ब्रज के सवैया
जीवन चरित
श्री ब्रज के सवैया वाणी संग्रह
सूकर ह्वै कब रास रच्यो अरु बावन ह्वै कब गोपी नचाईं
हे हरि! जब आप वराह (सूकर) अवतार में थे, तब आपने रासलीला कब रची? और जब आप वामन बने, तब गोपियों को कब नचाया? [1] जब आप मत्स्य (मछली) अवतार में थे, तब क...
ऐसे नहीं हम चाहन हारे
हे राधा कृष्ण: हम ऐसे आपके प्रेमी नहीं हैं जो आज तुम्हें चाहें और कल किसी और को। वह आँखें निकाल कर फेंक देने योग्य हैं जो श्री राधा कृष्ण के अतिरिक्त...
बृज मण्डल के कण-कण
हे राधे, ब्रजमंडल के कण-कण में आपकी ठकुराई [दिव्यता] बसी हुई है। [1] यमुना की हर लहर मधुर स्वर में आपकी महिमा का गान कर रही है। [2] श्री गोवर्धनधार...
मोहि वास सदा वृन्दावन कौं
हे श्रीराधे! मुझे अखंड वृंदावन धाम का वास प्रदान करें, जहाँ मैं प्रतिदिन यमुना तट पर स्नान कर सकूँ। [1] जहाँ गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा करूँ और ब्रज...
जिनके उर में घनस्याम बसे
जिनके हृदय में घनश्याम बसे हैं, वह ध्यान करें या न करें, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। [1] यदि वृंदावन धाम में चले गए, तो अन्य किसी धाम में जाने की आवश्य...
ऐसे किशोरी जू नाहीं बनो
हे किशोरी जी! आप जैसी दयालु और करुणामयी कोई नहीं है, फिर आप मेरी सुध क्यों भूल रही हैं? [1] हे दीनों की एकमात्र स्वामिनी, हे रस-संपदा की विस्तारिणी! ...
उत आवत है नन्दलाल, इते आय रही वृषभानु कुमारी
एक ओर से श्री राधा और दूसरी ओर से श्री कृष्ण आ रहे हैं। [1] वे बरसाना में प्रेम सरोवर में मिल रहे हैं और दिव्य प्रेम में उन्मत्त होकर एक-दूसरे को निक...
एक बेर राधे कहें कोटि
एक बार "राधे" कहने से कोटि-कोटि पाप नष्ट हो जाते हैं। वे जीव धन्य हैं जो "राधे राधे" का नित्य ही रटन लगाते हैं। [1] श्री राधा नाम की महिमा ग्रंथ बख...
सुन्दर मूरति दृष्टि परी
जब से उस मनोहर मूर्ति (श्रीकृष्ण) के दर्शन हुए हैं, तब से मेरा मन अत्यंत चंचल और व्याकुल हो गया है। [1] अब न अपनी कोई सोच बची है, न संकोच की कोई रेख...
काहे को वैद बुलावत हो
क्यों वैद्य को बुलाते हो मेरी बीमारी दूर करने के लिए? मेरे प्रिय कृष्ण की मधुर मुस्कान देखे बिना मैं जीवित नहीं रह सकती। [1] तुम व्यर्थ प्रयास कर रहे...
ब्रज धूरि प्राणों से प्यारी लगे
हे श्री राधे! मुझ पर ऐसी कृपा करें कि मुझे ब्रज रज प्राणों से भी अधिक प्यारी लगे और आप मुझे ब्रज मंडल में ही बसाए रखें। [1] मैं सदा रसिक संतों के संग...
मण्डल रास विलास महा
अद्भुत विलास से युक्त रास-मंडल के मध्य रस की पराकाष्ठा, साक्षात वृषभानु-नंदिनी श्री राधा विराजमान हैं। [1] जिनके चारों ओर कोक-कला में परम प्रवीण और ग...
मन में बसी बस चाह यही, पिय नाम तुम्हारा उचारा करूँ
अब मेरी केवल यही एकमात्र इच्छा शेष है, कि मैं दिन-रात तुम्हारा ही नाम लेता रहूँ। अपने मन के मंदिर में तुम्हारे लिए सिंहासन सजाऊँ, और तुम्हारे अति मनमो...
श्री कृष्ण ही कृष्ण पुकारा करूं, निज आंसुओं से मुख धोता रहूं
हे ब्रजराज श्री कृष्ण, आपके वियोग में मैं दिन-रात अश्रुधारा बहाता रहूँ, आपका नाम "कृष्ण कृष्ण" पुकारता रहूँ, और अपने आँसुओं से अपना मुख धोता रहूँ। आपक...
कलि काल कुठार लिए फिरता
हे मन, कलियुग अपने हाथ में कुल्हाड़ी लिए चारों ओर विचर रहा है। तेरा शरीर कोमल है, यह उसके प्रहार सहन नहीं कर पाएगा। अभी समय है, अपनी रसना से नित्य हरि...
नित बाँकी यह झाँकी निहारा करौं
हे बाँके बिहारी जी! मैं नित्य आपकी अद्भुत और बाँकी झांकी को निहारता रहूँ, और आप अपनी अनुपम छवि का दर्शन कराकर मुझ पर अपनी कृपा बरसाते रहें। हे प्रिय ब...
ब्रज धूरि प्राणों से प्यारी लगे, ब्रज मंडल माहीं बसाये रहो
हे "राधे"! मुझ पर ऐसी कृपा करें कि मुझे ब्रज की रज प्राणों से भी अधिक प्रिय लगे, और मुझे ब्रज मंडल में बसाए रखें। मैं नित्य रसिक संतों के संग में आनंद...
ब्रज गोपिन, गोपकुमारन की, विपिनेश्वर के
ब्रज की गोपियों, ग्वालों की जय, विपिनेश्वर श्री कृष्ण के सुख श्री किशोरी जू की जय, ब्रज के सब संतों और भक्तों की जय, ब्रज मंडल की जय और ब्रजराज श्री क...
बली जाऊं सदा इन नैनन पे, बलिहारी छटा पे होता रहूँ
हे कृष्ण! मैं बार-बार आपके नयनों और आपकी अनुपम छवि पर बलिहारी जाऊँ। मुझपर ऐसी कृपा करें कि चाहे मैं जागूँ या सोऊँ, आपका नाम कभी न भूलूँ।
दीनबंधु दीनानाथ रमानाथ ब्रजनाथ
तुम ही मेरे पिता, माता, भाई, कुलदेव, गुरुदेव, स्वामी एवं इष्टदेव हो ! केवल तुमसे ही मैंने समस्त नाते मानें हैं, अत: मेरी विनती को तुम नहीं सुनोगे तो औ...
जब से निरखो ये श्याम पिया
जब से श्याम पिया को निहारा है, तब से मेरे हृदय में एक क्षण को भी चैन नहीं है। [1] नैनों के तीक्ष्ण बाण ने गहरी चोट की है और सुंदर मुस्कान के घाव तो अ...
वृन्दावन की गैल में मुक्ति पड़ी विलखाय
श्री वृंदावन धाम की गलियों में मुक्ति व्याकुल होकर एक कोने में पड़ी गोपाल से पूछती है—“हे प्रभु! मेरी मुक्ति कैसे होगी?” [1] तब श्रीकृष्ण उत्तर देते ...
कोऊ करे जप संयम नेम तपै तप के सब देहि गमावें
कोई जप करता है, कोई संयम, नेम, तप आदि कर देह को कष्ट देता है। [1] कोई दान करता है, कोई वेद एवं पुराणों का अध्ययन करता है, और कोई नाना प्रकार की उपासन...
ऐसै नहीं हम चाहन हार
हे श्री राधा-कृष्ण! हम ऐसे आपके प्रेमी नहीं हैं जो आज तुम्हें चाहें और कल किसी और को। [1] जब हमारी आँखें तुमसे मिल गई हैं, तो हम इस झूठे संसार में कि...
जहाँ राधा राधा गावें तहां सुनवे कों हम धावें
श्रीकृष्ण कहते हैं — जहाँ भी ‘श्री राधा-राधा’ नाम गाया जाता है, मैं उस स्थान पर राधा नाम सुनने के लिए दौड़ पड़ता हूँ। [1] जहाँ भी श्री राधा की चर्चा...
किये व्रतदान तीरथ सनान
चाहे अनंत बार व्रत कर डालो, दान कर डालो, तीर्थों में जा-जा कर स्नान कर डालो, खूब आसन लगाकर ध्यान कर डालो। चाहे दान-भलाई आदि की कमाई कर स्वयं का निज ना...
ऐ रे मन मतवारे छोड़ दुनियाँ के द्वारे
अरे मेरे मूर्ख मतवारे मन, तू दुनिया के द्वारों में भटकन छोड़ दे। अब तो तू केवल और केवल राधा नाम को ही सहारा बना और जीवन-मरण श्री राधा रानी को सौंप दे।
तेरे ही पुजारियों की पग धूरि
हे श्री राधा-कृष्ण, मेरी यह विनम्र कामना है कि आपके भक्तों के चरणों की धूल को नित्य अपने मस्तक पर धारण कर सकूँ। मैं निरंतर आपके भक्तों की सेवा और भक्त...
अपने प्रभु को हम ढूँढ लियो
जैसे कोई अमूल्य वस्तु को लाखों में भी खोज लिया जाता है, उसी प्रकार मैंने अपने प्रभु को ढूंढ लिया है। [1] मेरे प्रभु के अंग माखन से भी अधिक कोमल हैं। ...
हे अलि री लखि आजु कौ खेल
अरे सखी, आज की अद्भुत लीला को निहार! मेरी बुद्धि इस अनुपम दृश्य का कहाँ तक बखान कर पाएगी? [1] आज श्री राधा जू के सिर पर मोरपंख सजाया गया है, हाथ में ...
यह बाग लली ललितेश का है
यह बाग़ लाड़िली श्री राधा एवं ललितेश श्री कृष्ण का है, जो सदैव बसंत ऋतु से आच्छादित रहता है। [1] चंद्र ने इस बाग़ का घेरा बनाया है एवं रति देवी ने इसे स...
जहाँ गेंदा गुलाब अनेक खिले, बैठो क्यूँ करील की छावन में
अरे मन, जहाँ अनगिनत गुलाब खिले हुए हैं, तू क्यों करील की सूखी छाँव में बैठा है? जब तुझे वृषभानु किशोरी श्री राधारानी जैसी अद्भुत स्वामिनी प्राप्त हो ग...
कोऊ गणेश महेश दिनेशहि
कोई चाहे गणेश, शिव या सूर्य की सदा सेवा करे, मनोहर पूजा करे। कोई तीर्थों में वास करे और मुक्ति पाने के लिए उपाय करता रहे। [1] मैं केवल एक अनुपम स्वरू...
मारि गयौ पिचकारी अचानक
हे सखी, श्रीकृष्ण अचानक आ गए और मेरे अंगों तथा हृदय में पिचकारी से रंग मार दिया। [1] मेरे समस्त वस्त्र भीग गए और अकस्मात ही मेरे हृदय में रसधारा बहने...
सब संक तजी गुरू लोगन की
एक गोपी कहती है - गुरूजनों और कुल-परिवार की सारी मर्यादा और संकोच को मैंने त्याग दिया है। [1] लाखों उपायों से भी कोई मुझे रोकना चाहे, अब मैं अपनी एक...
टेड़ी लसें भृकुटीन पै पाग
टेढ़ी-टेढ़ी भौंहें लचक रही हैं, सिर पर पगड़ी सुशोभित है, और नेत्र ऐसे चमक रहे हैं मानो दो सूरज खड़े हों। [1] तुम्हारा दास पुकार कर कहता है: हे दीनदया...
जोगी जती तपसी किन होऊ
योगी, जती, और तपस्वी होकर, सिर मुंडाकर, हर द्वार पर भिक्षा मांगने से क्या लाभ? [1] जो लोग हरि की सेवा करते हुए दिखते हैं, वे भी प्रायः सांसारिक इच्छा...
ललिता हरिदास हिये में बस्यौ
हे सखी, ललिता सखी श्री हरिदास मेरे मन-मंदिर में विराजते हैं, अब और कोई अभिलाषा नहीं। [1] दिन-रात उनकी ही के संग में रहती हूँ; उनके बिना क्षण भर भी चै...
पहने यह कुण्डल योंही रहो
हे मनमोहन! अपने कानों में यह सुंदर कुण्डल सजाए रहो, और अपनी अलकावली को इसी प्रकार सँवारते रहो। [1] अपने अधरों के अमृत का रसपान कराते हुए, मुरली को अप...
तिरछा है किरीट कसा उर में
तिरछे मुकुट को धारण किए हुए, और तिरछी वनमाला से ही वे सुशोभित हैं। [1] कमर पर तिरछी काछनी सजी हुई है, जिसमें सुख का महासागर निरंतर लहराता रहता है। [2...
लाल भए जिनके बस में उनको लखिकें बिनमोल बिकानी
जिन्होंने स्वयं लालजी (श्रीकृष्ण) को अपने वश में कर लिया है, उन श्री राधिका रानी की एक झलक पाने के लिए मैं अपना सब कुछ बिनामोल ही न्यौछावर कर दूँ। [1]...
जो काटत बंधन मोहन को
जो मोह के बंधन से छुड़ाने वाले हैं, उन श्रीकृष्ण के हृदय में श्रीराधा के प्रति बढ़ते हुए मोह को मैंने देखा। [1] श्रीकृष्ण के नेत्रों में, उनकी वाणी म...
गिरराज कौ वास मिलै नित ही
मेरी यह अभिलाषा है कि मुझे नित्य ही श्री गिरिराजजी का वास मिले, जहाँ मैं प्रतिदिन मानसी गंगा में स्नान करूँ। [1] मुझे ऐसा अवसर प्राप्त हो कि मैं हरदे...
काहू लियौ जप काहू लियौ तप
श्री हित हरिवंश महाप्रभु की महाप्रसाद निष्ठा के संबंध में यह सवैया प्राचीन काल से प्रसिद्ध है। इस निष्ठा की रक्षा के लिए ही उन्होंने एकादशी के दिन भी ...
भाग्य उदे जब होएं हमारे
जब हमारा भाग्य उदय होगा, तब हम भी ब्रज धाम में वास करेंगे। [1] ब्रजराज श्रीकृष्ण के दर्शनामृत से अपने पापों के पुंज का नाश करेंगे। [2] हम दिन-रात ब्...
वे उनकी धरे मोर पखा सिर
आज श्रीराधा ने अपने प्रियतम श्रीकृष्ण का मोर मुकुट धारण किया है, और श्रीकृष्ण ने श्रीराधा की मोर चंद्रिका को अपने शीश पर सजाया है। [1] श्रीराधा ने पी...
क्षण भंगुर जीवन की कलिका
कौन जानता है कि इस नश्वर जीवन की कोमल कली कल प्रातः खिलेगी भी या नहीं, और क्या हिमालय की शीतल, मंद तथा सुगंधित वायु का स्पर्श प्राप्त होगा या नहीं। [...
जय गहवर कुँज निकुँजन की
बरसाने में स्थित गह्वर कुंज-निकुंजों की जय हो, रस एवं प्रेम की प्रकाशिनी श्री श्यामा जू की जय हो। [1] दानगढ़, मानगढ़ अथवा विलासगढ़ की जय हो, गह्वर व...
श्रीवृषभानु से राजा जहाँ अरु
जहाँ स्वयं श्री वृषभानु जी जैसे राजा हैं और जहाँ कीरति जैसी सुखदायिनी रानी हैं। [1] जिसे श्री वृषभानुपुर (वृषभानु जी का नगर) कहा जाता है, जिसकी बरसान...
जब दांत न थे तब दूध दियो
जब तू शिशु था, तब परमात्मा ने दूध दिया, और जैसे ही तू बड़ा हुआ और दाँत आए, तब उसने अन्न भी दिया। [1] वह ईश्वर जल-थल के प्राणियों, पशु-पक्षियों — सबका...
मुसकान से काम तमाम हुआ
एक भक्त श्रीकृष्ण से कहता है — हे प्यारे! तेरी मुस्कान से ही मेरा मन मोहित हो गया, अब तिरछी चितवन से क्यों इसे घायल करता है? तेरे कपोलों की कोमलता और ...
पूरन प्रेम सुधानिधि सार की
एक ओर पूर्ण प्रेम और रस की सार स्वरूपा श्रीराधा की मनोहर मूर्ति विराजमान है, तो दूसरी ओर केली महोत्सव में हर्षित, रस की सघन मूर्ति श्रीकृष्ण विराज रहे...
ब्रजराज सों नाता जुड़ा अब है
जब ब्रजराज श्रीकृष्ण से एक बार मेरा प्रेम-संबंध जुड़ ही गया है, तो मैं अब इस स्वार्थी संसार की व्यर्थ में चिंता क्यों करूँ? अब तो बस मैं उनकी मधुर स्म...
ऐसे नहीं हम चाहन हार
हे श्री राधा-कृष्ण! हम ऐसे प्रेमी नहीं जो आज तुम्हें चाहें और कल किसी और को चाहने लगें। यदि हमारी ये आँखें तुम्हें छोड़कर किसी और की ओर देखें तो हम उन्...
मन में बसी बस चाह यही
हे राधा कृष्ण! अब मेरे मन में बस यही चाह है कि मैं दिन-रात तुम्हारा ही नाम लेता रहूँ। अपने मन रूपी मंदिर में तुमको बिठलाकर, तुम्हारा मनमोहक रूप निहारा...
तुम जान अयोग्य बिसारो मुझे
हे कृष्ण, चाहे तुम मुझे अयोग्य जानकर भुला भी दो, तथापि मुझ पर ऐसी कृपा करो कि मैं तुम्हें कभी न भूलूँ। मैं सदा तुम्हारे दिव्य गुणों का गान करूँ, निरंत...
यदि कुन्तलकाले सँवारे ही थे
हे श्रीकृष्ण! यदि तुमने पहले ही अपने केश सँवार लिए थे, तो उन्हें इस प्रकार कपोलों पर बिखेर कर लटकाना नहीं चाहिए था। और जब नेत्रों में काजल सजाया था, त...
अहो! दोउन के मुख चंद्र लसै
हे सखी! दोनों श्री राधा और श्री कृष्ण के मुख चंद्र के समान हैं एवं दोनों ही एक दूसरे के मुखचंद्र की चकोरी भी हैं। श्याम वर्ण वाले श्यामसुंदर ने स्यामव...
जय शरणागत वत्सल की
शरणागत पर कृपा बरसाने वाले, पूतना के प्राण हर कर उसका उद्धार करने वाले, ब्रज के अद्भुत श्रृंगार स्वरूप और जगत के परम आभूषण, रास बिहारी श्री कृष्ण मुर...
पूनम की रजनी सजनी यह
हे सखी, आज पूर्णिमा की उज्ज्वल रात्रि है — चारों ओर फैली चाँदनी मन को अत्यंत सुखद अनुभूति दे रही है। [1] यमुना तट पर जब श्रीकृष्ण की वंशी की मधुर ध्...
जय मंजुल कुंज निकुंजन की
ब्रज के शीतल कुंजों एवं निकुंजों की जै हो। कुंज में रास-विलास करने वाले रसिकों के समाज की जै हो। यमुना तट, वंशीवट की, गिरिराज के ईश्वर की और गिरिराज म...
कब गहवर की गलिन में
ऐसा कब होगा कि मैं गह्वर वन की कुंज-गलियों में चकोर समान विचरता हुआ नवल युगल किशोर श्री राधा-कृष्ण के मुखचन्द्र का निरंतर दर्शन करता रहूँ?
रसिवो बसिवो वृन्दावन को
श्री वृन्दावन धाम में वास करना, उसी रस में डूबना और संतों के संग में आनंदपूर्वक रहना ही परम सौभाग्य है। [1] नित्य 'रास-लीला' के विषय में पढ़ना एवं मन...
भाग्य उदय ही भये ललिते
हे ललिते! आपकी कृपा से यह भाग्य उदित हो गया—हमारी आँखों के सम्मुख एक अति लावण्यमयी युगल-छवि प्रकट हुई है। [1] घनश्याम श्रीकृष्ण मेघ के समान और श्रीरा...
नैन मिलाकर मोहन सों
जब श्रीकृष्ण के नयन श्रीराधिका के नयनों से मिले, तब वृषभानु ललि मन ही मन मुस्कुरा उठीं। संकोचवश उन्होंने दृष्टि फेर ली और घूँघट से अपने मुख को ढक लिय...