Verses & Passages
136 itemsदेखै तौ निजु केली कौं
चतुर-चूड़ामणि रसिकों की आसक्ति केवल युगल की निज केली में ही रहती है, जैसे मछली की आसक्ति पानी में होती है।
जामैं मरैं न बीछुरैं
श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि सर्वोपरि नित्य-विहारिणी हमारी श्री स्वामिनीजू न तो कभी प्रकट होती हैं, न कभी अन्तर्धान होती हैं, न कभी रूठती हैं और न ...
जब जागै तब प्रिया भजे
जब तक साधक जागता रहे, तब तक उसे चाहिए कि वह डटकर प्राणप्यारी श्री किशोरी जी का भजन करे; और जब नींद आए, तब पैर फैलाकर (समस्त चिंताओं से मुक्त होकर) सो ...
प्रेम-सार सुख-सार है
(प्रेम-धाम श्रीवृन्दावन में) निरन्तर चलता रहने वाला यह नित्य-विहार प्रेम का सार है, सुख का सार है, रूप-सौन्दर्य का सार है और रस का भी सार है। यही नित...
निहचै भजै बिहार कों
अपने तन, मन और सर्वस्व को रसिक गुरु को अर्पण करके, निर्भय होकर नित्य-विहार का ऐसी दृढ़ अनन्यता से भजन करो कि स्वप्न में भी किसी अन्य देवता का परिचय न ...
प्रिय हमरे अंतर रहै
हमारा श्री राधा जू से ऐसा घनिष्ठ संबंध है कि वे हमारे तन, मन और प्राण सहित हमारे रोम-रोम में समाई हुई हैं; और हम भी उनके भीतर ही समाए हुए हैं तथा उनके...
लड़ैती कहै लड़ैतीय कहावै
हम सदा काल लड़ैतीजू [श्री राधा] का ही नाम-गुण गाते हैं और अन्य जनों से भी श्री राधा का ही नाम-गुण गवाते हैं। हमारे मन को एकमात्र श्री लाड़ली जू ही भा...
जब प्रिया मानैं अपनपौ
जिसे श्री नित्य-विहारिणी जू (श्री राधा) अपना स्वीकार कर लेती हैं, श्री लाल जू (श्री कृष्ण) सदैव उसी के अधीन रहते हैं। वह जीव निरंतर सुखपूर्वक विहार क...
प्राप्ति में संसै नहीं
तन, मन और वाणी से हमारा यह अटूट संकल्प है कि हम कुंज-बिहारिणी श्री लाड़िली जू (श्री राधा) को निश्चित ही प्राप्त करेंगे।
श्रुति स्मृति बिचारत तत्व सब
जिस अद्भुत रस-तत्त्व का श्रुति और स्मृतियाँ निरन्तर विचार करती रहती हैं, परन्तु जिसका पार नहीं पा सकीं—उस सर्वोपरि नित्य-विहार को जगत में ललिता अवतार ...
श्री बिहारी दास जल जंतु ज्यौं
श्री बिहारिनदास जी कहते हैं कि जैसे जल के बिना मछली अपने प्राण त्याग देती है, उसी प्रकार श्री श्यामा-श्याम का नित्य-विहार ही मेरे जीवन के प्राण हैं; ...
भूल छुड़ावो लाड़िली, समझ देउ भर-पूरि
हे लाड़िली! मेरी समस्त भूलों और अज्ञानता को दूर कर मुझे पूर्ण विवेक प्रदान कीजिए। हे मेरी प्राण-रसायन श्री किशोरीजी, यह कार्य केवल आपके ही हाथ में है ...
झूठो है संसार यह, झूठी है यह देह
यह संसार असत्य है और यह शरीर भी सदा साथ नहीं रहता। यदि तुम सच्चे सुख की चाह रखते हो, तो सांसारिक सुखों और जीवों से अपना स्नेह हटाकर श्री बिहारी-बिहारि...
श्रीबिहारीदास संतोष गहि, बैठयौ सिखर सुमेरु
मैंने समस्त परमार्थ-संबंधी साधनाओं एवं संबंधों से अपने मन में भली भाँति संतोष करके ही श्री स्वामीजी (ललिता अवतार श्री हरिदास) महाराज की सुमेरु-शिखर की...
श्रीराधे राधे जो जन कहै
जो जन सच्चे मन से सर्वोपरि नित्यविहारिनी जू के ‘श्री राधे-राधे’ नाम का ही नित्य रटन करते हैं, वही श्री निकुञ्ज-मन्दिर के सर्वोपरि विहार के प्रेम-रस क...
नैना निरखैं रूप कों
मेरे नैना नित्य ही युगल-रूप का पान करें, और जीभ नित्य ही उनके निज-नाम का रटन करे। जहाँ श्री राधा-कृष्ण के अंग नित्य परस्पर मिले रहते हैं—अर्थात् युगल-...
देस विदेश भिखारिया
भिखारी की भाँति विषयों के लिए देश-विदेश भटकने से भीखरूपी दुःख ही प्राप्त होगा और श्री वृन्दावन की रज का सेवन किए बिना बैकुण्ठ की प्राप्ति भी दुःख देने...
बिगरी लेहि सँवारि कै
नित्य निकुञ्जेश्वरी श्री श्यामा प्यारी का यह स्वभाव है कि वे अपने आश्रित जनों की बिगड़ी हुई बात को भी सुधारकर उसे स्वीकार कर लेती हैं। अपने जनों का इस...
कोटि भजन एकादसी
चाहे कोई करोड़ों बार एकादशी का व्रत और भजन कर ले, या करोड़ों तीर्थों में स्नान कर ले, परंतु यदि वह किसी संत (भक्त) का दिल दुखाता है, तो श्री हरि उसकी ...
श्री बिहारी दास विहार कौं
नित्य-विहार रूपी यह दुर्लभ रस ऐसा है कि इसके लिए साक्षात भगवान विष्णु भी तरसते हैं। जीव यहाँ पितरों और देवताओं की भक्ति में लगे रहते हैं, जबकि निकुञ्...
राग-द्वेष हमरे नहीं
किसी से राग या द्वेष करना हमारा धर्म नहीं है, और न ही देह का अभिमान करना यहाँ की रीति है। यहाँ तो बस भाव के साथ सदा प्रियाजी (श्री राधा) से मिले रहो।...
ते अनन्य निजु जान
वास्तव में वही श्री स्वामी हरिदास जी महाराज के अनन्य निज-जन हैं, जिनका हृदय श्यामा-श्याम की अद्भुत निकुंज-रस-माधुरी के अतिरिक्त और कुछ स्पर्श नहीं करत...
श्री स्वामी हरिदास की, सरि नहिं दूजो कोई
ललिता-अवतार श्री स्वामी हरिदास जी महाराज के समान कोई नहीं है; इसका कारण यह है कि वे जिसे अपना बना लेते हैं, उसे अपने समान अधिकार दे देते हैं अर्थात् व...
रहनी कहनी एक सी, जयौं की त्यौं जो होइ
जिन साधकों की रहनी और कहनी एक समान होती है, वे बड़भागी जन चाहे जागें या सोएँ, उन्हें परम वस्तु (प्रेम-रस) निश्चित ही प्राप्त हो जाती है।
माला जनेऊ घालि गरै
कुछ लोग गले में कंठी और जनेऊ धारण कर अपने को उच्च कुल का बताकर परिचय देते हैं, किंतु उनकी वृत्ति और कृत्य से ही स्पष्ट हो जाता है कि वे वास्तव में किस...
मन मनसा आसा मगन, तन की कछु न सम्हार
श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि यद्यपि हम मुख से नाम का उच्चारण नहीं करते, तथापि श्री बिहारी-बिहारिनी जू के उस दिव्य नित्य-विहार का निरंतर ऐसा चिंतन औ...
तन छूटै तो परम सुख, रहै तो भजन अपार
जिन साधकों ने श्री कुंजबिहारिनी लाड़िली जू श्री राधा को अपने जीवन और प्राणों का आधार बना लिया है, उनके लिए देह-त्याग परम आनंद का कारण बनता है; और जब त...
कोऊ गोबर पाथनी, कोऊ ढोवै पाई
श्री स्वामिनी जू के विविध स्वरूपों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि किसी ने उन्हें साधारण गोबर थापने वाली गोपी के रूप में देखा, किसी ने जल-ढोने वाली क...
जा मारग मेरौ गुरु चलयौ, ता मारग हौं जाऊँ
जिस मार्ग पर मेरे सद्गुरु चले हैं, मैं भी उसी मार्ग का अनुसरण करूँगा। उनके बताए हुए स्वामी हरिदास जी के रस-उपासना-मार्ग के अतिरिक्त संसार में जितने भी...
सुरति समानी रूप में
प्रेम साक्षात रूप में समाहित है और रूप प्रेम में; दोनों एक-दूसरे में पूर्णतः ओतप्रोत हैं। श्रीचतुरदास जी कहते हैं कि रूप और प्रेम की पराकाष्ठा श्रीकुं...
आरति करत बिहार की, सब आरति बिसराई
अखंड नित्य-विहार के अनन्य उपासक के लिए बाह्य आरती गौण हो जाती हैं; उसका मन तो केवल प्रिया-प्रियतम के विहार के लिए ही निरंतर व्याकुल रहता है। इसी प्रेम...
अलकैं छूटीं वदन पर श्रम जल
सखी भावापन्न श्रीस्वामी चतुरदासजी कहते हैं कि श्यामा कुंजबिहारी की उस सुरतान्त छवि का मैं अहर्निश निरन्तर अवलोकन किया करता हूँ, जिसमें काली घुँघरारी ल...
नहिं चाहों बैकुंठ नहिं चहौं ब्रह्मानंद कौं
न तो मुझे वैकुण्ठ चाहिए, न ही ब्रह्मानंद चाहिए। न मुझे मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम चाहिए, न ही नंदलाल श्री कृष्ण। [1] न ही मुझे कुंजों कुंजों का रास...
सेवा करत निकट रहत मन में दूरी दुरास
यदि कोई श्री बिहारीजी महाराज के अति निकट भी रहे और उनकी सेवा भी करता रहे, परन्तु यदि उसने मन से ही बिहारीजी से दूरी बना रखी है—अर्थात् मन में सांसारिक...
सुख की संधि समझे बिना
सुख की संधि (श्रीधाम वृन्दावन) में अहर्निश चलने वाले नित्यविहार का ज्ञान न होने के कारण ही लोग सुख-दु:ख, लाभ-हानि और मान-अपमान जैसे द्वंद्वों के सागर ...
जे पैसनि माँनत भलौ
जो लोग धन में महत्त्व-बुद्धि रखते हैं, उनसे प्रेम बहुत दूर रहता है। पैसा पाकर तो केवल बहिर्मुख जीव ही फूला (अहंकार से भर) करता है, क्योंकि पैसे के प्र...
श्री कुंजबिहारिनी लाडिली, श्री स्वामी हरिदास
श्री कुंजबिहारिनी लाड़िली जू और ललिता-अवतार स्वामी हरिदास जी वस्तुतः अभिन्न स्वरूप हैं। दोनों एक प्राण, एक रस होकर नित्य-विहार रूपी प्रेम-विलास में सत...
कुटिल लम्ब कल चीकने
श्री श्यामा-कुंजबिहारी के घुँघराले, लंबे, कोमल और कानों तक झूलते सुंदर घने केशों को निहारकर चतुर सखी ऐसी मोहित हो जाती है कि वह अपने प्राणों तक को उन ...
सहज स्नेही श्याम के बन बसि अनत न जाँइ
जिन भक्तों के हृदय में श्री बिहारीजी के प्रति सहज और गाढ़ प्रेम बस जाता है, वे वृंदावन धाम को त्यागकर कहीं और नहीं जाते। जिनका प्रेम अनन्य नहीं होता, ...
भजन करै हरिदास को पावै नित्य बिहार
श्री स्वामी हरिदास जी का भजन करने से सर्वोपरि नित्यविहार रस सहज ही प्राप्त हो जाता है और स्वयं नित्य विहारिणी जू (श्री राधा) सदाकाल अपने हृदय का हार ब...
राग द्वेष हमरे नहीं
ललित रस के जो सुजान रसिक होते हैं उनके राग द्वेष एवं देहाभिमान लेशमात्र भी नहीं होता क्योंकि वे तो सदाकाल अपने सरस भाव द्वारा श्री प्रिया जू (श्री राध...
प्रेम प्रेम ही उपजै
जब जीव का संग बाड़ स्वरूप (सीमा रूप से) एक मात्र प्रेमी जनों से हो जाता है तभी ह्रदय में प्रेम का अंकुर उदय होकर फूलता फलता है, इसी बात को सभी प्रेमीजन...
श्रीस्वामी हरिदास भज
श्री चतुर दास जी अपने मन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे मन, स्वामी हरिदास जी का भजन कर एवं श्री प्रिया प्रियतम के नित्य विहार का अखंड चिंतन कर। यह...
जाकौं चाहैं लाडिली
जिसको श्री कुंजबिहारिनी लाड़ली जू [श्री राधा] चाहती हैं उसको ही सब सुख सहजता से प्राप्त हो जाता है। यह बात को सब जानते हैं कि प्रिया प्रियतम के निजमहल...
सो सुख वृन्दाविपिन है मूल आदिद्रुम जैस
संसार में जो भी सुख दिखाई पड़ता है उसका मूल स्रोत श्री वृंदावन ही है। श्री चतुरदास जी कहते हैं कि उसे लालितादिक सहचरियाँ नित नव कैशोर-मंडित श्री श्याम...
भक्ति साधारन जगत में, हरि कीनों सिष्टाचार
श्रीहरि ने जगत में अवतार ले-लेकर सृष्टि अनुसार अनेक प्रकार की भक्ति एवं रसों का विस्तार किया है। साधारनतया भक्त प्रायः उसी अनुसार भक्ति करता है। परंतु...
श्री स्वामी हरिदास भजो मन, श्री हरिदास भजौ
श्री चतुर दास जी अपने मन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे मन, स्वामी हरिदास जी का भजन कर एवं श्री प्रिया प्रियतम के नित्य विहार का अखंड चिंतन कर। दू...
प्राण पालित पाइनि परें परसें होत निहाल
श्रीलालजी (श्रीकृष्ण) की अद्भुत प्रेमासक्ति का वर्णन कैसे किया जाए? जिनके प्राणों का पालन एकमात्र श्री प्यारीजू (श्रीराधा) के चरणकमलों में सदा पड़े रह...
रसिक सिरोमनी लाड़िली सो हमरे अंग संग
रसिक शिरोमणि कुंज बिहारिनी, श्री लाड़ली जू (श्री राधा) सदा हमारे अंग-संग रहती हैं, इसी कारण हम कुंज महल में विराजते हुए, उनकी अखंड केलि को सदा निहारते...
नाम रूप विन गुन कहा
नाम रूप विन गुन कहा, केसर कुसुम कसूँभ। श्रीबिहारीदास बिनही कसैं, दोऊ दीसैं ऊंभ॥ - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी ...
जा सुख नैना सुख ढके
जिस रस से नैनों को सुख प्रदान करने वाला सुख ही नष्ट हो जाय, वह सुख सच्चा सुख नहीं है। सच्चा सुख तो वह है जिससे वियोग की व्यथा सदा-सदा के लिए मिट जाय ।
श्रीस्वामी हरिदास भजि, सिद्ध होइ सब काम
श्री चतुरदास जी अपने मन को समझाते हुए कहते हैं, “हे मन, तुम श्री स्वामी हरिदास जी महाराज का भजन करो (अर्थात् अखंड नित्य विहार उपासना करो), जिससे समस्त...
आये तैं हर्षे नहीं, गये करें नहिं सोग
कोई व्यक्ति या वस्तु आए, हमें कोई हर्ष नहीं; कोई व्यक्ति या वस्तु छिन जाए, हमें कोई शोक नहीं क्योंकि हम तो गौर-श्यामल वर्ण वाले श्यामा कुंज बिहारी के ...
मूँड मुंडायें कहा भयो, जो मन न मुंडायौ
यदि मन की वासनाओं को नहीं मुड़ाया, तो केवल मूँड के मुड़ाने से कोई लाभ नहीं क्योंकि बिना सच्चे भाव के, मन में संतोष आ ही नहीं सकता।
श्रीस्वामी हरिदास के
श्री स्वामी हरिदास जी के जो अनन्य जन हैं, उनका यह यश जगत में विख्यात है कि वे लोक-वेद की समस्त मर्यादाओं को त्यागकर, सदैव एकमात्र सर्वोपरि नित्यविहार...
ललितमोहिनी कृपा करी
श्री चतुरदास जी कहते हैं कि उनके गुरुदेव श्री ललित मोहिनीदास जी की कृपा से, वे नित्य विहार पारायण श्यामा कुंजबिहारी को निरखते हैं। समस्त सांसारिक द्वन...
सदा बसै वृन्दाबिपिन तजे न कबहूँ खेत
जो बड़भागी महतजन ऐसे अनन्य भाव से श्रीवृन्दावन में वास करते हैं कि वे एक क्षण को भी वृंदावन को त्याग कर नहीं जाते, वे ही महतजन साक्षात श्रीप्रियाजू (...
नेष्ठा गर बंधन भये
यदि अन्य अन्य निष्ठाएँ ह्रदय में पड़ी हुई हैं, तो वह निष्ठाएँ ही गले का बंधन बन जाती हैं। जिनका मन आचार-विचार में फँसा हुआ है, जो नख से सिख तक विधि-नि...
राख्यौ कहत न मैं कछू
सर्वोपरि नित्य बिहारिनी जू (श्री राधा) का महामधुर रसमय विहार ही हमारे जीवन के प्राणों का आहार (सर्वस्व) है। परमार्थ के सारों का सार यही विहार है, जिसे...
श्री स्वामी हरिदास को धर्म सुमेर समान
प्रिया-प्रियतम के एकान्तिक एवं अखंड नित्य विहार रस रूपी भक्ति-भाव का सतत पालन करने वाला स्वामी श्री हरिदास जी का सर्वोपरि प्रेम-धर्म, सुमेरु पर्वत के ...
अति टोंडिकु अति चिकनियाँ
ब्रज रस क्षेत्र के ठाकुर (श्री कृष्ण) अपने स्वाभाविक ठाठ-बाठ, अति टोडिक, छैल-छबीले एवं सिरताज स्वरूप से ऐंठ में भरे रहते हैं, परंतु निकुंज के (कुंज बि...
श्री बिहारीदास मन सौं कहै
श्री बिहारिन देव अपने मन से उपदेश करते हैं — “अब तू सब ओर से भलीभांति स्वयं को हटा कर, केवल स्वामी श्री हरिदास जी के रस-यश में, अर्थात् युगल सरकार के ...
जेतो अन्तर वास में तेतो जानि उपास
श्री वृन्दावन धाम की प्राप्ति साक्षात् इष्ट की प्राप्ति ही है। जितना हम श्री वृंदावन धाम वास से पृथक हैं, उतना ही हम अपने उपास्य तत्व से भी विलग हैं। ...
श्रीबिहारीदास ब्रज में बसत
प्रेमधाम श्रीब्रजमंडल में बसने से हमें वे श्री बाँकेबिहारीजी महाराज प्राप्त हुए हैं, जो एक मात्र प्रेमी भक्तों से प्रेम के कारण ही सपरस (स्पर्श/आलिंगन...
कोई कहै बैकुंठ, कोई कहै ब्रह्म है
कोई भगवान का निज स्वरूप वैकुंठनाथ को बताता है, कोई ब्रह्म को बताता है। कोई अयोध्यानाथ श्री राम को बताता है तो कोई स्वयं भगवान श्री कृष्ण को बताता है। ...
पाँडे माटी में सनैं
पंडित निपट-कोरे मिट्टी के समान इस कर्मकाण्ड में ऐसे उलझे रहते हैं जिसका कोई ओर-छोर ही नहीं है। ऐसे बाह्य आडम्बरों से युक्त कर्मकाण्डी लोग सर्वोच्च प्र...
रसिकन सों ऐंठे फिरें बिमुखति भेंटत धाइ
कुछ लोग ऐसे स्वभाव के होते हैं जो रसिक उपासकों से तो सदाकाल अपनी अकड़ में भरकर रहते हैं और विमुखों (सांसारिक जीवों) से बड़े प्रेमपूर्वक मिलते हैं, उनक...
व्याकुल बिरह बिहार बिनु
हे सखी! रसिक-शिरोमणि लाल जी रस-बिहार के नख से शिख तक लोभी होकर ऐसे आधीन रहते हैं कि यदि थोड़ा-सा भी विहार में व्यवधान पड़ जाए तो वे व्याकुल हो उठते हैं...
निजु प्रिय कीनी अपनपौ
रिझवार-चूड़ामणि श्री स्वामिनी जू ने मुझे अपनी निज कर लिया और वे मेरे तन-मन में समा गईं। मेरे मन के भावों का पोषण कर मुझसे बोलीं— “तू तो मेरी प्राण-सखी...
बिछुरन रहित सुबस्तु है
हे रस के अनुरागी रसिक जनों! चित्त लगाकर इस दुर्लभ नित्य-विहार-रस को सुनो। इस रस में श्री प्रिया–प्रियतम एक क्षण के लिए भी वियोग को प्राप्त नहीं होते। ...
काम न आवै कौन हूँ
बहुत से लोग जन्मभर अपरस-सपरस अथवा बाह्य आचार-विचार में उलझे रहते हैं। मृत्यु के समय जब जीव खाट छोड़कर आगे की यात्रा पर जाता है, तब केवल भगवान से किया ...
मनसा बाचा कर्मना
मन, वाणी और कर्म—तथा सम्पूर्ण आत्मभाव से श्री नित्यविहारिणी जू को ही अपना सर्वस्व मानो। इसी दिव्य रस के प्रभाव से श्रीविहारिणी जू की दासी बनकर, उनके प...
व्यास रसिक निर्णय कियौ श्रीवृंदावन माँहिं
श्रीधाम वृन्दावन में रसिक-समाज के मध्य गहन विचार के उपरांत, श्री हरिराम व्यास जी ने यह निष्कर्ष स्थापित किया कि रसिक अनन्य नृपति श्री स्वामी हरिदास जी...
नित ही राधाकृष्ण हैं
श्री राधा-कृष्ण नित्य हैं और श्री वृन्दावन भी नित्य है। अनंत-कोटि गोलोक भी श्री वृन्दावन के एक पत्र के प्रकाश की समानता नहीं कर सकते।
विभचारनि कौ संग तजि
यदि तुम व्यभिचारियों के संग को सर्वथा त्याग दो, एकमात्र निष्काम और अनन्य भाव से प्रिया-प्रियतम का भजन करो, केवल उनके सुख में ही सुखी रहो, तो तुम्हारे ...
आदि अंत वृन्दाविपिन, निरदोषिक करि बास
सृष्टि की रचना से पूर्व और प्रलय के पश्चात भी जो सतत एकरस भूतल पर विद्यमान रहता है, वह केवल श्रीवृन्दावन धाम ही है। वहाँ जो जन समस्त अपराधों से रहित ह...
तनु की मनु की बचन की करी अविद्या दूरि
तनु की मनु की बचन की, करी अविद्या दूरि। कुंजबिहारिनी लाडिली, भरयौ प्रेम भरपूरि॥ - श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की सा...
मेरी प्रिय है लाडिली
मेरी प्राणप्यारी तो श्री लाडिली जू ही हैं। वे क्षण-क्षण नई-नई प्रीति करती हुई मेरे सुख में ही अति सुखी होती हैं, और मैं भी उनके ही सुख में नित्य लीन र...
कोऊ नेष्ठा नाम की
श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि कोई-कोई बिना स्वरूप, सुख और सम्बन्ध का विचार किए केवल नाम-जप में ही निष्ठा रखता है; किसी की निष्ठा नामी के ध्यान में ...
बलिहारी जाऊँ जक परी
हे बिहारीदास! श्रीमद्भागवत् के वर्तमान वक्ता मुख से तो अत्यंत सरस व्याख्यान करते हैं और बार-बार दण्डवत कर विनम्रता का प्रदर्शन भी करते हैं, किन्तु जो ...
अनहाये कबहूँ नहीं
ऐसे रसिक, जिनकी एकमात्र मित्रता निकुञ्ज-विहारिणी श्री किशोरीजी से ही है, वे कभी भी अनहाये [अपवित्र अवस्था] में नहीं रहते। वे तो सदा ही नहाये हुए रहते...
हमरी बात भली बनी भई लडैती प्रान
जगत में हमारी बात बहुत ही सुन्दर बन गई क्योंकि स्वयं सर्वोपरि श्रीनित्यविहारिनीजू (श्री राधा) हमारी प्राण-स्वरूप हो गई हैं। रसिक-शिरोमणि श्यामा प्यारी...
एक दसा एकादसी एक इष्ट व्रत एक
श्री स्वामी हरिदास जी की अखंड नित्य विहार उपासना में सदा काल एक ही इष्ट (श्री बिहारी बिहारिनी) की अनन्य उपासना है एवं एक ही दशा की एकादशी रहती है। अर्...
रसिक अनन्य की सभा
युगल के अनन्य रसिकों की सभा में कर्मकांडी लालची-लोग लज्जित हो जाते हैं, क्योंकि जहाँ प्रेम की प्रधानता में श्रीश्यामा-श्याम के नित्य-विहार की चर्चा ह...
नित्य विहार सार सबको
'नित्य विहार' सभी ग्रंथों, वेदों आदि का सार है, जिसका न आदि है न अंत—जो अत्यंत दुर्लभ है।
रसिक अनन्य सौं मिलै
परम रसिक आचार्य श्रीबिहारिनदेवजी महाराज बोध कराते हैं कि निरंतर रसिक अनन्यों का सत्संग करें और उनके मध्य ही इस 'रसोपासना' के रहस्यों का अनुशीलन करें। ...
श्री बिहारीदास परमारथी मिली
सच्चे परमार्थी जन को परस्पर श्री युगल रस एवं युगल यश को ही कहना, सुनना एवं चिंतन करना चाहिए। यह रस इतना दुर्लभ है कि संसारी लोगों को यह सुनकर सुहाएगा ...
लाल लड़ायें लाडियें
संसार के समस्त सुखों को भलीभाँति त्यागकर एकमात्र स्वामिनी जू और उनके प्राण-जीवन लाडिले लाल जू को लाड़ लड़ाओ।
जा रज सौं जग रज कहै
साधारणतः यह जीव संसारी माया और नश्वर सुखों की खोज में भटकता हुआ अथक प्रयास करता है। वह केवल उस माया-रूपी रज (धूल) का ही संचय करता है, जो उसके मिथ्या अ...
नामी नाम न भावई
स्वामी हरिदास जी की रस-उपासना में हमारे रसिक-शेखर श्रीयुगल तन, मन, मनसा, एवं रोम-रोम से एकमात्र अखंड नित्य-विहार में ऐसे वशीभूत हुए रहते हैं कि इस विह...
बातें कहत बिहार की
कुछ लोग नित्य-विहार की बातें तो करते रहते हैं, पर उनके हृदय में व्यवहार तथा अनेकानेक उपासनाओं के जंजाल भरे रहते हैं। श्री बिहारिन देव जी कहते हैं— “मह...
सेवैं नित्य सरुप कौं
हम सदाकाल श्री वृन्दावन-चन्द्र में अखण्ड वास करते हुए नित्य-स्वरूप श्री लाड़ली–लाल की केलि-सुख का निरन्तर सेवन कर सतत आनन्द में निमग्न रहते हैं।
कूँची नित्य विहार की
वह परम रसमय 'नित्य-विहार', जिसकी प्राप्ति बड़े-बड़े साधकों एवं सिद्धों के लिए भी अत्यंत दुर्लभ है, उस निकुंज-धाम की चाबी रसिकेश्वर श्रीस्वामी हरिदासज...
निश्चय तन मन प्रेम सों
मैं तुमसे स्पष्ट कहता हूँ कि तुम तन-मन-प्राण से सर्वोपरि नित्य-विहारिनी जू के सुमिरन का लाभ आज ही ले लो, कल का दिन किसने देखा है।
दूल्ह नित्य विहार है
जैसे विवाह में एकमात्र दुल्हा-दुल्हन का ही मान-सम्मान और गौरव होता है और उन्हें ही सब निहारते हैं, वैसे ही रसिकों द्वारा रसोपासना-पद्धति में निज महल क...
अवध उड़ीसा द्वारिका
नित्य विहार-रूपी दुर्लभ रस, जिसे ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी ने बरसाया एवं स्वीकार किया है, उसकी तुलना अवध, उड़ीसा, द्वारिका, बद्रीनाथ, केदारनाथ ...
बिछुरन मिलन जहाँ रहै
जहाँ विरह (बिछुड़ना) और मिलन का चक्र बना रहता है, वहाँ प्रेम की पराकाष्ठा 'विशुद्ध प्रेम' नहीं होता। इसके विपरीत, प्रतिक्षण साथ रहते हुए भी मिलने की उ...
श्री स्वामी हरिदास को
श्री ललित किशोरी देव जी कहते हैं— “जिसने श्री स्वामी हरिदास जी महाराज को अपना जीवन समर्पित कर दिया है, वह अपने देह की सुध-बुध भूल जाता है और श्री प्रि...
सोई रसिक प्रवीन
जगत में वही चतुर-चूड़ामणि, अति प्रवीण तथा उच्च कोटि के रसिक हैं, जो दृढ़ अनन्य-भाव से एकमात्र सर्वोपरि नित्य-विहार-रस का ही सेवन करते हैं और साक्षात् ...
चरन कमल रज सेइयौं
अपनी वाणी के शुभारंभ से पूर्व मेरी एकमात्र अभिलाषा है कि मैं श्री नित्य विहारिणी (श्री राधा), श्री नित्य विहारी (श्री कृष्ण), श्री स्वामी हरिदास जी अथ...
सोई जगत में जानि
जिसको ‘मैं–मेरी’ की आसक्ति लगी हुई है, जो मैं-मेरापन से युक्त है, वही संसार है और वही संसार-माया के जाल में गँसा-जकड़ा हुआ है। किंतु भक्त-रसिक-संत महा...
कुंज बिहारिनि लाडिली
परम प्रवीण रसिक-शिरोमणि साक्षात् श्री नित्य-विहारिणी लाड़िली जिसे अपना बना लेती हैं, उसका हाथ वह कभी नहीं छोड़तीं।
रोम रोम आनंद भयो
हमारे रोम-रोम में आनंद भर रहा है और क्षण-क्षण हृदय उल्लास से परिपूर्ण हो रहा है, क्योंकि श्री कुञ्ज-विहारिणी लाड़िली श्री राधारानी सदा हमारे साथ विराज...
कुंज बिहारीनि बाल कों
जो बड़भागी जन बड़े ही हित से (प्रेमपूर्वक) श्री कुञ्ज-विहारिणी बाल—श्री राधारानी—की सतत सेवा करते हैं, उनके तन, मन और चित्त में किसी प्रकार का विघ्न न...
बैकुंठ महा बैकुंठ तै
जहाँ श्री वृन्दावन में युगल सरकार नित्य-विहार करते हैं, वह नित्य धाम वैकुण्ठ, महा-वैकुण्ठ और गोलोक धाम आदि सभी से परे है—जिनका नित्य सेवन यह सभी धाम भ...
कब देखौं भरि नैन
जो गौर-श्याम दोऊ लाड़िले श्री स्वामी हरिदास जी महाराज की गोदी में अनादिकाल से विहार कर रहे हैं, उन्हें मैं आँखें भर-भर कर कब देख पाऊँगा?
श्री बिहारीदास हरिदास कौ, संतत सुखद विहार
हे बिहारीदास! तुम भली-भाँति सोच-विचार कर देख लो कि एक श्री स्वामीजू (हरिदास जी) का नित्य-विहार ही अखंड रूप से समस्त भाँति, सदाकाल सर्वोपरि सुखदायी रस ...
सदा हमारे पास है
श्री कुञ्जबिहारिणी श्री राधाजू सदा हमारे समीप रहती हैं। हमारे भावों का पोषण करने के लिए वे क्षण-क्षण हमें निहाल करती रहती हैं।
सेवै नित्य बिहार कों
जो बड़भागी जन नित्य-विहार के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं जानते, उन्हें प्राण-प्यारी नित्य-निकुंजेश्वरी श्री राधा रानी अपने तन, मन और प्राणों में समेटे रखत...
कुंवरी लडैती लाडिली
हमारी कुँवरि प्राण-प्यारी श्री राधा महारानी अति सुकुमारी ऐसी लाड़िली हैं, जो महाप्रेम के सुख-सार स्वरूप अंग-संग केलि-रस को ही सदा सर्वदा प्रदान करती र...
हम हमरी है लाडली
हमारी प्राण श्रीलाड़िली राधा ही हैं, इसीलिए हम चित् लगाकर सदाकाल उनके ही केवल गुण गाते हैं एवं श्रवण करते हैं। उन्हीं की निकुंज-केलि नित्य-विहार का सद...
सरन गहौ श्री हरिदास की
श्री हरि की माया उन लोगों को छू भी नहीं सकती, जो श्री हरिदास (ललिता-अवतार) के चरण-कमलों की शरण ग्रहण कर लेते हैं। ऐसा इसलिए है कि श्री कुंजबिहारिणी ला...
अनेक जन्म की भूल कों
परम प्रवीण रसिक-शिरोमणि श्री कुञ्जबिहारिणी लाड़िली-जू जिसे अपना निज बना लेती हैं, उसकी वे समस्त प्रकार से रक्षा करती हैं। फिर किसी भी प्रकार से उसका ह...
बूडत ही विषधार में
हमारी कुंज-बिहारिणी श्री राधारानी से ऐसी अद्भुत प्रीति और स्नेह है कि मैं विषय-रूपी महाविष की नदी में डूब रहा था, परंतु उन्होंने स्वयं अपने हाथ पसारकर...
श्रीस्वामी के पद कमल
ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी के चरण-कमलों को हृदय रूपी शुभ स्थान में बड़े ही प्रेम से विराजमान कर गौर और श्यामल वर्ण की आभा से युक्त श्री युगल-सर...
चतुरदास चित चौंप सों
श्री चतुरदास जी के अनुसार, हृदय में परम उल्लास संजोकर श्री वृन्दावन धाम में निवास करना चाहिए और निरंतर युगल सरकार के दिव्य केलि-विहार का दर्शन करना चा...
निंदा बिंदा भै नहीं
नित्य-विहार के अनन्य उपासक श्री बिहारिन देव जी महाराज का मनभावन दृढ़ व्रत ऐसा है कि अपनी प्राण-जीवन स्वरूप श्री नित्य-विहारिणी जू (श्रीराधा) के श्रीमु...
श्रीबिहारीदास बिहार मैं
नित्य विहार का रस वेद भी नहीं जान सकते। इसे तो केवल वही जान सकते हैं, जिन्हें सखियाँ महा-मधुर रस को छानकर प्रेमपूर्वक जना दें।
अनंत जनम की भूलि कौं
हे श्री राधा! सर्वसमर्थ प्राणप्यारी जू, आप ऐसी कृपामयी स्वामिनी हैं कि अनंत जन्मों की भूल को भी एक क्षण में मिटा देती हैं। मुझमें कोई साधन-बल नहीं है;...
कुंज बिहारिनि लाडिली
रसिक-शिरोमणि की भी सिरमौर हमारी श्री कुंजबिहारिनि लाड़िली, अपने निज जनों के स्वभाव को जानकर क्षण-क्षण उनके भावों का पोषण करती रहती हैं।
Ati Tondik Ati Chikniyan
Ati Tondik Ati Chikniyan, Adhik Chatur Itarai.Kitahi Vibhau Kit Thakurai, Juthani Kaun Lalachai.- Shri Biharin Dev Ji, Shri Biharin Dev Ji Ki Vani, Si...
Rakhyo Kahat Na Main Kachu
Rakhyo Kahat Na Main Kachu, Tokon Sarvasu Saar.Shreekunjbiharini Kau Bhajan, Jeevan Ahaar Bihar.- Shri Biharin Dev Ji, Shri Biharin Dev Ji Ki Vani, Si...
Pandit Ya Ras Tain Bache
Pandit Ya Ras Tain Bache, Jyon Bijhukai Mrig Rojh.Navai Na Achavan Paavahi, Ved Ladai Sir Bojh.- Shri Biharin Dev Ji, Shri Biharin Dev Ji Ki Vani, Sid...
Shri Swami Haridas Ko Dharm Sumer Saman
Shri Swami Haridas Ko, Dharma Sumer Samaan.Aur Dharma Sab Doongri, Yahi Baat Parmaan.- Shri Lalit Kishori Dev, Shri Lalit Kishori Dev Ju Ki Vani, Sidd...
Shri Biharidas Man Son Kahai
Shri Biharidas Man Soun Kahai, Ab Na Lagaun Tohi.Jas Gaaun Haridas Kau, Tain Sukh Deenon Mohi.- Shri Biharin Dev Ji, Shri Biharin Dev Ji Ki Vani, Sidd...
तुम बिन नैंना ना सुखी
हे प्राणप्यारी श्री कुंजबिहारिनी जू! आपको देखे बिना मेरे नेत्र कहीं भी सुख नहीं पाते। मेरे हृदय की व्यथा आप सब जानती हैं, फिर और मैं क्या कहूँ?
Koi Kahai Baikuntha
Koi Kahai Baikuntha, Koi Kahai Brahma Hai.Koi Kahai Iha Rama, Koi Kahai Krishna Hai. [1]Koi Kahai Yaha Kunjani-Kunjani, Raas Kiyau Niradhara Hai.Hari ...
Kaam Na Aave Kaun Hu
Kaam Na Aavai Kaun Hoon, Ati Aparas Aachaar.Ant Nibaahai Prem Heen, Chhaande Khaat Kau Dwar.- Shri Biharin Dev Ji, Shri Biharin Dev Ji Ki Vani, Siddha...
Vyas Rasik Nirnay Kiyo
Vyas Rasik Nirnay Kiyo, Shrvrindavan Maanhi.Shri Swami Ke Dharm Kon, Patatar Kon Koi Nahin.- Shri Lalit Kishori Dev, Shri Lalit Kishori Dev Ju Ki Vani...
Balihari Jaun Jak Par
Balihari Jaun Jak Pari, Baatan Bahut Dandaut.Palat Deh Kutumb Kon, Bhale Samajh Bhagot.- Shri Biharin Dev Ji, Shri Biharin Dev Ji Ki Vani, Siddhant Ki...
Humri Baat Bhali Bani
Humri Baat Bhali Bani, Bhai Ladaiti Praan.Tahi Ten Ati Sukh Bhayo, Mili Su Rasik Sujaan.- Shri Lalit Kishori Dev, Shri Lalit Kishori Dev Ju Ki Vani, S...
Nami Nam Na Bhave
Naami Naam Na Bhavai, Tan-Man-Mansa Praan.Aasa Daasi Vihar Ki, Yon Basi Rasik Nidaan.- Shri Biharin Dev Ji, Shri Biharin Dev Ji Ki Vani, Siddhant Ki S...
Paande Maati Mein Sane
Paande Maati Mein Sanain, Karmath Nipat Nikor.Prem Padarath Kyon Gahein, Arujhe Lahai Na Chhor.- Shri Biharin Dev Ji, Shri Biharin Dev Ji Ki Vani, Sid...
Aadi Anta Vrindavipin Nirdoshik Kari Baas
Aadi Anta Vrindavipin, Nirdoshik Kari Baas.Adbuta Sukhad Bihar Kon, Det Tinhein Haridas.- Shri Lalit Kishori Dev, Shri Lalit Kishori Dev Ju Ki Vani, S...
Vibhcharani Ko Sang Taji
Vibhcharani Ko Sang Taji, Bhaji Ananya Nihkam.Shri Biharidas Sukh Mein Sukhi, Dampati Rati Dhan Dham.- Shri Biharin Dev Ji, Shri Biharin Dev Ji Ki Van...
Mansa Baacha Karmana
Manasa Baacha Karmana, Sarva Aatama Jaani.Shri Biharinidasi Basikaran, Fabi Priya Sukh Daani.- Shri Biharin Dev Ji, Shri Biharin Dev Ji Ki Vani, Siddh...