंत प्रकार के नशे करता है जो तुरंत उतर जाता है और दुख/अशांति प्रदान...
कूँची नित्य विहार की, श्री हरिदास हाथ
कूँची नित्य विहार की, श्री हरिदास हाथ | सेवत साधक सिद्ध सब, जाचत नावत माथ | - श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (530) नित्य...
अवध उड़ीसा द्वारिका, बद्री अरु केदार
अवध उड़ीसा द्वारिका, बद्री अरु केदार। ए न होहिं हरिदास के, समाईं न नित विहार। - श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (237) नित्...
श्री बिहारीदास परमारथी मिली
सच्चे परमार्थी जन को परस्पर श्री युगल रस एवं युगल यश को ही कहना, सुनना एवं चिंतन करना चाहिए। यह रस इतना दुर्लभ है कि संसारी लोगों को यह सुनकर सुहाएगा ...
लाल लड़ायें लाडियें, ललना सौं करि लाड
लाल लड़ायें लाडियें, ललना सौं करि लाड | श्री बिहारिनि दास संसार के, और सकल सुख छाड़ || - श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी ...
मेरे नित्य किशोर अजन्मा
- श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (143) श्री बिहारिन देव कहते हैं कि हमारे राधा कृष्ण का जन्म नहीं होता, और वो नित्य ही क...
सब ठाकुर कौ ठाकुर हरि
- श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी, रस के सेवैया (1) यद्पि श्री कृष्ण समस्त ठाकुरों के भी ठाकुर हैं, परन्तु उनकी ठाकुर ठकुरानी श्री राधा रानी...
स्वर्ग नर्क की आस न त्रास
स्वर्ग नर्क की आस न त्रास | जे रस रसिक बिहारिनि दास || - श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी इस दुर्लभ नित्य विहार रस जो रसिकों द्वारा बताया गया...
मेरौ मन श्री वृन्दावन अटक्यो, राख्यो श्री हरिदास विपुल बल, भूली न इत उत भटक्यो।
मेरौ मन श्री वृन्दावन अटक्यो, राख्यो श्री हरिदास विपुल बल, भूली न इत उत भटक्यो। - श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (154) श्री...
नवल वृन्दावन नवल बसंत
श्री बिहारिन देव जी के शब्दों में नित्य ही नया वृन्दावन है, नयी बसंत है, नित्य नया युगल वृन्दावन रस है , नित्य नया आनंद है और अनंत काल तक इसका अंत नही...
श्री वृन्दावन जब देखौं तबहिं
हर बार जब भी मैं वृन्दावन को देखता हूँ, मुझे परमानन्द की प्राप्ति होती है। मेरा मन दैविक रस में जब भी डगमगाता है, वृन्दावन का दैविक प्रभाव मेरे जीवन क...
सब सारनि को सार सुनि
श्री बिहारिन दास जी कहते हैं कि सब सारों का सार और सब भक्ति तत्त्वों का अन्तिम तत्त्व है कि अनन्यता एवं ममत्वपूर्वक एकमात्र श्री युगल सरकार में हर क्ष...
कोऊ मदमाते भांग के, कोउ अमल अफीम
कोऊ मदमाते भांग के, कोउ अमल अफीम, श्री बिहारीदास रसमाधुरी, मत्त मुदित तोफीम || - श्री बिहारिन देव - बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (297) को...
दरसें परसें अंग अंग लसैं विलसैं सुख सिंधु न प्रेम अघैहूँ
जहां जहाँ भी कोई देखता है, श्री प्रेम रस सिंधु समुद्र श्री राधाकृष्ण के प्रत्येक अंग से रस ही रस बरसता है। श्री बिहारिन देव कहते हैं कि हम रसिकों के ज...
साधन श्रम न कछु किये न कछु करने जोग
न तो मैंने कोई साधन किया है, और न ही करने योग्य हूँ। यह तो एकमात्र बिहारिनी श्री राधा रानी की कृपा है कि सहज ही वृन्दावन रस अर्थात् नित्य विहाररूपी रस...
ऐसी स्वामिनी साहिबिनी
श्री बिहारिन देव के शब्दों में स्वामिनी श्री राधारानी अत्यन्त उदार हैं एवं रसिक अनन्य की नित्य सहायता करने वाली हैं। श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि म...
बसीवो श्री वृन्दावन को नीकौ
(राग कलिंगडा) बसीवो श्री वृन्दावन को नीकौ, छिन्न छिन्न प्रति अनुराग बढ़त दिन, दरस बिहारीजी कौ ॥ [1] नैंन श्रवण रसना रस अँचवत, अंग संग प्यारी पी कौ | श्...
एक आस एक वास करि
केवल एक ही आशा रखो, एक ही धाम रखो, एक ही इष्टदेव का भजन करो। श्री बिहारिन देव जी कहते हैं—एक अनन्य भाव से भजन, युगल सरकार में विश्वास और रस में नित्य ...
सर्वोपरि कुँजबिहारिनी रानी
सर्वोपरि कुँजबिहारिनी रानी | सबै परजा ब्रजराज हूँ, लौं सर्वोपरि कुँजबिहारिनी रानी || - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के क...