ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
45 itemsकोटि कोटि कंचन अमूल्य रत्न राशियों का
श्री कृष्ण भले ही मुझे कोटि-कोटि स्वर्ण मुद्राएं एवं अमूल्य रत्नों के भण्डार का लोभ क्यों न दिखलायें, लेकिन मैं उनसे कभी मुख नहीं मोडूँगा। [1] पिशाच...
एक से एक बड़े रसिकों के निवास जहाँ
जहां एक से बढ़कर एक रसिकों के निवास स्थान हैं, जहां एक से बढ़कर एक तत्वज्ञानी रहते हैं। [1] जहां एक से बढ़कर बड़े उदार विद्वान हैं, जहां एक से बढ़कर...
पुण्य का प्रताप उदय होता कई जन्मों का
अनेक जन्मों के पुण्य का फल तब प्राप्त होता है जब किसी मनुष्य को एक बार ब्रज में आने का अवसर मिलता है। [1] सेवाकुंज, वंशीवट, कालीदह आदि को देख-देखकर ...
ताकत शरीर में न रही श्याम सुन्दर जो
हे श्याम सुंदर, मेरे इस मायिक शरीर में इतनी ताक़त कहाँ कि मैं ध्रुव के समान एक पैर पर खड़े होकर भजन करूँ।[1] भीष्म पितामह की तरह ऐसी दृढ़ता भी कहाँ क...
वेदों में न देखा ब्रह्म शास्त्रों में न देखा ब्रह्म
न मैंने उन्हें वेदों के मंत्रों में देखा, न ही ब्रह्म शास्त्रों के गूढ़ ज्ञान में। मैंने वेदांत के मर्म और ब्रह्म के मूल में भी उन्हें प्राप्त नहीं कि...
श्रीराधे जू निबाहे बनेंगी
श्री राधा अवश्य ही मुझे अपना मान लेंगी। इस पूरे संसार में मेरे समान दीन कोई नहीं है, अत: परम दयालु स्वामिनी मुझ पर कृपा की दृष्टि अवश्य डालेंगी। [1] ...
एक रज- रेणुका पै रजत
वृंदावन की एक रज रेणुका पर चाँदी का पहाड़ न्योछावर है। श्री यमुना जी की दिव्यता पर क्षीर सिंधु [जहां लक्ष्मी नारायण का निवास है] न्योछावर है। [1] अन...
सेवाकुञ्ज जाके ब्रजधूल को चढ़ाओ शीस
वृंदावन के सेवाकुंज वन में जाओ और वहाँ की पावन रज को अपने सिर पर लगाओ; वहाँ सुहावने तमाल वृक्षों का सौंदर्य निहार लो। [1] बंशीवट में श्री बांके बिहा...
वारौं घनश्याम कोटि श्याम के कलेवर पै
श्यामसुंदर के शरीर पर कोटि-कोटि घनश्याम (काले बादल) को नयौछावर किया जा सकता है। भगवान कृष्ण के पीले वस्त्रों की कान्ति पर कोटि-कोटि विद्युत रेखाएँ नयौ...
माथे पे मुकुट देखो चन्द्रिका चटक देखो
श्री कृष्ण के माथे पर विराजित मुकुट को देखो, चंद्रिका की प्रभा को निहारो, और उनकी भृकुटी की मटक को देखो, जो मुनि जनों के चित्त का हरण करती है। [1] उन...
ब्रज में प्रवेश करते ही कर्ण कुहरों में
ब्रजधाम में प्रवेश करते ही कानों में श्री राधे-श्याम की मधुर ध्वनि गूँजने लगती है, जो मन को आनंदमय कर देती है। [1] जैसे-जैसे इस पावन धाम में कदम बढ़त...
प्रेमी जन देख देख होते हैं प्रसन्न जिसे
वृंदावन धाम में स्थित यह दिव्य श्री निधिवन राज, जहाँ के दर्शन से प्रेमीजन अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं, और जहाँ की भूमि और वायु में प्रेम की वर्षा होती ...
ऐसी क्या आवश्यकता दुकूल सुखकारी की
रेशमी वस्त्रों की हमें क्या आवश्यकता? हम तो वृंदावन की प्यारी रज को ही अपनी देह से लगाएँगे। [1] अनेक प्रकार के भोजन के स्वाद लेकर हम क्या करेंगे? हम ...
जन्म हुआ भाग्य से पवित्र भूमि वृन्दावन
ब्रजवासी बालक कहता है: जहां जन्म लेने के लिए देवताओं का राजा भी तरसता है ऐसी पवित्र भूमि श्री धाम वृंदावन में भाग्य से हमारा जन्म हुआ है। [1] यह वही...
स्वर्ग से विशेष जहाँ
ब्रज-रस रसिकजन स्वर्ग जाने की तुलना में वृंदावन जाने के लिए अधिक उत्साहित रहते हैं। [1] यहाँ एक बार "कृष्ण कृष्ण" का प्रेमपूर्वक उच्चारण करने से प्रत...
धन्य धन्य वृंदावन बासी विलाव चूहे जो
धन्य धन्य हैं वृंदावन के चूहे जो वृंदावन के मंदिरों के भीतर घुसकर प्रभु का प्रसाद प्राप्त करते है। [1] धन्य धन्य हैं वृंदावन के कीट-पतंग क्योंकि वे उ...
जाये जिसे जाना हो हिमालय तप करने
जिसे हिमालय जाकर तप करना हो वो वहाँ जाकर खूब तपस्या करे, जिसे प्यारी गंगा के किनारे जाना हो वह भी शीघ्र वहाँ जाए। [1] जिसे गुफाओं में योगासन लगाने का...
प्रेम की पिपासा बढ़ी देख निज प्रेमियों की
श्री राधा कृष्ण ने जब देखा कि उनके निज प्रेमियों की पिपासा बढ़ गई है तो उन्होंने अगाध प्रेम का समुद्र सीमा तोड़ कर बहा दिया। [1] अब भावुक रसिक भक्त न...
निन्दा करे कोई या प्रशंसा ही हमारी करे
यदि कोई हमारी निंदा करे या स्तुति करे, हम वृन्दावन की रज में रज के समान ही बने रहेंगे। [1] हम श्री कृष्ण के आश्रय के अभिमान में मस्त रहेंगे, चाहे हमे...
कौन दिन होगा नाथ
हे नाथ, ऐसा कौन सा दिन होगा जब मैं वृन्दावन में बसूँगा ? जहाँ नित्य प्रातःकाल उठकर श्री यमुना जी में स्नान करूँगा। [1] मैं नित्य हरेकृष्ण ! हरेकृष्ण ...
प्रेम के समेत रहो
श्री राधा कृष्ण के प्रेमियों की संगती में प्रेम से रहो एवं प्रेम से ही श्री यमुना जल में स्नान करो। [1] वंशीवट में प्रेम से नित्य रास का दर्शन करो एव...
भक्तों के विहार हेतु भारत-वसुंधरा पे
भक्तों के विहार के लिए, भारत भूमि पर, श्री गोविंद ने स्वयं गोलोक को उतारा है। [1] यह सुंदर कमलों का सरोवर है एवं महिमा का सागर है, यह रस का समुद्र है...
कलित कदम्बों के कमनीय केलि कुंजों में
जहां कल-कल करता हुआ यमुना के किनारे पर सुशोभित सुन्दर कदम्ब वृक्षों से निर्मित कमनीय केलि कुंज हो। [1] जहाँ नटवर वेशधारी, तीखी चितवन से प्रेम बाण चला...
जल पूर्ण यमुना टिकारी पर टिकी हुई
आज भी यमुना जी तटों से होकर बहती है। वंशीवट के मध्य में रास मंडल फैला हुआ है। [1] वही हवा बहती है, और वही आकाश है। निधिवन आज भी निकुंज लताओं से ढका ह...
काँटेदार करील के वृक्ष जिस भूमि पर
जिस भूमि पर काँटेदार करील के वृक्ष हैं, और जहाँ हर ओर खारे जल से भरे कूप ही दिखाई देते हैं। [1] जहाँ ब्रजवासी लोग आपस में गाली देते हुए ही बात करते...
शक्ति नहीं ध्रुव सी अखण्ड तप कैसे करूं
नाथ! मुझमें ध्रुव के समान ऐसी शक्ति नहीं कि अखंड तप कर सकूँ, और न ही प्रह्लाद के समान ऐसी भक्ति है कि निरंतर भगवद् नाम का स्मरण कर सकूँ। [1] राजा अंब...
स्वर्ग में कहाँ है मधुर ध्वनि राधे राधे की
स्वर्ग में कहाँ “राधे राधे” की मधुर धुन सुनाई देती है? स्वर्ग में कहाँ हैं वे मनमोहक कुंज एवं वन? [1] स्वर्ग में कहाँ गोपियों, गायों और ग्वालों की भी...
कीर्तन के यूथ देख उठती उमंग एक
श्री धाम वृन्दावन में कीर्तन-मंडलियों को देखकर हृदय में उमंग उठती है। गोवर्धन पर दृष्टि पड़ते ही गोवर्धन-धारण करने वाले कृष्ण की स्मृति हो जाती है। [1...
श्री राधा राधारानी के पग पग पर प्रयाग
एक वृंदावन वासी, वृंदावन की महिमा का गुणगान करते हुए कहते हैं कि श्री राधा रानी जहाँ-जहाँ चलती हैं, वहाँ-वहाँ प्रयाग का स्वरूप बन जाता है। जिन कुंजों ...
देश देशान्तर के अनेक
देश-देशान्तर के अनेक व्यक्ति यहाँ खिंचे चले आते हैं, जिनके हृदय में प्रेम की प्रज्वलित ज्वाला धधक रही है। [1] यहाँ के कुञ्जों में गोपियाँ गुरु के गौर...
वृन्दावन वास कर रज में विश्राम भला
श्री वृंदावन धाम में वास करते हुए यहाँ की रज में विश्राम करना उत्तम है, न कि मखमली गद्दों के प्रति मोह बनाए रखना। [1] वृंदावन धाम में वास करते हुए यह...
मोहन तड़ाग बाग फूल फल मोहन हैं
यहाँ के तालाब (तड़ाग), बाग-बगीचे, फूल और फल सब मोहन (मन को मोहित करने वाले) हैं। यहाँ की गायें, पर्वत और गोवर्धन भी मोहन हैं। [1] यमुना नदी की जो धार...
इन्द्र-मद-मर्दन दुर्ग
गिरिराज गोवर्धन वह दुर्ग है जिसने इन्द्र के अभिमान का मर्दन किया था। श्री यमुना जी का जल अमृत के समान प्रवाहित होता है। [1] यहीं पर दिव्य प्रेम का प्...
एक बार अयोध्या जाओ
चाहे कोई एक बार अयोध्या की यात्रा करे, दो बार द्वारिका जाए या तीन बार त्रिवेणी में स्नान कर ले। [1] चाहे कोई चार बार चित्रकूट जाए, सौ बार नासिक जाए, ...
वृन्दावन-वृक्ष हैं कि पारिजात नन्दन के
क्या ये वृंदावन के साधारण वृक्ष हैं, या स्वयं स्वर्ग के पारिजात वृक्ष हैं? क्या ये वृंदावन की शाखाएँ हैं, या किसी दिव्य प्रेम के अंजन से अभिषिक्त दिव्...
कीरति किसोरी वृषभान की दुलारी प्यारी
हे वृषभानु दुलारी श्री राधे, कृपया मेरी प्रार्थना को सुनिए। (1) मेरा मन अत्यंत व्याकुल है (आप से विलग होने के कारण), मुझे कुछ नहीं भाता। मुझे धीरज प्...
मेरी टेर सुनो सुकुमारी
श्री लाल बलबीर श्री राधा से प्रार्थना करते हैं: “हे सुकुमारी जू, कृप्या मेरी विनती सुनें, आप श्री कृष्ण की प्रिया हैं जो तीनों लोकों के स्वामी हैं। [1...
गिरि से गिराओ हमें
हे नाथ, चाहे पहाड़ से हमें गिरवा दो, या हाथी से कुचलवा दो, या अतुल्य निर्दयता से अग्नि में जलवा दो। [1] हे नाथ, चाहे सांप से डसाओ, किसी रोग से कष्ट ...
गोरी मन भोरी अहो
हे गौरांगी श्री राधे! हे कोमल-हृदया, समस्त आनन्द की मूल स्वरूपिणी! मैं आपके चरण-कमलों को प्रणाम करता हूँ; कृपा कर मुझे अपनी निष्काम सेवा प्रदान कर मेर...
श्रीराधे राधे रटौं
मैं अहर्निश ‘श्री राधे-राधे’ का जप करना चाहता हूँ और एकान्त में हृदय में श्री राधा के स्वरूप का ध्यान करना चाहता हूँ। मेरे लिए तो कुलदेवी और कुलदेवता ...
जद्यपि अधम मलीन हौं
हे राधे! यद्यपि मैं एक अधम और मलीन जीवात्मा हूँ, तथापि मेरी आशा एकमात्र आप ही से है। ऐसी कृपा कीजिए कि मुझे श्रीवृन्दावन धाम में निरंतर वास प्राप्त हो...
नमो नमो वृषभानुजा
अद्भुत सुख की राशि वृषभानु-कुमारी श्री राधा को हमारा बारंबार प्रणाम है। ऐसी रखवार, जो अशरण को भी शरण प्रदान कर अभय कर देती हैं, उन्हें हमारा बारंबार प...
जय जय वृंदावन
सुख की राशि श्री वृन्दावन धाम की जय हो। हे समस्त रसिकों के प्राणधन-स्वरूप श्री वृन्दावन! कृपा कर मेरे हृदय में भी अपना निवास कीजिए।
ब्रह्म सनातन शुद्ध हरि
श्री हरि, जो ब्रह्मस्वरूप और सनातन हैं तथा समस्त जगत के मोह-रूपी फंदे में फँसे जीवों का मोह हरने वाले हैं, वही श्री हरि श्री वृन्दावन धाम में स्वयं प...
तीन लोक ते सरस है
श्रीवृन्दावन धाम तीनों लोकों से भी अधिक सरस है, क्योंकि वृन्दावन का दिव्य रस तीनों लोकों में कहीं नहीं मिलता; वहीं श्री राधा-कृष्ण नित्य विहार करते है...