ब्रज के दोहे
Verses & Passages
237 itemsराधा राधा नाम जो सपनेहु में लेत
यदि कोई स्वप्न में भी श्री राधा नाम ले ले, तो लाड़ले मोहन श्रीकृष्ण उस पर प्रसन्न होकर स्वयं को ही उस जीव को दे देते हैं।
हे राधे ये कहा कहौ
हे राधे! आप पर मेरा अटूट विश्वास है। आपसे मेरी यही विनय है कि चाहे सखी बनाकर रखें अथवा दासी बनाकर—किसी भी प्रकार मुझे अपना निकट-सामीप्य प्रदान करें जि...
दृग पात्र में प्रेम का जल भरि के
हे नाथ, मेरे नेत्रों से बहने वाले प्रेमाश्रुओं से आपके चरण कमलों का नित्य अभिषेक करता रहूं। आपका प्रेम-पुजारी बनकर, आपकी सदा आरती उतारता रहूं।
नहिं ब्रह्म सों काम कछु हमको
हमको ब्रह्म [भगवान] से कोई काम नहीं, न ही हमें वैकुंठ से कुछ लेना देना है, हम वैकुंठ की राह को देखते भी नहीं। हमारी इतनी ही आशा है की ब्रज की रज में ह...
प्रीति को बाण लग्यो तन पै
प्रेम का बाण तो मेरे शरीर पर चल ही चुका है। अतः अब मैं बदनामी का बीज बो चुकी हूँ। श्यामसुन्दर से प्रेम कर के मानो अपने जीवन से ही हाथ धो चुकी हूँ।
जमुना जल अँचवन करै जमुना जल में नहाहि
यमुना जी के जल से आचमन करें और उसमें स्नान करें, क्योंकि जहाँ-जहाँ यमुना जी का प्रवाह होता है, वहाँ यमराज का कोई प्रभाव नहीं रहता।
बरसानो जानो नहीं जपो नहीं राधा नाम
यदि तूने बरसाना को नहीं जाना और न ही राधा नाम का जप किया, तो तूने अभी ब्रज के महान तत्त्व को कहाँ जाना है?
मैं नहीं देखूँ और को
न मैं किसी और को देखूँ, न ही कोई मुझे देखे; मैं तो केवल नित्य तुम दोनों [श्री राधा-कृष्ण] को ही सर्वत्र देखा करूँ।
कुंजन की सेवा मिले
हे राधावल्लभ लाल! ऐसी कृपा मुझ पर सदा बनाए रखिए कि मुझे नित्य ही वृन्दावन के कुंजों की सेवा प्राप्त हो और मेरा जगत-जंजाल मिट जाए।
जय जय वृषभानु नंदिनी
श्री वृषभानुनन्दिनी राधा और श्री ब्रजराजकुमार कृष्ण की जय हो। कृपया मेरे सभी अपराधों को भुलाकर मुझे अपनी निज शरण में रखिए।
जाके दर्शन हेत नित
जिनके दर्शन के लिए श्रीकृष्ण नित्य ही विकल रहते हैं, उन श्री राधारानी के चरणों में ही मेरा मन सदा लगा रहे—ऐसी मेरी कामना है।
कब इन नैंनन ते लखुं वृंदावन की धूरी
कब मैं इन नयनों से श्री वृंदावन की उस परम-पावन रज का दर्शन करूँगा, जो रसिकों का प्राण-धन एवं जीवन का आधार है।
कृष्ण रुपिणी कृष्ण प्रिया पुनि पुनि याचै तोय
हे श्रीकृष्णस्वरूपिणी, श्रीकृष्णप्रिया, श्रीराधे! पुनि-पुनि मैं आपसे केवल यही प्रार्थना करता हूँ कि मेरी भक्ति आपके श्रीयुगल चरणों में अटल रहे; मुझे क...
कबहु सेवा कुंज में बनू मैं श्याम तमाल
ऐसा कब होगा कि मैं वृंदावन में सेवा-कुंज में एक तमाल वृक्ष बन जाऊँ, जहाँ ललित युगल श्री राधा-कृष्ण उस वृक्ष तले एक-दूसरे का हाथ पकड़कर विहार परायण हों...
को कबि वरनन कर सकै
कौन कवि ब्रज की इस परम-पावन रज की वास्तविक महिमा का वर्णन कर सकता है? इसके तो कण-कण में साक्षात् प्रिया-प्रीतम (श्री राधा-कृष्ण) के चरण-कमलों की रज म...
राधा रूप समुद्र में बह्यौ जात मनमीन
श्री राधा के अनुपम रूप रूपी अथाह समुद्र में मेरा मन रूपी मीन (मछली) बहता ही चला जा रहा है। श्री राधिका साक्षात् पावन मानसरोवर हैं, जिन्होंने मेरे मन क...
ब्रज रज जाकूँ मिलि गयी
जिसे ब्रज की रज प्राप्त हो जाती है, उसकी कोई इच्छा शेष नहीं रह जाती; क्योंकि ब्रज की लालसा तो नित्य ही ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी आदि को भी बनी रहती है।
जितनी वह दूर रहें हम सों
मेरे प्रियतम श्यामसुंदर चाहे मुझसे जितने भी उदासीन रहें, मैं उनसे उतना ही अधिक प्रेम करता जाऊं। विरह की वेदना में एक अद्भुत और अलौकिक सुख छिपा है। क...
श्री वृषभानु कुंवरी के करूँ चरण कमल को ध्यान
मैं नित्य ही श्री वृषभानु-कुंवरी के चरणों का ध्यान करूँ, जिनके चरणों का स्मरण करने से प्रेम-स्वरूप भगवान की प्राप्ति होती है।
वृंदावन में ही सदा
हे श्री राधा रानी! मेरी यही प्रार्थना है कि मैं नित्य ही श्रीवृन्दावन धाम में आपके संग निवास करूँ और आप सदा मेरे हृदय में विराजमान रहें।
श्री राधे प्राणन बसी और न कछू सुहाय
श्री राधा ही मेरे प्राणों में बसी हैं; मुझे और कुछ भी नहीं सुहाता। हे श्री राधे! मेरे मन-रूपी मंदिर में पधारकर मुझे अपने दर्शन दीजिए।
राधा श्री राधा रटूं
राधा श्री राधा रटूं, निसि - दिन आठों याम। जा उर श्री राधा बसै, सोइ हमारो धाम॥ - ब्रज के दोहे मैं नित्य प्रतिदिन आठों याम केवल “राधा-राधा” का ही जप क...
ब्रह्म नहीं माया नहीं
न मैं ब्रह्म के रहस्य को जानना चाहता हूँ, न माया के विषय में, न ही जीव के स्वरूप को समझना चाहता हूँ और न ही काल के रहस्य को। मेरी तो बस यही कामना है क...
हे राधा रानी सदा
हे राधारानी! मुझ पर सदा अपनी कृपा-दृष्टि बनाए रखें और ऐसी करुणा बरसाएँ कि मुझे भी आपके संग नंदकिशोर श्रीकृष्ण के दिव्य दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हो।
अहो राधिके स्वामिनी गोरी परम दयाल
हे स्वामिनी श्री राधिका जू! आप गौरवर्ण हैं और परम दयालु हैं। हे परम कृपालु, ऐसी कृपा कीजिए कि आप नित्य मेरे हृदय में वास करें।
डूबै सो बोलै नहीं, बोलै सो अनजान
जो इस दिव्य प्रेम-समुद्र की अगाध गहराइयों में डूब जाता है, वह मौन हो जाता है और कुछ कह नहीं पाता; और जो इसके विषय में व्यर्थ की बातें करता है, वह वास्...
कबहुँ लाड़िली होत पिय, लाल प्रिया ह्वै जात
प्रेम की अद्भुत अवस्था में कभी श्री राधा ही श्री कृष्ण के रूप में प्रतीत होती हैं और कभी श्री कृष्ण श्री राधा के रूप में। इस प्रेम-रस में डूबे भक्त को...
रस रस रस रस प्रेम-रस बरसत व्रज दिन रैन
श्री ब्रजधाम में दिन-रात प्रेम-रस की वर्षा हो रही है। इस प्रेम-रस के प्यासे नेत्र पल-पल इसे पान करते हैं, फिर भी उनकी तृप्ति नहीं होती और उनकी प्यास ब...
ठाकुर नाहीं दूसरों, श्री राधा रमण समान
श्री राधा रमण के समान दूसरा कोई ठाकुर नहीं है। इसलिए, सांसारिक प्रपंचों को त्यागकर, केवल उन्हीं का ध्यान करना चाहिए।
प्यारे राधा राधा रटो भगो नट नागर आवेगो
अरे प्यारे! यदि तू नित्य “राधा राधा” रटेगा, तो निश्चित ही श्री नटवर नागर श्री कृष्ण दौड़े चले आएँगे। तेरे हृदय में प्रेम की तरंग उठेगी और भीतर प्रेम-स...
नव निकुंज मन कौ अगम, सेवत कोटि अनंग
नव-निकुंज का वह दिव्य रस, जो सामान्य मन के लिए अगम्य है और जिसे कोटि-कोटि कामदेव भी सेवा करते हैं, जहाँ निरंतर प्रेम-रंग बरसता रहता है—वही वास्तव में ...
श्रीराधा बाधा-हरन, रसिकन जीवन-मूरि
श्री-राधा समस्त बाधाओं का हरण करने वाली हैं और रसिकों के जीवन का एकमात्र सर्वस्व-आधार हैं। मैं उनसे यही वरदान माँगता हूँ कि जन्म-जन्मांतर तक मुझे उनके...
एक वेर राधा रमण कहै प्रेम से जोय
यदि कोई एक बार भी प्रेम से ‘राधा-रमण’ कहता है, तो उसके अनन्त-कोटि जन्मों के अपराध उसी क्षण भस्म हो जाते हैं।
चलो सखी वहाँ जाइये जहाँ बसें बृजराज
आओ सखी, चलो वहाँ चलते हैं जहाँ ब्रजराज श्रीकृष्ण का निवास है। हम अपने गोरस (दुग्ध-उत्पाद) बेचेंगे और श्रीकृष्ण से भी मिलेंगे—इस प्रकार एक ही मार्ग से...
जेते मीठे जगत रस, सबकौ करुऔ अंत
इस संसार में जितने भी मीठे प्रतीत होने वाले विषय-रस हैं, उन सभी का अंत अत्यंत कड़वा और दुखद होता है। किंतु श्री राधा का वह महान और दिव्य नाम आदि से ले...
प्रीति रीति जान्यौ चहै, तो चातक सों सीख
तैसेहि जो जन जगत सों, चाहै निज उद्धार। तजि राधा काऊ देव पै, मती निज हाथ पसार॥ [2] - ब्रज के दोहे यदि प्रीति की रीति जानने की इच्छा हो, तो चातक पक्षी...
ब्रज की रज में लोट कर
मेरी यह अभिलाषा है कि मैं ब्रज की पावन रज (धूल) में लोटूँ और श्री यमुना जी के पवित्र जल का पान करूँ। निरंतर 'श्री राधा-राधा' नाम का रटण करते हुए ही इ...
अरब खरब पाऊँ जनम
हे मित्र! यदि मुझे अरबों-खरबों जन्म भी लेने पड़ें, तो मुझे उसकी कोई चिंता नहीं है। मेरी केवल एक ही अभिलाषा है कि प्रत्येक जन्म में श्री राधा महारानीजू...
कहा करौं ऊपर निरखि वृथा गवाऊँ शक्ति
जब श्री राधा के युगल श्री चरणों की अनूठी भक्ति प्राप्त हो गई है, तो अब वृथा कहीं और निरखकर व्यर्थ की शक्ति गँवाने से क्या लाभ?
मीठौ राधा नाम यश, जिन चाख्यौ एक बार
श्री राधा नाम का मीठा यश जिसने एक बार भी प्रेमपूर्वक चख लिया है, उसे फिर कभी माता के गर्भ में नहीं आना पड़ता (अर्थात् वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो ज...
राचै तो रंग राधिका, बाँचै तो तेहि नाम
यदि जीवन में रंच-मात्र भी आसक्ति या प्रेम करना है, तो वह केवल श्री राधिका से ही कीजिए। यदि कभी कुछ जपना है, तो केवल उन्हीं का नाम जपिए। यदि जीवन में क...
तब सखियन पिय सौ कह्यौ, सुनहुँ रसिकवर राइ
एक सखी श्री श्यामसुन्दर से कहती है कि अहो रसिकवर जू! यहाँ आपकी एक न चलेगी। यदि कुछ रस प्राप्त करने की इच्छा हो तो हमारी श्री प्रिया जू के चरणों को पकड...
खड़ी छड़ी ले राधिका प्रिय
श्री राधिका हाथ में छड़ी लेकर श्री श्यामसुन्दर को नृत्य सिखा रही हैं। जब भी श्यामसुन्दर की चाल थोड़ी मंथर हो जाती है, तब वे डर के मारे थर-थर काँपने लग...
वृन्दावन के नाम सौं
वृन्दावन का नाम सुनते ही समस्त अंग पुलकित हो उठते हैं। वह दिव्य स्थान श्री वृन्दावन ही है, जहाँ नित्य ही श्यामा-श्याम रस-रंग में निमग्न होकर नित्य विह...
वृज रानी श्री राधिके, महिमा अमित अपार
ब्रज की अधिष्ठात्री श्री राधिका महारानी हैं, जिनकी महिमा असीम और अपरंपार है। उनकी दासियों के द्वार पर भी रिद्धि और सिद्धि स्वयं उपस्थित होकर बुहारी-स...
यह तनु नय्या झांझरी, मन मलीन मल्लाह
जीवात्मा यात्री के लिए यह शरीर मानो एक नय्या है, जो संसार-समुद्र के तेज झंझावातों में डगमगाती रहती है; और उसका मल्लाह यह मलिन मन है, जो बार-बार उसी भव...
को कवि वर्णन कर सके ब्रज की रज कौ मूल
कौन ऐसा कवि हो सकता है जो ब्रज की रज के वास्तविक तत्त्व का पूर्ण वर्णन कर सके, जहाँ प्रत्येक कण में युगल सरकार श्री राधा-कृष्ण के चरण-चिह्नों की पावन ...
ब्रज रज में ये रज मिलि रज में यमुना नीर
इस शरीर की मिट्टी (रज) जब ब्रज की पावन रज में मिल जाती है, और वह रज श्री यमुना जी के पवित्र जल से सिंचित होती है, तो वही परम सौभाग्य का विषय है। धन्य ...
मुक्ति पूछे गोपाल से मेरि मुक्ति बताये
एक समय स्वयं मुक्ति-देवी ने पूर्ण पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण से विनयपूर्वक जिज्ञासा की, "हे प्रभु! यद्यपि मैं चराचर जगत के जीवों को भव-बंधन से मुक्त करती हू...
मुक्त भये मुनि जन कहैं होय दुखन कौ अन्त
जीव की जब मुक्ति होती है, तो उसके दुखों का अंत हो जाता है, परंतु वह श्री राधा-दर्शन एवं संत-समागम से सदा के लिए वंचित हो जाता है। भाव यह है कि जीव को ...
बाँकौ मारग प्रेम कौ कहत बनै नहिं बैन
यह प्रेम का मार्ग अत्यंत बाँका है, जिसे वाणी से कहा नहीं जा सकता। इसमें नेत्र और श्रवण की गति भी उलट जाती है।
श्री राधा पद भक्ति रस 'रस वृन्दावन' माँहि
श्री राधा के चरण-कमलों की भक्ति का सच्चा रस केवल रस-स्वरूप श्री वृन्दावन में ही उपलब्ध है। यह राधा-रस अत्यंत निर्मल है, इसमें किसी प्रकार का कोई संदेह...
राधे मेरी लाडिली मेरी ओर तू देख
राधे मेरी लाडिली, मेरी ओर तू देख। मैं तोहिं राखौं नयनमें, काजरकी सी रेख॥ - ब्रज के दोहे श्री ठाकुर जी लाडिली जी से कहते हैं: हे मेरी प्यारी श्री राध...
राधे रूप उजागरी राधे रस की पुंज
श्री राधा उज्ज्वल रूप से प्रकाशमान हैं और समस्त रसों की पुंज स्वरूप हैं। वे अनंत गुणों की निधि हैं, परम नागरी हैं और नित्य नवीन निकुंजों में सदा वास क...
जिन राधा पद रस पियौ, मुख रसना करि ओक
जिन राधा पद रस पियौ, मुख रसना करि ओक। पुनि न पिये तिन मातु थन, जाय बसे गोलोक॥ - ब्रज के दोहे जिन परम भाग्यशाली रसिकों ने अपनी जिह्वा (रसना) की अंजुल...
रसिक तबहिं पहिचानिये जाके यह रस-रीति
वही वास्तव में रसिक कहलाने योग्य है, जिसके हृदय में ऐसी रस-पद्धति स्थापित हो जाए कि श्री राधा-कृष्ण की मधुर झाँकी एवं लीलाएँ उसे प्रत्येक क्षण अनुभव ह...
वृज रानी श्री राधिके महिमा अमित अपार
हे ब्रज की महारानी, श्री राधा! आपकी महिमा अपरम्पार है। आपकी दसियों के द्वार पर रिद्धि-सिद्धि बुहारी देती रहती हैं।
पाग बनो पटुका बनो बनो लालको भेख
हे मन, शीघ्र दौड़कर श्री राधावल्लभ लाल की आरती का दर्शन कर, जिन्होंने अद्भुत और मनमोहक वेश धारण किया है। उनके सिर पर सुशोभित पाग बँधी है और उनकी कमर प...
लटसम्हार प्रिय नागरी कहा भयोहै तोहि
श्री कृष्ण, श्री राधा से कहते हैं—हे प्रिय नागरी! अपनी इन बिखरी हुई अलकों को संभालिए, आपको क्या हो गया है? आपकी ये काली, घुँघराली लटें नागिन के समान प...
तन विच प्राण अटक रहे लागी दर्शन आस
तन विच प्राण अटक रहे, लागी दर्शन आस। क्यों पटकी मँझधार में, राख आपने पास॥ - ब्रज के दोहे मेरे प्राण अब केवल आपके दर्शनों की आशा में ही इस तन में अटक...
भुक्ति मुक्ति चाहत सबै मोहि न भावति सोइ
संसार में सभी लोग या तो सांसारिक सुख (भुक्ति) चाहते हैं या मोक्ष (मुक्ति) की कामना करते हैं, परंतु मुझे इनमें से कुछ भी नहीं सुहाता। मेरी तो बस यही एक...
व्रज तजि अनत न जाई हों यही हमारी टेक
कुंज-बिहारी श्री श्यामसुंदर का यह दृढ़ और अनन्य संकल्प है कि वे ब्रज को छोड़कर एक पल के लिए भी बाहर नहीं जाते। ब्रज से बाहर जो-जो लीलाएँ प्रकट होती है...
राधा राधा नाम सपने में जो लेत
जो जीव स्वप्नावस्था में भी श्री राधा-राधा नाम का उच्चारण कर लेता है, मनमोहन श्री कृष्ण उसे तत्काल अपना स्वीकार कर लेते हैं और अपनी शरण में ले लेते हैं...
कवि नख शिख वर्णन करें रमे रहें रिषि रंग
अन्य रसिक कवियों ने श्री राधा के नख से शिख तक वर्णन किया है और उसी रस में डूबे रहे हैं। परंतु मेरे लिए परम हितैषी और सदा आश्रय प्रदान करने वाले श्री र...
ब्रजवासी वल्लभ सदा मेरे जीवन प्रान
श्री ठाकुर जी कहते हैं कि ब्रजवासी मेरे लिए प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। मुझे नंद बाबा की शपथ है कि मैं एक क्षण के लिए भी ब्रजवासियों को अपने हृदय से...
श्री वृन्दावन सों वन नहि नन्द गाँव सों गाँव
वृन्दावन जैसा कोई वन नहीं है, नन्दगाँव जैसा कोई गाँव नहीं है, वंशीवट जैसा कोई वटवृक्ष नहीं है, और कृष्ण जैसा कोई नाम नहीं है।
सार तत्त्व ब्रह्मांड कौ श्री राधे कौ नाम
ब्रह्मांड का सार तत्व “श्री राधे” का नाम ही है। जिसके बिना जग के नायक भगवान श्री कृष्ण भी ‘आधे’ माने जाते हैं—अर्थात् श्री राधा के बिना उनकी पूर्णता न...
मनुष्य जन्म का परम फल श्री राधा राधा नाम
इस मनुष्य जीवन का परम फल श्री “राधा राधा” नाम का भजन करना है। जब कोई “राधा” नाम का भजन करता है, तो समस्त बाधाएँ नष्ट हो जाती हैं और श्री वृन्दावन धाम ...
श्यामा श्याम बिसारी के करि न और की आस
दिव्य दम्पति श्री श्यामा-श्याम को बिसारकर मैं अन्य किसी की भी आस स्वप्न में भी न करूँ। हे ब्रज की लाड़िली श्री श्यामा जू! मुझे चातक जैसी अनन्य प्यास द...
वृंदावन बानिक बन्यौ भ्रमर करें गुंजार
वृन्दावन की शोभा देखते ही बनती है, जहाँ भ्रमर गुंजार करते हैं और जहाँ दुल्हन-रानी श्री राधिका तथा दूल्हा नंदकुमार श्री कृष्ण विराजमान हैं।
ब्रजमण्डल की स्वमिनी मेरी मन अभिलाष
हे ब्रज-मण्डल की अधिष्ठात्री स्वामिनी श्री राधिका! मेरे हृदय की एकमात्र अभिलाषा यही है कि जन्म-जन्मांतर मुझे केवल श्री वृन्दावन में ही वास प्राप्त हो।
हों तौ चेरौ चरन कौ चरणहि नाऊँ माथ
जिन श्रीचरणों की वंदना स्वयं द्वारिकानाथ श्रीकृष्ण करते हैं, मैं केवल उन्हीं श्रीराधा के चरणों की दासी हूँ और उन्हीं श्री चरणों को अपने मस्तक से लगाती...
राग मुक्त मन शुद्ध ह्वै विगत ज्ञान अज्ञान
जब मन समस्त राग-द्वेष और आसक्तियों से मुक्त होकर पूर्णतः शुद्ध हो जाता है, तब ज्ञान और अज्ञान के द्वंद्व स्वतः समाप्त हो जाते हैं। ऐसी अवस्था में साधक...
कर मुरली लकुटी गहे, घूँघरवारे केश
जिनके कर-कमलों में मुरली सुशोभित है, जो हाथ में लकुटी धारण किए हुए हैं, और जिनके केश अत्यंत सुंदर और घुँघराले हैं, उन श्री श्यामसुन्दर का मनोहारी स्वर...
कमलनको रवि एकहै, रविको कमल अनेक
कमलों के लिए सूर्य केवल एक ही है, परंतु सूर्य के लिए खिलने वाले कमल अनेक हैं। हे प्रभु! आपके लिए तो मुझ जैसे न जाने कितने ही भक्त होंगे, किंतु मेरे लि...
पात-पात पर राधिका कण-कण पर घनश्याम
जिस पावन भूमि के प्रत्येक पत्ते पर श्री राधिका और प्रत्येक कण में श्री घनश्याम की छाप अंकित है, वही अद्वितीय धाम श्री वृंदावन है।
अहा कहा रसमय रच्यौ द्वै अक्षर कौ नाम
अहा! “राधा” यह दो अक्षरों का नाम कितना रसमय और मधुर है। यही वंशी का जीवन-धन और परम अभिराम मंत्र है।
जहां भक्त मम पग धरे वहां धरुं मैं हाथ
भगवान स्वयं अपनी भक्त-वत्सलता प्रकट करते हुए कहते हैं कि जहाँ-जहाँ मेरा भक्त अपने चरण रखता है, वहाँ मैं अपने हाथ रख देता हूँ (ताकि उसे कोई कष्ट न हो)।...
जिन मोरनके पंख हरि राखत अपने शीश
जिन मोरनके पंख हरि, राखत अपने शीश। तिनके भागनकी सखी, कौन करिसकै रीश॥ - ब्रज के दोहे हे सखी! जिन मोरों के पंख श्री हरि ने अपने शीश पर धारण किए हैं, उ...
काल डरै, जमराज डरै, तिहुँ लोक डरै, न करै कछु बाधा
“राधा” नाम की महिमा इतनी अपार है कि जिस क्षण मनुष्य भूल से भी “राधा” नाम का उच्चारण कर लेता है, उसी क्षण काल और यमराज भी उससे भयभीत हो जाते हैं। तीनों...
जिनके मुक्ति-पिशाचिनी तन-मन रही समाइ
जिनके हृदय में मुक्ति की चाह रूपी चुड़ैल निवास करती है, वे हरि से निश्चित ही विमुख हो जाते हैं, और फिर पश्चाताप करते हैं।
कहा करौं हौं मुक्त ह्वै भक्ति न जँह लवलेश
मैं मुक्ति को लेकर क्या करूँगा जहां भक्ति का लवलेश भी नहीं है। ऐसी कृपा हो कि मैं ब्रज धाम का भक्त बनकर उन्मत्त रहूँ।
चित चिंता तजि डारिकैं भार जगत के नेम
हे मन, तू अपनी समस्त चिंताओं एवं सांसारिक नियम-रूपी भार को त्यागकर एकमात्र श्री श्यामा-श्याम की शरण ग्रहण कर और उनसे प्रेम बढ़ा।
मोहन के हम मत्त अति इत उत कहूँ न जाय
हम श्री मोहन के प्रेम-रस में पूर्णतः मतवाले हो चुके हैं; अब हमारा मन कहीं और नहीं भटकता। हमारा चित्त अनन्य भाव से श्री राधा के मुख-कमल पर ही स्थिर रहत...
श्रीराधे सर्वेश्वरी रस सरिता सुख पुँज
श्री राधा सर्वेश्वरी हैं—वे रस की अनंत सरिता और सुख की मूर्ति हैं। हे वृंदावन-विहारिणी राधिका! कृपा करके मेरे हृदय-कुंज में भी अपने चरण रखकर विहार कीज...
ब्रज चौरासी कोस में चार ग्राम निजधाम
ब्रज चौरासी कोस के क्षेत्र में चार ग्राम (वृंदावन, मथुरा, बरसाना और नंदगाँव) श्री राधा कृष्ण के निजधाम माने जाते हैं।
अपनावै ब्रजवासिनि तब ह्वै ब्रज सौं हेत
जब ब्रज की स्वामिनी श्री राधिका किसी जीव पर कृपा कर उसे अपना लेती हैं, तभी उसके हृदय में ब्रज के प्रति सच्चा प्रेम जाग्रत होता है। उनकी अनुकंपा से ही ...
मस्त रहे अपने मन में
हम नित्य ही अपने में मस्त रहते हैं, न हमें लाभ से मतलब है और न ही हानि से। हम नाम जप मन ही मन करते हैं, हमें और किसी से कोई मतलब नहीं, हमें बस मनमोहन ...
वृंदावन में जाय कर कर लीजै दो काम
श्री वृंदावन धाम में पहुँचकर साधक को दो कार्य अवश्य करने चाहिए—प्रथम ब्रज की पावन रज को श्रद्धा से मुख में धारण करे और तत्पश्चात प्रेमपूर्वक “राधे श्य...
नहिं प्रवसत जा विपिन में बिनु आज्ञा वृजराज
जिस श्रीवृंदावन में श्रीराधा महारानी का अखंड साम्राज्य है और जहाँ स्वयं ब्रजराज श्रीकृष्ण भी उनकी आज्ञा के बिना प्रवेश नहीं करते, तो फिर यमराज आदि की ...
ब्रज है ब्रह्म समान भेद ब्रज हरि में नाहीं
ब्रज धाम साक्षात ब्रह्म के समान है, और ब्रज तथा श्री हरि में कोई भेद नहीं है। हरि ब्रज धाम में बसे हैं, और ब्रज धाम श्री हरि में समाहित है।
बैननि के नैननि सौं दरस्यौ युगल स्वरूप
बैननि के नैननि सौं, दरस्यौ युगल स्वरूप। नैननि के बैननि सौं, बरस्यौ बरन अनूप॥ - ब्रज के दोहे रसिकों का कथन है कि उन्होंने वाणी के नेत्रों से प्रेम क...
प्रथम सीस अर्पन करै पाछै करै प्रवेस
दिव्य प्रेम-देश में प्रवेश पाने के लिए प्रेमी को सर्वप्रथम अपना शीश अर्पित करना होता है, अर्थात् आत्मसमर्पण करना पड़ता है; तभी उसे प्रवेश मिलता है।
सीस काटि भूई धरै ता पै राखै पाँव
यदि प्रभु के प्रेम-मार्ग में प्रवेश करना है, तो पहले अपना शीश भूमि पर रख देना चाहिए—अर्थात् अपनी बुद्धि का समर्पण कर, निस्वार्थ एवं निष्कपट भाव से ही ...
जयति जयति श्रीराधिका चरण जुगल करि नेम
श्री राधिका की जय हो, जिनके युगल चरणों की अनन्य भक्ति ही मेरा एकमात्र व्रत है। जिन श्री चरणों की दिव्य छटा के प्रकाश से पामर जीव भी प्रेम-रूपी अमूल्य ...
श्री नंदलाल तमाल सो
नंदलाल कृष्ण का स्वरूप मानो श्याम-वर्ण के तमाल-वृक्ष के समान है, और श्री राधा का स्वरूप उस वृक्ष से लिपटी हुई स्वर्ण-रंग की बेलि के समान है।
गोरी मन भोरी अहो श्री राधे सुखरास
गौरवर्णा और सरलस्वभावा श्री राधिका के चरणकमलों में मैं विनम्र वंदन करता हूँ। वे आनंद और सुख की साक्षात् मूर्ति हैं तथा अपने भक्तों की समस्त मनोकामनाएं...
कूल कलिंदी नीप तर
वृंदावन में, श्री यमुना के तट पर कदंब वृक्ष के नीचे सुशोभित श्री श्यामा-श्याम अत्यंत मनोहर हैं। मेरी ऐसी कामना है कि इनकी यह मधुर छवि सदा ही मेरे मन ...
मेरो मन माणिक गिरवी धरयो
मैंने अपना माणिक रत्न रूपी मन, मनमोहन श्री कृष्ण के पास गिरवी रखा है, उसके प्रेम का ब्याज इतना बढ़ गया है कि अब उसके मुक्त होने की कोई आशा नहीं दिखती...
संत समागम हरिभजन राधापद अनुराग
सत्संग और हरि-भजन का फल यही हो कि श्रीराधा के चरणों में अनन्य प्रीति जागृत हो जाए। मुझे तो भक्ति रूपी कामधेनु की लालसा है; मुक्ति रूपी साधारण बकरे की...
जिहि उर सर राधा कमल लस्यौ बस्यौ इहि भाय
जिस भक्त के हृदय-सरोवर में श्रीराधा रूपी कमलिनी सतत प्रफुल्लित रहती है, वहाँ श्रीकृष्ण रूपी चंचल भ्रमर प्रेमासक्त होकर अहर्निश मँडराता रहता है।
रजधानी वृंदा विपिन भानु सुता कौ राज
ब्रज की परम राजधानी श्रीवृंदावन धाम में वृषभानु-नन्दिनी श्रीराधा का अखंड राज है। जहाँ साक्षात यमराज का प्रवेश भी सर्वथा वर्जित है, वहाँ भला वे किसी जी...
गौर स्याम तन मन रंगे, प्रेम स्वाद रस सार
गौर-श्यामल वर्ण वाले श्री राधा-कृष्ण, जो रस के सार हैं, नित्य विहार में सदा ऐसे निमग्न रहते हैं कि तन और मन से रंगकर केवल प्रेम रस का ही आस्वादन करते...
चारि वेद कौ सार है
चारों वेदों का सार, साम वेद के गीत का सार, मिश्री के समान मीठा एवं माखन से भी कोमल, श्री राधा नाम है।
उज्जल जैसी चन्द्रिका, मीठी जैसी खाँड
हे श्री राधिके! आपकी भक्ति शरत्काल की चाँदनी के समान अत्यंत उज्ज्वल (निर्मल) है और मिश्री के समान मधुर है। मुझे अपने चरणों की यही अनन्य भक्ति प्रदान क...
चरन गहौ विनती करौ आगें दोउ कर जोरि
श्री ललिता सखी श्री कृष्ण से विनय करती हैं—हे लाल जी! हमारी लाड़िली अत्यंत सरल और भोरी हैं; आप उनके चरणों में दण्डवत कर, हाथ जोड़कर निवेदन कीजिए, तभी ...
राधा पद रज स्वाति जल चातक मेरौ हीय
श्रीराधा की पावन चरण-रज मेरे चातक रूपी हृदय के लिए स्वाति नक्षत्र की जल-बूंद के समान जीवनदायिनी है। मोती के समान यह अश्रु हैं, जिन्हें प्रवाहित कर मन ...
अमिय सिंधु राधे चरण सुखद संजीवनी मूरि
श्रीराधा के श्रीचरण अमृत के सागर और परम सुख को प्रदान करने वाली संजीवनी बूटी के समान हैं। हे जीव! तू हृदय से इन चरणों की शरण ले और उनकी पावन रज को मस्...
श्री राधा के चरन सब सेवत हित की रीति
समस्त सहचरियाँ श्री राधा के चरणों की प्रेमपूर्वक सेवा करती हैं और मन, वचन, एवं कर्म से पूर्ण अनन्यता धारण कर उन्हीं चरणों में अपनी अटूट प्रीति रखती ह...
कुंज बिहारी पद कमल विनवों दोऊकर जोर
हे कुंज बिहारी लाल, दोनों हाथों को जोड़कर, तुम्हारे चरण कमलों में मेरी यही विनती है कि मुझे सदा अपने चरणों की सेवा में लगाये रखना।
ऐरे कठिन अहीर के
हे कठिनता से प्रसन्न होने वाले, अहीर जाति के श्री कृष्ण! थोड़ा तो मेरी पीड़ा को पहचानो क्योंकि तुम्हारे मुख के दर्शन करने के लिए मैंने कुल कानि को भी त...
अष्ट सिद्धि नव निद्धि कौ
अष्ट सिद्धि एवं नव निधियों का दाता श्री राधा नाम है। श्री श्यामसुन्दर भुक्ति, मुक्ति एवं भक्ति (सब कुछ) श्री राधा के बल से ही प्रदान करते हैं।
प्रेम छिपाये ना छिपे
जिसके हृदय में प्रेम प्रकट हो जाता है, वह चाहे जितना भी प्रयास करे उसे छुपाने का, लेकिन प्रेम छुपता नहीं। मुख से भले ही वह कुछ न बोले, परंतु उसकी आँखो...
श्री राधा पद पदम रज
हे श्री राधा, मैं आपके चरण कमलों की रज की बारंबार वंदना करता हूँ। हे मनमोहन की प्राणाधार श्री लाड़िली जू, मुझ पर कृपा कीजिये!
जे पद शिव ब्रह्मादिक दुर्लभ शारद उमा रमा री
जिनके चरणों को प्राप्त करना शिव, ब्रह्मा, सरस्वती, पार्वती एवं लक्ष्मी आदि के लिए भी अत्यंत दुर्लभ है, उन श्री राधा के चरणों की रज (अर्थात् वृंदावन की...
श्री राधा पद पंकज निरखि
श्री राधा के चरण कमलों को निहार कर श्री कृष्ण ऐसे मोहित हो जाते हैं कि उन्हें अपलक नेत्रों से देखते रहते हैं। वे अपने हाथ में महावर लेकर उन श्री चरणों...
ब्रज रज में ये रज मिलि, रज में यमुना नीर
ब्रज की रज में मेरा तन रूपी रज मिल जाये जिस रज में साक्षात् यमुना जी मिलती हैं। धन्य धन्य भाग्य है उस जीव का जो इस ब्रज धाम में अपना शरीर त्यागता है।
कर गहि डार कंदब की, ठाड़े हैं छबि ऐन
कदंब के वृक्ष की डाल पकड़े हुए, सुंदर छवि में खड़े, श्री लाल जी श्री प्रियाजी (राधा) के रूप-ध्यान में मग्न होकर, नेत्रों को बंद किए विराजित हैं।
अद्भुत रुचि सखि प्रेम की
हे सखी, यह दिव्य प्रेम की अद्भुत रुचि सहज ही इन दोनों (प्रिया-प्रियतम) में रहती है। प्रिया और प्रियतम अभेद हैं, ऐसा लगता है मानो एक ही रंग की दो शीशिय...
जबहिं द्वार वृषभानु के
जब भी नंदनंदन श्री कृष्ण, बरसाना में श्री वृषभानुजी के महल के द्वार पर आते हैं तो प्रेम से वशीभूत होकर उनकी गति ही बदल जाती है एवं वे अपनी सुध बुध खोन...
मोहन नैंना आपके नौका के आकार
हे मोहन श्री कृष्ण! आपके तिरछे नेत्र नौका के आकार के हैं, जो जन इसमें बस जाते हैं, वे सहज ही इस संसार सागर को पार कर जाते हैं।
चितवत जितही लाडिली
श्री राधा जिस ओर अपनी दृष्टि डालती हैं, श्री कृष्ण भी उसी ओर सहज ही देखने लगते हैं। प्रेम की इस अद्भुत रीति को तो देखो कि श्री राधा का दृष्टिगत स्थान ...
बांकेबिहारी रूप कौ
बाँके बिहारी जी महाराज की मनोरम छवि को नयनों के मार्ग से भीतर लेजाकर, सुमनों से सुसज्जित ह्रदय सेज पर उन्हें विराजमान करके, धीरे धीरे मन लगाकर उनके रस...
चंद्र कहूँ, तौ बनत ना
श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं - आपको चंद्रमा कहूँ तो कैसैं कहूँ? ये दिन में प्रकाशहीन रहता है। कमल कहूँ तो कैसैं कहूँ क्योंकि यह रात्रि में अपना मु...
धरत भागिनी पग जहाँ, रहत साँकरी खोर
साँकरी खोर में श्री राधा अपने पावन चरण रखती हैं। हे सखी, बरसाना के इस गह्वर वन के रस की महिमा को कौन जान सकता है?
यह करुणा की बान लखि मो हिय अति हुलसात
हे प्रभु, आपका परम करुणामय स्वभाव जानकर मेरा ह्रदय उल्लास से भर उठता है और मन में एक उमंग उठती है कि बनते-बनते मेरी भी बिगड़ी एक दिन अवश्य ही बन जाएगी...
मकराकृत कुंडल श्रवण
हे गोपियों के स्वामी, श्री कृष्ण! मकराकृत कुण्डल और पीले वस्त्रों से सुशोभित होकर, कृपया आप श्री राधिका जू के संग मेरे हृदय में सदा वास करें।
इत उत मन भटकै नहीं फँसे न माया जाल
ऐसी कृपा हो कि अब मेरा मन इधर उधर न भटके और न ही मायाजाल में फँसे। हे करुणा सिंधु, परम कृपालु श्री राधा! अब मेरा चित्त केवल आपके चरण कमलों में ही रमा ...
मेरे हिय सरवर मही खिल्यौ कृष्णमुख कंज
मेरे हृदय रूपी सरोवर में श्रीकृष्ण का मुख रूपी कमल खिल उठा है। अब वही मुख-कमल मेरे ध्यान में प्रकट होता है, जो अद्भुत सुख का पुंज है।
प्राणन वारौं चरण रज व्रज के प्रीतम प्यारी
मैं अपने प्राणों को ब्रज के प्रीतम प्यारी (श्री राधा कृष्ण) के चरणों की रज पर समर्पित करता हूँ, जो रसिकों की परम गति हैं एवं अन्य सभी फलों से न्यारे ...
मोहनी मूर्ति श्याम की मो मन रही समाय
मेरे मनरूपी मंदिर में श्यामसुंदर की मोहिनी मूर्ति इस प्रकार समाई हुई है, जैसे मेहंदी के पत्ते में उसकी लालिमा छिपी होती है। वह लालिमा बाहर से दिखाई नह...
श्री राधा वुषभानुजा, भक्तनि प्राणाधार
हे वृषभानु नंदिनी श्री राधा, आप भक्तों के प्राणों की आधार हैं। हे वृन्दावन में नित्य विहार करने वाली श्री राधिका! मैं बार-बार आपको प्रणाम करता हूँ।
लट छूटी त्रिय शीशते रही कपोलन छाय
ठाकुर जी कहते हैं - श्री प्रिया जी की घुँघराली लटें उनके मुखकमल से इस प्रकार लिपटी रहती हैं, मानो सर्प के शिशु अमृतरस का पान कर तृप्त हो रहे हों।
कैं तुव कान परी नहीं, दीनबंधु मम टेर
हे दीनबंधो श्री कृष्ण! मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है कि मेरी पुकार अभी तक आपके कानों तक पहुँची ही नहीं है, क्योंकि आपने तो पूर्व के चारों युगों में किसी ...
वृन्दाबन राजैं दुवौ साजै सुख के साज
वृन्दावन में सब प्रकार के सुख (रस) के साज सजाये हुए युगल सरकार अत्यन्त सुशोभित हो रहे हैं। इधर तो ब्रजराज श्रीकृष्ण विराज रहे हैं तो उधर वृंदावन की मह...
वृन्दावन महिमा अमित वरणि सकै नहिं कोय
श्री वृन्दावन धाम की महिमा अपरंपार और अवर्णनीय है, जहाँ के वृक्षों की हर शाखा और पत्ते से मानो स्वतः “राधे राधे” की रसयुक्त धुन प्रवाहित होती रहती है...
श्वेतोत्पल दल सम सुखद विभ्रद मणि मय वास
श्री राधा के चरण श्वेत कमल की पंखुड़ियों के समान सुखद हैं एवं रत्नों से विभूषित शोभायमान हैं। मैं अपनी प्रत्येक श्वास से करोड़ों करोड़ बार उनके चरणों ...
गहवर बन अरु साँकरी, गलियन लीला होय
गह्वर वन अथवा साँकरी खोर में जो राधा-कृष्ण की मधुर लीलाएँ होती हैं, उनका वास्तविक अनुभव तभी हो सकता है जब किसी का हृदय विशुद्ध प्रेम और सुंदर भक्ति-भा...
रसना रस की खानि तू सरस मधुर प्रिय तोय
हे जिह्वा! तू तो रसों की ख़ान है, तुझे सदा सरस-मधुर विषयों में ही आनंद आता है — तो क्यों न तू “श्रीराधा” नाम रूपी प्रेमरस को नित्य पिया कर क्योंकि इसक...
कोऊ चाहै सिर कमलकर
कोई अपने सिर पर अपने आराध्य देव के हस्त कमल चाहता है, कोई अपने आराध्य देव के मुखारविंद को ही निहारना चाहता है। परंतु मैं तो श्रीराधा के चरण-कमल को अपन...
हित आह्लाद स्वरूपिनी मोहनि-मोहन वाम
जो हृदय को आनंद देने वाली हैं, वही श्रीराधा मोहिनी हैं, जो स्वयं मोहन (कृष्ण) को भी मोहित कर लेती हैं और उनके वामभाग में विराजमान रहती हैं। श्रीहरि नि...
ऊधो सूधो है गयौ सुनि गोपिन के बोल
उद्धव ब्रज में गोपियों को ज्ञान का उपदेश देने आए थे, परंतु गोपियों की प्रेममयी वार्ता को सुनकर वे सीधे (प्रेम मार्गी) हो गए। वे तो ज्ञान की डुगडुगी बज...
श्याम रंग श्यामा रंगी श्यामा के रंग श्याम
राधा, कृष्ण के श्याम रंग में रंगी हुई हैं और कृष्ण, राधा के प्रेम के रंग में रँगे हुए हैं। दोनों का तन, मन और प्राण एक ही है। केवल कहने मात्र के लिए उ...
जनम सुन्यौं श्रीकुमरि कौं, भिक्षुक आये धाय
श्री राधा सुकुमारी के जन्म का शुभ समाचार सुनते ही भिक्षुक/संत-महात्मा दौड़ते हुए बरसाना आ पहुँचे। देश-देश से लोग अपनी-अपनी विशेषताएँ/उपहार लेकर आए और ...
वृषभानु भवन को भाग री बरसाने को भाग
धन्य है वृषभानु भवन, धन्य धन्य है बरसाना धाम जहाँ हमारी श्री लाडली जी प्रकट हुई हैं। ब्रज के भक्तों की प्राणेश्वरी श्री राधा चिरकाल तक आनंदित रहें, यह...
वृन्दावन की चूहरी चली मुक्ति ठुकराय
वृन्दावन की महतरानी (भंगिन) भी मुक्ति को अपने पैरों से ठुकरा कर चल देती है। इसमें आश्चर्य क्या है, यह तो साक्षात श्री राधा का महल है, जिसकी वे दासी है...
वंशीवट यमुना-निकट जहाँ सघन घन छाँह
श्री ललिता सखी कहती हैं — यमुना के सुरम्य तट पर स्थित वंशीवट पर, जहाँ सघन वृक्षों की छाया है, वहाँ श्रीराधा अपने मुख पर मधुर मुस्कान लिए खड़ी हैं, और ...
ब्रज ब्रह्माचल शिखर पै सुन्दर प्यारी ठाम
ब्रज चौरासी कोस के बरसाना में स्थित ब्रह्माचल पर्वत की चोटी पर सुंदर और परम पावन स्थल है, जहाँ लाड़िली श्री राधा अपनी सखियों के साथ आठों पहर विहार करत...
राधा राधा रटत ही मिट जाती सब बाधा
केवल श्री राधा नाम के स्मरण मात्र से समस्त बाधाएँ तुरंत मिट जाती हैं, और अनंत कोटि जन्मों की आपदाएँ भी श्री राधा नाम के प्रभाव से समाप्त हो जाती हैं।
निकट सदाँ मोहे रखियो, जान आपनी दास
हे प्रभु! मुझे अपना दास जानकर सदैव अपने निकट ही रखना। अब और न सताइए; कृपा करके मुझे श्री वृन्दावन का वास प्रदान कीजिए।
श्रीवनराज विलासिनी मृदुहासिनी सुख पुँज
हे श्रीवनराज (वृंदावन) में विलास करने वाली, मधुर मुस्कान से शोभायमान, सुख की मूर्ति, कृष्ण वल्लभा श्री राधिका! तुम्हारी जय हो! हे सेवाकुँज की अधीश्वरी...
महली की गति महली जानै
श्री राधा महारानी के निज महल की श्री कृष्ण संग गोपनीय रस-लीलाओं को केवल महल में रहने वाली अंतरंग सहचरियाँ ही जानती हैं। बाहर वाले, जिनका उस रस में प्र...
प्रेम धाम वृन्दाविपिन मध्य मधुर वर जोर
वृन्दावन धाम दिव्य प्रेम का मूर्तिमान स्वरूप है, जहाँ युगल जोड़ी श्री राधा-कृष्ण मधुरता की पराकाष्ठा के साथ विराजमान हैं। वहाँ का प्रत्येक कण रस से सर...
ज्यों दिन जात अषाढ के त्यों त्यों घटै मेरी भूख
जैसे जैसे आषाढ़ मास के दिन बीतते जा रहे हैं, त्यों-त्यों मेरी भूख कम होती जा रही है। हे विधाता! तू मुझे बरसाना धाम के वृक्षों के दर्शन कब कराएगा?
संकर्षण-प्रिय-अनुज की, प्रिया प्राण आधार
संकर्षण (बलराम) के प्रिय छोटे भाई श्रीकृष्ण की प्रिया (श्रीराधा) ही मेरे प्राणों की आधार हैं। मैं उनके वर देने वाले (कृपा रूप) श्री चरणकमलों पर सदा बल...
महाराजा वृषभानु कौ बरसानौं सुखसार
महाराज वृषभानु जी का बरसाना, जहाँ श्री राधारानी सदा वास करती हैं, समस्त सुखों का सार है, जिस पर अरबों-खरबों वैकुंठ धाम भी न्योछावर किए जा सकते हैं।
श्री राधा पद पंकज गहे छूट जात जग द्वन्द
जो भी श्रीराधा के चरण-कमलों को दृढ़ता से पकड़ लेता है, वह सभी सांसारिक दुःखों और द्वन्दों से मुक्त हो जाता है। श्रीराधा नाम का भजन करने से यमराज की फा...
सब लोकन कौ मुकुटमणि बरसानौं कमनीय
परम मनहोर बरसाना धाम समस्त लोकों में मुकुटमणि है जहाँ की परम पावन भूमि को स्वयं श्री राधा महारानी के चरणों का स्पर्श प्राप्त है, एवं उनके दिव्य चरणचिह...
श्री वनराज विलासिनी मृदुहासिनी सुख पुंज
श्री धाम वृंदावन की कुंज लताओं में रमण करने वाली, मंद-मंद मुस्कान से चित्त को मोहने वाली, स्वयं आनंद और माधुर्य की निधि श्री राधिके! आपकी जय हो! हे श्...
जाकी मायावश बिरंचि शिव नाचत पार न पायो
जिन भगवान श्रीकृष्ण की माया से मोहित होकर ब्रह्मा और शिव भी उनके इशारों पर नाचते हैं, फिर भी उनका पार नहीं पा सकते, उन्हीं श्रीकृष्ण को ब्रजांगनाएँ अप...
दान देति ता दानिकों, जो दानिन शिर मौर
जो दानी समस्त दानियों के सिरमौर हैं, उन दानी जनों को भी श्री राधा रानी ही दान देती हैं। श्री राधा रानी से सरस अन्य दाता और कहीं नहीं है।
ब्रज-वृन्दावन अघट रस राधा कृष्ण सरूप
ब्रज वृन्दावन अद्भुत और असीम रस से परिपूर्ण है, जो स्वयं श्री राधा-कृष्ण का स्वरूप है। यहाँ की लीलास्थलियों के नाम लेने से पाप नष्ट हो जाते हैं। इनकी ...
वृन्दावन के वृक्ष को मर्म न जाने कोय
वृन्दावन के वृक्ष की पूरी-पूरी महिमा कोई भी नहीं जानता क्योंकि इस पावन धाम में प्रत्येक डाल और प्रत्येक पत्ते से निरंतर श्री 'राधे-राधे' की ही दिव्य ध...
राधा राधा रटत ही बाधा हटत हज़ार
“राधा-राधा” का जप करते ही असंख्य बाधाएँ मिट जाती हैं। प्रेमघन नंदकुमार स्वयं सिद्धियों सहित भक्त के द्वार पर उपस्थित हो जाते हैं।
ऋषि मुनि गायौ नाम जस महिमा कही अनंत
जिस नाम का ऋषि-मुनियों ने यश गाया और जिसकी अनंत महिमा कही, श्री कृष्ण कहते हैं—वही “राधा” नाम अत्यंत मधुर है।
भीने अति रस रंग में, नवल रँगीले लाल
नित्य नवीन युगल जोड़ी, श्री लाड़ली लाल, प्रेम-रस में सराबोर होकर, बाँहों में बाँहें डालकर, मत्त मराल की मोहक गति से विहरण कर रहे हैं।
गोरे मुख पै तिल बन्यों, ताहि करूँ मैं प्रणाम
श्रीराधा के गोरे, सुंदर मुख पर जो तिल सुशोभित है, मैं उस तिल को प्रणाम करता हूँ। वह ऐसा प्रतीत होता है मानो चन्द्रमा पर अत्यन्त अद्भुत शालिग्राम-शिला ...
गौर श्याम की कृपा बिन जानि सकै कोउ नाहिं
गौर-श्याम वर्ण वाले दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण की कृपा के बिना, इस नित्य विहार रस को कोई भी जान नहीं सकता। प्राप्त करना तो बहुत दूर की बात है, चाहे को...
जानें रसिक अनन्य जे अनुरागे रस प्रेम
वास्तविक अनन्य रसिक वे हैं जिनका अनुराग नित्यप्रति प्रिया-प्रियतम को प्रेमपूर्वक लाड़ लड़ाने में लगा रहता है। वे विधि, निषेध और नियमों को त्यागकर, सदा...
मुक्ति भुक्ति सब खोखली भक्ति भरी रस रंग
मुक्ति (मोक्ष) और भुक्ति (भोग) भीतर से खोखले हैं, जबकि भक्ति रस और आनंद से परिपूर्ण है। मुक्ति स्थिर जल-भरी पोखरी के समान है, पर भक्ति बहती हुई स्वच्छ...
राधे जू के भाल पै, बेंदी अति छबि देय
श्री राधा जू के भाल पर सजी बिंदी अत्यन्त सुंदर शोभा से युक्त है। ऐसा प्रतीत होता है मानो खिले हुए केतकी-पुष्प को प्रेममग्न भँवरा ग्रहण कर रहा हो।
राधा राधा जे कहत चहूँ दिश तिनहिं हमेश
जो जीव नित्य राधा-राधा भजते हैं, उनकी रक्षा श्री हरि, भगवान शिव, वरुण एवं इंद्र आदि चारों दिशाओं में विभिन्न अस्त्र धारण कर करते हैं।
जय राधा माधव गोपीजन श्री वृन्दावन धाम
युगल सरकार, श्री राधा माधव की जय हो, व्रज गोपीजनों की जय हो, तथा परम पावन श्रीधाम वृन्दावन की जय हो। यमुना जी की जय हो, दिव्य लताओं की जय हो और उन सुं...
वृंदावन रज पायलई तो पाय को क्या रहयौ
यदि वृन्दावन की रज प्राप्त हो गई, तो अब और क्या पाना शेष रह गया? और यदि राधा-प्यारी का ध्यान कर लिया, तो फिर ध्यान करने के लिए और क्या शेष रह जाता है?
राधा-राधा जो कहे बसै हजारों कोस
जो "राधा-राधा" कहते हैं, वे चाहे हज़ारों कोस दूर ही क्यों न निवास करें, उनके पाप वैसे ही कट जाते हैं, जैसे सूर्य के प्रकट होते ही ओस समाप्त हो जाती ह...
बिसरिहौं न बिसारिहौ यही दान मोहिं देहु
हे श्री हित हरिवंश जी की लाड़िली, श्री राधा! कृपया मुझे अपना बना लीजिये और मुझे ऐसा वर दीजिए कि मैं आपको कभी नहीं भूलूं, और न ही आप मुझे भूलें।
भानु कुंवरि पद कमल की भक्ति कली गुलाब
वृषभानु-नन्दिनी श्री राधा के चरण-कमलों के प्रति जो अनन्य भक्ति है, वह तो खिले हुए गुलाब की कली के समान सुकोमल और सुगंधित है। इसके विपरीत, मोक्ष (मुक्त...
राधा सुख की मूल है राधा रतन अमोल
राधा सुख की मूल है, राधा एक अनमोल रत्न है। जो राधा-राधा नहीं रटता, उसके जीवन का क्या मूल्य है?
ब्रजबासिन को प्राण धन बरसानो निज धाम
ब्रजवासियों के प्राणों का धन यह बरसाना धाम ही है, जहाँ के महल की शोभा अत्यंत सुंदर, सुख प्रदान करने वाली और सर्वोत्तम है।
अनियारे दीरघ नयन किती न तरुनि समान
इस संसार में ऐसी कितनी ही युवतियाँ हैं जिनकी आँखें तीक्ष्ण और विशाल हैं, किंतु श्री राधा के नेत्रों की वह चितवन (दृष्टि) कुछ और ही अलौकिक है, जिसकी के...
श्री राधावल्लभ लाड़िलो दुल्ह नित्य किशोर
लाड़िले श्री राधावल्लभ लाल नित्य किशोर दूल्हा हैं। वे कुंज बिहारी, श्री राधा प्यारी के मुख चंद्र को चकोर की भाँति अपलक नेत्रों से सदा निहारते रहते हैं...
ब्रज की महिमा को कहै
ब्रज की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है और इस पावन धाम की महत्ता का बखान कौन कर सकता है, जहाँ हर एक श्वास में श्री राधे-श्याम समाए हुए हैं।
मैं काको जानो नहीं
हे युगल सरकार! न मैं किसी और को जानूँ, न ही कोई मुझे जाने। बस मेरी प्रीति सदा आपसे ही जुड़ी रहे और मैं केवल आपको ही जानूँ।
बरसाने के वास की आस करे शिव शेष
शिव, शेषनाग आदि देवता भी बरसाना-वास की आशा रखते हैं। बरसाना की महिमा का बखान कौन कर सकता है, जहाँ स्वयं भगवान श्रीकृष्ण भी सखी का रूप धारण करके प्रवेश...
वन्दौं राधा के परम पावन पद अरविन्द
श्री राधा जू के परम पावन चरणारविन्दों को बार-बार वंदन है, जिनके मृदुल चरण-कमलों के मकरंद का पान करने की लालसा श्याम रूपी मधुप नित्य ही रखते हैं।
वृन्दावन को आसरो
वृन्दावन का ही आसरा है और वृन्दावन का ही विश्वास है। ऐसी कृपा हो कि एक क्षण के लिए भी वृन्दावन-वास न छूटने पाए।
ज्यों नवशिशु सों वानरी सद्य जात सुत गाय
जैसे वानरी अपने नवजात शिशु से, और गाय अपने अभी जन्मे बछड़े से अलग नहीं होती। उसी प्रकार हे श्री राधा महारानी जू! मेरा मन भी आपके श्री चरण-कमलों से तनि...
श्री राधा राधा रटत
श्री राधा-राधा नाम रटते ही समस्त दुःख-द्वंद्वों का नाश होता है। श्री राधा का ध्यान करने से नंदनंदन श्री कृष्ण के ह्रदय में भी सुख का सागर उमड़ पड़ता ह...
लाल सखी कौ भेष धरि
श्री लालजी [श्री कृष्ण] सखी का वेष धारण कर, अद्भुत श्रृंगार कर, प्रेम सहित श्री राधारानी के चरणों की सेवा करते हैं।
काजर में कारौछि जिमि जैसे जल बिच मीन
जैसे काजल में उसकी कालिमा रची-बसी रहती है और जैसे मछली सदैव जल के भीतर ही निवास करती है। हे श्री राधा महारानी जू! ठीक उसी प्रकार मेरा यह मन भी निरंतर ...
वंदौ श्रीवृषभानुपुर सर्वोपरि अभिराम
मैं श्री वृषभानुपुर (बरसाना) की वंदना करता हूँ, जो सर्वोपरि और अत्यंत सुंदर है। यह धाम भगवान श्री हरि के अन्य धामों (वैकुंठ आदि) से भी कहीं अधिक महिमा...
जामें रस सोई हरौ यह जानत सब कोय
सब जानते हैं कि जिसमें रस होता है, वही वास्तव में हरा (रसीला) होता है। जैसे नीले और पीले रंग के मेल से हरा रंग बनता है, वैसे ही गौरवर्ण श्री राधिका और...
सब धामन को छाँड़ कर मैं आई वृन्दावन द्वार
सब धामों को छोड़कर मैं आपके द्वार पर आयी हूँ। हे वृषभानु की लाड़िली श्री राधा, अब मेरी ओर भी अपनी कृपादृष्टि डालिए!
जा ब्रज रजके परस ते मुक्ति मिलत हैं चार
जिस ब्रज की रज के स्पर्श मात्र से चारों प्रकार की मुक्ति स्वतः ही प्राप्त हो जाती है, उसी अमूल्य रज में मानो ब्रज की बालाएं चारों मुक्तियों को झाड़ू ल...
नैननि सौं नैना मिले, इकटक रहे निहारि
दोनों के नेत्रों से नेत्र मिले हुए हैं और वे एक-दूसरे को अपलक निहार रहे हैं। श्री श्यामा-श्याम की ऐसी उलझी हुई आँखों को भला कौन सुलझा सकता है?
रा अक्षर को सुनत ही
जब श्री कृष्ण किसी के मुख से “रा” अक्षर को सुनते हैं, तो उनका मन मोहित हो जाता है। जैसे ही वे पुनः “धा” अक्षर सुनते हैं, उनका ह्रदय प्रेमानंद में डूब ...
द्वन्दन कौ शिरमौर ज्यों श्री गायत्री छंद
जिस प्रकार गायत्री मंत्र युग्म छंदों में सिरमौर है, उसी प्रकार समस्त देवों के चरणों में श्री राधा के चरण कमल ही सिरमौर हैं।
श्री राधा पद पद्म रस, पगी रसीली भूमि
मैं श्री वृषभानुपुर (बरसाना धाम) को प्रणाम करता हूँ, जहाँ की रसीली भूमि श्री राधा के चरणों के रस से पगी हुई है और जहाँ के वृक्ष एवं लताएँ, प्रेम में व...
मोहन के दृग मत्त अलि, इत-उत्त कहूँ ना जाय
हे सखी! मोहन श्री लालजी (कृष्ण) के नेत्र उन्मत्तता से भरे हुए हैं, वे इधर उधर कहीं नहीं भटकते। वे इक-टक (अपलक) श्री राधा मुख कमल पर टिके हुए हैं।
जहँ जहँ मणिमय धरनि पर चरण धरति सुकुँमारि
जहाँ-जहाँ इस वृन्दावन की मणिमय धरती पर श्री राधिका प्यारी अपने कोमल चरण रखती हैं, वहाँ-वहाँ प्रियतम श्री कृष्ण अपने नेत्रों के आँचल से पहले ही उस भूमि...
एक हि तन मन प्राण है, दोउ रस प्रतिपाल
श्री कुंजविहारिणी लाडिली (श्री राधा) एवं कुंज विहारी लाल (श्री कृष्ण) का एक ही तन है, एक ही मन एवं एक ही प्राण है एवं दोनों ही रस को प्रदान करने वाले ...
राधा जीवन सार है भुक्ति मुक्ति और भोग
श्री राधा ही जीवन का सार हैं। भुक्ति, मुक्ति और भोग सब उनके सामने गौण हैं। वह जिह्वा दहन करने के योग्य है जो “राधा राधा” न कहे, क्योंकि ऐसी रसना ने अप...
बंसी वारे मोहना बंसी तनक बजाय
हे बंसीवाले श्यामसुन्दर! हमें भी अपनी मधुर बंसी की तान सुना दो। तुम्हारी बंसी की ध्वनि ने हमारे मन को ऐसा मोहित कर लिया है कि अब हमें अपना घर-आँगन भी ...
निज सुभाय छोडत नहीं कर देखौ हिय गौर
कोई भी व्यक्ति अपना स्वभाव नहीं छोड़ता है। हे श्री कृष्ण! आप इस बात को अपने हृदय में विचार कर देख लीजिए। यदि आपका नाम अधम उधारन अर्थात् पापियों का उद...
फिरि फिरि राधा-कृष्ण कहि
पुनः-पुनः श्री राधा-कृष्ण, श्री राधा-कृष्ण कहते हुए, उन्हीं का ध्यान लगाते हुए, मैं श्रीधाम वृंदावन के कुंजों में निश्चिंत होकर कब विचरण करूँगा?
पति के पाँय पलोटहीं सिंधु-सुता गुणवंत
सागर-तनया, गुणों की खान लक्ष्मीजी अपने पति (स्वामी) श्रीहरि के सदा चरण दबाती हैं, परंतु वृषभानु-नंदिनी श्री राधा, जो स्वयं श्रीहरि की भी स्वामिनी हैं,...
वेद भेद जानें नहीं नेति नेति कहै बैन
जिन श्री कृष्ण के रहस्य को वेद भी नहीं जान पाते और अंततः 'नेति-नेति' कहकर मौन हो जाते हैं, वही श्री कृष्ण, श्री राधा के चरणों में महावर लगाकर उन श्री ...
वाँह-विहारी की गहों बसों विहारी धाम
श्री बाँके बिहारी लाल जी की बाँह को पकड़ो, श्री बाँके बिहारीजी के धाम श्री वृंदावन में बसो, श्री बाँके बिहारी जी के दर्शन करो एवं श्री बिहारी जी के न...
मृगनैनी आमोदनी महामोद की रास
हे मृग के समान चपल और सुंदर नेत्रों वाली, आनंद प्रदान करने वाली, साक्षात् महा-आनंद की पुंज, श्री राधा महारानी! हे गोवर्धन, वृंदावन के वनों और यमुना के...
श्री राधे मेरी स्वामिनी
श्री राधा ही मेरी एकमात्र स्वामिनी हैं और मैं उन्हीं का अनन्य दास हूँ। मेरी केवल यही अभिलाषा है कि मुझे प्रत्येक जन्म में श्री वृन्दावन धाम का ही वास ...
मेरे प्यारे मोहना मेरे मनके चोर
हे मेरे प्यारे मनमोहन, हे मेरे चित्त चुराने वाले चोर! तुम्हारे मुखारविंद के दर्शन करे बिना, मेरे नेत्रों को कुछ भी दिखाई नहीं देता।
श्याम लाल बैन्दी बनी शोभा बड़ी अपार
श्रीकृष्ण स्वयं को श्री राधा के मस्तक पर सुशोभित लाल बिंदी में रूपांतरित कर देते हैं, जो अनंत सौंदर्य को प्रकट करती है। अपनी प्रिया के मुखचंद्र पर एक ...
अहो किशोरी स्वामिनी गोरी परम दयाल
हे मेरी परम दयामयी गौरवर्णी किशोरी स्वामिनी! आप करुणा की साक्षात् मूर्ति हैं। मुझ पर भी अपनी करुणा भरी दृष्टि की एक सूक्ष्म सी कोर (कटाक्ष) डाल दीजिए ...
एकै प्रेमी एक रस श्रीराधावल्लभ आहि
एकमात्र सच्चे प्रेमी और प्रेम-रस के आधार केवल श्री राधावल्लभ अर्थात् युगल सरकार ही हैं। यदि कोई भूलवश भी यह कहे कि इनके अतिरिक्त ऐसा युगल-रस कहीं और प...
वृज के रस कूँ जो चखै
जो एक बार श्री ब्रज के इस अलौकिक प्रेम-रस का आस्वादन कर लेता है, उसे फिर संसार का कोई भी अन्य स्वाद या विषय-भोग रुचिकर नहीं लगता। यदि कोई प्रेम सहित ह...
सेवा अंग सिगार में परम चतुर घनश्याम
विविध प्रकार की अंग-श्रृंगार सेवा में परम रसिक श्रीकृष्ण अत्यन्त निपुण हैं। गौर वर्ण से सुशोभित श्री राधा की वेणी गूँथते हुए वे न केवल श्री राधा को सु...
ब्रजभूमि मोहनी जा चौरासी कोस
ब्रजभूमि मोहिनी है; जो भी जीव श्रद्धाभाव से चौरासी कोस में पग धरता है, उसके समस्त पापों का निश्चित ही नाश हो जाता है।
ढूँढ़ि फिरै त्रेलोक जौ
यदि कोई तीनों लोकों में भी ढूँढने फिरे, तो भी श्री हरि कहीं प्राप्त नहीं होते। वे तो केवल साक्षात् प्रेम के स्वरूप होकर, नित्य एकरस भाव से श्री वृन्दा...
अलख ब्रह्म अच्युत अगम
वह अलख, अविनाशी और अगम्य ब्रह्म, जिसका न कोई आदि है और न ही अंत, उन भगवान् श्री कृष्ण को श्री राधा ने अपनी आँखों का काजल बना लिया है अथवा उनपर अपनी क...
ब्रज समुद्र मथुरा कमल
श्री ब्रज मण्डल एक विशाल समुद्र के समान है, जिसमें मथुरा पुरी एक खिले हुए कमल के समान सुशोभित है और श्री वृन्दावन उस कमल का दिव्य मकरंद (पराग-रस) है। ...
जिनके रग रग में बसैं
ऐसे ब्रजवासियों को शत-शत प्रणाम, जिनके रग-रग में दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण का वास है।
जैसो तैसो रावरौ कृष्ण प्रिय सुख धाम
हे कृष्ण-प्रिया श्री राधा! हे सुख की धाम! मैं जैसा भी हूँ, भला या बुरा, जैसा भी हूँ, निश्चित ही मैं आपका हूँ। कृपा करके मुझे अपने उन सुन्दर, सुखदायक औ...
कछु माखन के बल बढ्यौ
कुछ बल श्रीकृष्ण को माखन से मिला, कुछ गोप-सखाओं से; परंतु उन्होंने गोवर्धन तो श्री राधारानी की कृपा से ही उठाया था।
धन्य धन्य श्री राधा रमण धन धन भट्ट गुपाल
धन्य हैं श्री राधा-रमण, धन्य हैं श्री गोपाल भट्ट जी, जिनकी भक्ति के कारण श्री राधा-रमण लाल ने तत्काल रूप धारण कर लिया।
राधा श्री राधा रटूँ
श्रीकृष्ण कहते हैं, “मैं नित्य ही आठों याम ‘राधा-राधा’ का जप करता हूँ। मैं केवल उसी हृदय में निवास करता हूँ, जिस हृदय में राधा बसती हैं।”
पड़ी रहो या गैल में
पड़ी रहो या गैल में, साधु संत चली जाए। ब्रजरज उड़ मस्तक लगे, तो मुक्ति मुक्त ह्वै जाए॥ - ब्रज के दोहे मुक्ति भगवान श्री कृष्ण से पूछती है कि मैं सबको...
भक्त वत्सला लाडिली श्यामा परम उदार
भक्तों पर स्नेह और प्रेम बरसाने वाली, परम उदार स्वामिनी, अपने रसिकों को सुख प्रदान करने वाली तथा रस की आधार-स्वरूपा श्यामा जू (श्री राधा) की जय हो।
दीनबन्धु ह्वै दीन की जो तुम नहिं सुध लेत
हे श्री कृष्ण ! यदि आप दीनबन्धु होकर भी मुझ दीन की सुधि नहीं लेते तो आपने अपना नाम दीनबन्धु क्यों प्रसिद्ध करा रखा है ? या तो आप अपने को दीनबन्धु कहला...
हाड़ मांस की पुतरी, हरि तोय दई अमोल
यह मानव-शरीर हाड़-मांस से बना हुआ होते हुए भी भगवान हरि का अत्यंत अनमोल उपहार है। इसलिए जब तक इसमें प्राण हैं, तब तक “राधा राधा” नाम का जप करते रहना च...
जित जित भामिनि पग धरै
जहाँ-जहाँ श्री राधा जू के चरण पड़ते हैं, वहीं-वहीं श्री श्यामसुन्दर उनकी रूप-माधुरी से विमोहित होकर दौड़ते हैं और अपनी पलकों के पाँवड़े बिछाते जाते है...
वरष हजारन तप किये वेद चतुर्मुख गाये
ब्रह्मा जी ने हजारों वर्षों तक तप किया और अपने चारों मुखों से वेदों का गायन किया, फिर भी वे श्री राधारानी की चरण-रज को प्राप्त न कर सके।
इन कजरारी अंखियन में
हे श्री स्वामिनी जू! आपकी इन कजरारी काली आँखों में नित्य ही प्रियतम बसे रहते हैं, इसीलिए उनके श्री अंगों का रंग भी काजल के समान श्यामल (साँवला) हो गय...
राधे तेरे रूप की पटतर कहिये काहि
हे श्री राधे! आपकी सुंदरता का पूर्ण वर्णन करने में कोई भी समर्थ नहीं है। जैसे कोई भ्रमर कमल-पुष्प की पंखुड़ियों को छोड़कर उसके मध्य-कोष की ओर आकर्षित ...
मिलि है कब अंगधार ह्वै
वह धन्य घड़ी कब आएगी, जब मैं श्री वृन्दावन की गलियों की परम पावन रज (धूल) बन जाऊँगा, तब मेरे जीवन के आधार, मेरे प्राण-सर्वस्व युगल किशोर के श्री चरण-क...
कहाँ जाउँ कासों कहौं मोहिं और कहाँ ठोर
कहाँ जाउँ कासों कहौं, मोहिं और कहाँ ठोर। राधा रानी के विना, स्वामिनि कोई न और॥ - ब्रज के दोहे मैं कहाँ जाऊँ और अपनी बात किससे कहूँ? मेरे लिए कोई दू...
प्रेम नगर ब्रज भूमि है जहां न जावै कोय
यह पावन ब्रज भूमि साक्षात् प्रेम का नगर है। जो भी इसकी सीमा में प्रवेश करता है, वह संसार के सभी बंधनों को खो देता है। यदि वह लौटता भी है, तो वह प्रभु ...
कीच लगी ब्रज खिरक की
ब्रज की इन कुंज-गलियों की पावन रज जब अंगों पर लग जाती है, तो उसकी ऐसी महिमा है कि साक्षात् यमराज भी उसे देखकर, भयभीत होकर दूर भाग जाते हैं।