shri harivyas devacharya
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Core Concepts
shri harivyas devacharya Collected Verses
तिहि समान बडभाग को
जो मन, वचन और कर्म से सदा युगल-किशोर को ही रिझाते और लाड़लड़ाते हैं, उनके समान भाग्यशाली कौन है? वही जन सिरमौर हैं।
मोहिं वृन्दावन रज सौं काज
“ मोहिं वृन्दावन रज सौं काज । ” - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार), व्यास वाणी , पूर्वार्ध (116) मेरा वास्तविक काज केवल वृन्दावन की रज से ही है।
राधामोहन सहज सनेही
राधा मोहन सहज ही स्नेही हैं। उनके रूप एवं गुण भी सहज हैं और श्री राधा मोहन एक प्राण हैं परंतु दो देह धारण किए हैं। [1] श्री राधा कृष्ण की अंग अंग की म...
वृंदावन रस मोहि भावे हो
श्री हरिराम व्यास जी (श्री विशाखा अवतार), वृन्दावन रस की महिमा का बखान करते हुए बताते हैं कि मुझे केवल वृन्दावन रस ही सुहाता है। मैं बार बार उन पर बलि...
व्यास विवेकी संत जन
विवेकी भक्त की कहनी और रहनी एक ही होती है; अर्थात् जो वे उपदेश देते हैं, वही स्वयं भी आचरण में लाते हैं। उनकी कहनी और करनी की यह समानता पत्थर की रेखा ...
श्री हरि भक्ति न जानहीं
जिन्होंने श्री हरि-भक्ति के अमूल्य धन को नहीं जाना और माया (संसार तथा संसारी जनों) को ही अपना माना, वे जीवित रहते हुए सदा पापी ही रहते हैं और मृत्यु क...
व्यास हिं आस श्याम श्यामा सों
मुझे एकमात्र आशा राधा कृष्ण से ही हैं
बने दोउ रसिक बिहारी बिहारनी
(पद) बने दोउ रसिक बिहारी बिहारनी रूप भरे गुन भरे। अंग अंग सोहें रंग भीने अभरन रतन जरे॥ पहरें बसन सुबरनी छबि मनहरनी ढरनि ढरे। श्रीहरिप्रिया बैठे सिंहास...
वृन्दावन के रूख हमारो मात पिता गुरु बंधु
वृंदावन के वृक्ष हमारे माता, पिता, आध्यात्मिक गुरु और भाई हैं।
सुभग गोरी के गोरे पाँइ
सुभग गोरी के गोरे पाँइ, ताके शरन रहत काकौ डरु कहत व्यास समुझाइ - रसिक अनन्य श्री हरिराम व्यास श्री राधा के गोरे चरणों की जो भी जीव शरण लेता है, इन ...
व्यास भक्ति कौ फल लहयौ
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि श्री हित हरिवंश महाप्रभु के प्रताप से मेरे जीवन की मूल निधि यह वृन्दावन की रज, भक्ति के फलस्वरूप प्राप्त हुई है।
व्यासहि अब जिनि जानियौ
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि अब वे लोक-वेद की मर्यादाओं के दास नहीं रहे, क्योंकि श्री राधावल्लभ लाल उनके हृदय में विराजमान हैं; अन्य सब से वे उदास...
जंत्र, मंत्र और वेद तंत्र में
न कोई ऐसा यन्त्र है, न मन्त्र है और न ही तंत्र है जो राधा नाम के ऊपर भारी पर सके । श्री हरिराम व्यास जी के शब्दों में राधा नाम ही उनका परम धन है जो सब...
व्यास बड़े हरिके जना
सबसे बड़े वही हैं जो भगवान हरि के भक्त हैं, जिनका एकमात्र आधार स्वयं श्रीहरि हैं। हरि के भक्त नित्य उनके भजन में ही उन्मत्त रहते हैं और उनका प्रेम एक ...
कठिन है रंग महलको रिझाइबौ (औ) सहचरि कहाइबौ
श्री राधा के महल की टहल पाना, एवं सहचरी बनना अत्यंत कठिन है। यह छवि एवं रस तभी फलीभूत होता है जब श्री स्वामिनी (राधारानी) के चरण कमल का मकरंद प्राप्त ...
व्यास न तासु प्रीति करि
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि उस व्यक्ति से प्रीति (प्रेम) न करो जिसे केवल अपनी ही पीड़ा और स्वार्थ की चिंता रहती है। इसके विपरीत, उस करुणामय प्रभ...
यह रस दुर्लभ हूँ ते दुर्लभ
यह रस दुर्लभ हूँ ते दुर्लभ, सुलभ नित्य रहत है ताहि। श्रीहरिप्रिया जान जन जिये में, हिये में अपनावत जब जाहि॥ - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सिद्ध...
धर्म मिट्यौ अब कृपा करि
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि प्रभु की अपार कृपा से अब मेरे हृदय से कर्मकांडीय धर्म का अहंकार मिट गया है और मुझे 'भजन-रस' की वास्तविक रीति प्राप्त ...
राधा वल्लभ मधुर रस
राधा वल्लभ मधुर रस, जाकैं हृदय नहिं व्यास। मानुष देही रतनसी, भली विगारी तास॥ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (71) जिसके हृदय में श्री राधा-कृष...
मुँह मीठी बातैं कहैं
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि जो लोग मुख से तो मीठी-मीठी बातें करते हैं, किंतु जिनका हृदय अत्यंत कठोर और कपट से भरा है, वे उस चतुर शिरोमणि नन्दनन्...
स्यामा स्याम वलैया लैहौं
श्यामा श्याम पर बलिहार जाइए, सुख एवं दुःख त्याग कर वृंदावन में रहिए। [1] अति पावन यमुना जल में स्नान करिए, ब्रज वासियों की झूटन को ग्रहण करिए। [2] व...
वंशीवट के निकट हरि रास रच्यौ
वंशीवट के निकट श्री हरि ने मोर मुकुट एवं पीले वस्त्रों को धारण कर रास रचाया। पुनः श्री यमुना जी के सुंदर तट पर, वृंदावन की सघन कुंजों में युगल वर श्र...
व्यास सदा हरिजन बड़े
श्री हरिराम व्यास कहते हैं— ‘श्री हरि के भक्त सबसे बड़े हैं, क्योंकि उनका हृदय अत्यन्त गंभीर होता है। वे अपने सुख की कभी इच्छा नहीं करते और सदा दूसरों...
व्यास न कथनी कामकी
कथनी व्यर्थ है, करनी ही सार है। जैसे गधा चन्दन का बोझ तो ढोता है, पर उसके मूल्य को नहीं समझता; वैसे ही भक्ति के बिना पंडित भी व्यर्थ है। केवल शास्त्र ...
व्यास आस हरिवंश की
श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि उन्हें तो आशा केवल श्री हित हरिवंश से ही है, और वे उन्हीं पर बलिहारी जाते हैं, जिनके प्रताप से वृंदावन की कुंजों में तथा...
श्री हरिप्रिया नित हीय में लसौ
(पद) मनमोहै (री) सोहै अति सुन्दर बानिक मोहनलाल की। झुकनि छबीली रंग रँगीली पगिया गोर भाल की॥ [1] नवल नासिका नथ मोतीकी झलकनि रूप रसाल की। श्रीहरिप्रिया ...
वृंदावन सांचो धन भैया
अरे भैया, श्री वृन्दावन धाम ही सच्चा धन है। यह वृंदावन ऐसा सच धन है कि यदि तुझे अनंत कोटि सोने के पहाड़ भी मिल जाएँ तब भी उसको त्याग कर श्री वृंदावन म...
जीवनि धन राधा वल्लभ लाल
॥पद॥ जीवनि धन राधा वल्लभ लाल। कृष्ण वल्लभा रसिकिनि राधा वारिज बदनी बाल॥ [1] जुगल किसोर किसोरी जोरी गोरी स्याम तमाल। बसहु निरन्तर हियें श्रीहरिप्रिया आ...
यही है यही है भूलि भरमो न कोउ
साधकगण नित्य-वृंदावन को इस पृथ्वी पर स्थित वृंदावन से पृथक न समझें। इसी कारण श्री हरिव्यास देवाचार्य बार-बार कहते हैं—“यही है, यही है”; अर्थात यही वह ...
आरती कीजै जुगलकिसोर की
श्री युगल किशोर श्यामा श्याम की आरती कीजिए एवं संध्या, दोपहर एवं भोर में नख से सिख तक अंगों की पुनः पुनः बलैया लीजिए। [1] श्री नागरी नट [श्यामा श्याम...
मान न कीजै मानिनि वरषा ऋतु आई
श्री हरिराम व्यास श्री राधारानी से कहते हैं "हे मानिनी श्री राधा, देखिये वर्षा ऋतू आ गयी है, अब मान का त्याग कीजिये। श्री श्यामसुंदर के अंग से अंग मिल...
श्रीराधा प्यारी के चरनारविंद सीतल सुखदाई
श्री राधा प्यारी के चरणारविंद अत्यंत शीतल हैं। ऐसे श्री चरणों के नख की चाँदनी के समक्ष तो कोटि-कोटि चंद्रमा भी मंद प्रतीत होते हैं। [1] श्री राधा प्य...
(श्री) राधावल्लभ मूल अरु
श्री राधावल्लभ लाल ही सबके मूल (जड़) हैं, और अन्य सब उसी वृक्ष के पुष्प, पत्ते और डालियों के समान हैं। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि उन्हीं मूल तत्...
ऐसो कब करिहौ मन मेरौ
हे वृंदावन! ऐसा मेरा मन कब करोगे जब में हाथ में करुवा और कन्धे पर कमरिया (छोटा कम्बल) रखकर वृन्दावन की कुंजों के मध्य में बस जाऊँगा। [1] जब मुझे भूख...
बिहरें बिपिन बिहारी बिहारनि
(पद) बिहरें बिपिन बिहारी बिहारनि। मानि मानि मन मोद परस्पर तनक न मानत हारनि॥ [1] अङ्ग अङ्ग रसरंग तरङ्गनि कोटि काम बलिहारनि। श्रीहरिप्रिया अटकि रहे दोऊ ...
व्यास आस इत जगतकी
जो इस संसार की भौतिक तृप्ति की इच्छा रखता है और साथ ही श्रीकृष्ण की भक्ति की कामना भी करता है, वह निर्लज्ज पतित है क्योंकि वह संसार के नश्वर भोग और पर...
व्यास कनक अरु कामिनी
कनक (धन) और कामिनी (सुन्दर स्त्री) की इच्छा से बचना चाहिए और उससे दूर भागना चाहिए, क्योंकि यह इतनी प्रबल है कि निश्चित ही श्री हरि के भजन में विक्षेप ...
नैंन सिरानैंरी प्यारी देखत मुख
हे प्यारी जू, आपके मुख कमल का दर्शन कर मेरे नेत्र अश्रुपूरित हो गए। हे श्री राधा, मेरी बात सुनिए, मुझपर आपकी करुणा दृष्टि होने से अब मेरी समस्त बाधाएं...
व्यास बड़े हरिके जना
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि संसार में वे ही भक्त सबसे महान और श्रेष्ठ हैं, जिनका साक्षात् श्री हरि के साथ संबंध (मित्रता) है। ऐसे महापुरुष अपने प...
व्यास जगत में रसिक जन, जैसें द्रुम पर चंद
श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि इस संसार में रसिक संत ठीक उसी प्रकार सुशोभित होते हैं, जैसे वृक्षों के ऊपर चंद्रमा अपनी शीतलता बिखेरता है। वास्तव में चं...
लगै जौ वृन्दावन कौ रंग
श्री हरिराम व्यास कहते हैं "जिस जीवको वृन्दावन का रंग लग जाता है, उसके शरीर सम्बन्धी समस्त संदेह समाप्त हो जाते हैं तथा विषय से पूर्ण वैराग्य हो जाता ...
चाँपत चरन मोहनलाल
नव नागरी बाल श्री स्वामिनिजी [राधा] अपने पलंग में विश्राम कर रही हैं और श्री मोहन लाल श्री राधिका के चरण दबा रहे हैं। [1] बहुत ही प्रेम से श्री कृष्ण...
तेई रसिक अनन्य जानिवै
श्री हरिराम व्यास कहते हैं "जिनका अंतःकरण विषय-विकार से शून्य हो गया है एवं श्री हरि के प्रेम में डूबा हुआ है, ऐसे साधु जनों को ही रसिक अनन्य मानना चा...
परम धन राधा नाम आधार
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि श्री राधा नाम ही हमारा परम धन है। जिस नाम को श्रीकृष्ण मुरली में गाते हैं और बार-बार सुमिरन करते हैं। [1] यंत्र, मन...
सुभग सुहाग को चिनौं प्यारी तेरे चरननि सोहै
सखी भाव में अवस्थित श्री हरिराम व्यास श्री राधा से कहते हैं "हे प्यारी जू, परम सुभग श्री श्यामसुंदर के सुहाग चिन्ह तो आपके चरणों में शोभायमान है, एवं ...
रूप तेरौरी मोपै बरन्यौं न जाइ
हे राधा प्यारी, आपके इस अद्भुत रूप का वर्णन करने का सामर्थ मेरे में नहीं है। यदि मेरे रोम रोम में कोटि कोटि रसना भी हो तो भी मैं आपके गुणों का बखान नह...
प्यारी श्रीवृंदावन की रैनु
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं "श्री वृन्दावन की रेणु बड़ी प्यारी है, जिसका दर्शन कर श्री कृष्ण सुख पाते हैं और हर्षित हो मधुर वेणु बजाते हैं।" [1] श्र...
सदा सनातन एक रस, सदा बसत सब काल
हम श्री वृन्दावन की महिमा का क्या वर्णन करें, जहाँ के राजा मोहन लाल और रानी श्री राधा सी हैं। ये अनादि काल से यहाँ सब काल, अर्थात् सतयुग, त्रेता, द्वा...
ललनकी बतियाँ चोज सनी
श्री लालजी [कृष्ण] श्री राधा से प्रेम भरी बतियाँ कर रहे हैं। परम कृपालु श्री राधिका, करुणामयी दृष्टि से लाल जी की ओर निहार रही हैं। [1] दोनों सुरत रस...
आजु कछु कुंजनिमें वरषासी
सखी भावयुक्त श्री हरिराम व्यास अन्य सखी से कहते हैं "हे सखी, आज कुञ्ज में हल्की वर्षा हो रही है। उन बादलों के भीतर बिजली की चपल तरंगों को तो देख।" [1]...
बड़े भाग पाई जु हम, जीवन प्रान-अधारि
रसिक दम्पति की यह जोड़ी हमें बड़े भाग्य से प्राप्त हुई है। यह हमारे जीवन और प्राणों की आधार-स्वरूपा है। यह जोड़ी रसिक-शिरोमणि है और सदा सहज सुख प्रदान...
व्यास चंद आकास में, जलमें आभामंद
जिस प्रकार आकाश में स्थित चंद्रमा का जल में प्रतिबिंब देखकर मंद-बुद्धि कमल उसे अपने जैसा समझ बैठता है, उसी प्रकार रसिक संत इस संसार में सामान्य प्रतीत...
प्रान वारि बलिहारी लै
सहचरियाँ श्री प्रिया-प्रियतम के मुखचंद्र का दर्शन करके अत्यंत आनंदित और प्रफुल्लित हो उठती हैं। वे अपनी सारी सुध-बुध खोकर उनकी बलैया लेती हुई अपने प्र...
काहू के बल भजन कौ काहू के आचार
किसी को भजन का बल प्राप्त है, किसी को सदाचार का आश्रय—श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि उन्हें तो केवल श्री राधारानी का ही अटूट भरोसा एवं बल है। उनकी क...
जाकौ श्याम मुरली में टेरत, सुमिरत बारम्बार
श्री हरि राम व्यास जी कहते हैं की राधा रानी का नाम ही परम धन है। हमारा जिस नाम को श्री कृष्ण मुरली में गाते हैं, और बार बार स्मरण करते हैं। जंत्र, मन्...
जो कछु सो तुव चरन बल, नहिं मेरो उपकार
हे सुखस्वरूपा स्वामिनी श्री राधा महारानी जू! जो भी सामर्थ्य, यश या प्रताप दिखाई देता है, वह सब आपके पावन युगल-चरणों की ही कृपा है; उसमें मेरा कोई योग...
हरि हीरा गुरु जौहरी, व्यासहि दियौ बताइ
श्री हरि (परमात्मा) एक अनमोल हीरे के समान हैं और गुरु उस जौहरी की भाँति हैं जो उस रत्न की वास्तविक परख और पहचान कराना जानते हैं। श्री हरिराम व्यास जी ...
अलक-लड़ैती लाड़ली, अलक लड़ौ सुकुंवार
लाड़ करने योग्य या तो लड़ैती जू (राधा) हैं या इनके प्यारे लाड़िले सुकुमार हैं, या यह सुंदर निज महल या इन दोनों का नित्य विहार ही लाड़ करने योग्य है।
नाँचत गोपाल वनैं नटवर वपु काछैं
श्रीकृष्ण कमर में काछिनी बांध कर नटवर का रूप धारण कर नृत्य कर रहे हैं। वह गान कर रहे हैं और श्री राधा के पीछे उनकी तेज गति से मेल खाते हुए नृत्य कर रह...
श्रीराधा पद कमल ते नूपुर कलरव होय
श्री राधा के चरण कमलों से जो नूपुरों की मधुर ध्वनि (कलरव) प्रकट होती है, वही वास्तव में निर्विकार और सर्वव्यापक 'शब्द ब्रह्म' है। जिसे शास्त्र 'ब्रह्म...
करुनानिधि नागरि अहो
(पद) ऐसी करौ करुनानिधि नागरि होइ रहों कछु तिहारे चरन तर। यह कैं ऊ वह कै वा ओही इतने में कोई पाऊँ बर॥ मन बच क्रम निहचै उर मेरे और कछु अभिलाष न अतपर। ...
बिहारिनि जीवनि मेरी हो
(पद) बिहारिनि जीवनि मेरी हो। सदा प्रान प्रतिपालन हौं बलि जाऊं तेरी हो॥ [1] परमाधार प्रेयसी स्यामा सहज स्वरूपा एरी हो। श्रीहरिप्रिया आस अवलम्बनी तो पद ...
व्यासहिं ब्राह्मण मति गनों
श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि मुझे मात्र एक जन्मजात ब्राह्मण मत समझो; मैं तो श्री हरि के भक्तों का दास हूँ। मेरी तो यही अभिलाषा है कि श्री वृन्दावन के...
"अब मैं वृन्दावन रस पायौ, श्री राधा चरन सरन मन, दीनो मोहन लाल रिझायो ||"
श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि "अब जाकर मैंने वृन्दावन के विलक्षण रस को प्राप्त किया है। श्री राधारानी की जैसे ही मैंने चरण शरण ग्रहण करी उसी क्षण श्री...
किशोरी मोहि अपनी कर लीजै
हे किशोरी जी! जैसे भी हो, मुझे अपना बना लीजिए; और कुछ दीजिए या न दीजिए, पर वृन्दावन-रज (ब्रजवास) अवश्य प्रदान कीजिए। [1] भले ही वृन्दावन में पक्षी, ...
कनक रतन भूषण वसन, मिथ्या अनत विलास
स्वर्ण, रत्न, आभूषण और बाह्य विलास की सारी कामनाएँ त्यागकर— यदि आवश्यकता पड़े तो अपनी पुत्री को सजाकर हाट में बैठाना पड़े—तथापि श्री वृन्दावन का वास ...
रहौ मेरो नेह चरन-बनजात
श्रीलालजू कह रहे हैं - ॥ दोहा॥ हे कुँवरि किशोरीजू, आप सुनिये, मेरी एकमात्र यही अभिलाषा है कि आपके चरण-कमलों में मेरा स्वाभाविक स्नेह सदा बना रहे। ॥ प...
पियकौ नाँचन सिखवत प्यारी
प्यारी श्री राधा अपने प्रियतम श्री कृष्ण को नृत्य करना सिखा रही हैं। श्री वृन्दावन में शरद पूर्णिमा की उज्ज्वल रात्रि में महारास रचा गया है। [1] सखिय...
व्यास बड़े हरिके जना
श्रीहरि के वे अनन्य भक्त ही वास्तव में महान हैं जो अहर्निश उनके पावन यशोगान में मग्न रहते हैं। जिन्होंने तन, मन और वाणी से श्रीहरि के अतिरिक्त अन्य कि...
कहा भयौ वृंदावनहि बसै
श्री धाम वृंदावन में यदि वास भी मिल गया तो ऐसा क्या हो गया क्योंकि जब तक लोभ एवं पाखंड रूपी माया से वे ग्रसित है तब तक उसने घर को त्याग कर भी ऐसा क्या...
राधा-वल्लभ ध्याइ कैं और ध्याइयै कौंन
सब अवतारों के मूल श्री राधावल्लभ जी का ध्यान करने के बाद अब अन्य किसका ध्यान किया जाए? जैसे भोजन में एक साथ नमक डालते हैं, वैसे ही एक-एक 'बरी' (दाल की...
अंग अंग सोभा जु पर
श्री राधा-कृष्ण के अंग-प्रत्यंगों की अनुपम शोभा पर करोड़ों कामदेवों को अर्पित किया जा सकता है। ऐसी अद्वितीय युगल-जोड़ी न तो कभी सुनी गई और न ही कहीं द...
जय जय चतुरि चूड़ामनी
(पद) [राग केदारौ] जय जय चतुरि चूड़ामनी। चारु चंचल-लोचनी चितहरनि चन्द्राननी॥ [1] जयति सुख-सौन्दर्य-संपति, सुद्ध चम्पक तनी। स्वामिनी श्रीहरिप्रिया नि...
ताके वल गर्वभरे रसिकव्यास से न डरे
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि उन्हीं श्री राधा के बल के गर्व में मैंने लोक, वेद, कर्म, धर्म एवं चारों प्रकार की मुक्ति का निर्भयता पूर्वक त्याग कर ...
प्यारे वृन्दावन के रूख
वृंदावन के वृक्ष अत्यंत प्यारे हैं जिनको देखकर समस्त कामनाएँ विलीन हो जाती हैं क्योंकि इनके नीचे सदा श्री राधा मोहन विहार करते हैं। [1] यह सदा प्रेम ...
व्यास दीनता के सुखहि
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि परम दीनता (विनम्रता और निरभिमानता) में निहित परम सुख को यह मंदबुद्धि संसार क्या जाने? जब भक्त स्वयं को सर्वथा असमर्थ ...
श्रीराधे जु आसा पुजवौ मेरी
हे श्री राधे जू, तुम्हारी बलिहारी जाऊँ, मेरी इस आशा को पूर्ण करो कि मैं सदा सदा के लिए तुम्हारी दासी बन जाऊँ। [1] मुझे श्री कृष्ण (भगवान) का डर नहीं...
जय राधे जय सब सुख साधा
जय राधे जय सब सुख साधा जय जय कमल नैन बस करनी । जय स्यामा जय सब सुख धामा जय जय मन मोहन मन हरनी । । जय गोरी जय नित्य किसोरी जय जय भागनी भरी सुभामिनी । ज...
ऐसौ काकौ भाग जु दिन प्रति
वे जन परम सौभाग्यशाली होते हैं जो दिन-रात प्रेमपूर्वक जुगल किशोर श्री श्यामा श्याम की महिमा का गान करते हैं। [1] ऐसे भक्त के चरण कमलों की शरण लेनी चा...
एक पकौरी सब जग छूट्यौ
इस पद में महाप्रसाद की महिमा का वर्णन करते हुए श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि जप, तप, व्रत, संयम आदि सब कुछ करके मैं हार गया, मेरा मन तनिक भी न टूटा...
स्वामिनी प्रगटी सुख भयौ, सुर पुहुपनी वरषाइ
जब स्वामिनी श्री राधा प्रकट हुईं, तब चहुँओर अपार सुख छा गया और और देवताओं ने आकाश से पुष्पों की वर्षा की। श्री हित हरिवंश जी की कृपा के प्रताप ने उसमे...
जम की मार बुरी अहै, छुटै न और उपाइ
यमराज का दण्ड (मृत्यु और नरक का कष्ट) अत्यंत भयानक है, जिससे बचने का संसार में अन्य कोई उपाय नहीं है। यदि कोई जीव दृढ़तापूर्वक श्री हरि की भक्ति को अपन...
स्वान प्रसादहि छ्वै गयौ
यदि प्रसाद को कुत्ता छू ले या कौवा उसे स्पर्श कर जाए, तब भी वह अपवित्र नहीं होता। श्रीमद् भागवत और रसिक महापुरुषों का यही सिद्धांत है कि प्रसाद सदा पा...
राधिका सम नागरी नवीन को प्रवीन सखी
हे सखी, श्री राधा के समान निपुण, नवीन एवं प्रवीण कौन है? उनके रूप, गुण, सुहाग और भाग्य की समानता तीनों लोकों की कोई भी नारी नहीं कर सकती। [1] वरुणलोक...
पाछैं बैठे मोहन मृगनैंनींकी बैंनी गुहत
श्री कृष्ण श्री राधा के पीछे बैठकर उनकी वेणी गूँथ रहे हैं, इस छवि की शोभा कहते नहीं बनती, जिसे देख मेरी ऑंखें शीतल हो रही हैं। [1] श्री राधा की नख-ज्...
अहो बिहारिनि कहत बलि
(पद) जोई जोई करति तुम प्यारी सोई सोई मो मन मानें। अहो बिहारिनि सौंह तिहारी उर प्रतीति अति आनें॥ [1] जब तुम नेंक रुखोंई चितवति प्रनय-कोप-रस सानें। श्री...
मन बावरे तूँ हरि पद अटक्यौ
अरे मन बाँवरे, तू अब जाके श्री हरि के चरणों में अटका है, इसी वजह से अब तू साँचा सुख प्राप्त कर रहा है। जब तू संसार में था तो इसी आनंद के लिए घर घर भटक...
सुखनिधि सुन्दरि सरसनी
हे सुख-समुद्र रूपा सुंदरी जू, हे स्वामिनी जू! मेरी बात सुनिए, आप ही रस-उद्दीपन करने वाली हैं। हे श्री राधा गोरी जू, हे प्रिया जू! आपकी सदा जय हो, आप म...
जय श्रीराधिका रवनी
(पद) जय श्रीराधिका रवनी। प्रानप्रीतम की प्रिया जय कलस्वनी कवनी॥ [1] जय श्रीबिहारिनि लाड़िली जय रसिक जोरी बनी। स्वामिनी सुखसनी श्रीहरिप्रिया दुखदवनी॥ [...
जाकी है उपासना, ताहीकी वासना
साधक को जिस इष्टदेव (श्री राधा कृष्ण) की उपासना प्राप्त है, उसे केवल उन्हीं को प्राप्त करने की इच्छा बनानी चाहिए। उन्हीं के नाम, रूप, लीला एवं गुणों क...
व्यास नाम सम नाम है
भगवान के नाम के समान उनका नाम ही है, जिसकी कोई समानता नहीं है। यह जग-विख्यात है कि नामी से ही नाम प्रकट होता है, फिर भी नाम नामी से श्रेष्ठ है।
लाल बस बाल कें बाल बस लाल
(पद) लाल बस बाल कें बाल बस लाल। [1] सुरत-सुख-सेज पर हेज-भरे बिलसहीं, हुलसि चितचाड़िले लाड़िले लाल॥ [2] कमल-माला कलित ललित उर पर बलित, दलित अङ्ग अङ्ग रति...
कृष्णरूप श्रीराधिका, राधे रूप श्रीस्याम
श्री राधिका कृष्ण-रूप हैं और श्री श्यामसुंदर श्री राधा-रूपा हैं। ये दोनों दर्शन-मात्र को तो दो हैं, परंतु तत्त्वतः ये दोनों सुख-धाम एक ही हैं।
व्यास रसिक सब चलि बसे नीरस रहे कुवंश
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि वास्तविक रसिक (प्रेमी) तो सब चले गए, अब तो केवल नीरस हृदय वाले कुवंश ही बचे हैं मानो निर्मल सरोवर के राजहंस छल-कपट से...
अनन्यनि कौनकी परवाहि
श्री राधा कृष्ण के अनन्य रसिकों को किसी की परवाह नहीं होती। वे तो कंधे पर कंबल एवं हाथ में करुवा लिए, नित्य श्री कुञ्जबिहारी की ही अनन्य आशा बनाये रखत...
जिनकी दया सुदृष्टि की वृष्टिहि करें निहाल
(पद) प्यारी जू प्रानन की प्रतिपाल। जिनकी दया सुदृष्टि वृष्टि करि पल में होत निहाल॥ [1] तन मन परम पुष्ट पन पावै लावै रंग रसाल। श्रीहरिप्रिया प्रेम रस ब...
नैननि देख्यौ, सोई भावै
मेरे नैनों को वही भाता है जो कपट एवं लोभ का त्याग कर श्री राधा वल्लभ का गुणगान करता है। [1] जो रसिक अनन्यों की मंडली से हो और नित्य प्रति प्रिया प्रि...
नव कुँवर चक्र चूड़ा नृपतिमनि साँवरौ
श्री वृंदावन धाम प्रेम की राजधानी है जहां के राजा नायक शिरोमणि श्री श्याम सुन्दर और रानी तरुणि-मणि श्री राधिका हैं। पाताल से वैकुंठ तक के सब लोकों क...
आसू कौ हरिदास रसिक हरिवंश
अनन्य रसिक संत श्री स्वामी हरिदास जी एवं श्री हित हरिवंश महाप्रभु जी की कृपा की अभिलाषा है एवं उनके द्वारा दिखाये गए पथ पर ही चलना है क्योंकि मेरे ह्र...
भ्रमत रहत निसिदिन छिना
श्री कृष्ण कहते हैं कि हे राधे! मेरे नेत्र-रूपी भौंरे तुम्हारे कमल-रूपी चरणों के प्रेम-रस में ऐसे सराबोर रहते हैं कि ये भौंरे उन चरण-कमलों पर रात-दिन ...
राधैवेष्ट: संप्रदायैक कर्ताचार्यो राधा
श्री राधा ही जिनकी इष्ट हैं, श्रीराधा ही जिनके सम्प्रदाय की एकमात्र प्रवर्तक आचार्य हैं, जिनकी मंत्रदाता सद्गुरू श्रीराधा ही हैं, जिनका मंत्र भी श्रीर...
व्यास न कबहूँ उपजि है
श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि संतों की कृपा से विषयों के प्रति अनुराग जड़ से समाप्त हो गया है। बिना संत चरण रज पान किए ह्रदय के ताप कभी शांत नहीं होते...
सरद सुहाई जामिनि, भामिनि रास रच्यौ
शरद कि सुहावनी रात्रि में भामिनी श्री राधा ने रास रचा है। यमुना तट पर वंशीवट के निकट प्रवाहमान शीतल-मंद-सुगंधित पवन सुखमय है। [1] मधुर ताल में मृदंग ...
व्यास भक्ति को फल लायो, वृन्दावन की धूर
व्यास भक्ति कौ फल लहयौ, वृन्दावन की धूरि - श्री हरिराम व्यास श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि उनकी भक्ति से उन्हें "वन्दावन की रज" फल रूप में मिली ...
कोटि ब्रह्म ऐश्वर्यता वैभवता की वारि
करोड़ों ब्रह्माओं की ऐश्वर्यता और समस्त वैभव भी जिनके सामने तुच्छ हो जाए, श्री हरिरामव्यास की उन किशोरी श्री राधा को भला अब कौन निहारने में समर्थ है।
(श्री) राधावल्लभकौ हौ भांवतौ चेरौ
मैं श्री राधावल्लभ जी का चहेता दास हूँ। श्री राधावल्लभ का नाम श्रवण एवं उच्चारण करने मात्र से मेरे मन में यम, नियम, आदि नहीं ठहरता। [1] श्री राधावल...
तेई रसिक अनन्य जानिवै
उन्हीं को रसिक-अनन्य जानना चाहिए, जिनके अंदर विषय-विकार नहीं, अपितु श्री हरि से रति है। उन्हें ही साधु मानना चाहिए। [1] ऐसे रसिक अनन्य के संग से पतित...
मन तू वृंदावन के मारग लागि
अरे मन, तू वृंदावन के मार्ग का अनुसरण कर। तेरा यहाँ कोई नहीं है और न ही तू किसी का है; संसारिक मोह-माया को त्याग कर तू भाग चल। [1] सर्प रूपी कलियुग स...
प्यारी लागै श्रीवृन्दावन की धूरि
मुझे श्री वृन्दावन की धूलि (रज) ही प्यारी लगती है। इस वृंदावन धाम की रानी श्री राधा हैं एवं राजा मोहन हैं जिनका राज सदा भरपूर है। [1] यहां की रज का क...
अपनैं-अपनैं मत लगे वादि मचावत सोर
अपने अलग-अलग मतों को लेकर बेकार में ही सब लोग शोर मचा रहे हैं। जैसे-तैसे, सबको किसी न किसी रूप में, उस एक नंदकिशोर (परम भगवान जो सर्वव्यापक है) का ही ...
अनन्य नृपति श्रीस्वामी हरिदास
श्री स्वामी हरिदास जी अनन्य रसिक प्रेमियों में सर्वोच्च सम्राट के समान हैं। वृंदावन के एकांत कुंजों में श्री कुंज बिहारी-बिहारीणी के अतिरिक्त उन्होंने...
लागी रट, राधा श्रीराधा नाम
अब मैंने श्री राधा नाम की रटना लगा दी है। मैंने समस्त वृन्दावन में ढूंढने का प्रयत्न किया परंतु नंद के नटखट दुलारे श्री श्यामसुन्दर कहीं नहीं मिले। [1...
व्यास विदित चतुराइयनि
कुछ कपटी ऐसे होते हैं जो स्वयं तो सदा संसार में आसक्त रहते हैं परंतु दूसरों को संसार से अनासक्त कराने का उपदेश देते रहते हैं। जो स्वयं कभी नाव पर चढ़ा...
जिनके मुख गोपालजी पावन हरि गुन गीत
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि जिनके मुख प्रेमपूर्वक श्री हरि के पावन गुणों का गान करते हैं, उन्हें मेरा युगों-युगों का मित्र मानना।
प्रिया मोहिं दीजै हो पद पर्म
(पद) प्रिया मोहिं दीजै हो पद पर्म। प्रनतन पाल कृपाल कृसोदरि है तिहरो यह धर्म॥ [1] तुम बिन अहो सुकुँवारि सिरोमनि को समुझै निज मर्म। श्रीहरिप्रिया स्वाम...
रसिक अनन्य हमारी जाति
हमारी जाति रसिक अनन्य है। कुल देवी श्री राधा हैं, गांव हमारा बरसाना है और जाति-बिरादरी ब्रज वासियों के साथ है। [1] गोत्र गोपाल हैं, यज्ञोपवति कण्ठीमा...
अहो बलि स्वामिनी सुखसार
(पद) अहो बलि स्वामिनी सुखसार। जो कछु सो सब पद प्रताप करि, मोहि देत अधिकार॥ [1] तुम कारन के कारन तुमहीं, करता के करतार। श्रीहरिप्रिया प्रान-जीवन-धन, तन...
सेवा हूँ तें दूर कियो विधि निषेध जंजार
स्वामी श्री हरिदास जी ने सेवा में विधि-निषेध के समस्त बंधनों को हटाकर, विशुद्ध प्रेम के सार स्वरूप “नित्य विहार” रस का गान किया है।
सुभग गोरी के गोरे पाँइ
गौरवर्ण वाली श्री राधिका के गोरे चरणारविंद की शोभा अत्यंत सुंदर है, जिन्हें स्वयं श्यामसुंदर प्रेम-विवशता से अपने करकमलों में धारण करते हैं और अपने क...
व्यास पराई कामिनी कारी नागिन जानि
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि पराई स्त्री को काली नागिन के समान मानना चाहिए। यदि किसी ने कामुक दृष्टि से उन्हें भोगने की कामना की, तो सम्पूर्ण जीवन...
यही चाह चित मो चहौ
(पद) यही चाह चाहौ चित मेरौ, और चाह तन तनक न हेरौ। मधुकर ह्वै पदपंकज केरौ, रैंन दिना करि रहौं बसेरौ॥ श्रीहरिप्रिया प्रेम उरझरौ, उरझयौ रहु न होहु सुरझेर...
श्री राधावल्लभ परम धन
श्री राधावल्लभ ही परम धन हैं, और व्यासजी ने हर्षित होकर इस अमूल्य संपदा को लूटा है। यह ऐसा दिव्य खजाना है कि चाहे जितना निरंतर निकालो, इसका भंडार सदा ...
करि कें आस जू और की तकत न इत उत होय
(पद) श्रीराधे! तो पद पंकज की परछाँहीं रहत सदा मन मेरौ। करिकें आस और इत उतकी तकत न दाहिन डेरौ॥ [1] सकल लोक सुख-संपति कौ सुख नाहिं सुहावत नेरौ। श्रीहरिप...
चलि चलिहि वृंदावन वसंत आयौ
आओ, चलें! वसंत का वृंदावन में आगमन हो गया है। खिलते हुए फूलों के गुच्छे लहरा रहे हैं, और मंद समीर उनकी मधुर सुगंध दूर-दूर तक बिखेर रही है। [1] भँवरे,...
हरि हीरा गुरु जौहरी व्यासहि दियो बताइ
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि हरि दिव्य हीरे के समान हैं, और गुरु उस हीरे को तराशने वाले कुशल जौहरी के समान हैं। भगवन्नाम लेने से तन और मन दोनों मे...
श्रीराधावल्लभ की नव-कीरति
युगल राधावल्लभ का नित्य नवीन यश वाणी से परे है। भारत के श्रेष्ठ कविगण भी, जिनके रस का वर्णन करते हुए अघाते नहीं हैं। [1] रसिक जयदेव ने जब इन लीला प...
व्यास राधिका-रवन बिनु
श्री राधिका रमण युगल सरकार, जो सबके मूल स्रोत हैं, उनके बिना मुझे कहीं भी सच्चा आनंद प्राप्त नहीं हुआ। संसार की प्रत्येक डाल-डाल पर भटकते-भटकते मैं उल...
भ्रमत रहत निसिदिन छिना
(पद) प्यारी लाड़िली पदारविन्द नैन मधुकर मेरे। भ्रमत रहत निसिदिना छकि छिनछिना अधिकेरे॥ [1] कोटि जतन करहु कोउ फिरत नाहि फेरे। श्रीहरिप्रिया सहज सुभाव ...
मन रति वृंदावन सौ कीजै
हे मन, श्री वृन्दावन से प्रेम कर — तू अब तक केवल इंद्रिय-सुखों में पशुवत जीवन जीता रहा है, अब जीवन के परम उद्देश्य को प्राप्त कर। [1] सत्य और असत्य...
मोहन मोहिनी आधीन
(पद) मोहन मोहिनी आधीन। रहें अति आसक्त अनुदिन कहा गति जल मीन॥ [1] नित्य नवतन नेह नेही परस्पर रस-लीन। हित श्रीहरिप्रिया रसिकन हेत बिबि तन कीन॥ [2] - श...
पल बिछुरें न कल परें
सहज रंगीली साँवरी गोरी जोरी परम उदार है। ये दोनों इस प्रकार के रस में ढरे हुए हैं कि यदि ये एक पल के लिये भी बिछुर जाएँ तो इन्हें कल नहीं पड़ती है।
व्यासहि बॉमन जिनि गनौं हरिभक्तन कौ दास
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं “मुझे ब्राह्मण मत गिनो, मैं तो हरिभक्तों का दास हूँ”। श्रीराधावल्लभ लाल जी के प्रेम में, संसार के समस्त ताने और उपहास को...
श्रीराधावल्लभ तुम मेरे हित
हे श्रीराधावल्लभ! आप ही मेरे सच्चे हितैषी हैं। संसार के समस्त रिश्ते केवल तब तक ही साथ देते हैं जब तक उनका स्वयं का कोई स्वार्थ जुड़ा हो। [1] इस जगत...
करुणा सब दुख चूरणा
सर्व दुःखों का नाश करने वाली, श्रीकृष्ण के लिए परम सुखदायिनी, शरणागत-पालिका प्राणप्यारी, सुकुमारी श्री राधा किशोरी की सदा ही जय हो।
अनन्य व्रत खाँडेकीसी धार
अनन्य-भक्ति का व्रत तलवार की धार के समान सूक्ष्म और कठिन है। यदि मन इधर-उधर डगमगाकर संसार के मोहों में फिसल जाता है, तो फिर यद्यपि हरि जगत के हितैषी ह...
व्यास कुलीननि कोटि मिलि पंडित लाख पचीस
यदि करोड़ों उच्च कुलीन जन और लाखों-पचीस विद्वान पंडित भी एकत्र हो जाएँ, तो उन सभी के शीश एकत्र होकर भी उस वृंदावन के स्वपच की चरण-रज की बराबरी नहीं कर...
जय श्रीराधिका रसभरी
(पद) जय श्रीराधिका रसभरी। रसिक सुन्दर साँवरे की प्रान-जीवन-जरी॥ [1] गौर अंग अनंग अद्भुत सुरति-रंगनि-ररी। सहज संग अभंग जोरी सुभग-साँचे-ढरी॥ [2] परम प्...
झूलत फूलत कुंजविहारी
निकुंज में कुंजविहारी झूला झूल रहे हैं एवं प्रफुल्लित हो रहे हैं, और दूसरी ओर किशोरवल्लभा, वृषभानु की दुलारी, श्री राधा महारानी विराजमान हैं। [1] वे ...
पराभक्ति रस वर्धिनी श्यामा सब सुख दैन
श्री श्यामा जू (श्री राधा) पराभक्ति दान करने वाली, रस को बढ़ाने वाली हैं तथा समस्त सुखों को प्रदान करने वाली हैं। रसिकों के लिए वे ही परम शिरोमणि हैं।...
नर देही द्वारौ खुल्यौ हरि पावन की घात
मानव देह रूपी दुर्लभ अवसर भगवान हरि की प्राप्ति तथा जन्म–मृत्यु के चक्र से सदा के लिए मुक्त होने का खुला हुआ द्वार है। श्री हरिराम व्यास जी सचेत करते ...
"वृन्दावन की शोभा देखत मेरे नैन सिरात |"
"वृन्दावन की शोभा देखत मेरे नैन सिरात ।" - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी वृन्दावन की शोभा को देखकर हमारे नयन (आनंद रस से) शीतल बने रह...
गावत प्यारौ राधा तेरौ जसु
इस पद में श्रीकृष्ण की विरह-अवस्था का वर्णन है। सखी-भावापन्न हरिराम व्यास श्रीराधा से प्रार्थना कर रहे हैं— हे श्रीराधे! तुम्हारे प्रियतम श्रीकृष्ण नि...
श्री शुक, प्रगट कियू नहीं जाएं, जानी सार को सार
श्री शुक, प्रगट कियू नहीं जाएं, जानी सार को सार, परम धन राधा नाम आधार । - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (38) श्री हरि राम ...
व्यास बढाई और की
भक्तकवि श्रीहरिराम व्यासजी कहते हैं कि संसारी (विषयी) जनों द्वारा की गई स्तुति अथवा प्रशंसा सर्वथा तिरस्कार के योग्य है। मेरे लिए तो रसिक संतों द्वार...
व्यास स्वामिनी रास मंडल में
वृंदावन में रास मंडल में श्री राधारानी, श्री कृष्ण को चुटकी पर नाच नचाती हैं। मैं इस वृन्दावन की दिव्य निधि एवं धन पर बार बार बलिहार जाता हूँ।
दुविधा तब जैहै या मनकी
मेरे मन की दुविधा तभी जाएगी जब मैं निर्भय होकर के इस वृंदावन रज का सेवन करूंगा। [1] एक कंबल और एक करुवा हाथ में लेकर, शीतल कुंजों की छाया में, दिव्य ...
जयति जय राधा रसिक मनि मुकुट मनि
(स्तोत्र) जयति जय राधा रसिक मनि मुकुट मनि हरनी त्रिये। पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये॥ [1] जयति गोरी नव किसोरी सकल सुख सीमा श्रिये। परा...
तजि के रसिक अनन्यता
परम रसिक श्री हरिराम व्यासजी का मत है कि जब कोई साधक रसिकों द्वारा निरूपित श्रीराधारानी की उस मधुर अनन्य भक्ति का परित्याग कर, केवल शास्त्रोक्त विधि-...
सदा वृन्दावन सब की आदि
वृंदावन धाम सदैव सब कुछ का मूल रहा है। अनगिनत जीवनकाल के लिए आनंद और खुशी का अंतहीन खजाना यहाँ हर पल में मौजूद है।
देखो श्री वृन्दाविपिन प्रभाइ
ओह सखी, श्री वृंदावन धाम की भव्यता और प्रभाव को देखो, यहां तक कि अन्य सभी तीर्थ भी यहीं आगए हैं। श्री हरिराम व्यास इस आश्चर्यजनक सर्वोच्च रस का वर्णन ...
तेइ रसिक अनन्य जानिवे
जिसका जीवन धन एक मात्र वृन्दावन है उसे ही रसिक अनन्य जानिये।
कहि न परै सोभा या सुख की
दोहा - हे सखी ! मेरी यह प्रार्थना है कि ये लाल ललना उपरोक्त इसी अद्रभुत रस कि वर्षा करते रहें। और हम सब इनके मुखारविदु की रूप माधुरी को देख देख कर जिय...
रहि मन वृंदावन की शरण, यह रस पसु निरस तू छाँडत
रहि मन वृंदावन की शरण, यह रस पसु निरस तू छाँडत, भाजत पेटहि भरन। व्यास अनन्य भक्तिकी जीवनि, बन में मंगल मरन। - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्या...
व्यास न व्यापक देखिये निर्गुण परै न जानि
श्री हरिराम व्यासजी कहते हैं कि वह परब्रह्म सर्वव्यापक होने के कारण इन चर्म चक्षुओं से दिखाई नहीं देता और निर्गुण होने के कारण बुद्धि की पहुँच से परे ...
व्यास मिठाई विप्र की
अनन्य रसिक श्री हरिराम व्यास जी वृन्दावन अथवा वृन्दावन के वासियों की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि यदि किसी कर्मकांडी विद्वान (विप्र) अथवा वृन्द...
पलकांतर अवलोक बिन
(पद) मेरें सरबस-धन स्वामिनी मोहिं और न कछू सुहावै री। पलकांतर अवलोके बिन मोहि कल्पांतरहि बिहावै री॥ [1] एक टेक यहि चित चढ़ी रहै बिन देखे अकुलावैं री। ...
साधुन की सेवा कियैं
साधुओं और संतों की सेवा करने से ही श्री हरि को परम संतोष प्राप्त होता है। इसके विपरीत, जो लोग संतों से विमुख होकर केवल हरि का भजन करना चाहते हैं, श्री...
प्रानन के आधार मेरे
(पद) प्रानन के आधार मेरे। अहो कुँवरी करुनामई स्वामिनि रहौ सदा मो नेरे॥ अन्तर आनि परत पल चितवत बितवत वर्ष घनेरे। श्रीहरिप्रिया यह टेव परी कोउ सूझ न साँ...
वृन्दावन न तजै अधिकारी
अधिकारी जन वृन्दावन कभी नहीं त्यागते। जिनके हृदय में प्रीती की रीति नहीं है (प्रेम एवं विश्वास) नहीं है, बिहारी जी उनके वश नहीं हैं।
यह तनु वृन्दावन जो पावै
इस पद में श्री हरिराम व्यास वृन्दावन धाम के वास की महिमा बखान कर रहे हैं। यदि वृन्दावन वास मिल जाये तो उसका क्या परिणाम होगा। वृन्दावन वास करके अपने स...
जाके मन बसै वृंदावन
जिन महानुभावों का चित्त, श्री धाम वृंदावन एवं श्री राधा कृष्ण से जुड़ गया है, वे रसिक जन धन्य है। जो रसिक महापुरुष विषय वासना से रहित हैं एवं जिनका अं...
श्री राधावल्लभ के गुन गाइ लेहु
हे मन, श्री राधावल्लभ के गुणों का गान कर। [1] असाधुओं का त्याग करते हुए, संतों का नित्य संग कर, भजन का अभ्यास कर और श्री हरि चरणों में प्रेम को बढा। [...
जै जै आनन्द कन्दनी, श्रीहरिप्रिया किसोरि
(पद) जै जै राधा रसिकिनी। रसिक बिहारी जोरी बनी॥ [1] जै जै स्यामा लाड़िली। मन मोहन मन चाड़िली॥ जै जै रूप उजागरी। नित्य नवीना नागरी॥ [2] जै जै आनन्द कन्दन...
स्यामा स्याम वलैया लैहौं
श्री हरिराम व्यास कह रहे हैं की स्वयं को न्यौछावर करते हुए श्री वृन्दावन धाम का वास करुँगा। [1] परम पवित्र श्रीयमुना जी में स्नान करुँगा और ब्रजवासीयो...
व्यास कनक अरु कामिनी
श्री हरिराम व्यास जी सचेत करते हुए कहते हैं कि कंचन (धन-संपत्ति) और कामिनी (स्त्री) ये दोनों अत्यंत पैनी और लंबी तलवार के समान हैं, जिन्होंने असंख्य स...
जुगलवर को यह सुरत बिहार
(दोहा) जो कोई अधिकारी इस “सुरत-सुख” का स्मरण करता है, उस पर श्री प्रिया-प्रियतम रीझ जाते हैं और उसे सुरत-सुख से उत्पन्न अति दुर्लभ उस काम-रस सुख को प्...
अरी मेरे नैननि को आहार
(पद) अरी मेरे नैननि को आहार। कल न परै पल एक बिना मोहिं अवलोकें सुखसार॥ [1] सकल मनोरथ सफल होत तब करत हियें संचार। श्री हरिप्रिया प्रान-जीवन-धन कौ यह ...
बलि बलि जाऊँ राधा मोहिं रहन दै वृंदावन की सरन
श्री हरिराम व्यास जी (विशाखा सखी अवतार) श्री राधारानी से प्रार्थना कर रहे हैं, हे किशोरीजी मैं आपकी बार बार बलिहार जा रहा हूँ, आप मुझे अपने निज महल वृ...
व्यास रसिक तासौं कहैं
श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि वे उसी को रसिक मानते हैं जो जीव के माया-फंदे को काटने में समर्थ हो, समस्त भक्तों के प्रति समान आदर का भाव रखे और किसी क...
व्यास बड़े हरिके जना
श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि श्री हरि के भक्त सबसे बड़े हैं, क्योंकि वे नित्य ही श्री हरि की भक्ति करते हैं और उन्हें प्रणाम करते हैं। उन भक्तों की ...
सबकौ भाँवतौ राधावर
ब्रज के लाड़िले यशोदा पुत्र नंदनंदन राधावर श्री श्यामसुंदर की रूप माधुरी सबके हृदय को भाती है। [1] कुंजबिहारी सदैव श्रृंगार संपन्न नाचते गाते ब्रज में...
किशोरी तेरे चरनन की रज पाऊँ
हे किशोरी (श्री राधा)! मुझे अपने चरण-कमलों की रज प्रदान कीजिए, जिससे मैं वृन्दावन के किसी कुञ्ज के कोने में बैठकर दिव्य दम्पति श्री श्याम-राधिका का ग...
कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ
मैं इस पावन श्री वृन्दावन धाम को त्याग कर कहाँ जाऊँ? मुझ जैसे अधम और तुच्छ प्राणी के लिए श्री कृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई स्थान नहीं है। [1] वृन्दावन ...
“ श्री शुक, प्रगट कियू नहीं जाएं, जानी सार को सार , 'व्यासदास' अब प्रगट बखानत डारि भार में भार || ”
श्री शुकदेव परमहंस जी ने वेदों का सार का भी सार मान कर इसको प्रगट नहीं किया।श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि अब श्री राधारानी की ही कृपा जान उन्होंने ...
श्री वृन्दावन रस मोहि भावे हो
“ श्री वृन्दावन रस मोहि भावे हो । ” - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (118) मुझे केवल वृन्दावन रस ही भाता है।
जो कोऊ वृन्दावन रस चाखे
जो श्री वृंदावन रस चखना चाहता है एवं ब्रज वास करना चाहता है, उसे श्री राधारानी का आश्रय लेना चाहिए।
व्यास स्वामिनि श्याम भामिनि वृन्दावनचंद उजियारी
जिसकी उपस्थिति वृन्दावन चाँद श्री कृष्ण को भी रूपवान एवं उज्व्वल बनाती हैं, वह मेरी स्वामिनी राधा हैं।
हरि तो तबहीं मिली हैं
“हरि तो तबहीं मिली हैं, जबहिं श्री गुरु होहिं कृपाल । ” - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी श्री कृष्ण तब ही मिलते हैं जब गुरुदेव की कृपा होती है।
“ जो रज शिव सनकादिक दुर्लभ, सो रज सीष चढ़ाऊँ | किशोरी तोरे चरनन की रज पाऊँ | ”
जो रज शिव सनकादिक दुर्लभ, सो रज सीष चढ़ाऊँ । किशोरी तोरे चरनन की रज पाऊँ । - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (293) श्री हरिराम व्यास जी श्र...
अब न और कछू करने, रहनै है वृन्दावन
अरे मन, अब और कुछ नहीं करना केवल वृन्दावन धाम में निवास करके दिन रात युगल सरकार की भक्ति करनी है क्यूंकि इस झूठे तन की आयु दिन पर दिन कम हो रही है । ...
" रसिक अनन्य हमारी जाति "
"रसिक अनन्य हमारी जाति " - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (121) हमारी जाति यही है कि हम रसिक अनन्य हैं अर्थात हम श्री किशोरी जी के अनन्य भ...
प्रनय कोप बोली, कितव अपराध किये तें मेरे
प्रनय कोप बोली, कितव अपराध किये तें मेरे, परम उदार व्यास की स्वामिनी, छाँड़ि दिए करि चेरे । - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी श्री हर...
श्री राधा ललितादिक मेरे जीवनी प्राण आधार, सर्वेषु व्यास दास को वन है वृन्दावनहि अभार ||
श्री राधा और ललिता आदि उनकी साखियां मेरे जीवन का प्राण हैं। विशाखा अवतार श्री हरिराम व्यास का कहना है, श्री वृंदावन की महिमा अपरम्पार है जहां वह हर पल...
बने न कहत राधा कौ रूप
श्री राधा के दिव्य रूप का वर्णन करना बिल्कुल असंभव है। श्री हरिराम व्यास कहते हैं, श्री कृष्ण स्वामिनी श्री राधा रानी के साथ विहरण करने के कारण ही सु...
निरखि मुख सुख पावत मेरे नैंन
निरखि मुख सुख पावत मेरे नैंन , श्री व्यास स्वामिनी की अद्भुत छबि, कवि पै कहत बनैंन । - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (124) ...
जुगल किसोर किसोरी जोरी
श्री गौर वर्ण प्रिया जू (श्री राधा) एवं श्री श्याम वर्ण लाल जू (श्री कृष्ण) की जोड़ी सदैव मेरे हृदय में केलि-रूपी आनंद की वर्षा करती हुई विराजमान रहे।
जयति नव नागरी , कृष्ण-सुख-सागरी
(राग केदारो व कामोद) जयति नव नागरी , कृष्ण-सुख-सागरी , सकल गुन-आगरी , दीनन भोरी ! जयति हरि-भामिनि , कृष्ण-घन-दामिनी , मत्त गज-गामिनी , नव किशोरी !! जय...
वृंदावन रस मोहि भावे हो
श्री हरिराम व्यास जी (श्री विशाखा अवतार), वृन्दावन रस की महिमा का बखान करते हुए बताते हैं कि मुझे केवल वृन्दावन रस ही सुहाता है। मैं बार बार उन पर बलि...
मत्त गज-गामिनी, नव किशोरी
श्री राधा रानी की चाल मधमस्त हाथी के सामान है। मैं अपने आप को उस पर बलिदान देता हूं जो हमेशा नव किशोरी हैं।
गौर स्याम सोभा सागर कौ, नाँहिन वारापारु
"युगल सरकार की शोभा रुपी समुद्र, जो नित्य प्रतिदिन बढ़ता रहता है उसका आंकलन करना (मापना) असंभव है। श्री हरिराम व्यास जी कहते है कि किशोरी जू की छवि के...
मन मोहन मन मोहनी
सदैव आनंदमयी दिव्य युगल—श्री राधा का सुन्दर मुख और श्रीकृष्ण का नीला रंग—वृन्दावन के रसिक संतों के मन को मोह लेता है। यही आकर्षण ही रसिक संतों का खजा...
मोहिं स्याम कौ डर नहीं, श्यामा ! छूटत न आसा तेरी
हे श्री राधा आपके कमल चरणों की सेवा करना मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। मैं न तो श्री कृष्ण, सर्वोच्च भगवान और न ही किसी और से डरता हूं, मेरी समस्...
तब मेरे नैंन सिरात किसोरी जब तेरे नैंन निहारौं
तब मेरे नैंन सिरात किसोरी जब तेरे नैंन निहारौं - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी हे किशोरी राधा, मेरे नयन रस में केवल तभी विसर्जित हो...
हम कब होहिंगे ब्रजवासी
विशाखा अवतार श्री हरिराम व्यास जी के शब्दों में ऐसा कब होगा की हम सच्चे ब्रजवासी बन जाएंगे, क्यूंकि हमारे ठाकुर श्री कृष्ण हैं एवं श्री राधारानी सी हम...
यहै अनन्य धर्म पटपाटी यहै
" यहै अनन्य धर्म पटपाटी यहै, वृन्दावन तजि अनत न जाइए । " - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी यह रसिक अनन्य धर्म है कि वृन्दावन को त्याग...
‘व्यास’ आस छाँड़हु सब ही की
‘व्यास’ आस छाँड़हु सब ही की, कृपा करी राधा-नंदनदन । - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी श्री हरिराम व्यास (श्री विशाखा अवतार) कहते हैं, ...
मन तू वृन्दावन के मारग लागि
अरे मन तू वृन्दावन रसिकों के बताये हुए मार्ग में ही चल। न तो तेरा कोई है, न तू किसी का है, इसलिए मायिक अज्ञान और मोह को त्याग कर रसिकों की राजधानी वृ...
छबीली वृन्दावन की धरनी
छबीली वृन्दावन की धरनी, व्यास स्वामिनी कौ बल वैभव कही न सकत कवि डरनी - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (8) वृंदावन की धरती...
जासौं लोग अधर्म कहत हैं सोई धर्म है मेरो
श्री हरिराम व्यास (विशाखा सखी) कहते हैं कि मुझे वैदिक अनुष्ठान (धर्म) से बिल्कुल भी कोई मतलब नहीं है और जिसे लोग अधर्म कहते हैं वही मेरा धर्म है। लोग...
तन अवही कौ कामै आयो
श्री हरिराम व्यास (श्री विशाखा सखी अवतार ) के शब्दों में, मेरा तन जो आज काम आया है धन्य है। धन्य है जो इसने साधु चरणों का संग किया जिसके परिणाम स्वरुप...
ऐसो कब करिहौ मन मेरौ
हे मन, ऐसा कब होगा जब तू रसिक संतों का दासत्व स्वीकार करेगा और श्री वृंदावन में रहेगा ?
श्री वृन्दावन की सोभा देखत विरले साधु सिरात
विभिन्न संतों में भी अत्यंत दुर्लभ है, जो वृंदावन धाम की सच्ची महिमा को पहचान सकते हैं। यह वृन्दावन रस जिसने चख लिया उसे और कोई रस सुहा ही नहीं सकता !
वृन्दावन की लता द्रुम
वृन्दावन धाम की लताओं, वृक्ष, फूल और वन जहाँ श्री राधा रानी विहार करती हैं, ऐसी छवि एवं लताओं को देखकर मैं बार-बार बलिहार जाता हूँ।
वृन्दावन कबहि बसाईहौ
हे राधे, मैं वृंदावन में कब रहूंगा ? कब मैं युगल नाम 'राधा कृष्ण' का जप निरंतर करूँगा ? कब मैं नीले रंग के वस्त्रों में श्री राधा और पीले वस्त्र में श...
प्यारी श्री वृन्दावन की रैनु
वृंदावन की रज बहुत प्यारी है, श्री कृष्ण इसी वृंदावन की रज को नित्य ही निहारते रहते हैं और प्रसन्न होकर वह बांसुरी बजाते हैं। यह वह रज है जिसमें श्री...
हरि मिली है वृन्दावन में
श्री हरिराम व्यास कहते है कि वृंदावन में श्री हरि मिलते हैं। श्री वृन्दावन में युगल सरकार (श्री राधा और श्री कृष्ण) एक दूसरे को आलिंगन किये हुए निकुं...
“ लोभिनि वृन्दावन न सुहात, सहज माधुरी कौ रस, कैसे नीरस हृदय समात || ”
लोभ से युक्त व्यक्ति को वृन्दावन नहीं सुहाता। यहाँ सहज रूप से ही वृन्दावन रस बरसता है, यह नीरस हृदय में कैसे समायेगा ?
“ मोसो पतित न अनत समाई, याहि तें मैं वृन्दावन की सरन गह्यो है आई | ”
मोसो पतित न अनत समाई, याहि तें मैं वृन्दावन की सरन गह्यो है आई।” - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार), व्यास वाणी, पूर्वार्ध (17) मेरे समान कोई पतित नह...
करि मन वृन्दावन सों हेत
“ करि मन वृन्दावन सों हेत, निसि दिन छिन छाया जिनि छाड़हिं, रसिकन कौ रस खेत । " - श्री हरिराम व्यास (व्यास वाणी), पूर्वार्ध (91) अरे मन तू वृन्दावन स...
मन रति वृन्दावन से कीजै
अरे मन वृन्दावन से नेह बढ़ा, यहाँ श्यामा श्याम के दिव्य रस की वर्षा निरंतर हो रही है जो जितना चाहे उतना रस पान कर सकता है।
लागी रट, राधा श्री राधा नाम
हे मन! निरंतर हर श्वास के साथ श्री राधा नाम की रट लगाए रह। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि ‘राधा’ ही उनका जीवन है और ब्रज में स्थित बरसाना धाम ही उनक...
व्यास स्वपच बहु तरिगए, एक नाम लवलीन
व्यासजी कहते हैं कि जो नाम-सुमिरन में लवलीन हुए, वे चांडाल (स्वपच) भी इस संसार-सागर से पार उतर गए। किंतु जो लोग अभिमान की नाव पर सवार हुए, वे बड़े-बड़...
अब न और कछु करने
अरे मन, कुछ भी मत करो और वृंदावन में जाओ और श्री राधा कृष्ण की भक्ति करो, क्योंकि झूठा तन दिन-दर-दिन नष्ट हो रहा है।
खरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सार
सांसारिक लोग किसी पारखी की भाँति केवल लाभप्रद वस्तु का ही चयन करते हैं अर्थात् अपने स्वार्थ सिद्धि के अनुसार ही सम्बन्ध जोड़ते हैं। किन्तु नन्दलाल श्री...
सुखकारी सबके सदा
नित्य-नवीन प्रेम से परिपूर्ण श्रीलाड़िलीलाल (श्रीराधा-कृष्ण) समस्त सखी-सहचरियों के प्राणों के आधार और जीवन-धन हैं। वे परम सुख प्रदान करने वाले हैं और ...
मनमोहन बसकारिनी नखसिख रूप रसाल
उन स्वामिनी जी, रसकिनी श्रीराधा के गुणों का नित्य गान कीजिए, जो श्री कृष्ण को वश करने वाली हैं और जिन का नख से शिख पर्यन्त रूप रस से भरा हुआ है।
वृंदावन सांचो धन भैया
श्री वृन्दावन धाम ही सच्चा धन है । श्री वृन्दावन धाम की रज को पाने के लिए महालक्ष्मी भी तरसती हैं जहाँ श्री राधारानी के चरण अंकित हैं ।
अलबेले आँगन खरे
अलबेले रसिक दम्पति श्री राधा-कृष्ण परस्पर गलबहियाँ दिए हुए निकुंज महल के आँगन में खड़े हैं और सहचरी दर्पण दिखला रही है।
राधिका रमन जय
राधिका रमन जय, जाके चरन कमल सेवत नित, रसिक अनन्य भये सब निर्भय। - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (60) जिनके कमल के समान य...
कहत हौं बने न ब्रज की रीति
ब्रज की इतनी अधिक महिमा है कि ब्रज की रीति कहते ही नहीं बनती। समस्त वास्तविक गोपाल उपासक वृन्दावन धाम में तन और मन से प्रीति रखते हैं अर्थात् शरणागत ह...
आदि अंत अरु मध्य में
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि आदि, अंत और मध्य—अर्थात सदा-सर्वदा—रसिकों की यही एक रीति और अनन्य निष्ठा रही है कि वे समस्त संतों को अपने गुरुदेव के ...
जीवन मरत श्री वृन्दावन शरनै
हे मेरे प्रियतम श्यामा श्याम ध्यानपूर्वक आप मेरी विनती सुनिए: "मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि जीवन मरण मैं केवल श्री वृन्दावन धाम की शरण में ही रहूँ।"
रसिक कहे सोइ भली
रसिक संतों की आज्ञा में ही हमारा परम कल्याण समाहित है, अतः उसे कदापि अन्यथा नहीं लेना चाहिए और न ही बुरा मानना चाहिए। श्री हरिराम व्यास जी के अनुसार, ...
व्यास भलौ अवसर मिलौ
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं— “श्री ठाकुर जी ने यह अमूल्य मनुष्य-जीवन दिया है; इसे व्यर्थ नष्ट न करो। श्री सद्गुरु की शरण में इस जीवन को समर्पित कर द...
वृंदावन को वास करि
अरे मन! जगत की आस को त्याग कर वृन्दावन में वास कर; रसिक संतों के संग से नव-जन्म का प्रकाश प्रकट होता है।
प्यारी तेरे वदन-कमल-रस अटक्यौ
हे प्यारी [राधे], लाल [कृष्ण] अलि [भँवरा] तुम्हारे बदन रूपी कमल रस पर अटक गया है। उनका तन आपके तन से मिला है, और मन आपके मन से मिला हुआ है, अब ऐसा उलझ...
अब मैं वृंदावन रस पायौ
श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि "अब जाकर मैंने वृन्दावन के विलक्षण रस को प्राप्त किया है। श्री राधारानी की जैसे ही मैंने चरण शरण ग्रहण करी उसी क्षण श्री...
व्यास भजन करिवौ करौ
जो रसोपासना-भक्ति में निरंतर वृद्धि की इच्छा रखता है, उसे श्री राधारानी के भक्तों से प्रेम बढ़ाना चाहिए और श्री वृन्दावन धाम रूपी रस-क्षेत्र में दृढ़ ...
महाप्रलै अबही भई
हे मन! यदि अब तक भक्ति-रस की सिद्धावस्था प्राप्त नहीं हुई, तो तेरे लिए महाप्रलय वर्तमान क्षण में ही उपस्थित है। अतः बिना विलंब किए श्री वृन्दावन धाम म...
वैर करै हरिभक्तसौं
जो संसार से मित्रता करे और भक्तों से वैर रखे, फिर भी अपने को भक्त कहलाए—उसका यमराज के द्वार पर आवागमन कभी समाप्त नहीं होगा।
जो तुम पुरवहौ मन काम
(पद) जो तुम पुरवहौ मन काम। तो मैं माँगत यही निसि दिन छिन न बिसरों नाम॥ रहौं टहलनी महल में व्है निरखि छबि अभिराम। श्रीहरिप्रिया हित बात सुनी सुनी धरौं ...
श्री वृन्दावन में मंजुल मरिबौ
श्री वृन्दावन धाम में मृत्यु भी मनोहर है। समस्त ब्रजवासी जीवन मुक्त हैं एवं श्री राधा रानी के कृपा पात्र हैं, उनकी पद रज भी जीव का कल्याण करती है, इसल...
(श्री)वृंदावन के रुख हमारे
श्री हरिराम व्यास जी कहते है," श्री वृंदावन धाम के वृक्ष हमारी माता, पिता, पुत्र और भाई हैं। आध्यात्मिक गुरु, भगवान और विभिन्न रसिक संतों की संगति से ...
मेरौ हरि नागर सौं मन
मेरा मन नटवर नागर श्री कृष्ण चंद्र से मान चुका है [अर्थात् अब मैंने उनको अपना सब कुछ बना लिया है]। मैंने अगम [वेदों] और निगम [शास्त्रों] में वर्णित अ...
मेरे मन आधार प्रभु
मेरे मन के आधार और मेरे सर्वस्व श्री वृन्दावन के युगल-चन्द्र श्री राधा कृष्ण हैं। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि “मैं उनका हूँ और वे मेरे हैं”—ऐसा ...
व्यास बसेरौ कुंजमें
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं— “मेरा बसेरा वृन्दावन की कुंजों में, बंशीवट की छाँव में है। मेरा आसरा हरि-भक्त हैं और राधावर की बाँह है।”
धनी धनी वृंदावन की धरनि
“अधिक कोटि बैकुंठ लोक ते, सुक-नारद मुनि बरनि।” यहां की भूमि वैकुंठ धाम से भी अनंत कोटि श्रेष्ठ है, ऐसा शुकदेव नारद मुनि इत्यादि ने वर्णन किया है। “रा...
एक स्वरूप सदा द्वै नाम
श्री युगल किशोर स्वरूप से एक हैं, लेकिन दो नामों को धारण करते हैं। श्री राधारानी स्वयं श्रीकृष्ण को आनंद प्रदान करने वाली हैं, जो कि स्वयं आनंद हैं। औ...
राजत निकुंज धाम ठकुरानी
वृंदावन के निकुंज में श्री राधारानी कुसुम की सेज पर बिराज रही हैं और श्री ललिता जी सुन्दर राग गा रही हैं एवं उनके चरण दबा रही हैं। यह सब देखते हुए श्र...
मोरी अँखियाँ लगी रहौ नित
केवल एक ही अभिलाषा है कि मेरी अँखियाँ नित्य युगल सरकार श्री राधा कृष्ण को निहारती रहें एवं प्रिया जी के महल की टहल करती हुई अपना धन्य भाग्य मनावें।
जीवत मरत वृन्दावन शरनें
जीवत मरत वृन्दावन शरनें, यह परम पुरुषार्थ मेरौ, और कछु नहिं करने । - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (289) मेरा केवल एक ही ...
श्री वृंदावन प्रगट सदा सुख चैन
इस मृत्युलोक के प्रकट वृन्दावन में नित्य सुख, चैन (रस) बरसता है । सुकुमारी नागरी श्री राधारानी अत्यंत उदार हैं जो नित्य ही सुख देती हैं (मानो रोम रो...
यह वृन्दावन मेरी सम्पति, इहलोक परलोक वृन्दावन मेरौ पुरुषार्थ परमार्थ गथु गति।
यह वृन्दावन मेरी सम्पति, इहलोक परलोक वृन्दावन मेरौ पुरुषार्थ परमार्थ गथु गति। - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (27) केवल श...
जयति नवनित्य नागरि निपुन राधिके
॥ पद॥01॥ जयति नवनित्य नागरि निपुन राधिके रसिक-सिरमौरि मनमोहनी जू। चारु छबि चंचला चित्त आकर्षनी वर्षनी प्रेम-घन मोहनी जू॥ सहज सिद्धा प्रसिद्धा प्रक...
व्यास विवेकी भगत सौं
श्री हरिराम व्यास जी भक्ति की रीति को समझाते हुए कहते हैं कि यदि भक्ति में आगे बढ़ना है, तो रसिक-संत का दृढ़तापूर्वक संग करें और श्री राधा-कृष्ण में अ...
जै जै वृन्दावन रजधानी
(राग आसावरी) जै जै वृन्दावन रजधानी, जहाँ विराजत मोहन राजा श्री राधा सी महारानी। सदा सनातन एक रस जोरी महिमा निगम न जानी। श्री हरिप्रिया हितु निज दासी र...
मोहि कृपा करि दीजिये
श्री लाल जू श्री राधारानी से कहते हैं— “मेरी एकमात्र अभिलाषा आपके अंग-संग की सेवा करने की ही है; अतः आप मुझे यह सेवा प्रदान करें। हे बिहारिनि लाड़िली!...
जीवत मरत वृन्दावन शरनैं
हे मेरे प्रियतम श्यामा श्याम ध्यानपूर्वक आप मेरे हृदय की विनती सुनिए: "मुझपर ऐसी कृपा कीजिये कि जीवन मरण मैं केवल श्री वृन्दावन धाम की शरण में ही रहूँ...
हित हरिवंश कृपा बिना
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि उनके लिए श्री हित हरिवंश महाप्रभु की कृपा के अतिरिक्त कोई अन्य ठौर नहीं है; उन्हीं श्री हित हरिवंश महाप्रभु की कृपा स...
वेद पुराण हूँ पढै
यदि कोई अनन्त बार वेदों का अध्ययन कर ले अथवा अनेक सुकर्म कर ले, तो भी अनन्य भक्ति के बिना उसकी एक भी गति नहीं होती; अर्थात सब कुछ निरर्थक है।
नीरजनैंनी नागरी कलबैंनी सुकुँवारि
(पद) जय जय प्रिया प्राण-पिय प्यारी। जय जय रूप उजारी राधे, अति सुन्दर सुकुंवारी॥ [1] जय जय नीरजनैंनी नागरि, कलबैंनी कमला री। जय जय श्रीहरिप्रिया हिये, ...
राधाकृष्ण स्वरूपां वै कृष्ण राधास्वरूपिणम्
श्री राधा कृष्ण स्वरूपा हैं और कृष्ण श्रीराधा रूप हैं, मैं निकुञ्जस्थ गुरुरूपा श्रीराधा की शरण में जाता हूँ।
व्यास रसिकजन ते बड़े
श्री हरिराम व्यास कहते हैं, भक्तों में सर्वोपरि रसिक भक्त हैं जो श्री ब्रज धाम कभी नहीं छोड़ते। यहां तक कि भोजन के लिए भी मांग कर स्वपच का झूठन खाना उच...
जो करुनामय कुंवर अहु
(पद) सहजहि रहौ एह सुभाव। प्रिया पद नख चन्द्रकी छबि टरि न उर ते जाव॥ [1] जो पै करुना करति हो तो और चित्त न चाव। श्रीहरिप्रिया की उरझनी सों रहौ उर उर...
जुगलचरन हिय ना धरै, मिलै न संतनि दौरि
जो हृदय में श्री युगल (श्री राधा-कृष्ण) के चरणों को धारण नहीं करता और संतों के पास दौड़कर (श्रद्धापूर्वक) नहीं जाता, श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि ऐ...
मोहि कृपा करि दीजिये
(दोहा) श्रीलालजू श्रीराधारानी से कहते हैं, मेरी एकमात्र आपके अंग-संग सेवा करने की ही अभिलाषा है, अतः आप कृपा करके यह सेवा मुझे प्रदान करें। सेवा-सम्ब...
हौं बलि बलि आनन्दनिधे अब
(पद) हौं बलि बलि आनन्दनिधे अब। तुव पद प्रापति की रहै लालस बाल कहौ यह कौंन विधे अब॥ जानि परी जिय में न कछू यह बानि सदा सुखदानि रिधे अब। श्रीहरिप्रिया अ...
व्यास बड़ाई छाँड़िकैं
अपनी बढ़ाई और मान का त्याग कर श्री हरि के चरणों में चित्त लगाना चाहिए। करोड़ों ब्राह्मण भी एक भक्त—श्री रैदास जी—पर न्योछावर किए जा सकते हैं।
एक मैं कृपा सुदृष्टि चहौं
(पद) एक मैं कृपा सुदृष्टि चहौं। सोंह तिहारी मोही अहो जीय जो मैं राखि कहौं। जब तुम चितवत मो तन के तन तब सब सुखहिं लहौं। श्रीहरिप्रिया नाउँ तेरे बिन और ...
मेरे तू जिय में बसत
श्री कृष्ण श्री राधा रानी से कहते हैं, हे नित्य नवेली, मेरी प्रिय प्राण प्यारी जू, मेरे हृदय में तो केवल आप बसी हो। आपके दर्शन एवं स्पर्श से मुझे राग...
वृन्दावन के राजा दोऊ स्याम राधिका रानी
श्री वृंदावन धाम में दो राजा हैं। एक हैं श्रीकृष्ण और दूसरी श्री राधिका रानी। समस्त इच्छाएं, धर्म (धर्म), धन (अर्थ), सुख (काम) और मुक्ति (मोक्ष) एक मज...
नैंन न मूँदे ध्यानकौं
न तो मैंने आँखें बंद करके ध्यान किया और न ही कोई उपवास या तपस्या की। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं—केवल नृत्य और कीर्तन करके, रसिकों के संग में वृन्दा...
राधिका मोहन की प्यारी
श्री राधा श्रीकृष्ण को प्राणों से भी प्यारी हैं। (1) नख से शिख तक, वे सुंदरता और गुणों की सीमा हैं, जो महाराज वृषभानु की लाड़िली हैं। (2) निकुंज महल मे...
नैनन कौ लाठौ लीजिये
(पद) नैनन कौ लाठौ लीजिये। गोरी श्याम सलौनी जोरी सुरस माधुरी पीजिये॥ [1] छिन-छिन प्रति प्रमुदित चित चावहि निज भावहि में भीजिये। श्रीहरिप्रिया निरखि तन ...
करै वरत एकादशी
श्री हरिराम व्यास जी ‘महाप्रसाद’ के महत्व का वर्णन करते हुए कहते हैं— ‘जो एकादशी के दिन महाप्रसाद—अर्थात् श्री राधा–कृष्ण के प्रसाद—में चिदानन्द का भा...
मुहरैं मेवा अनत के
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं— ‘अन्य स्थानों का दिया हुआ मिथ्या भोग-विलास त्याज्य है; परन्तु वृन्दावन के स्वपच की झूठन भी माँगकर खाना कल्याणकारी है।’
वृन्दाबन साँचौ धन भैया
"हे मेरे भाई, श्री वृंदावन धाम ही एकमात्र सच्चा धन है। इसलिए सोने के उन ढेरों को छोड़ दो और श्रीकृष्ण का भजन करो। [1] श्री वृन्दावन में लक्ष्मीजी श्री...
वृन्दावन कलानाथौ हृदयानन्द वर्द्धनौ
मैं नित्य निकुञ्ज लीला परायण उन श्रीराधा कृष्ण को भजता हूँ जो वृन्दावन के चन्द्रमा स्वरूप हैं, जिनके हृदयों का स्वभाविक आनन्द उल्लास इस प्रकार से बढ़त...
देखौ श्री वृन्दाविपिन प्रभाइ
ओह सखी, श्री वृंदावन धाम की भव्यता और प्रभाव को देखो, यहां तक कि अन्य सभी तीर्थ भी यहीं आ गए हैं। [1] श्री जमुना जी के तट पर लताओं के कुंजों और वृंदा...
महिमा स्याम की हम जानी
मैंने श्री कृष्ण की महिमा को जान लिया है। यह केवल उनकी अहैतुकी कृपा का परिणाम है कि मैं, एक अभिमानी व्यक्ति, वृंदावन में निवास कर रहा हूँ। हर प्रकार स...
प्रिया मोहिं दीजै हो पद पर्म
(दोहा) श्रीलालजी अत्यंत प्रसन्न होकर श्रीस्वामिनीजू के चरणारविन्दों को थामकर कहते हैं, "हे सुख की निधि श्रीस्वामिनीजू! आपके अतिरिक्त इस मर्म को कौन सम...
आजु बधाई है बरसानैं
बरसाना आज बधाइयों से गूंज रहा है — वृषभानु जी के घर कुँवरि किशोरी श्री राधा का अवतरण हुआ है, और समस्त लोकों में मंगलध्वनि गूंज रही है। [1] नंद जी, वृ...
कृपा कटाक्षि चितै 'श्रीहरिप्रिया'
श्रीहरि एवं प्रियाजू के श्रीचरणों की रेणु की उपलब्धि उनकी कृपा कटाक्ष चितवनि से ही सम्भव हो सकती है।
मेरे भाँवते स्यामा स्याम
मुझे तो श्री श्यामा श्याम की युगल जोरी ही आकर्षित करती है। यह दिव्य जोरी नित्य रास विलास परायण अनेक प्रकार की विनोद लीलाएं करते हुए वृंदावन में विचरण ...
जौ पै वृन्दावन धन भावै
जिस किसी का भी मन श्री वृंदावन धाम के उज्जवल रस में लग गया है उसे सृष्टि के समस्त विषय व्यर्थ प्रतीत होने लगते हैं क्यूँकि सृष्टि का कोई भी रस अथवा पर...
काहू के बल भजन कौ
किसी को भजन का बल है, किसी को सदाचार का; परंतु श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि उन्हें तो केवल श्री राधारानी का ही भरोसा और बल है, जिसके कारण वे दोनों...
जीवनि धन राधा वल्लभ लाल
(पद) जीवनि धन राधा वल्लभ लाल। कृष्ण वल्लभा रसिकिनि राधा, वारिज बदनी बाल॥ जुगल किसोर किसोरी जोरी गोरी स्याम तमाल। बसहु निरन्तर हियें श्रीहरिप्रिया आनन...
व्यास एक ही बात गही, राधावल्लभ धाम
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि मेरा तो केवल श्री राधावल्लभ के निज धाम से ही संबंध है। अन्य अनेक उत्तम भक्तों या मार्गों से मेरा अब कोई प्रयोजन नहीं ...
रँगीली लाड़िली रँगभीने मोहनलाल
(दोहा) तदन्तर, परस्पर अनुराग में सराबोर दोनों—अर्थात् मूर्तिमान प्रेम स्वरूपा श्रीप्रियाजू और साक्षात् श्रृंगार-रस स्वरूप श्रीलालजू—एक-दूसरे के गले मे...
सुनीहूँ न देखी ऐसी जोरि जुगल किसोर किसोरि
(पद) सुनीहूँ न देखी ऐसी जोरि जुगल किसोर किसोरि। अंग अंग सोभा पर सजनी वारौं काम करोरि॥ [1] नहिं उपमा पटतर दीबे कों देखि थकी मति मोरि। श्रीहरिप्रिया अद...
दुविधा तब जैहै या मन की
मेरे मन की दुविधा तभी जाएगी जब मैं निर्भय होकर के इस वृंदावन रज का सेवन करूंगा।
अंग अंग रस वृष्टि करि
(पद) सनमुख रुख लियें ललन चलत नव बाल कें। [1] एक आज्ञाहिं अनुकूल आनन्द उर, रहत ज्यों चहत त्यों प्रान प्रतिपाल कें॥ [2] दृष्टि-रस-वृष्टि करि पुष्ट अंग अ...
रसिक अनन्य कहाइकैं
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि जो स्वयं को 'रसिक-अनन्य' (श्री राधा-कृष्ण के अनन्य भक्त) कहलाते हैं, परंतु फिर भी सांसारिक लाभ के लिए नवग्रहों और गणे...
हौं बलिहारी भक्तकी
मैं उन भक्तों पर बलिहार जाता हूँ, जिनके महान उपकार हैं; वे हृदय में हरि-रूपी धन को स्थापित कर देते हैं और संसार से वैराग्य उत्पन्न करा देते हैं।
कल न पर छिन बिन लखे, तो मुख चंद्र प्रभाव
श्रीलाल जू श्री प्रिया जू से विनय पूर्वक कहते हैं :- (दोहा) हे प्रियाजू! मेरा स्वभाव अब कुछ ऐसा सहज हो गया है कि आपके मुख-चन्द्र की दिव्य आभा का एक ...
प्रिया बदन सुखमा सदन
श्री प्रिया जू का मुख कमल सुख का वह सदन है जो प्रेम से परिपूर्ण है, जिसमें प्रियतम के प्राण बसे हुए हैं। वही उनके प्राणों का आधार है।
मनहु द्रु मन तें सुमन झरि
(पद) देखि री दुहुनि की सहज बतरावनी। [1] मनहु दिबि द्रु मन तें सुमन झरि-झरि परत, हरत मन परस्पर बरन उचरावनी॥ [2] लागत कैसी रुचिर रदन छबि बदन में, मदन मन...
कोटि ब्रह्म ऐश्वर्यता
करोड़ों ब्रह्मांडों का ऐश्वर्य और समस्त वैभव तो श्री राधा जू की सुंदरता के ऊपर न्योछावर किया जा सकता है। श्री हरिराम व्यास जी की स्वामिनी जू के इस अपा...
जय राधे जय राधे राधे
“श्यामा गोरी नित्य किशोरी, प्रीतम जोरि श्री राधे। रसिक रसिलो छैल छबीलो, गुण गर्विलो श्री कृष्णा”॥2॥ श्री राधा: नित्य किशोरी हैं और अंग का वर्ण सुनहरा ...
एकहि तन मन एक ही
(दोहा) रसिक-दम्पति की यह अद्भुत युगल-छवि स्वाभाविक सुख से रञ्जित है और किसी अनिर्वचनीय साँचे में इस प्रकार उत्तम रीति से ढली हुई है जिससे इन दोनों के...
मोहिं स्याम कौ डर नहीं, श्यामा ! छूटत न आसा तेरी
मोहिं स्याम कौ डर नहीं, श्यामा ! छूटत न आसा तेरी | तुव पद पंकज पारस परसत, व्यास कहा अब खेरी || - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी , पूर्व...
तब मेरे नैंन सिरात किसोरी जब तेरे नैंन निहारौं
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी हे किशोरी राधा, मेरे नयन रस में केवल तभी विसर्जित होती हैं जब मैं आपके रसीले नयनों को निहारता हूं।
जीवत मरत वृन्दावन शरनें
जीवत मरत वृन्दावन शरनें, यह परम पुरुषार्थ मेरौ, और कछु नहिं करने | - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (289) मेरा केवल एक ही पर...
वृंदावन रस मोहि भावे हो
वृंदावन रस मोहि भावे हो | ताकि हौं बलि जाऊं सखी री, जो कोई मोहि सुनावे हो || - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (118) श्री हरि...
वृंदावन सांचो धन भैया
वृंदावन सांचो धन भैया, जहाँ श्री राधा चरण रैंनुंकी, कमला लेती बलैया || - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (192) श्री वृन्दावन ...
सदा वृन्दावन सब की आदि
सदा वृन्दावन सब की आदि, रसनिधि, सुखनिधि, जहाँ बिराजत नित्य, अनंत, अनादि || - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (4) वृंदावन धाम ...
पिय को नाचन सिखावत प्यारी
श्री हरिराम व्यास जी द्वारा लिखित लीला में श्री राधा रानी, श्री कृष्ण को नाचना सिखा रही हैं।वृन्दावन में शरद पूर्णिमा की रात्रि में रास लीला हुई थी और...
कृपा कटाक्षि चितै 'श्रीहरिप्रिया'
श्रीहरि एवं प्रियाजू के श्रीचरणों की रेणु की उपलब्धि उनकी कृपा कटाक्ष चितवनि से ही सम्भव हो सकती है।
देखो श्री वृन्दाविपिन प्रभाइ
देखो श्री वृन्दाविपिन प्रभाइ | सब तीरथ धामनि फिर आवत देखत उपजत भाई || अचरज कहा व्यास सुख वर्णत, थके रसिक ताहि गाई | - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार)...
प्रिया मोहिं दीजै हो पद पर्म
(दोहा) श्री लालजी अत्यंत प्रसन्न होकर श्री स्वामिनी जू के चरणारविंदों को पकड़कर कहते हैं "हे सुख की निधान श्री स्वामिनी जू ! आपके बिना इस मर्म को कौन ...
रहि मन वृंदावन की शरण, यह रस पसु निरस तू छाँडत
रहि मन वृंदावन की शरण, यह रस पसु निरस तू छाँडत, भाजत पेटहि भरन। व्यास अनन्य भक्तिकी जीवनि, बन में मंगल मरन। - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास...
जयति नव नागरी , कृष्ण
(राग केदारो व कामोद) जयति नव नागरी , कृष्ण-सुख-सागरी , सकल गुन-आगरी , दीनन भोरी ! जयति हरि-भामिनि , कृष्ण-घन-दामिनी , मत्त गज-गामिनी , नव किशोरी !! जय...
निरखि मुख सुख पावत मेरे नैंन
निरखि मुख सुख पावत मेरे नैंन , श्री व्यास स्वामिनी की अद्भुत छबि, कवि पै कहत बनैंन | - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (124) ...
यह वृन्दावन मेरी सम्पति, इहलोक परलोक वृन्दावन मेरौ पुरुषार्थ परमार्थ गथु गति।
यह वृन्दावन मेरी सम्पति, इहलोक परलोक वृन्दावन मेरौ पुरुषार्थ परमार्थ गथु गति। - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (27) केवल श्र...
बने दोउ रसिक बिहारी बिहारनी
(दोहा) श्रीहरि एवं प्रिया, मानों सुन्दरता रूपी साँचे में अच्छी प्रकार से ढले हुए सिंहासन पर सुशोभित हैं । ये दोनों रसिक बिहारी बिहारनी रूप तथा समस्त ग...
यहै अनन्य धर्म पटपाटी यहै
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी यह रसिक अनन्य धर्म है कि वृन्दावन को त्याग कर अन्य कहीं मत जाइए।
कहि न परै सोभा या सुख की
हे सखी ! मेरी यह प्रार्थना है कि ये लाल ललना उपरोक्त इसी अद्रभुत रस कि वर्षा करते रहें। और हम सब इनके मुखारबिंद की रूप माधुरी को देख देख कर जिया करें।...
वृन्दावन के रूख हमारो मात पिता गुरु बंधु
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी वृंदावन के वृक्ष हमारे माता, पिता, आध्यात्मिक गुरु और भाई हैं।
जीवन मरत श्री वृन्दावन शरनै
जीवन मरत श्री वृन्दावन शरनै, सुनहुँ सुचित ह्वै (श्री) राधामोहन, यह विनती मन धरनै॥ - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (289) हे ...
भर्म तजौ हरिप्रिया भजौ
(पद) यही है यही है भूलि भरमो न कोउ , भूलि भरमें तें भव भटक मरिहौं। लाडिली लाल के नित्य सुखसार बिन कौन बिधि वारतें पार परिहौं॥ एक अनन्य की टेक उर में ध...
श्री वृंदावन की माधुरी
श्रीवृन्दावन की दिव्य माधुरी का नित्य पान करना तो रसिकों के घर की ही बात है। श्री राधा-कृष्ण के युगल चरणों का दर्शन करके श्री हरिराम व्यास बलिहार जा र...
व्यास विवेकी भगत सौं दृढ़ करि कीजै प्रीति
व्यास विवेकी भगत सौं दृढ़ करि कीजै प्रीति। अविवेकी कौ संग तजि, इहै भक्ति की रीति। - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, साखी (67) श्री हरिरा...
मोहि कृपा करि दीजिये अंग संग की सेवा।
श्री लाल जू श्री राधारानी से कहते हैं, मेरी एक मात्र आपके अंग संग सेवा करने की ही अभिलाषा है, अत: आप मुझे यह सेवा प्रदान करें। हे बिहारिनि लाडिली मेरे...
जंत्र, मंत्र और वेद तंत्र में
“ जंत्र, मंत्र और वेद तंत्र में, सभी तार को तार, परम धन राधा नाम आधार || ” - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (38) न कोई ऐसा य...
जीवत मरत वृन्दावन शरनैं
(राग सारंग) जीवत मरत वृन्दावन शरनैं ॥ सुनहुँ सुचित ह्वै (श्री) राधामोहन, यह विनती मन धरनै। यही परम पुरुषार्थ मेरौ, और कछु नहीं करनैं॥ स्याम भरोसे, तेर...
जै जै वृन्दावन रजधानी
सभी रसिक संतों की राजधानी श्री वृन्दावन धाम की जय हो, जय हो, जहां श्री राधा सर्वोच्च रानी ('महारानी') और श्री कृष्ण राजा (’महाराज') हैं। यह दिव्य युगल...
Manmohan Baskarini Nakhasikh Rup Rasal
Manmohan Baskarini, Nakhasikh Roop Rasaal.So Swamini Nit Gaaiye, Rasikani Radha Baal.- Shri Harivyas Devacharya, Mahavani, Utsah Sukh (23)Sing ceasele...
वृंदावन तजि जे सुख चाहत
विशाखा अवतार श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि जो जीव वृन्दावन को त्यागकर सुख (रस) पाना चाहते हैं, वे राक्षस और प्रेत के समान हैं—मनुष्य भी नहीं। यह बात स...
करि मन वृंदावनसौं हेत
अरे मन तू वृन्दावन से स्नेह और नेह बढ़ा, जो रसिक संतों का खेत है जहाँ नित्य ही वृन्दावन रस प्रकट होता है। [1 & 2] यहाँ श्री राधामोहन [दिव्य दंपति] विभि...
श्रीराधावल्लभ व्यास के
श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि उनके इष्टदेव, मित्र और गुरुदेव श्री राधावल्लभ लाल ही हैं। कुंज-महल के रस के रहस्य को उजागर करने के लिए, श्री हित हरिवंश ...
बिलसौ दोउ लाल मेरे हिय
॥दोहा॥ श्रीस्वामिनी जी का दिव्य मंगल विग्रह एक प्रकार की स्वर्ण कमलों की माला होकर श्रीलालजू के अंग-अंग में सुशोभित है। श्रीहरिप्रियाजू प्रार्थना करती...
राधावल्लभ मेरौ प्यारौ
श्री हरिराम व्यास कह रहे हैं "जो सर्वोपरि हैं, समस्त जनों के ठाकुर अथवा इष्ट हैं, सब को सुख दान करने वाले हैं, वे श्री राधावल्लभ मेरे प्राणधन हैं।" [1...
रसिकन के हित कारने
रसिक दम्पति की यह गौर-साँवरी जोड़ी रसिकों के हित के लिए अहर्निश नित्य विहार में लवलीन रहती है इसलिए इस जोड़ी जैसी उदारता और जोड़ियों में नहीं है।
श्री वृन्दावन में मंजुल मरिबौ
श्री वृन्दावन में मंजुल मरिबौ | जीवन मुक्त सबै ब्रज वासी, पद रज सौं हित करिबौ || - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (190) श्री...
तजि के रसिक अनन्यता
तजि के रसिक अनन्यता, विधि निषेध दे घेरि। व्यासदास के भाव ते, भक्ति गई दै टेरी॥ - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, साखी (100) श्री हरिराम...
मोरी अँखियाँ लगी रहौ नित
केवल एक ही अभिलाषा है कि मेरी अँखियाँ नित्य युगल सरकार श्री राधा कृष्ण को निहारती रहें एवं प्रिया जी के महल की टहल करती हुई अपना धन्य भाग्य मनावें।
कहत हौं बने न ब्रज की रीति
कहत हौं बने न ब्रज की रीति, सब गोपाल उपासक, तन मन वृन्दावन सोन प्रीती। - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (5) ब्रज की इतनी अधि...
गौर स्याम सोभा सागर कौ, नाँहिन वारापारु
गौर स्याम सोभा सागर कौ, नाँहिन वारापारु | व्यास स्वामिनी की छबि आगैं, सकल सरूप उगारु || - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी "युगल सरकार की...
बने न कहत राधा कौ रूप
"बने न कहत राधा कौ रूप, व्यास स्वामिनी सौं विहरत ही, मोहन लगत सरूप || " श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, उत्तरार्ध (77) श्री राधा के दिव...
श्री वृंदावन प्रगट सदा सुख चैन
अति उदार सुकुमारि नागरी रोम रोम सुख दैन। हाव भाव अँग-अंग विलोकत धन्य व्यास के नैन।। - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (13) इस...
मन मोहन मन मोहनी
सदैव आनंदमयी दिव्य युगल—श्री राधा का सुन्दर मुख और श्रीकृष्ण का नीला रंग—वृन्दावन के रसिक संतों के मन को मोह लेता है। यही आकर्षण ही रसिक संतों का खजान...
जुगल किसोर किसोरी जोरी
श्री गौर वर्ण प्रिया जू (श्री राधा) एवं श्री श्याम वर्ण लाल जू (श्री कृष्ण) की जोड़ी सदैव मेरे हृदय में केलि-रूपी आनंद की वर्षा करती हुई विराजमान रहे।
तेइ रसिक अनन्य जानिवे
तेइ रसिक अनन्य जानिवे, तिनकी जीवनि धन वृन्दावन, जीवत मरत बखानिवै || - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (178) जिसका जीवन धन एक ...
जाके मन बसै वृंदावन
(राग सारंग एवं रामकली) जाके मन बसै वृंदावन। सोई रसिक अनन्य धन्य, जाकैं हितराधामोहन॥ ताही नित्य विहार फुरै वन, लीलाकौ अनुकरन। विषय वासना नाँहिन जाकैं, ...
अलबेले आँगन खरे, अंस अंस भुज धारि
अलबेले रसिक दम्पति श्री राधा कृष्ण परस्पर गलबहियाँ दिए हुए निकुंज महल के आँगन में खड़े हैं और सहचरी दर्पण दिखला रही हैं।
हम कब होहिंगे ब्रजवासी
(राग सारंग) हम कब होहिंगे ब्रजवासी। ठाकुर नंदकिशोर हमारे, ठकुराइनि राधा सी।। कब मिलि हैं वे सखी सहेली, हरिवंशी हरिदासी। वंशीवट की शीतल छहियाँ, सुभग नद...
राधिका रमन जय
राधिका रमन जय, जाके चरन कमल सेवत नित, रसिक अनन्य भये सब निर्भय। - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (60) जिनके कमल के समान युगल...
श्री राधा ललितादिक मेरे जीवनी प्राण आधार, सर्वेषु व्यास दास को वन है वृन्दावनहि अभार ||
श्री राधा ललितादिक मेरे जीवनी प्राण आधार, सर्वेषु व्यास दास को वन है वृन्दावनहि अभार || - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी श्री राधा और ल...
महिमा स्याम की हम जानी
मैंने श्री कृष्ण की महिमा को जान लिया है। यह केवल उनकी अहैतुकी कृपा का परिणाम है कि मैं, एक अभिमानी व्यक्ति, वृंदावन में निवास कर रहा हूँ। हर प्रकार स...
रँगीली लाड़िली रँगभीने मोहनलाल
(दोहा) फिर परस्पर के अनुराग में भीगे हुए दोनों लाल अर्थात् मूतिमान प्रेम श्रीप्रियाजू और साक्षात् श्रृंगार रस स्वरूप श्रीलालजू परस्पर गल बहियाँ दिये ह...
‘व्यास’ आस छाँड़हु सब ही की
- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी श्री हरिराम व्यास (श्री विशाखा अवतार) कहते हैं, किसी व्यक्ति एवं संसारी पदार्थ की आस मत रखो और पूर्ण र...
जय राधे जय सब सुख साधा
नित्य किशोरी वाम, सुख धाम स्वरूप उन राधारानी की सदा जय हो जो अपनी प्रेम माधुरी से अपने प्यारे कमल नैन को अपने वश में करे रखती हैं। सब सुखो की सिद्धि स...
आदि अंत अरु मध्य में
आदि अंत अरु मध्य में, यह रसिकन की रीति। संत सबै गुरुदेव हैं, व्यासहि यह परतीति।। - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, साखी (24) समस्त वास्...
जयति नवनित्य नागरि निपुन राधिके
।। दोहा । । श्रीलाल जू के चित्त को आकर्षण करने वाली उन विधुत स्वरूपा श्रीस्वामिनी जू की जय हो, जो रसघन स्वरूप श्रीलाल जू को पिघला कर (द्रवीभूत) कर प्र...
राधिका-रवन जय
श्री हरिराम व्यास कह रहे हैं "अपने दासियों को सुख प्रदान करनेवाली वृन्दावन विहारिणी नवलकुँवरि श्री राधिका रमण की जय हो।" [1] जिनके चरण कमलों की नित्य ...
जय वृन्दावन धाम सब जनमन पूरन काम
उस पावन श्री वृन्दावन धाम की सदा जय हो, जो सब जनों की अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाला है। वहीं श्री श्यामा-श्याम सुंदर अपनी सुघर सहेलियों के साथ मधुर विह...
व्यासहिं ब्राह्मण मति गनौं हरि भक्तन को दास
मुझे ब्राह्मण मत गिनो, मैं हरि के सभी भक्तों का दास हूं। मुझे वृंदावन धाम के स्वपच (वृंदावन रज के सेवक) की माँग कर जूठन खाने का सौभाग्य प्राप्त है।
वृंदावन की शोभा देखे
श्री हरिराम व्यास कहते हैं "वृन्दावन की कुञ्ज एवं निकुंजों में अद्भुत सुख की वर्षा हो रही है, जिसके गान से मेरे ह्रदय में बड़ा भारी हर्ष हो रहा है, वृ...
व्यास सु रसिकन की रहनी
हे भाई! रसिकों की रहनी (रसिक कहलाना) अत्यंत कठिन है, क्योंकि संसार की समस्त कठिनताओं को सहते हुए भी उनका मन श्री राधा-कृष्ण के युगल-रस में नित्य ही डू...
कोटि कोटि एकादशी
अनन्त कोटि एकादशी तो महाप्रसाद के एक अंश के समान हैं। श्री हरिराम व्यास कहते हैं कि उन्हें इस बात पर पूर्ण विश्वास है, क्योंकि उनके गुरु श्री हित हरिव...
(Shri) Radhavallabhkau Hau Bhanvatau Cherau
(Shri) Radhavallabhkau Hau Bhanvatau Cherau.Radhavallabh Kahat Sunathi, Man Na Naim Jam Kerau. [1]Radhavallabh Vastu Bhooli Hoon, Kiyau Anat Nahin Phe...
Shri Radhavallabha Param Dhan
(Shri) Radhavallabha Param Dhan, Vyasa Hi Phabi Gayi Loot.Kharachat Hoon Nighatein Nahi, Bhare Bhandar Atoot. - Shri Hariram Vyas, Vyas Vani, Siddhant...
Kari Ken Aas Ju Aur Ki
(Doha)Kari Ken Aas Ju Aur Ki, Takata Na It Ut Hoy.Tuv Pad Parchhaahi Bina, Nahin Bhaavat Man Koy.(Pad)Shri Radhe! Toh Pad Pankaj Ki Parchhaahi Rihat S...
Aaju Badhai Hai Barsane
(Raag Jayatishri / Devgandhar)Aaju Badhai Hai Barsanain. Kunwari Kisori Janam Layo, Sab Lok Baje Sahdanain. [1]Kahat Nand Vrishbhanaray Saun, Aur Baat...
Chali Chalihi Vrindavan Vasant Aayo
(Raag Vasant)Chali Chalihi Vrindavan Vasant Aayo.Jhoolat Phoolani Ke Jhanvara, Marut Makarand Udayo. [1]Madhukar Kokil Keer Keki Mili, Kolahal Upjayo....
Hari Heera Guru Jauhari
Hari Heera Guru Jauhari, Vyasa Hi Diyo Bataai.Tan Man Anand Sukh Mile, Naam Let Dukh Jaai.- Shri Hariram Vyas, Vyas Vani, Siddhant Ki Saakhi (23)Shri ...
Nirjanani Nagari Kalbaini Sukumari
(Doha)Nirjanani Nagari, Kalbaini Sukumari.Shrihari Pyari Nit Hiye, Basau Sada Sukhkari.(Pad)Jai Jai Priya Pran-Piya Pyari.Jai Jai Roop Ujari Radhe, At...
Shri Radhavallabh Ki Nav-Keerati
(Raag Sarang)Shri Radhavallabh Ki Nav-Keerati Varnat Hu Na Nighaat.Bharatkhand Ki Su Kavimandali Varnat Hu Na Aghaat. [1]Bade Rasik Jaydev Vakhani Lee...
Pyari Ladili Padaravind Nain
(Doha)Bhramat Rahat Nisidin Chhina, Chhake Adhik Ras Neh.Pyari Tuv Pad Kanj Par, Mo Drig Madhukar Eah.(Pad)Pyari Ladilee Padaravind Nain Madhukar Mere...
Vyas Radhika Ravan Binu
Vyas Radhika-Ravan Binu, Kahun Na Paayau Sukh.Daarani-Daarani Main Phiryau, Paatani-Paatani Dukh.- Shri Hariram Vyas, Vyas Vani, Siddhant Ki Saakhi (3...
Man Rati Vrindavan Sau Keejai
Man Rati Vrindavan Sau Keejai.Khaayau Piyau Bharyau Bhoonjyau, Ab Jeevan Kau Phal Leejai. [1]Kaaj Akaash Jaani Sab Aapunau, Dau Sanvarau Deejai.Dekhi ...
Pal Bichhurein Na Kal Parein
Pal Bichhurein Na Kal Parein, Dhare Rahain Rasadhaari.Sahaj Sanwaree Gori Yah, Jori Param Udaari.- Shri Harivyas Devacharya, Mahavani, Utsah Sukh (37)...
Vyashi Baman Jin Gano Haribhaktan Ko Das
Vyashi Baman Jini Ganaun, Haribhaktan Kau Das.(Sri) Radhavallabh Karnain, Sahyau Jagat Uphas.- Shri Hariram Vyas, Vyas Vani, Saakhi (14)Sri Hariram Vy...
Shriradhavallabh Tum Mere Hita
(Raag Kanharo)Shriradhavallabh Tum Mere Hita.Aur Sabai Svarath Ke Sangi, Gur Chopari Dai Poshat Pitu. [1]Yah Main Jaani Sabani Saun Tori, Tumsaun Jori...
Karuna Sab Dukh Churana
Karuna Sab Dukh Churana, Mam Sarana Sukunvari.Shri Radhe Pranadhike, Jayati Krishna Sukhakari.- Shri Harivyas Devacharya, Mahavani, Utsah Sukh (117)Al...
Sunihun Na Dekhi Aisi Jori Jugal Kisor Kisori
(Doha)Ang Ang Sobha Ju Par, Varaun Kaam Karori. Suni Na Hun Dekhi Kahun, Aisi Adbhut Jori. (Pad)Sunihun Na Dekhi Aisi Jori Jugal Kisor Kisori.&nb...
Ananya Vrat Khande Kisi Dhaar
Ananya Vrat Khaande Keesi Dhaar.It-Ut Dagat Jagat Hit Tehari, Pheri Na Karat Samhaar. [1]Kaha Gyaasi Kul-Karmani Chhade, Jolagi Vishay Vikaar.Binu Pre...
Jay Shri Radhika Ras Bhari
(Doha)Puran Prem Prakas Ken, Pari Payodhini Puri.Jay Shri Radha Ras Bhari, Shyam Sajeevan Muri.(Pad)Jay Shri Radhika Ras Bhari.Rasik Sundar Sanware Ki...
Vyas Kulinani Koti Mili, Pandit Laakh Pachis
Vyas Kulinani Koti Mili, Pandit Laakh Pachees.Swapach Bhakt Ki Paanahi, Tulai Na Tinke Sees.- Shri Hariram Vyas, Vyas Vani, Saakhi (16)Even if crores ...
Jhulat Phulat Kunjavihari
(Raag Malar)Jhoolat Phulat Kunjavihari.Dusari Or Kishor Vallabha Shri Vrishabhan Dulari. [1]Kulkata Hansat Khasat Kusumavali Sundar Jhumak Saari.Kabah...
Ari Mere Nainani Ko Aahar
(Doha)Safal Manorath Hot Sab, Avat Hiye Jitek.Mere Nainani Ko Ari, Yah Aahar Hain Ek.(Pad)Ari Mere Nainani Ko Aahar.Kal Na Parai Pal Ek Bina Mohin Avl...
Parabhakti Ras Vardhini Shyama Sab Sukh Den
Parabhakti Ras Vardhini, Shyama Sab Sukh Den.Rasik Mukut Mani Radhika, Jai Nav Neeraj Nain.- Shri Harivyas Devacharya, Mahavani, Sewa Sukh (51)Śrī Śyā...
Nar Dehi Dvaro Khulyo Hari Pavan Ki Ghat
Nar Dehi Dwaro Khulyau, Hari Paavan Ki Ghaat.‘Vyas’ Feri Nahin Lagatu Hai, Taruvar Tutyau Paat.- Shri Hariram Vyas, Vyas Vani, Saakhi (87)Human birth ...
Gavat Pyaro Radha Tero Jasu
(Rag Sarang)Gavat Pyaro Radha Tero Jasu.Teroi Naam Japat Aur Bilapatu Hai, Kaamkau Syamhin Sank Su. [1]Kahyo Na Parai Darun Dukh Pyari, Tere Virah Moh...
Priya Badan Sukhma Sadan
Priya Badan Sukhma Sadan, Rahyo Prem Paripoori.Ja Madhi Preetam Praan Ki, Sarbas Jeevani Moori.- Shri Harivyas Devacharya, Mahavani, Sewa Sukh (05)The...
Vyas Na Vyapak Dekhiye Nirgun Pare Na Jaani
Vyas Na Vyapak Dekhiye, Nirgun Pare Na Jaani.Tab Bhaktani Hita Autare, (Shri) Radhavallabh Aani.- Shri Hariram Vyas, Vyas Vani, Saakhi (07)Śrī Harirām...
Rasikan Ke Hit Karane
Rasikan Ke Hit Karane, Bisad Bihar-Nihari.Jori Gori Sanwari, Anhoni Param Udari.- Shri Harivyas Devacharya, Mahavani, Sahaj Sukh (55)This fair-and-dar...
Kahan Haun Vrindavan Taji Jaun
(Raag Sarang)Kahan Haun Vrindavan Taji Jaun, Mose Neech Poch Kaun Anat Na Hari Binu Aur Na Thaun. [1] Sukh Punjanikunjani Ke Dekhat, Vishay Vishai Kyo...
Kharo Kharo Sab Let Hain
Kharau Kharau Sab Let Hain, Parakhi Parkhu Sar.Khote ‘Vyas’ Ananya Kau, Gahak Nandkumar.- Shri Hariram Vyas, Vyas Vani, Saakhi (34)Just as a jeweler s...
Sukhkari Sabke Sada
Sukhkari Sabke Sada, Pranan Ke Pratipal. Sarbas Jivan Sakhin Ki, Naval Ladili Lal.- Shri Harivyas Devacharya, Mahavani, Utsah Sukh (146)The ever-new d...
जय वृन्दावन नित्य जै
(पद) जय वृन्दावन नित्य बिहार। श्रीराधा पिय परम उदार। जय सहचरी आदि रंगदेव्य। स्यामास्यामहि जिनकें सेव्य॥ [1] जय नव नित्य कुंज सुख सार। जय जमुना कंकन आ...