shri vnshi ali
Biography & History
shri vnshi ali Collected Verses
राधे तेरे नैन कटारे
हे श्री राधे, आपके नैन कटाक्ष अति तीक्ष्ण हैं। एक ओर श्री ललिता जू सहित अन्य सखियाँ जैसे घायल होकर वन वन भटक रही हैं और दूसरी ओर श्री कुंजबिहारी, जो इ...
विषयाक्त चित्तोऽपि श्वपाकोऽपि महत्तमः
श्रीराधा का नाम निरन्तर गान करने वाला और श्री ललिता जी को गुरु मानने वाला चाण्डाल विषयों में आसक्त होने पर भी सबसे श्रेष्ठ है।
राधा मम नैन-प्रान
राधा मम नैन-प्रान, राधा सुख-सम्पत्ति है, राधा मुख-कमल मेरे हियको आधार है। [1] धर्म पूज्य लोक इष्ट मित्र वेद राधा ही, राधा कौ नाम मेरी रसना उचार है॥ [2...
स्याम सलौनी राधिका, गोरी राधा बाल
श्री राधा को सर्वत्र देखने वाली सखी कहती है, साँवरे श्री श्यामसुंदर भी श्री राधा हैं, गोरी श्री श्यामा जू तो श्री राधा ही हैं, समस्त सहचरिगण भी श्री ...
अब जिन करो अबार लड़ैती जू
हे लड़ैती जू, अब देर न कीजिये, मेरी नाव भव सागर में अटकी हुई है। मेरे जैसा अधम और आपके जैसा उद्धार करनेवाला कोई और नहीं है। [1] मैं विषय रस में डूबा ह...
हौं दासी बिन मोल की, तुम्हरी हौं सुकुँवारि
वंशी अलि जी के रास लीला से सम्बंधित काव्यों में गोपियों का श्री राधा के प्रति प्रियतम भाव है, उनकी उपासना में श्री कृष्ण का ना के बराबर स्थान है। श्री...
हौं वृषभानु नन्दिनि भजौं
श्री वंशी अली जी कहते हैं "युगल किशोर श्री राधा कृष्ण की सहचरी कहाने से मेरे मन में लाज आती है, परन्तु सत्य यह है की मैं तो श्री राधा का ही भजन करता ह...
परी रहौं वृषभानु के द्वारैं
श्री वंशी अली जी कहते हैं "मैं महाराज विषभानु के महल के द्वार पर पड़ा रहूँगा, जहाँ मेरी लाड़िली श्री राधा हैं।" [1] उसी द्वार से श्री राधा खेलते हुए आत...
नरक पड़न आछो लगे कुमरि चरण के हेत
हे किशोरी जी (श्री राधा)! आपके श्री चरणों के सानिध्य के लिए मुझे नरक में गिरना भी स्वीकार्य (अच्छा) है, किंतु उन श्रीचरणों के बिना मुझे स्वर्ग या सुंद...
नाहिं लोक सों लाज है, नाहिं वेद सों काज
अब न तो मुझे लोक-मर्यादा की कोई लज्जा है और न ही वेदों के विधान से मेरा कोई प्रयोजन रह गया है। मेरा एकमात्र सम्बन्ध तो केवल श्री राधा महारानी जू से है...
विफलीकृतचंद्रमण्डले राधे पाद
जिनकी पद नख चंद्रिका ने चंद्र मंडल को निस्तेज कर दिया है, ऐसे श्री राधा के चरणों में करुण क्रंदन युक्त होकर मैं श्री वृंदाविपिन के आमोद और रस के आश्र...
विशोकजे, भानुसुते, किशोरिके, राधे
श्री राधा जो विशोकजा तथा श्री वृषभानु की पुत्री हैं, वह अपने भक्तों को अभय प्रदान करती हैं एवं उन पर स्नेह की वर्षा करती हैं। श्री राधा ही मेरी एक मात...
कुँवरि किशोरी राधे सुख की रासि
कुँवरी किशोरी श्री राधे ही सुख की राशि हैं। हे लाड़िली, अब तो मुझे आपकी कृपा की आशा है एवं बरसाने के वास पर ही भरोसा है। [1] हे छबीली, मुझे अब अपनी क...
रुचिर धाम वृंदाविपिन पुर वृषभान उदार
श्री वृन्दावन धाम परम सुंदर और रुचिकर है एवं बरसाना धाम परम उदार है जहाँ (बरसाना में) श्री गह्वर वन में श्री राधा-कृष्ण का नित्य विहार चलता रहता है।
हिंडोरैं झूलत राधा प्यारी
श्री राधा प्यारी हिंडोरा (झूला) झूल रही हैं। उनका मुख कमल गोरा है एवं उन्होंने कुसुंभी (केसरिया) रंग की साड़ी धारण किया है। [1] श्री राधा इस प्रकार प्...
नानावतारस्तव देवि मायया
श्री राधा की दैविक माया से ही नाना प्रकार के अवतार होते हैं और नंद का पुत्र उनकी चरणों की रज से उत्पन्न हुआ है। लालित्य की सीमा, श्री ललिता की चरण कृप...
सेव्य सदा श्रीराधिका सेवक नन्द कुमार
श्री वृन्दावन के सुंदर नित्य विहार में श्री राधिका ही सदा सेव्य हैं; और श्री श्यामसुंदर तथा सहचरियाँ उनकी नित्य सेवक हैं।
भक्तसुखाय युगलस्वरूपप्रकाशकर्त्री
अपने निज भक्तों के सुख के लिए ही अपने युगल रूप का प्रकाश करने वाली भी श्री राधा ही हैं।
सब तत्वनि कौ सार जो जुगल विहार है
समस्त तत्त्वों का सार यदि श्री श्यामा-श्याम का युगल-विहार है, तो उसका भी परम सार कीरति सकुँवारी श्री राधा हैं।
गोरी रूप सुधा रस बरसत
श्री राधा गोरी का रूप सुधा रस बरस रहा है जिसको श्री लाल जी [कृष्ण] के नयन अनवरत प्यासे चातक पक्षी की तरह पुलकित होकर पी रहे हैं। [1] प्रेम की बेली लल...
दूलह श्री वृषभानकुमारी दुलहिन श्यामल गात जू
श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि सहचरियों का पतिव्रत-धर्म श्री कृष्ण में नहीं, श्री राधा में है। उनकी दृष्टि में श्री राधिका दूल्हा हैं और श्यामल गात जू द...
आनंदनिधि तुम ही श्रीराधा
आनंद की निधि श्री ललिता सखी श्री राधा का ही अभिन्न स्वरूप हैं जिन्होंने अपनी ही [राधा की ही] भक्ति करने के लिए दो रूप धारण किए हैं (अर्थात् श्री राधा ...
राधा नाम रटे जोई, तासों मेरो संग
जो नित्य राधा-नाम को रटते हैं, उन्हीं के साथ मेरा सच्चा संग है। मेरी अविचल रति और अनन्य प्रीति केवल श्री राधा के चरणों में ही स्थित है।
राधा जीभ रटों सदा
मेरी जिह्वा सदा “राधा” रटती है, मेरे कान सदा “राधा” सुनते हैं। मेरे नयन सदा श्री राधा को ही देखते हैं; श्री राधा के अतिरिक्त मेरी कोई गति नहीं है।
सहचरि करै सोइ मोइ भावै
प्रिया प्रियतम का विहार सहचरी की इच्छा के अनुकूल ही होता है। जो ललिता जी करती हैं वही प्रिया प्रियतम को भाता है और जो प्रिया प्रियतम की इच्छा होती है...
श्री राधा मेरे प्रान धन
श्री राधा ही मेरा प्राण धन है, श्री राधा ही मेरा जीवन है एवं श्री राधा की गौर वर्ण की छवि ही मेरी आँखों में नित्य समाई हुई है।
जे जे राधा नाम कौं, भजत जगत में जान
जो भी इस संसार में श्री राधा-नाम का भजन करते हैं, वे सब मुझे अपने प्राणों के समान प्रिय लगते हैं।
श्री हरिवंश स्वरूप हैं श्रीहरिदास उदार
श्री वंशी अलि जी के अनुसार श्री हरिवंश एवं श्री हरिदास दोनों एक ही स्वरूप हैं, जिन्होंने प्रिया-प्रियतम के निज महल के नित्य विहार रस का ही वर्णन किया ...
लाल नैंन में कुंवरि है, कुंवरि चरण में लाल
श्री कृष्ण के नैनों में राधिका रहती हैं, श्री राधा के चरणों में श्री कृष्ण रहते हैं, और श्री ललिता जी के हृदय में दोनों राधा-कृष्ण सदा रहते हैं, जिनका...
जलबिहार ते आदि सुष, सषियन के ही हेत
श्री राधा विविध लीलाएँ, जैसे जल-विहार आदि, अपनी सखियों के आनंद के लिए करती हैं। प्रत्येक सखी अपने विशिष्ट भाव के अनुसार उस लीला-रस का आस्वादन करती है।
जे श्रीराधा चरन उपासी
जो श्री राधा के चरणों के अनन्य उपासक हैं उनके चरणों में नित्य सेवा करनी चाहिए। [1] उनके चरण कमलों का प्रसाद पाकर ही समस्त प्रकार के मन के विकार एवं द...
लटकि चलत राधा गरबाहीं
जब श्री राधा श्री श्यामसुन्दर को गलबाहीं दिये लटक कर चलती हैं तब उनकी अलकें थिरकते हुए उनके चेहरे पर आती हैं। वृषभानु दुलारी श्री राधा की मुस्कान को द...
मंजीर मंडित चरण पंकज
श्री ललिता जी के दिव्य चरण कमलों में नूपुर अलंकृत हैं एवं उनके नख (नाखून) की कांति चन्द्र के समान उज्जवल है। [1] श्री राधा की कृपा प्राप्त करने के लि...
देख्यो नेही नंदकिसोर
इस पद में नित्य विहार रस के संयोग एवं वियोग की एक साथ अवस्था की विचित्र दशा का वर्णन किया गया है। श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि श्री लालजी की प्यारी जू...
आदौत्वमेवासि तथावसाने
हे श्री राधा! जगत की सृष्टि के आदि में तुम ही थीं, मध्य में तीन प्रकार से - विष्णु, ब्रह्मा और रुद्र बनकर सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार आदि तीन प्...
नरक परन आछो लगे कुंवरि चरन के हेत
यदि श्री राधा के चरणों का संग प्राप्त हो, तो नरक का वास भी मुझे प्रिय होगा। परंतु उनके चरणों के बिना, चाहे मुझे सुंदर निकुंज का वास ही क्यों न मिल जा...
नृपति निकुंज विहारनि रानी
निकुंज की महाराज श्री निकुंज बिहारिनी श्री राधा हैं। ऐसे निकुंज की श्री ललिता जी मंत्री हैं जिनके विभिन्न परिकरों की सेना है और वहाँ के सेवक श्री लालज...
सुनो जी कानैं नूपूररो झनकार
श्री राधा जू के चरणों के नूपुर की झंकार को अपने कानों से सुना है। हे किशोरी लड़ैती जू, अब ऐसी कृपा हो कि आप मुझे अपना बनाकर, अपने परम अंतरंग नित्य विह...
कुंवर लली वृषभान की मेरे जीवन प्रान
श्री वृषभानु कुँवरी श्री राधा ही मेरे जीवन की प्राण हैं। मैं इस वृंदावन धाम की शपथ ग्रहण कर कहता हूँ कि उनके अतिरिक्त मेरे ह्रदय में अन्य कोई नहीं निव...
लालन मन राग भाल बैंदी लाल
श्री लालजी (कृष्ण) का मन श्री राधा के भाल पर विराजमान बिंदी से आसक्त है। लाड़िली श्री राधा की घुंघराली अलकावलि उनके मुख पर ऐसी प्रतीत होती है मानो चंद्...
जय जय श्री राधिका पद कमल
श्री राधिका के चरण कमलों की जय हो जो सखियों के मन को सुख प्रदान करने वाले हैं एवं रसिक जनों के जीवन का आधार हैं। [1] लक्ष्मीपति श्री हरि, शुकदेव, एवं...
श्री ललिता हरिवंश वपु
श्री वंशी अलि जी के अनुसार स्वयं श्री ललिता जी ही श्री हित हरिवंश के स्वरूप में कुँवरि श्री राधा की चरण माधुरी को विश्व में प्रकाशित करने हेतु इस धरा ...
नयन ही में नयन रहें हिय में हियो समाय
श्री राधा के नयनों से श्री कृष्ण के नयन मिलते रहें, ह्रदय में ह्रदय समाया हो, भुजाओं से भुजाएँ लिपटी हों—बस यही (नित्य विहार) रस ह्रदय को भाता है।
राधा चेरी हों सखी मेरे मन नहिं आन
हे सखी, मैं श्री राधा की ही अनन्य दासी हूँ, मेरे मन में श्री राधा के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है। श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि श्री राधा के निज जन की सब...
लालन सोई प्रिया पद गुरु सोई प्रिया उपास
मैं उन श्री लाल जी (श्री कृष्ण) को ही जानता हूँ जो श्री राधा के चरणों के अनन्य दास हैं, और उन गुरुदेव को ही जानता हूँ जो श्री राधा की अनन्य उपासना करे...
श्री राधिका-पद-कमल माधुरी परम रस
श्री राधारानी के चरण कमलों की अपार रस-माधुरी का गान, श्री हित हरिवंश के अतिरिक्त और कौन कर सकता है? ये दिव्य चरण कमल वेदों और पुराणों के लिए भी अगम्य...
राधा अंग सिंगार हौं, जावक दैहौं पाँव
श्री राधा के अंगों को श्रृंगार कर, उनके चरणों में जावक लगाती हूँ। कभी कभी श्री राधा से ही प्रेमपूर्वक झगड़ा भी करती हूँ क्योंकि उनके अतिरिक्त मेरी और ...
प्रीति की रीति रसिकनी जानैं
प्रीति की रीति तो परम रसिकनी श्री राधा ही जानती हैं। इसी कारण वे अपने प्रियतम को सदा संतुष्ट रखती एवं एक क्षण को भी मान नहीं ठानकर सदा उनका पोषण करती ...
प्रीति तौ श्री राधा ही सों कीजै
यदि प्रेम करना है तो श्री राधा से ही कीजिए क्योंकि वे ही जीवन और मरण में अर्थात् सदा साथ निभाने वाली हैं, जिनके बिना यह मनुष्य शरीर धारण करना व्यर्थ ...
छकन छके जे राधिका, तिनहें न और सुहाय
जो उपासक श्रीराधिका के रस में छक गए हैं, उन्हें और कोई रस सुहाता नहीं। जैसे अंगूर का स्वाद चखने के बाद कोई नीम का फल नहीं खाता।
हित की बात लाड़िली जानैं
केवल श्री लाडलीजी (श्री राधा) ही हित (प्रेम) की बातों को जानती हैं। जो प्रेम विहीन हैं उनसे भी वे प्रेम को निभाना जानती हैं एवं सदा अपने ह्रदय में करु...
नैनन नासिका राधिका
मेरे नयन, नासिका एवं सभी अंग राधिका हैं, श्री राधा ही मेरे हृदय और वचनों में संपूर्ण रूप से विराजती हैं। ऐसा अब मेरा सहज स्वभाव बन चुका है कि मैं श्री...
राधा ही के भजन से पाऊँ राधा बाल
श्री राधा का अनन्य भजन करके ही श्री राधा को प्राप्त किया जा सकता है जिसके पश्चात् वे नित्य ही हंस हंस कर निहारती हैं एवं निहाल करती रहती हैं।
रूप की राशि किशोरी मोहिनी मन हरयौ है
रूप की राशि किशोरी मोहिनी श्री राधा ने मन को मोह लिया है। उनके नेत्रों में कृपाण की तीव्र धार है और मनोहारिनी मुस्कान जादू सा कुछ करती है। [1] उनकी घ...
नेह खेत की द्रुमलता, सहचरी मोहनलाल
सहचरीगण और मोहन लाल श्री कृष्ण प्रेम-खेत की द्रुम-लता के समान हैं, श्री राधा नित्य ही उनको अपनी करुणामयी दृष्टि डालकर रूप के जल से सींचती हैं।
रसिक अनन्य मुकुट हमरे
श्री राधा के चरणों की जय हो जिनमें हमारे रसिकों के अनन्य मुकुट मणि, सदा काल, रमें रहते हैं। [1] जिन श्री चरणों की कृपा प्रसाद से मन का कोई ग़म शेष नह...
नाहीं और रस की तहाँ खटक कहूँ दिन रात
इस एकांतिक निज महल के रस में प्रिया प्रियतम को रात-दिन नित्य विहार के अतिरिक्त अन्य कोई रस नहीं भाता। यहाँ प्यारी राधिका रस माधुरी से श्री कृष्ण का पो...
ताके मुख की हौं बलि जाउँ
मैं उन पर बलिहारी जाता हूँ जो श्री राधा का नाम जपते हैं। वही मनुष्य परम रस को प्राप्त करता है जो श्री राधा का नाम जपता है। [1] मुझे श्री लाल जी (कृष...
भजो कीरति नन्दिनी श्रीश्यामा
कीर्ति नंदिनी श्री राधा का अनन्य भजन करो। वे वृषभानु बाबा की अति ही लाड़िली पुत्री हैं एवं जिनके भैया श्रीदामा ने उन्हें लाड़ लड़ाया है। [1] वह ललिता...
अति अलवेली भाँति सौं लई मुरलिका हाथ
जब श्री राधा ने अत्यंत अलबेली और मोहक रीति से अपने करकमलों से वंशी उठाकर अपने होठों से मधुर स्वर में वंशी वादन किया, तो उसकी स्वर-माधुरी से वृंदावन के...
श्री वृन्दावन रानी साहिबनी
श्री वृन्दावन धाम की साहिबनी (मालकिन) श्री राधा हैं। ऐसी स्वामिनी के श्री चरणकमलों की सेवा हमें भली प्रकार से जम गई है। [1] फिर यदि ललिता आदि सखियों ...
नमो नमस्तेऽस्तु परात्परायै
मैं बारंबार उनको प्रणाम करता हूँ, जो सर्वोपरि हैं, जिनके परे कुछ नहीं है, जिनका नाम राधा है और जो सम्पूर्ण सृष्टि की पालक हैं। जो कोई एक बार भी उनका न...
प्रीतम कुंवारि चरन बिनु को है
श्री राधा की परम अनन्यता धारण किए हुए एक सहचरी कहती है कि मेरा प्रियतम (प्रेम/लाड़ लड़ाने योग्य) किशोरी जी के चरणों के अतिरिक्त और कौन है? सम्पूर्ण जग...
तुही एक राधा कुँवर दृग दरशत नहिं और
हे श्री राधा! केवल आप ही मेरे जीवन का सर्वस्व हैं। मेरे नेत्र आपके अतिरिक्त किसी अन्य के दर्शन की चाह नहीं रखते। हे रसिक शिरोमणि! इसी कारण मैं केवल आप...
श्री राधे अब तो होरी आनि बनी है
हे श्री राधे, होली का पर्व आ गया है, परंतु आपके बिना मेरा हृदय सूना पड़ा हुआ है। आपके मिले बिना, मैं इस उत्सव को कैसे बिताऊँ? [1] हे मेरी स्वामिनी, ज...
मंडल रास रच्यौ बिमल निर्तति कुँवरि सुजान
जब श्री राधा ने रास मंडल में प्रत्येक गोपी के संग नृत्यमय रास रचाया, तब ब्रज-बालाओं को वास्तविक आनंद की परम अनुभूति हुई। उस दिव्य रासलीला के अद्भुत प्...
नैन बैन राधा गहे, रहे प्रीति के टारि
श्री राधा नागरी ने सखियों के नयनों एवं वाणी को पकड़कर अपनी प्रीति के वशीभूत कर लिया है। अब श्री राधा मुख को देख-देखकर सखियों के रोम-रोम में फुलवारी फू...
श्री बिशोक नंदिनी बिनु कौहै
श्री बिशोक नंदिनी, श्री ललिता जी के अतिरिक्त और कौन है जो मेरे जैसे पतित जीव का उद्धार और निर्वाह कर सके? ऐसी अहेतुकी करुणा और अनंत दया तो केवल श्री ल...
मो निर्धन की ललिता संपति
मेरे जैसे निर्धन की सम्पत्ति श्री ललिता सखी ही हैं। मेरा हृदय एक क्षण के लिए भी उन्हें विस्मृत नहीं कर पाता; वह निरंतर उनसे बँधा रहता है और हर पल उनके...
हौं रूसोंगी कुँवरि सों, कुँवरि मनावै मोहि
मैं कुँवरि (श्री राधा) से प्रेमपूर्वक रूठ जाऊँ, तो श्री राधा ही मुझे मनाएँगी। परंतु यदि कभी श्री राधा मुझसे रूठ जाएँ, तो मैं उनके चरणों में गिरकर उन्ह...
गहि गहि राधा कर कमल झूमक नाचौं नाच
श्री राधा के कोमल, कमल-से हाथों को बार-बार थामकर, झूमते हुए नाचूँ और चरणकमलों को सच्चे (शुद्ध) मन से अपने नेत्रों से लगाऊँ।
जिहिं जिहिं अंगनि दृष्टि परतहो लडैती
हे प्यारीजू! तुम्हारे जिस-जिस अंग पर मेरी दृष्टि पड़ती है, मेरा मन वहीं ठहर जाता है। मैं तुम्हारी सौगंध खाकर यह कहता हूँ कि मैं तुम्हारा ही नित्य दास ...
कसूंबी सारी पहरें सोधें सनी
श्री राधा कुसुंबी (गहरी लाल) रंग की साड़ी में, मोहन (श्री कृष्ण) के मन को भी मोहने वाली मोहिनी स्वरूपा, नित्य सुसज्जित हैं। [1] उनकी कमान-सी भौंहें ...
जय जय श्री ललिता ललित
श्री ललिता जी की जय हो, जो सदैव युगल (श्री राधा कृष्ण) के आनंद को बढ़ाने वाली हैं। वे कीर्ति-नंदिनी, श्री राधा को अपना जीवन-प्राण मानती हैं। [1] वे अ...
जय जय निज आनंद लड़ावनि लाड़ली
श्री ललिता जी की जय हो जिनका निज आनंद कोई और नहीं स्वयं श्री राधा हैं जिन्हें वे बड़े ही प्रेम से लाड़ लड़ाती हैं। वे हर क्षण प्रेम में अति उन्मत्त हो...
कुंज महल रंग हो हो होरी
निकुंज रूपी महल में होली के रंगों की धूम मची हुई है, जहाँ नित्य किशोर श्री कृष्ण और नित्य किशोरी श्री राधा प्रेम की होली खेल रहे हैं। ताल, मृदंग, झाँझ...
श्री वृषभान कुमार नित नाम कुँवर नंदनन्द
श्रीवृषभानु-कुमारी श्रीराधा एवं नन्दनन्दन श्रीकृष्ण सदा नित्य-विहार-रस में निमग्न रहते हैं और अपनी सखियों के हृदयों को आनन्दरस में अभिषिक्त करते रहते ...
हौं कहि हों नाहिंन कछू पोढ़ी कुंवर सुखरास
सुख की राशि किशोरी जब पौढ़ी होंगी, मैं कुछ भी नहीं बोलूँगा, उनको निहार-निहार कर मेरे ह्रदय में उनके मुख दर्शन की प्यास और-और बढ़ेगी।
मोसों हँसि हो लाडिली हौं हँसिंहों तेहि सँग
मेरे साथ श्रीलाड़िलीजी (राधा) हँसती-खेलती हैं और मैं भी उनके साथ हँसती हूँ। जब वे प्रेम में भरकर मुझे गुदगुदी करके हँसाती हैं, तब मैं भी उनके अंगों को...
लतनि तजि नैनन भरि चितई
श्री राधा वन से प्रकट होती हैं और श्री कृष्ण को निहारती हैं (एवं नयन कटाक्ष से श्री कृष्ण के हृदय पर वार करती हैं) जिससे श्री कृष्ण अपनी सुधि खो देते ...
श्री ललिता सिखवत रस परिकर की
निकुंज-सेवा की आचार्या श्री ललिता सखी समस्त सखी-परिकर को दिव्य निकुंज-रस की पद्धति और रस-रीति का बोध कराती हैं। हे सखी! ऐसी कृपा हो कि मुझे वृषभानपुर ...
बेटी श्री वृषभानु की मेरी जीवन प्राण
श्री वृषभानु नंदिनी, श्री राधा ही मेरी जीवन-प्राण हैं। मैं इस पावन वनभूमि (श्री वृन्दावन) की सौगंध खाकर कहता हूँ कि उनके सिवा मेरा कोई और आश्रय या गति...
शाखोपरिष्ठा इह चन्द्रलेखा, भवेद्यथोक्तिः परमल्पदृष्टेः
जैसे किसी अत्यंत अल्प दृष्टि वाले व्यक्ति को यह कहकर कि “देखो उस वृक्ष की शाखा के ऊपर चंद्रमा दिखाई दे रहा है, संकेत से चंद्रमा का बोध कराते हैं”। उसी...
ईश्वर ताई कुंवरि मै
श्री धाम वृंदावन के नित्य विहार में ईश्वरत्व श्री राधा में है और दासत्व श्री कृष्ण में है। श्री राधा सदा अपनी कृपा दृष्टि डालकर श्री कृष्ण को निहाल क...
राधा पलिका पौढ़ि है बैठि पलोटों पाइ
जब श्री राधा अपने पलंग पर शयन कर रही होंगी, तो वहीं पास में बैठकर उनके चरणों को प्रेमपूर्वक दबाऊँगी। नेत्रों से अश्रु प्रवाहित करते हुए, श्री राधा के ...
सखी लालन को पयोष प्रिया-पद-रस प्याइ
सखियाँ श्री कृष्ण का पोषण श्रीराधिका के चरणों का रस पिलाकर करती हैं और श्री कृष्ण सखियों को श्रीराधा के गुणों का गान कर प्रसन्नता देते हैं।
लालन तन नैनन भरि चितई
श्री कृष्ण (लाल) ने प्रिया जी के श्रीअंगों को नेत्र भरकर निहारा। उस रूप माधुरी को देखकर वे मूर्छित होकर गिर पड़े और अपनी देह की सुधि भुला दी; ऐसा प्रती...
हंस हंस कंठ लगाय है मोको मेरी जीव
मेरी प्राणप्यारी, श्री लाड़ली प्यारी जू (श्री राधा), मुझ पर अपनी अनंत करुणा बरसाते हुए हँस-हँस कर मुझे बार बार गले से लगाती हैं और अपने अमृततुल्य खंडि...
ललिता बिनु क्यों राधा पैयेयै
श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि श्री ललिता सखी की कृपा के बिना श्री राधा को कोई प्राप्त कैसे कर सकता है ? कुँवरि किशोरी [श्री राधा रानी] की प्राण जीवन लल...
यन्नामस्मरणात श्वपाकोपि भवेद्विज
श्री राधा के नाम स्मरण करने से श्वपच भी द्विज बन जाता है। “राधा” नाम के स्मरण मात्र से समस्त जीवों का शीघ्र कल्याण सम्भव है।
निरस्तसाम्येन च साम्य कल्पनात्वदीय
श्री राधा की तुलना किसी से करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है [चाहे कोई कितना ही महान क्यूँ न हो] क्यूँकि श्री राधा तो ‘निरस्तसाम्य’ [समता रहित] हैं...
इतनी कहि हिय विवस ह्वै रुदन कियौ ब्रजवाल
श्री राधा और सखियों के महारास-विलास में, जब श्री राधा रानी सहसा अंतर्धान हो गईं, तब समस्त ब्रजवालाएँ उनके विरह में पूर्णतः भाव-विह्वल हो उठीं। इतना कह...