shri suradasa
Biography & History
shri suradasa Collected Verses
धनि धनि धनि हौं कुँवरि राधिका
“ धनि धनि धनि हौं कुँवरि राधिका, नंदनंदन जा सौं रति मानी । ” - श्री सूरदास जी नित्य किशोर श्री राधारानी धन्य, धन्य, धन्य हैं जिन्हे स्वयं नंदनंदन अप...
ब्रह्मादिक सनकादि महामुनि
ब्रह्मादि देवता, सनकादि तथा महामुनि जन कल्पों तक हाथ जोड़कर यही प्रार्थना करते रहते हैं कि किसी प्रकार वृंदावन का तृण बन जाएँ, जिससे वे श्री युगल सरका...
रुचिसों जेंवत जुगल किशोर
(राग धनाश्री) रुचिसों जेंवत जुगल किशोर। होंस विनोद करत हैं बहुविधि देत परस्पर कोर। [1] जो भावे सो लेत हैं दोऊ ललितादिक त्रन तोर। सूरदास यह सोभा ऊपर दे...
राधे तेरौ बदन बिराजत नीकौ
हे श्री राधे, आपका बदन पूरी तरह से शोभित है। जब तुम इधर-उधर तिरछे देखती हो तो चंद्रमा फीका हो जाता है। [1] बौहें रूपी धनुष नेन रूपी बाणों को साधे हुए ...
भवसागर तैं बूड़त राखै
भवसागर में डूबने वालों को गुरु ज्ञान रूपी दीपक प्रदान करते हैं। सूरदास कहते हैं कि वास्तविक गुरु इतने समर्थ होते हैं कि वे क्षण भर में ही जीव का पूर्ण...
राधा माधव भैंट भई
प्रस्तुत पद में श्री सूरदास जी, राधा माधव की मिलन लीला का वर्णन करते कहते हैं कि, "श्री राधा और श्री कृष्ण जब मिलते हैं (राधा कृष्ण बन जाते हैं और कृ...
बांह छुड़ाकर जात हो
हे श्यामसुंदर! मुझे निर्बल जानकर मेरी बाहें छुड़ाकर जा रहे हो; हिम्मत हो तो मेरे हृदय से निकलकर दिखाओ, तब तुम्हें मर्द मानूँ। (यह प्रेमपूर्ण व्यंग्य ह...
पिया बिन चन्द्र लग्यो दुःख दैन
प्रियतम के बिना यह चंद्रमा भी दुख दे रहा है। मैं तारे गिन गिन कर हार चुकी हूँ, मुझे एक क्षण को भी चैन नहीं मिल रहा है। [1] कहाँ गयी, वो प्यारी रातें ...
हरिजन संग छिनक जो होई
यदि एक क्षण को भी हरिजन [संत] का दर्शन हो जाए, तो वह अनमोल है जिससे कोटि स्वर्ग सुख, कोटि मुक्ति सुख इत्यादि की भी तुलना असम्भव है। [1] ऐसा मानना च...
देखो माई ये बड़भागी मोर
हे सखी! उन अति भाग्यशाली मोरों को देखो जिनके पंखों से नन्दनन्दन ने अपना मुकुट सजाया है। [1] श्री कृष्ण के पिता महाराज नंद तथा उनकी माता श्री यशोदाजी ...
उधो, मन न भए दस बीस
गोपियां कहती है, हे उद्धव, मन तो हमारा एक ही है, दस-बीस मन तो हैं नहीं कि एक को किसी के लगा दें और दूसरे को किसी और में। अब वह भी नहीं है, कृष्ण के सा...
नवल किशोर नवल नागरियाँ
नवल किशोर श्री कृष्ण ने श्री राधा के ऊपर अपनी भुजा रखी है और नवल नागरी श्री राधा ने श्री कृष्ण के ऊपर अपनी भुजा रखी है एवं दिव्य युगल ने एक दूसरे को ...
देखोरी माई हरि नंगम नंगा
हे सखी, देखो! आज श्रीकृष्ण नग्न हैं! उन्होंने केवल मोतियों के आभूषण ही अंग में पहने हैं एवं वस्त्र नहीं पहने हैं। सौंदर्य की लहरें उसके नग्न रूप से उ...
ठाड़े मनमोहन सुन्दर यमुना
श्याम सुंदर यमुना किनारे विराज रहे हैं। जब से वह मेरी दृष्टि में आए हैं, तब से एक क्षण को भी मुझे धीरज नहीं मिल रहा है एवं उनसे मिलने को व्याकुलता बढ...
कहि राधा किन हार चोरायो
चतुर सखियाँ श्री राधा से पूछती हैं: हे राधा, आपका मोतियों का हार किसने चुराया है? मैं नाम से सभी साखियों को जानती हूं, सुनो: - श्यामा, कामा, चतुरा, न...
ऊधौ, कर्मन की गति न्यारी
गोपियाँ उद्धव से कहती हैं: हे ऊधो कर्मों की गति न्यारी है। धरती पर जितनी भी नदियाँ हैं वे सब की सब अपना मीठा जल सागर में डाल रही हैं लेकिन वह फिर भी स...
जब ते प्रीति श्याम से कीन्ही
जब ते प्रीति श्याम से कीन्ही, ता दिन तैं मेरें इन नैननि, नैकुहुँ नींद न लीन्ही। - श्री सूरदास, सूर सागर जब से मैंने श्याम सुन्दर से प्रीति की है, उस ...
प्यारी तोहि गिरधर लाल
हे श्री राधे! आपके प्रियतम, श्री गिरिधर लाल जी आपको बुला रहे हैं। दिन और रात वे केवल "राधे राधे" रटते हैं और कुछ भी उन्हें नहीं भा रहा है। [1] प्रेम...
यह ऋतु रूसवे की नाहीं
श्रीकृष्ण श्री राधिका से कहते हैं, "यह रूठने का मौसम नहीं है!" देखो, कैसे मेघ पृथ्वी के लिए अपने प्रेम की वर्षा कर रहा है। [1] वन की लता, जलती हुई गर...
हों इन मोरन की बलिहारी
श्री सूरदास कहते हैं “मैं इन मोरों पर बलिहार जाता हूँ जिनके पंख गिरिधर श्री कृष्ण के मुकुट पर टिके रहते हैं। [1] मैं इस बांस के वंश पर बलिहार जाता हू...
दीप मालिका को दिन आयौ
आज दीपावली का त्यौहार है। यशोदा नंदा बाबा से कहती हैं कि यह पर्व उनके मन को बहुत प्रिय है। [1] समस्त गोपियाँ सुंदर वस्त्र धारण कर, अपने घरों से चल कर...
राधा मोहन करत वियारू
दिव्य युगल श्री राधा कृष्ण एक साथ भोजन कर रहे हैं। ब्रज की सुंदर युवतियां एक ही थाली में उनको खाना परोस रही हैं। उन्होंने एक जैसे कपड़े पहने हैं और उन...
मो सम कौन कुटिल खल कामी
श्री सूरदास जी विनयपूर्वक शब्दों में कहते हैं कि हे प्रभु मेरे समान कुटिल, खल एवं कामी जीव विश्व में कौन होगा ? मेरे समान नमक हरामी कौन होगा क्यूँकि ज...
यह छवि तिहूँ भुवन कहुँ नाहीं, जो ब्रज भूतल धाम
यह छवि, जो इस भूतल पर स्थित ब्रज धाम में देखने को मिलती है, वह तीनों लोकों में कहीं नहीं है। श्री सूरदास जी कहते हैं कि श्री राधिका-श्याम सुंदर की यह ...
नाथ मोहिं अब की बेर उबारो
हे नाथ, मुझे अबकी बार उबार लीजिए।मैं कर्महीन एवं जन्म से अंधा हूँ, मुझसे अधिक नकारा कौन हो सकता है? [1] हे नाथ, आप तीनों लोकों के पालनकर्ता हो और मै...
वृन्दावन एक पलक जो रहिये
जो एक पल के लिए भी श्री वृन्दावन का वास करता है और मुख से कृष्ण नाम का उच्चारण करता है, उसके जन्म-जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं। [1] श्री सूरदास कहते ...
मुरली कौन तप तें कियौ
हे मुरली, तूमने कौन-सी तपस्या की है जिससे तुम सदैव गिरिधारी के अधरामृत पर विराजमान हो उसके दिव्य रस का पान करती हो। [1] नंद नंदन ने तुम्हारे लिए अपना...
माधव राधा के रंग राँचे राधा माधव रंग रई
श्री कृष्ण राधा के रंग में रंगे हैं और श्री राधा कृष्ण के रंग में रँगी हुई हैं। श्री सूरदास जी के प्रभु श्री राधा-कृष्ण का ब्रज में नित्य-नवीन विहार ह...
पिया बिन चन्द्र लग्यो दुःख देन
श्री सूरदास जी कहते हैं "श्री कृष्ण के बिना यह चन्द्र भी दुःख दे रहा है। सम्पूर्ण रात्रि मैं तारे गिनते-गिनते हार गयी लेकिन एक क्षण के लिए भी विश्राम ...
वृंदावन हरि, यही विधि क्रीड़त सदा राधिका संग
श्री कृष्ण सदा श्री राधिका के साथ वृन्दावन में प्रेम-केलि में निमग्न रहते हैं। उन्हें न भोर का ज्ञान रहता है, न रात्रि का भान; वे निरंतर एक ही दिव्य र...
जहां वृन्दावन आदि अजिर, जहां कुंज लता विस्तार
श्री वृन्दावन धाम समस्त दिव्य लोकों का आदि है, जहाँ निकुञ्जों और लताओं का अनंत विस्तार है। वहाँ श्री प्रिया-प्रियतम (राधा-कृष्ण) नित्य विहार करते हैं,...
बसों मेरे नैनन में यह जोरी
श्री सूरदास जी कहते हैं कि यह नित्य जोड़ी (श्री राधा कृष्ण ) सदैव मेरे आँखों में बसें रहें। सुन्दर श्री कृष्ण के सुन्दर नयन कमल हैं, और संग में वृषभानु...
काम क्रोध में नेह सुहृदता काहू विधि कहै कोई
चाहे कोई काम, क्रोध, प्रेम अथवा मित्रता—किसी भी भाव या विधि से उस परमात्मा का स्मरण क्यों न करे, यदि वह दृढ़तापूर्वक श्री हरि का ध्यान धरता है, तो सूरद...
अब मैं नाच्यौ बहुत गुपाल
श्री सूरदास जी कहते हैं - हे गोपाल! अब मैं बहुत नाच चुका। काम और क्रोध का जामा पहनकर एवं विषय (चिन्तन) की माला गले में डालकर। [1] महामोहरूपी नूपुर बज...
सदा एक रस अखंडित, आदि अनादि अनूप
दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण का नित्य-विहार सदा एकरस और अखंड है—जिसका न आदि है, न अंत। श्री युगल स्वरूप (श्री राधा-कृष्ण) इस रस में मग्न होकर ऐसा विहार ...
श्री राधिका श्याम की प्यारी कृपा बास ब्रज पाऊँ
हे श्री श्यामसुंदर की प्राणप्रिय श्री राधिका! आपकी अहैतुकी कृपा से मुझे पावन ब्रज मण्डल में वास प्राप्त हो। मेरी यही अभिलाषा है कि आपके नित्य-नवीन निक...
राधा परम निर्मल नारि
हे श्री राधा, आप परम निर्मल नारी हैं, यह मैं ह्रदय में बिना किसी दुविधा के, मन तथा कर्म से कहती हूँ। [1] केवल आप ही श्री श्यामसुंदर के मन की अवस्था क...
स्याम तन स्याम मन स्याम है हमारो धन
गोपियाँ उद्धव से कहती हैं: श्याम ही हमारा तन है, श्याम ही हमारा मन है, श्याम ही हमारा धन है, आठों याम हमें श्याम से ही केवल काम है। [1] श्याम ही हमार...
जाके दरश को जग तरसत है
श्री सूरदास जी माननी श्री राधिका से कहते हैं: हे मेरी राधा प्यारी, जिस श्री कृष्ण के दर्शन को समस्त जग तरसता है, अब तू उसको दर्शन दे। [1] जिसकी म...
प्यारी, प्रीतम आरति करतु
श्री राधा की एक अंतरंग सखी श्री राधा से कहती है, हे राधे, प्रीतम श्री कृष्ण तुमसे मिलने के लिए अत्यंत व्याकुल हैं। वे तुमसे मिलने के लिए मेरे चरणों मे...
राधे हरि तेरौ नाम विचारै
हे राधा, कृष्ण तेरे नाम का ही विचार करते रहते है। तुम्हारे गुणो की माला गूंथकर वाणी रूपी हाथ से घुमाते रहते हैं। [1] आँख मूँदकर तुम्हारा ही रूप ध्यान...
स्यामा तू अति स्यामहि भावै
हे श्यामा प्यारी (राधा)! तू कृष्ण को अत्यधिक प्यारी है। बैठते, उठते, चलते, गाय चराते तुम्हारी ही लीला गाते हैं। [1] (तुम्हारे) पीले रंग को (शरीर को) ...
रसना एक नहीं शत कोटिक, शोभा अमित अपारी
हे श्री राधे, मेरी तो एक ही जिह्वा है न कि शत-कोटि, मैं किस प्रकार तुम्हारी अमित एवं अथाह शोभा का उससे वर्णन करूँ। कृपा कर मुझे कृष्ण-भक्ति दीजिए, मैं...
जो सुख होत गोपालहिं गायैं
श्री कृष्ण का प्रेमपूर्वक कीर्तन करने से जो सुख (रस) प्राप्त होता है, वह जप, तपस्या और करोड़ों तीर्थों में स्नान करने से भी नहीं प्राप्त होता। [1] जि...
रे मन मूरख जनम गँवायौ
यह संसार सेमल के फूल के समान है जो पहले तो बहुत सुहाना लगता है, फिर उसमें फल आते हैं किंतु वह फल तो पकने पर तड़क जाता है। उसमें न गुदा होता है न रस के...
देखो करनी कमल की
कमल का निष्काम प्रेम तो देखो कि उसने जल से प्रेम किया था तो प्राण दे दिए, पर प्रेम को नहीं छोड़ा। यहाँ तक कि पानी के साथ कमल भी सूख गया।
ब्रज में हरि होरी मचाई
ब्रज में हरि होरी मचाई। इतते आई सुघर राधिका, उततें कुँअर कन्हाई। [1] हिलि-मिलि फाग परस्पर खेलैं, सोभा बरनी न जाई। [2] बाजत ढोल मृदंग झाँझ ढप, बीना अरु...
सब तजि भजिऐ नंद कुमार
सब सांसारिक प्रपंचों को त्याग कर श्री हरि का भजन करो। किसी अन्य का भजन करने से काम नहीं चलेगा, और न ही यह भव जंजाल मिटेगा। [1] जिस जिस योनि में भी जी...
सदा सँधाती अपनौ जिय कौ जीवन-प्रान
हे मन! जो भगवान (श्री हरि) सदा तुम्हारे साथ रहने वाला है, सदा तुम्हारी रक्षा करने वाला है एवं प्राणों का भी प्राण है, उस प्रभु को तूने अनायास ही, बातो...
खंजन नैन सुरंग रसमाते
श्री कृष्ण के कमल-नयन खंजन पक्षी की भांति हैं जो श्री राधा की रूप-माधुरी के रस में मत्त है, जो अतिशय सुंदर, निर्मल एवं चंचल हैं, एक क्षण के लिए भी पलक...
राधे तेरे नैन किधौं बटपारे
हे श्री राधे, यह आपकी आंखें है या बाण। इन्हें देख कर वन के मृग मोहित हो रहे हैं, तो मनुष्य की कौन कहे। आपकी आंखों में लगे काजल को देख श्री श्यामसुंदर ...
जो पै जिय लज्जा नहीं कहा कहौं सौ बार
सूरदास जी कहते हैं कि हे गँवार और दुष्ट मन! यदि तुझे लज्जा ही नहीं है, तो मैं तुझे सौ बार क्या कहूँ? क्योंकि तूने तो एक बार भी भगवान का भजन नहीं किया।
आदिलोक बैकुंठ में ब्रज परिपूरन सोय
ब्रज परिपूर्ण है, क्योंकि ब्रजवासियों के हित के लिए साक्षात श्री हरि ही गिरिराज गोवर्धन के रूप में विराजमान हैं।
दीपक पीर न जानई
एक दीपक को पतंग की पीड़ा का अनुभव नहीं है, परंतु पतंगा दीपक के दीये की लौ से प्रेम करके प्रेम में जलकर भस्म हो जाता है। उस पतंगे का शरीर तो ज्वाला में...
सुने री मैंने निरबल के बल राम
मैंने सुना है कि निर्बल के बल भगवान हैं। प्राचीन संत भी साक्षी हैं कि जो अपने आपको भगवान के भरोसे छोड़ देते हैं, उनके सभी बिगड़े काम प्रभु स्वयं संवार द...
जौ हम भले बुरे तौ तेरे
चाहे हम अच्छे हों या बुरे, हैं तो हम आपके ही।हे प्रभु! हमारी लाज और प्रसिद्धि आपके ही हाथों में है; कृपया मेरी प्रार्थना सुनें! [1] सब को त्याग कर ही...
प्रीति तौ मरिबौऊ न विचारै
प्रेम मृत्यु की परवाह नहीं करता, जैसे दीपक को देखकर पतंगा बिना सोचे-समझे जल जाता है। [1] जैसे ध्वनि से मोहित होकर हिरण शिकारी के पास पहुँच कर मृत्यु ...
बलिहारी वृंदावन भूमिति
श्री वृंदावन धाम की परम पावन भूमि की बलिहारी है, जो सर्वसौभाग्यशाली है, जहाँ सूरदास के प्रभु श्री कृष्ण नंगे पाँव हर दिन गायों को चराते थे।
अब मेरैं निज ध्यान यह
ब्रह्मा जी कहते हैं, हे प्रभु, अब मैं बार-बार यही प्रार्थना करता हूँ कि मुझे ग्वालों का अवशिष्ट प्राप्त हो जाए। मैंने यह जान लिया है कि आपने भी उन ग्व...
तेरौ बुरौ न कोऊ मानै
गोपियाँ कहती हैं, हे ज्ञान मार्गी उद्धव! हम तुम्हारी ब्रह्म ज्ञान की बातों का कोई बुरा नहीं मानते क्योंकि हमारी रस की बातें तो कोई रसिक ही समझ सकता है...
गर्भ-बास अति त्रास मैं जहाँ न एकौ अंग
अरे मूढ़, सुन! गर्भवास जैसी भयावह अवस्था में, जहाँ तेरा एक भी अंग पूर्ण रूप से विकसित नहीं हुआ था, वहाँ भी भगवान ने एक क्षण के लिए भी तेरा साथ नहीं छो...
निसिदिन बरसत नैन हमारे
मेरे नेत्रों से दिन-रात निरंतर आँसू बहते रहते हैं, मानो श्यामसुंदर के प्रस्थान के बाद वर्षा ऋतु का सदा के लिए आगमन हो गया हो। [1] मेरी आँखों में का...
मीन वियोग न सहि सकै
चाहे नीर (पानी) मछली की बात भी नहीं पूछता फिर भी मछली तो पानी का वियोग नहीं सह सकती। तुम मछली के प्रेम की निराली गति को देखो कि इसका शरीर चला जाता है ...
तुम मेरी राखो लाज हरि
हे श्री कृष्ण, कृपया मेरी लाज रख लें। आप सर्वज्ञ हैं, सब कुछ जानने वाले हैं, मैंने कोई भक्ति नहीं की है। [1] मेरे अवगुण मेरा पीछा छोड़ते नहीं, वे हर ...
वृंदावन सुख छाड़िकै, कहाँ बसे हो आइ
उद्धव जी जब ब्रज से वापस द्वारका लौटे, तो श्री कृष्ण के चरण पकड़कर, उन्हें उलाहना देते हुए कहने लगे, “श्री वृंदावन धाम का अद्भुत सुख और गोवर्धन धाम को...
जोइ भावै सोइ करहु तुम लता सिला द्रुम गेहु
ब्रह्मा जी भगवान श्री कृष्ण से कहते हैं - हे प्रभु, तुम्हें जो अच्छा लगे मुझे वही बना दो — चाहे वृंदावन की लता बना दो, यहाँ की चट्टान बना दो, यहाँ का...
श्रीमुख बानी कही विलँब अब नैंकु न लावहु
जब ब्रह्मा जी क्षमा याचना कर रहे थे, तब श्री कृष्ण बोले - "अब जरा भी विलंब न करो। ब्रज की परिक्रमा करके अपने देह के पापों को नष्ट करो"।
तैं जो रतन पायौ भलौ जान्यौ साधि न साज
तूने मनुष्य देह रूपी अनमोल रत्न पाया, किंतु उसका उपयोग करना तूने नहीं जाना। अरे, प्रतिदिन प्रेम की कथा सुनता है, फिर भी अपनी प्रेम हीनता पर लज्जा नहीं...
प्राण इक द्वै कीन्हे भक्ति-प्रीति-प्रकास
श्री राधा एवं श्री कृष्ण का प्राण एक ही है परंतु उन्होंने दो रूप धारण किए हैं भक्ति एवं प्रेम को प्रकाशित करने के लिए। श्री सूरदास कहते हैं: स्वामी (श...
ब्रज-वासी-पटतर कोऊ नाहीं
ब्रजवासियों की बराबरी कोई नहीं कर सकता। जिन श्रीकृष्ण को ब्रह्मा, शिव, सनकादि आदि भी ध्यान में नहीं पा सकते, वही श्रीकृष्ण प्रेमवश ब्रजवासियों की जूठ...
मन रे श्याम सों कर हेत
अरे मन! श्यामसुन्दर से प्रेम के बंधन में जुड़ जा। “कृष्ण” नाम का घेरा अपने चारों ओर बना ले, और अपना जीवन रूपी खेत सुरक्षित कर ले। [1] तेरा मन रूपी तो...
चारि बदन मैं कह कहौं
ब्रह्मा जी, श्रीकृष्ण से क्षमा याचना करते हुए कहते हैं — "हे प्रभु! आप ब्रज में गायें चराते रहते हो और नन्दबाबा की शपथ की दुहाई देते हो। आपकी इन अलौकि...
लोचन भए स्याम के चेरे
मेरे नेत्र श्यामसुंदर के बिना दाम के गुलाम बन गए हैं। इस ग़ुलामी में इन्हें उस कोटि का सुख प्राप्त होता है कि ये मुड़कर मेरी ओर देखते तक नहीं। [1] मै...
वेद, पुरान, सुमृति सबैं सुर-नर सेबत जाहि
सभी वेद, पुराण और स्मृतियाँ उसी प्रभु की महिमा का बखान करते हैं, जिसकी सेवा सभी सुर-नर-मुनि आदि करते हैं। अरे महामूर्ख मन! तू उस परम प्रभु का स्मरण क्...
यह सब जानों भक्त के लच्छन
श्री सूरदास कहते हैं "यह सब भक्त के लक्षण हैं। कोई उनकी निंदा करता है तो कोई उनकी वंदना करता है, तथा कोई उनपर प्रहार कर उनका धन लेकर भाग सकता है।" [1]...
मेरी सुधि लीजौ हो, ब्रजराज
हे व्रज के नाथ, श्री कृष्ण! कृपा कर मेरी सुधि लीजिए। इस संसार में मेरा और कोई नहीं है। आप ही मेरी बिगड़ी को बनाने वाले हैं! [1] आपने अनेकों का उद्धा...
वे जमुना, वे सखा हमारे नित नव केली विहारी
श्री कृष्ण सत्यभामा से कहते हैं - मैं शपथपूर्वक कहता हूँ, वह यमुना, वह हमारे प्रिय ब्रजवासी सखा, सखियों संग नित्य नवीन केली विहार, वृंदावन धाम के पुष्...
जैसैं सुखहीं तन बढ़यौ तैसैं तनहिं अनंग
जैसे-जैसे सुखपूर्वक शरीर पुष्ट होता गया, वैसे-वैसे उसमें काम की वृद्धि होती गई। जिसके परिणाम स्वरूप अज्ञानता रूपी धुआँ इतना बढ़ गया कि विचाररूपी दृष्ट...
दोऊ राजत स्यामा स्याम
श्री राधिका और श्यामसुंदर दोनों सुशोभित हैं। ब्रजवनिताओं का सम्पूर्ण समूह भी उनके साथ ही सुशोभित है। आकाश से देवांगनाएँ भी उत्सुक होकर उनके दर्शन कर र...
बृंदाबन खेलत हरि होरी
वृंदावन में भगवान हरि (श्रीकृष्ण) होली खेल रहे हैं। वहाँ ताल, मृदंग, झाँझ और डफ बज रहे हैं, और नंदलाल (कृष्ण) व वृषभानुकिशोरी (राधा मिलकर उत्सव मना रह...
'रस की बात मधुप नीरस सुन रसिक होय सो जानै'
रस की बात मधुप नीरस सुन रसिक होय सो जानै। - श्री सूरदास जी गोपियों द्वारा ज्ञानी उद्धव को उत्तर: रस की वार्ता नीरस हृदय को नहीं भाती, वह केवल रसिक हृ...
स्याम भये बस नागरि कैं
श्री कृष्ण नागरि (श्री राधा) के वशीभूत हो गये हैं। वे उन घोष (गोपालक) कुल को उजागर करने वाली श्री राधा के नेत्र-कटाक्ष और उनकी टेड़ी चितवन पर रीझे हु...
हरि, तेरौ भजन कियौ न जाइ
हे भगवान् श्री हरि! आपका भजन किया ही नहीं जाता, क्या करूँ? आपकी प्रबल माया मेरे मन को बार-बार भ्रमित कर देती है। [1] जब मैं संतों का संग करता हूँ, तो...
सुनि परमित पिय प्रेम की चातक चितवति पारि
प्रिय के असीम प्रेम को सुनकर चातक पक्षी सदा बादलों की ओर अनन्य भाव से निहारता है। उसी मेघ की आशा से सब दुख सहता है, परंतु मरते दम तक भी जल (वर्षा) के ...
नित बिहार गोपाल लाल संग
जगनायक, जगदीश श्री कृष्ण की प्यारी, जगतजननी, जग महारानी, श्री राधा श्री कृष्ण के संग श्री वृन्दावन राजधानी में नित्य विहार लीला परायण हैं। [1] जिसकी ...
जो सुख ब्रज में एक घरी
ब्रज में जो आनन्द प्रत्येक घड़ी हो रहा है, वह आनन्द तीनों लोकों में नहीं है। यह गोप-नगरी धन्य है। [1] आठों सिद्धियाँ और नवों निधियाँ द्वार पर यहाँ हा...
सब रस कौ रस प्रेम है विषयी खेलै सार
संसार के समस्त रसों में प्रेम-रस ही सर्वोत्तम है। जैसे एक विषयी जुआरी सार (जुए की गोटियाँ) खेलते समय तन, मन, धन और यौवन अर्थात् सब कुछ दाँव पर लगा देत...
कह जानो कहँवा मुवो
न जाने यह कुमति बुद्धि वाला दुष्ट जीव कैसी मौत मरेगा जो श्री हरि की भक्ति एवं प्रेम को छोड़ कर भी सुख चाहता है।
प्रीति की रीति को पैंड़ो ही न्यारो
श्री राधा कृष्ण के प्रेम मार्ग की गति ही न्यारी है।[1] प्रेम के इस मार्ग को या तो वृषभानु नंदिनी श्री राधा जानती हैं या नन्द के दुलारे श्री श्यामसुंद...
प्रभु मेरे अवगुण चित ना धरो
हे प्रभु, कृपया मेरे दोषों की तरफ़ ध्यान न दें। आप समदर्शी जाने जाते हैं और सभी को समान रूप से प्यार करते हैं, यदि आप चाहें तो मुझे इस भवसागर से पार क...
मैं कैसें रस रासहिं गाऊँ
मैं किस प्रकार रास रस का वर्णन करूँ ? श्यामसुन्दर की प्यारी श्रीराधिका जू की कृपा से ही केवल मैं ब्रज का वास प्राप्त कर सकता हूँ! [1] मैं किसी अन्य द...
मैं ब्रजवासिन की बलिहारी
श्री सूरदास जी कहते हैं कि मैं ब्रज वासियों की बलिहारी जाता हूँ जिनके संग श्री गोवर्धन धारी कृष्ण नित्य ही क्रीड़ा करते हैं। [1] किसी बृजवासी के संग व...
करहु मोहि ब्रज रेनु
हे प्रभु! मुझे ब्रज की रज बना दीजिए और नित्य ही श्रीवृन्दावन का वास प्रदान कीजिए। यदि मुझ पर कृपा करनी हो, तो प्रसादस्वरूप यही वर दे दीजिए; इसके अतिरि...
माधौ मोहिँ करौ वृंदावन रेनु
ब्रह्मा जी विनयपूर्वक स्तुति करते हुए कहते हैं—“हे माधव! मुझे श्री वृन्दावन की पावन रज बना दीजिए। यह वही दिव्य रज है, जिस पर आप अपने चरणों से विचरण कर...
आज वन उमगि रही
आज वन में समस्त ब्रज नारी उमंग से भरी हैं। निश्चित ही हर्षोल्लास से सब सखियाँ गुणrगान कर रही हैं एवं प्राण प्यारी श्री स्वामिनी जी [श्री राधा] झूला झू...
राधे तू दधिसुत क्यों न दुरावे
अरी राधा, तेरा मुख कमल चंद्रमा के समान सुन्दर है, तू इसे क्यों नहीं छुपाती। सुनो, हे श्री वृषभानु नंदिनी, उसे उजागर कर, क्यों इतने जीवों को तरसाती हो।...
झुकरही नींद श्याम के नैनन
श्री श्यामसुंदर के नयन नींद के कारण झुक रही हैं। वे श्री प्रिया जी के चिबुक (ठुड्डी) को उठाते हैं और उनके मुख कमल की ओर निहार रहे हैं जिसकी सुंदरता अव...
हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीति
जब उद्धव योग की युक्ति-विधि की चर्चा करते हैं, तब ब्रज की गोपियाँ उत्तर देती हैं— हम तो सीधी-सादी ग्वालिनें हैं, हम योग साधने की क्रिया कैसे समझेंगी? ...
वृंदावन मोकों अति भावत
श्री श्यामसुन्दर कहते हैं: अरे सब सखाजन सुबल, श्रीदामा, तुम लोग सुनो! वृन्दावन मुझे बहुत प्रिय है, इसी कारण व्रज से मैं यहाँ वन में गायें चराने आता ह...
खान-पान-परिधान मैं जीवन गयौ सब बीति
खाने-पीने और भोग-विलास में सम्पूर्ण जीवन यूँ ही व्यर्थ बिता दिया। जैसे कोई दुराचारी व्यक्ति रात किसी पराई स्त्री के साथ बिताकर सुबह भयभीत हो उठे, वैसे...
फूल्यो री सघन वन तामे
हे प्यारी जू! देखो, वृंदावन के सघन कुंज किस प्रकार पुष्पों से भरकर अपनी अनुपम शोभा बिखेर रहे हैं। इन लताओं में कोयल मधुर स्वर में गान कर रही है, मानो ...
देखौरी या मुकुट की लटकन
हे सखी, श्री कृष्ण की मुकुट की लटकनी को तो निहार, कैसी शोभा देखते ही बनती है जब श्री राधा महारानी के संग नूपुर एवं पायल की पटकन कर वे दोनों रास में व...
धनि यह वृन्दावन की रेनू
श्री वृन्दावन धाम की रज धन्य है। इस रज की तुलना के सामने तो समस्त इच्छाओं को पूरा करने वाली कामधेनु और कल्पवृक्ष भी नगण्य हैं।
ऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि
ब्रह्मा कहते हैं— ब्रज की गलियों में बसने की रीति ऐसी ही होनी चाहिए जहाँ हम ब्रजवासियों और ग्वालों के जूठे पत्तलों से अन्न के दानों (सीथ) को चुन-चुनकर...
जब जब मुरली कान्ह बजावत
श्री सूरदास सखी भाव धारण कर श्री राधा से कहते हैं - जब-जब श्रीकृष्ण मुरली बजाते हैं, तब-तब वह “राधा” नाम का बार-बार उच्चारण कर आपको रिझाने का प्रयत्न ...
कहाँ सुख वृज को सो संसार
मैं नित्य सोचता हूँ कि ऐसी कोई जगह इस संसार में कहाँ है जहां ब्रज जैसा आनंद मिलता हो? जो सुख श्री यमुना जी के किनारे बंशीवट में बंशी वादन में आता है व...
साँचौ निहचै प्रेम कौ जीवन मुक्ति रसाल
उद्धव द्वारा प्रतिपादित योग के प्रत्युत्तर में ब्रज-गोपिकाएँ प्रेम-तत्व की सर्वोच्चता सिद्ध करते हुए कहती हैं— प्रेम का सच्चा निश्चय ही जीवन की सरस मु...
भरोसो दुढ़ इन चरनन केरौ
श्रीमद् वल्लभ (श्री कृष्ण वा वल्लभाचार्य जी) के चरण कमलों में दृढ़ विश्वास कर इनकी शरण में हो जाओ क्योंकि इन श्रीचरणों के नख चंद्र की छटा के बिना समस्...
चरन कमल बन्दौ हरि राई
मैं श्री हरि के कमल-चरण को प्रणाम करता हूँ जिनकी कृपा से एक लंगड़ा व्यक्ति एक पहाड़ पर चढ़ सकता है और एक अँधा व्यक्ति सब कुछ स्पष्ट रूप से देख सकता है...
कहाँ सुख वृज को सो संसार
श्री कृष्ण नित्य सोचते हैं कि ऐसी कोई जगह इस संसार में कहाँ है जहां ब्रज जैसा आनंद मिलता हो? जो सुख श्री यमुना जी के किनारे बंशीवट में बंशी वादन में ...
जब तै श्रवन सुन्यौ तेरौ नाम
हे श्री राधा! जब से श्री कृष्ण ने आपका नाम सुना है तब से "हा राधा, हा राधा" बस यही मंत्र नित्य जप रहे हैं। [1] अपने प्रिय सखाओं को छोड़कर श्री कृष्ण ...
वृन्दावन व्रज को महत कापे बरनी जाई
श्रीधाम वृन्दावन और सम्पूर्ण व्रजभूमि का ऐसा अपार महत्व है कि उसका वर्णन वाणी और बुद्धि की सीमाओं से परे है। जब स्वयं चार मुख वाले ब्रह्मा जी ने ब्रज ...
राधे तेरे नैन किधौं री बान
हे श्री राधे, आपके नयन मानो बाणों के समान हैं। कोई यदि आपके तिरछे बाण देख लेता है वो तो धरती पर गिर जाता है मानो उसके प्राण ही चले जाते हैं। हे राधे, ...
'रस की बात मधुप नीरस सुन रसिक होय सो जानै'
गोपियों द्वारा ज्ञानी उद्धव को उत्तर: रस की वार्ता नीरस हृदय को नहीं भाती, वह केवल रसिक हृदय से ही समझी एवं ग्रहण की जाती है।
धनि धनि धनि हौं कुँवरि राधिका
गोपियां कहती है, हे उद्धव, मन तो हमारा एक ही है, दस-बीस मन तो हैं नहीं कि एक को किसी के लगा दें और दूसरे को किसी और में। अब वह भी नहीं है, कृष्ण के सा...
मेरो मन अनत कहां सुख पावै
श्री सूरदास जी कहते हैं, मेरे हृदय को और कहाँ सुख मिलेगा? (अर्थात् श्री राधा कृष्ण के अतिरिक्त कहीं ओर सुख नहीं मिल सकता।) [1] एक पक्षी जो जहाज पर र...
ब्रज में रहौं आन नहिं जावौं, कृपा तिहारी पाऊँ
हे प्रभु! मैं केवल ब्रज में ही रहूँ और कहीं अन्यत्र न जाऊँ, बस आपकी यही कृपा चाहता हूँ। मैं तो जन्म-जन्मों का याचक (भिखारी) हूँ और मेरा नाम 'सूरदास' ह...
धनि यह वृन्दावन की रेनू
श्री वृन्दावन धाम की रज धन्य है। इस रज की तुलना के सामने तो समस्त इच्छाओं को पूरा करने वाली कामधेनु और कल्पवृक्ष भी नगण्य हैं।
जब तै श्रवन सुन्यौ तेरौ नाम
हे श्री राधा! जब से श्री कृष्ण ने आपका नाम सुना है तब से "हा राधा, हा राधा" बस यही मंत्र नित्य जप रहे हैं। [1] अपने प्रिय सखाओं को छोड़कर श्री कृष्ण र...
जब ते प्रीति श्याम से कीन्ही
जब से मैंने श्याम सुन्दर से प्रीति की है, उस दिन से अब तक एक क्षण को भी मेरे इन नैनों ने नींद नहीं ली।
सखी री ब्रज को बसवो नीकौ
हे सखी, ब्रज वास बहुत ही नीको [उत्तम] है। यहाँ श्री कृष्ण गाय एवं बछड़े चराते हैं एवं वन में विहरण करते हैं। [1] जब वह मुरली बजाते हैं तो समस्त ब्रज क...
ब्रज परिक्रमा करहु देह को पाप नसावहु
“ब्रज परिक्रमा करहु देह को पाप नसावहु” - श्री सूरदास ब्रज की परिक्रमा करने से समस्त पापों का नाश होता है।
धनि यह वृन्दावन की रेनु
वृन्दावन की रज धन्य है। [1] जहाँ श्री कृष्ण गऊ चराते हैं और वंशी बजाते हैं। [2] जो व्यक्ति मन को मोहित करने वाले कृष्ण का ध्यान धरता है वह अत्यन्त सुख...
कृपा तो लालन जू की चहिये
श्री सूरदास किसी सखी से कहते हैं "हे सखी, मुझे तो एकमात्र श्री लाल जू (श्री कृष्ण) की कृपा ही चाहिए। [1] इनका किया हुआ भले ही मुझे दुखदायी प्रतीत हो, ...
प्रीति करि काहू सुख न लह्यौ
(श्री सूरदास जी के शब्दों में एक ब्रज गोपी कह रही है) प्रेम करके किसी ने भी सुख नहीं पाया। एक पतंगे ने अग्नि से प्रेम किया और (उसमें गिरकर) अपने प्राण...
राधे जु के प्रान गोवर्धन धारी
भावार्थ: श्री कृष्ण जो श्री गिरिराज पर्वत को धारण करने वाले हैं वो श्री राधा जी के प्राण हैं। वे गहरे तमाल के वृक्ष हैं और उनकी प्रिय श्री राधिका उनके...
बलि बलि हौं कुँवरि राधिका
भावार्थ: मैं अपने जीवन और आत्मा को बार-बार श्री राधिका को समर्पण करता हूँ। श्री राधिका, जिन्हें नंद के पुत्र श्रीकृष्ण प्यार करते है। श्री कृष्ण चतुर ...
तज मन हरि विमुखन को संग
भावार्थ: हे मेरे मन ! जो जीव हरि भक्ति से विमुख हैं, उन प्राणियों का संग न कर। उनकी संगति के माध्यम से तेरी बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी क्योंकि वे तेरी भक्...
धन्य धन्य वृषभानु दुलारी
श्री वृषभानु जी की बेटी (श्री राधा) धन्य हैं। उनके माता-पिता भी धन्य हैं, और यह बृज भी धन्य हैं जहाँ प्यारी किशोरी जी का निवास है। [1] वह दिन धन्य है,...