ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
341 itemsडीठि हू कौ भार जानि देखत न डीठ भरि
इस आशंका से ही कि मेरी दृष्टि का प्रिय पर भार न पड़े, प्रियतम श्रीलाल जी प्रिया को दृष्टि भर कर नहीं देखते हैं। सुकुमारी प्रिया, प्रियतम को नयन एवं प...
जब चितई कजरारे नैननि
जब प्रिया ने अंजन-रञ्जित नेत्रों से प्रियतम की ओर दृष्टिपात किया, तो मनमोहन लाल प्रेम-विवश तो हुए ही वरन उनको चारो ओर से प्रेम रूपी कामदेवों ने घेर लि...
अनुरागे जिनके भजन
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि जो रसिकजन युगल-किशोर के प्रेम-रस-विहार के भजन और चिन्तन में अनुरक्त हैं, उनकी चरण-धूलि को प्राप्त कर पूर्ण श्रद्धा और भक्...
मोहनता की रासि किसोरी
नवल-किशोरी प्रिया के रूप-लावण्य में सबको प्रेम विमुग्ध करने की अपार क्षमता है, अतएव वे मोहनता की राशि हैं। जो श्रीलालजी अखिल-विश्व का मन मोहित करने मे...
सबै सखी सब सौंज लै
युगल के अविचल प्रेम-रंग में रंगी सखियाँ, समय-समय की रुचि अनुसार सेवा की सभी सामग्री लिए, निरन्तर युगल के संग बनी रहती हैं।
चतुरानन देख्यौ कछुक
ब्रह्मा जी ने किंचित श्री वृंदावन के अद्भुत प्रभाव का अनुभव किया और पाया कि यहाँ के तरु-लताओं की रचना किसी और प्रकार की नहीं, बल्कि अद्वितीय है।
राजति कुँवरि परम सुकुवाँरी
आज परम सुकुमारी श्री किशोरी अपूर्व शोभा को प्राप्त हैं। वे प्रातः काल ही कुञ्ज भवन से निकल कर अपनी ललित बाहु-लताओं को प्रियतम के स्कन्धों पर डाले हुए ...
पट तर बृन्दाविपिन की
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि वृन्दावन की समता किसी से भी करना सर्वथा असंभव है क्योंकि वृन्दावन की रज में मृत्यु को प्राप्त होना भी मंगलमय है।
कानन में रहे झलकि कैं
श्री वृन्दावन में हित-युगल के मुख-चन्द्र की कांति निरंतर झिलमिलाती रहती है, जिसे सहज स्नेहमूर्ति सखियाँ चकोर की भाँति निरखकर अपने मन और प्राणों को शीत...
लाल लाड़िली प्रेम तें
श्री राधा-कृष्ण के परस्पर प्रेम से भी अधिक रसमय इन नित्य-विहार की सखियों का प्रेम है। ये सखियाँ अपने निज प्रीति-रस में इस प्रकार मग्न और अटकी हुई हैं ...
वृन्दाविपिन प्रभाव सुनि
इस वृन्दावन का अद्भुत प्रभाव सुनो—यह मलिन जीव को भी बिना किसी विचार के युगल-प्रेमस्वरूप अपना गुण प्रदान कर देता है; जैसे वात्सल्यमयी माता मैले-कुचैले...
व्रत, तप, निगम, नेम, यम
भक्ति रहित जो भी व्रत, तप, वेद-पाठ, नियम यम,संयम आदि बड़े-बड़े साधन हैं, कष्ट साध्य एवं क्लेशदायक हैं तथा इनका प्रवेश भक्ति-देवी के द्वार तक नहीं है।...
काम रस भींजे हैं दोउ लाल
आज पावस के रसमय पर्व पर श्री लाडिली-लाल युगल प्रेम-रूपी काम-रस से भींज रहे हैं। उनकी रूप लावण्य छवि कुछ विलक्षण ही प्रकार से वृद्धि को प्राप्त है। उनक...
वृन्दावन वृन्दा कहत
वृन्दावन! अरे, आधा नाम ‘वृन्दा’ कहते ही पापों के समूह नष्ट हो जाते हैं और निर्मल चित्त में रस-भजन की प्रेम-लता अंकुरित हो जाती है।
वृंदावन वृंदाविपिन
हे जिह्वा! तू हर क्षण ‘वृन्दावन, वृन्दाविपिन, वृन्दाकानन’—इन परम सुखद, सुख-स्वरूप श्रीधाम के मधुर नामों को ही रट।
बार-बार तो बनत नहिं
मानव-तन की प्राप्ति, श्री वृन्दावन का निवास, रसिक भक्तो का संग अवं श्री श्यामा श्याम युगल रूप की इष्टता का यह अनुपम संयोग जीवन में अथवा अन्य जीवनो मे...
जुगल-प्रेम रस-सार सर
रसिक युगल श्री लाड़िली-लाल के सर्वोपरि प्रेम-रस-सार के सरोवर में केवल हंस-स्वरूप रसिक ही अवगाहन करने में समर्थ होते हैं। शेष जगत के विषय-रस-रंजित कौओं...
सुरपति-पसुपति-प्रजापति
जहाँ का वैभव देखकर स्वयं ब्रह्मा, शिव और इन्द्रादिक भी बौरा (मोहित) जाते हैं, उस श्रीवृन्दावन की महिमा और वहाँ के रस की विभूति भला और कौन जान सकता है?
कहँ तू कहँ वृन्दाविपिन
हे मन! कहाँ विषय-वासना में रमा हुआ तू, और कहाँ परम सच्चिदानन्दघन वृंदावन। हित-कृपा से ऐसा सुंदर सुयोग प्राप्त हुआ है; अतः इस बात को भली-भाँति समझकर अप...
छिन छिन बन की छवि नई
युगल को प्रसन्न करने के लिए वृन्दा सखी नित्य नये-नये प्रकार से वृन्दावन का श्रृंगार करती हैं। उनके हृदय की रुचि को भली-भाँति जानकर सेवा करती हुई वृन्...
आवत लाल-प्रिया भुज जोरैं
श्री प्रिया लाल परस्पर बाहुबद्ध हुए निकुञ्ज-भवन से निकल कर आ रहे हैं। वे आलस्य के रस में भींगे हुए डगमगाते हुए चल रहे हैं। उनकी नेत्र-तटी अरुणिम है। ...
जुगल रूप की झलक उर
श्री श्यामा-श्याम के दिव्य अति-मधुर रूप की झलक नयनों में बनी रहे और उसी सुख के रंग में मन भी सदा रंगा रहे।
भुवन चतुर्दश आदि दै
चौदह भुवन पर्यन्त सब नाशवान हैं; परंतु यह एक मात्र श्रीवृन्दावन धाम सहज-सुख-धाम है, अविनाशी है।
मेरी लाडिली राजत रंग भरी
श्री हित ध्रुवदास जी कहते है कि मेरी आराध्या लाड़िली-किशोरी सदैव आनंद से परि-पुरित ही रही आती हैं। जब कभी वे अत्यधिक प्रेम से भर कर अपनी सुकोमल भूजलता ...
अनियारे नैन-सर बेध्यौ
श्री लाड़िली के नुकीले नयन-बाणो ने प्रियतम के मन को बींध दिया है, जिससे वे जके-थके से शिथिल एवं शक्ति-रहित हो गये हैं। [1] प्रिया के नेत्र सहज कजरारे ...
यद्यपि राजत अवनि पर
धरा-धाम पर विराजमान होते हुए भी श्रीवृन्दावन सर्वोपरि है, जिसकी वंदना स्वयं लक्ष्मीपति करते हैं; उसके समान और कौन हो सकता है?
पाइ रतन चीन्हौं नहीं
यह मानव-देह एक अनमोल रत्न के समान है, जिसे प्राप्त करके भी तू अज्ञानवश व्यर्थ गँवा रहा है। यह तो वैसा ही है जैसे कोई अपने हाथों से ही अपनी बहुमूल्य सं...
वन्दावन कौ जस सुनत
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं— श्री वृन्दावन की महिमा सुनकर जिनके हृदय में उत्साह और हर्ष उत्पन्न नहीं होता, उनका स्पर्श भी नहीं करना चाहिए; उनके संग का त...
भजन-महल में निकसत नाहिंन
भागवत धर्म की श्रेष्ठता यह है कि भगवान् का भजन करने वाला भक्त भजन रूपी महल में ही रहता है उसे वहाँ से निकलने की न इच्छा होती है और न ही उसे अवकाश है। ...
कोमल चित्त सब सौं मिलै
हृदय अत्यंत कोमलता से युक्त हो और सबसे कोमल चित्त से ही मिलें; व्यवहार में कभी भी कठोरता न लाएँ। जो सब प्रकार की इच्छाओं तथा राग-द्वेष से रहित है, उसक...
देह स्वाद छुटि जाहिं सब
इस देह के समस्त भौतिक स्वाद और आसक्तियाँ छूट जाएँ, चाहे यह शरीर कितना ही क्षीण (दुर्बल) क्यों न हो जाए। बस मेरे हृदय में भगवत्-प्रेम का रंग बढ़ता रहे ...
या मन के अवलंब हित
मैंने तो अपने मन को कुछ आधार देने के लिए यह उपाय किया है, जिससे श्री वृन्दावन-रस का वर्णन करते हुए मन और बुद्धि कभी इसमें लग जाएँ।
आप सहित सब चतुर्भुज
ब्रह्मा जी ने जब स्वयं सहित चारों ओर श्री वृन्दावन को निहारा, तो सबको ही चतुर्भुज रूप में पाया। यहाँ का वैभव देखकर वे अपनी प्रभुता सर्वथा भूल गए और उन...
परम रसिक नागर नवल
परम रसिक नव-नागर प्रियतम को केवल दो ही बातें प्रिय लगती हैं—प्रथम, नवल किशोरी प्रिया की छवि का दर्शन; और द्वितीय, उनके श्रीमुख से निकले मधुर वचनों का ...
अलबेली चितवनि मुसिकनि अलबेली
श्री लाड़िली की विलक्षण चितवन, मनमोहिनी मुस्कान एवं ललित पदन्याय ने श्री लाल का मन हरण कर लिया है। [1] उनके छवि-निर्झरण से वृन्दावन की समस्त भूमि छबि...
हंस सुता तट बिहरिबौ
वृन्दावन रस के अनन्य रसिक उपासक को चाहिये कि वह प्रथमतः दृढ़तापूर्वक विरक्तभाव से वृन्दावन वास करे एवं श्री यमुना तट का सेवन करे। युगल की कुञ्ज-क्रीड़...
यद्यपि धावत विषै कौं
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि मैंने ऐसे वृंदावन की शरण ली है, जहाँ चंचल मन यदि विषयों की ओर दौड़ने भी लगता है, तो भजन बीच में ही उसका हाथ पकड़कर उसे स...
नहिं सो माता पिता नहिं
वे माता-पिता, मित्र या पुत्र भी अपने नहीं हैं, जो वृंदावन-वास में व्यवधान डालते हैं।
चलत फिरत सुनियत यहै
जहाँ चलते-फिरते “श्री राधावल्लभ लाल” का ही नाम सुनाई पड़ता है, ऐसे श्रीवृन्दावन में नित्य वास करना चाहिए।
रूप-रसीली हँसीली छबीली रँगीली
सरस रूपमयी मन्द-स्मिता छबि आगरी एवं रंग रंगीली प्रिया रसिक रँगीले लाल को अपने प्राणों से भी अधिक प्यारी हैं। [1] उनके सुन्दर, लजीले, रतनारे, विशाल नय...
भक्त आहिं बहु भाँति के
भगवान के भक्त अनेक प्रकार के होते हैं और उनके भावों में भी अनेक भेद होते हैं—दास्य, सख्य आदि। इसलिए जो साधक भक्तों के इस तारतम्य को बिना समझे संग करता...
जो कोउ साँची प्रीति सौं, 'हरि-हरि' कहत लड़ाइ
यदि कोई व्यक्ति सच्चे प्रेम और लाड़-चाव से श्री हरि का नाम लेता है, तो उस प्रेमी को वे क्या-क्या दे सकते हैं—इसका अनुमान लगाना भी कठिन है।
मेरी अखियाँ रूप के रंग रँगीं
हे सखि ! मेरे नेत्र रूप के रँग में रँग गये हैं। वे चन्द्रमा रूपी युगल किशोर के बदनारविन्द की शोभा के रस में पगे हुये हैं। [1] मेरे ये नेत्र लडिली लाल...
रे मन अरु सब छाँडि कै
हे मन! यदि तू सब ओर से सिमटकर कहीं अटकना अथवा स्वयं को स्थिर करना चाहता है, तो वह रमणीय स्थल श्री वृन्दावन की सघन कुंजें हैं, जहाँ रसिक-शिरोमणि श्यामा...
श्री राधावल्लभ लाल की आरती
श्री राधावल्लभ लाल की आरती जो कञ्चन निर्मित मणिमयी एवं रत्न जटित है, सहचरियाँ प्रीतिपूर्वक वार (उतार) रही हैं। [1] आरती के समय श्री राधावल्लभ लाल के ...
भयौ न रसिकन संग जौ
रसिक भक्तों के संग के अभाव में और प्रेम-रंग में रंगे बिना मन वश में नहीं होता, जैसे पारस-मणि के स्पर्श के बिना लौह-धातु कदापि स्वर्ण-रूप में परिवर्तित...
पिय-प्यारी के पद-कमल
श्री ध्रुवदास जी मन को सावधान करते हुए कहते हैं— ‘हे मन! तू श्री लाड़िली-लाल के चरण-कमलों का ही अहर्निश ध्यान करता रह और अनन्य-भजन की परिपाटी में अन्य...
मन तौ चंचल सबनि ते
यह मन सबसे अधिक चंचल है। इसकी चंचलता के निवारण के लिए कौन सा उपाय किया जाए? इस साधन के लिए केवल दो ही मार्ग सहायक हैं: या तो निरंतर श्री हरि का भजन क...
जौ चाहत है नित्त सुख
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि यदि तुम सदैव सुख और शांति चाहते हो, तो प्रतिपल प्रीतिपूर्वक श्री श्यामा-श्याम का भजन करते रहो।
युगल प्रेम रसमाधुरी
आश्चर्य की बात है कि विषयों में आसक्त जीव नित्य दुःख देने वाले मायिक फलों का ही आस्वादन करता फिरता है, किन्तु नित्य आनंद देने वाली युगल प्रेम-रस-माधुर...
एक बार जिनि नाम लिये
जो एक बार भी दीन होकर प्रेम से श्री हरि का नाम ले लेता है, दयालु हरि उसे कभी नहीं छोड़ते; सदा उसे अपना बना लेते हैं।
उलटौ पंथ है प्रेम कौ
प्रेम का मार्ग सर्वथा उलटा और अनोखा है, जहाँ मन का अहंकार और उसकी गति समाप्त हो जाती है; इसी कारण इस प्रेम-पंथ में अपनी स्तुति अप्रिय लगती है और अपमा...
रूप की नौलासी देखैं फूल की नौलासी सखी
रूप और कोमलता की फूल-छड़ी समान प्रिया, नवल रंगीले लाल के प्रेम में शिथिल हाथों से ऐसे फिसल गईं जैसे फूल की डाली किसी के हाथ से धीरे-धीरे सरक जाए। [1] ...
ज्ञान भजन जो करहु बहु, कौन करै बकवाद
कुछ लोग ज्ञान मार्ग से परम तत्त्व को पाने के लिए बहुत प्रयास करते हैं, लेकिन वास्तव में यह सब व्यर्थ का श्रम है; यदि आप बहुत सारे व्यंजन बनाते हैं, त...
देखौ अद्भुत प्रीति की चालहि
नव निकुंज देश की कोई सहचरी अपनी सहेली से कहती है - हे सखी ! प्रीति की अध्भुत गति का अवलोकन तो करो, जहॉ प्रिया अपने प्रियतम को प्रीति पूर्वक हृदय पर ऐ...
रूप-बेली प्यारी बनी, प्रीतम प्रेम-तमाल
श्री प्रिया जी (राधा) साक्षात् रूप और लावण्य की सुकोमल लता हैं, और उनके प्रियतम श्री कृष्ण प्रेम के सुदृढ़ तमाल वृक्ष हैं। जिस प्रकार एक स्वर्ण-लता तम...
सोने ते सुरंग गोरी सौंधे सौं सुवास अति
वृन्दावनेश्वरी श्री राधा की गौरवर्णी अंग-कान्ति तप्त स्वर्ण की प्रभा से भी अधिक चमकदार और तेजस्वी है। उनके दिव्य अंगों की सुगंध ऐसी प्रतीत होती है मान...
वृंदावन रस अति सरस है कैसो करूँ बखान
हे जीवों! वृन्दावन-रस इतना आनंदित एवं सरस है कि कोई भी इसे बखान नहीं कर सकता। यहाँ तक कि भगवान विष्णु का "वैकुण्ठ धाम" भी इसकी तुलना में बेस्वाद है।
जो कह्यौ श्री हरिवंश रस बिरलौ समुझनहार
श्री हित हरिवंश महाप्रभु ने जिस दिव्य वृन्दावन रस का वर्णन किया है, उसे समझने वाला कोई विरला (अत्यंत दुर्लभ) ही होता है। ऐसे रसिक जन पूरे संसार में खो...
ठौर-ठौर पिय रचत हैं आसन कुसुम रसाल
प्रियतम श्री कृष्ण मार्ग में जगह-जगह पुष्पों के सुंदर आसनों का निर्माण करते हैं, यह सोचकर कि न जाने कहाँ अलबेली सरकार श्री राधिका विश्राम करेंगी।
सब धर्मनि में भ्रमै जिनि, जुगल चरन चितलाइ
अन्य समस्त धर्मों की भटकन छोड़कर युगल-चरणों को ही हृदय में धारण करना चाहिए। जैसे परदेश से आए व्यक्ति का दुःख घर आ जाने पर मिट जाता है, वैसे ही जीव परम...
सबै अंग गुनहीन हौं
सर्वप्रथम, मैं तो सर्वथा गुणहीन और किसी भी साधन या यत्न से रहित हूँ। यह निश्चित है कि वृन्दावन-रस की प्राप्ति न तो अपने पुरुषार्थ से होती है और न ही क...
हित ध्रुव यह रस मधुर है
यह मधुर रस उपासना समस्त साधनों का सार और अगाध तत्त्व है। यह हृदय में तभी प्रकट होती है जब युगल सरकार श्री राधा-वल्लभ अपनी कृपा बरसाते हैं।
तीन लोक कौ राज सुख
श्री वृंदावन की रज एवं प्रेम-रस के आगे तीनों लोक का राज-सुख, वैभव आदि कुछ भी नहीं है। यदि उसे तुला पर रखकर तोलें, तो उस वृंदावन प्रेमी के पल-भर का प्र...
छबीली छबि सौं रँगीले दोउ
सुहावनी छवि से युक्त रंगीले युगल यमुना तट पर विराजमान हैं। उनके युगल-गौर तनु पर अंग-अंग के भूषण प्रतिबिम्भित हैं। [1] साथ में सखियों के समूह हैं और श...
प्रेम रंग सौं रँगे जे
जिनके चित्त युयुगल किशोर के प्रेम-रंग में रँगे हैं और जो इस रस के अतिरिक्त हृदय में किसी अन्य साधन-भजन को स्थान नहीं देते, एकमात्र वही अद्भुत वृंदावनी...
कंचन के वरन चरन मृदु प्यारीजू के
श्री प्रियाजी (राधा) के कोमल चरण स्वर्ण की आभा से दमकते हैं, और उन पर सजी लाल जावक की रंगत प्रियतम के हृदय को आकृष्ट करने वाली है। [1] श्री हित ध्रुव...
भजन-रंग सतसंग मिलि
श्री ध्रुवदास जी का कथन है कि रसमय भजन का सुख, रसिक संतों का संग तथा श्री वृंदावन में वास—ये सभी केवल कृपा-साध्य हैं। इसलिए इस दुर्लभ अवसर का मूल्य सम...
यह रस नित्य-विहार बिनु
यह दिव्य प्रेम-रस “नित्य-विहार” के बिना न तो कहीं प्रत्यक्ष देखा गया है और न ही श्रवण में आया है। इस नित्य-विहार में प्रेमी और प्रेमास्पद की प्रीति, स...
अब तौ आहि यहै भली
अब तो सबसे भली यही है कि सब से मोह मिटा कर रसिक अनन्यों का संग करके श्यामा श्याम को लाड़-प्यार करना चाहिए।
आराधहि मन राधा दुलहिनि
हे मेरे मन ! तू श्री राधा नामक नित्य नव-वधू नवल-किशोरी की ही आराघना कर, जिनकी आराधना रसिक शेखर श्री विहारीलाल भी सदा करते हैं। [1] वे अपनी आराध्या श्...
सनेही एक विहारी-विहारिनि
अखिल विश्व-ब्रह्माण्ड में यदि कोई प्रेमी है, तो वह केवल श्री वृन्दावन निकुञ्ज-विलासी विहारी-विहारिणी श्री लाड़िली-लाल ही हैं, जो केवल अनन्य प्रेम की र...
रसिक सिरोमनी रसिक पिय, जानत रस की रीति
रसिक शिरोमणि श्री कृष्ण चन्द्र रस रीति के परम ज्ञाता हैं और उन्होंने प्रभुत्व को त्याग कर प्रेम को महत्व दिया है। तभी तो वे प्रेम के वशीभूत होकर परम द...
श्री राधावर भज श्री राधावर भजि
श्री हित ध्रुवदास जी रसिक उपासकों को उपदेश करते हैं कि तुम श्री राधावल्लभ का ही भजन करो, केवल श्री राधावल्लभ का ही भजन करो और अन्य धर्मों को सर्वथा त्...
सुनि ध्रुव ऐसी चाहियै, छाँड़ि जगत की रीति
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि यदि इस रस-मार्ग में आगे बढ़ना है तो जगत के व्यवहार को छोड़कर युगल के कोमल एवं सुंदर चरणारविन्दों से ही अनन्य प्रीति करनी ...
ह्वै अनन्य इक-रस गहै
रसिक उपासक को चाहिए कि वह अनन्य भाव से श्री वृंदावन की रस रीति का दृढ़तापूर्वक निर्वाह करे, एवं विधि-निषेधादिक धर्मों को कदापि स्वीकार न करे, केवल रसम...
चढ़ि कै मैन तुरंग पर
मोम के अश्व पर बैठ कर धधकती हुई अग्नि ज्वाला में से होकर निकल जाना जितना कठिन है, उतना ही कठिन है, प्रेम-मार्ग पर चलना। प्रायः इस पथ का निर्वाह सब से ...
ढूँढ़ि फिरै त्रैलोक जो
कोई त्रिलोकी में ढूँढ़ता फिरे तो भी उसे ऐसे सहज प्रेमी कहीं देखने को भी नहीं मिलेंगे जैसे साक्षात् प्रेम स्वरूप श्री राधा कृष्ण सदा एकरस वृन्दावन की न...
प्रीतम हू कैं प्रन इहै प्रीति के बस ह्वै जाहिं
प्रियतम श्री लाल जी (श्री कृष्ण) की यही प्रतिज्ञा है कि वे सदा प्रेम के वशीभूत ही रहते हैं, किन्तु प्रेम से विहीन कोटि-कोटि धर्माचरण करने वालों की ओर ...
अब की देही मनुज की
नाना योनियों में भटकने के पश्चात् न जाने किस भाग्योदय के फलस्वरूप इस बार यह अमूल्य मनुष्य देह प्राप्त हुआ है, अतएव युगल किशोर के चरण कमलों से अटल अनु...
ऐसी करौ नव लाल रंगीले जू
हे नित्य नव-रंग रंगीले लाल (श्री कृष्ण)! ऐसी कृपा करो कि मेरा यह चित्त आपको छोड़कर अन्यत्र कहीं आकर्षित न हो। [1] प्रारब्धयोग से प्राप्त होने वाले दे...
कुँवरि-कुँवर दोउ रसिक वर, सब सखियनि के प्रान
युगल रसिकवर किशोर एवं किशोरी समस्त सखियों के प्राण हैं। इस रसिक दम्पति का सुख ही तत्सुखमयी सखियों का आस्वाद सुख है। इस सुख के अतिरिक्त इनकी अन्य कोई ग...
अब लगि मन कीन्हौ सोई , जो जो कह्यौ तैं मोहि
हे मन ! अब तक तूने जो कहा, वही मैं करता रहा हूँ। अब तू मेरा इतना कहा मान ले कि तू श्री श्यामा-श्याम के चरणों का ध्यान-दर्शन करता रहेगा।
राधिकावल्लभ प्यारी सोहै तन नील सारी
श्री वल्लभ लाल जू की प्रिया श्री राधिका के सुन्दर तन पर नील वर्ण की साड़ी एवं सुगन्ध से सनी हुई सुन्दर कञ्चुकी भली प्रकार कसी हुई शोभित है। [1] उनके ...
सब तें कठिन उपासना प्रेमपंथ रस रीति
प्रेम-मार्गीय रस-रीति की उपासना सब उपासनाओं से कठिन है। श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि राई के समान किंचित भी मन के विचलन से प्रेम प्रीति में अन्तराय पड...
रहे चकि लाल चितै मुख बाल
नवयुवती प्रिया (श्री राधा) का मुखकमल देख श्री लाल (श्रीकृष्ण) चकित रह जाते हैं, और उनका मन प्रियाजी के रूप की लहरों में झूमने लगता है। [1] छिन-छिन उन...
सब तजि जुगल-किसोर भजि
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि यदि आप परम शांति की कामना रखते हैं, तो सभी सांसारिक आसक्तियों का त्याग करके श्री श्यामा-श्याम का भजन करें। मन-वचन से...
भजन कुँडलिया में रहौ
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं—हे उपासको! भजन रूपी कुण्डली (घेरा) के भीतर ही निवास करो। कुण्डली से एक पग भी बाहर मत जाओ और अनन्य भाव से केवल श्री लाड़िली -...
खेलत बसंत होरी नवल छबीली जोरी
नवल छबि धाम युगल आज ऋतुराज वसन्त आगमन पर होली का शुभारम्भ करते हुए अनुराग की गुलाल उड़ा रहे हैं। [1] उनकी मन्द मधुर मुसकान एवं ह्दय का उल्लास ही पुष...
ऐसौ और सनेही कौन
रसिक शिरोमणि श्रीलाल जी (श्री कृष्ण) के अतिरिक्त ऐसा और कौन रँगीला-प्रेमी है, जो चौदह लोकों के ऐश्वर्य-वैभव तथा स्वामित्त्व का त्याग करके केवल एक प्रे...
गरजनि घन अरु दामिनी
वर्षा ऋतु के आगमन पर मेघों की गर्जना, विद्युत की चमक, चातक, कोयल, शुक और मोर के मधुर स्वर वातावरण को सुखमय बना रहे हैं। काजल से भी अधिक काले बादल चार...
प्रीतम के प्रान प्यारी
श्री राधा श्री कृष्ण के प्राण हैं और श्री राधा के प्राण हैं श्री कृष्ण। ऐसे प्रेम-राशि युगल परस्पर एक दूसरे की छवि का निरंतर अवलोकन करते रहते हैं, तथा...
प्रान दियैं यह प्रेम न पैयै
हे सखि ! प्राणों का उत्सर्ग करने पर भी लाड़िली-लाल का यह सर्वोपरि प्रेम नहीं मिलता, ऐसा विलक्षण-मूल्यवान् अर्थात् महँगा है यह प्रेम, अतएव हे सखि ! तुम...
नख-सिख मोहनि सोहनी
नित्य-नवेली श्री राधा नख-शिख पर्यन्त परम सुहावनी एवं मनमोहनी हैं। उन पर कोटि-कोटि रति एवं साक्षात् महालक्ष्मी भी न्यौछावर हैं। यद्यपि प्रियतम श्याम-स...
यह सुख समुझन कौं कछू
वृन्दावन रस का अनुभव किसी साधन या उपाय से संभव नहीं है। केवल श्री किशोरी जी की निष्कारण (अहैतुकी) कृपा ही इसका द्वार खोल सकती है। जब उनकी कृपा-बल से प...
मन वच काइक एक रस धरे महा व्रत प्रेम
मन, वचन और देह तीनों को एक-रस रखकर अर्थात पूरी एकाग्रता से, केवल एक प्रेम का महाव्रत धारण किए हुए, रसिक कुँवर लालजू (श्री कृष्ण) श्रीराधा की सेवा में ...
अवधि प्रेम की दोऊ प्यारे
हे सखि ! हमारे युगल किशोर प्रेम की चरम सीमा हैं। इनका तन, मन और नेत्र — सब एक हो गए हैं, ये कभी एक-दूसरे से विलग नहीं होते। [1] दोनों अपने-अपने प्रेम...
न्यारौ है सब लोक तें
श्री राधामाधव युगल का निज-गृह स्वरूप यह श्रीवृन्दावन सब लोकों से न्यारा और सर्वोपरि है, जहाँ युगल सहज प्रेम में मत्त होकर सतत विहार करते हैं।
हारनि के भार भारी ऐसी सुकुमारी प्यारी
प्रियतम की प्यारी श्री राधा ऐसी सुकुमारी हैं, जिन्हें हारावली का अल्प सा भार भी बहुत भारी प्रतीत होता है, फिर भी प्रेमावेश में उन्होंने रसिक रँगीले ला...
छुवत न रसिक रँगीलौ लाल प्यारी जूको
रसिक रंगीले प्रियतम श्री कृष्ण श्री प्यारी जू के कोमल अंगों का स्पर्श तन से तो क्या, मन के हाथों से भी करने की कल्पना नहीं कर पाते हैं। [1] सहज सुकु...
कैसौ फव्यौ है नीलांबर सुंदर
हे सखी! श्री प्रिया के गौर अंग पर नील निचोल की आभा कितनी अद्भुत प्रतीत हो रही है, जिसने स्वयं मनमोहन श्रीलाल जी के हृदय को भी मोहित कर लिया है। [1] उ...
बसिवौ वृन्दाविपिन कौ
अपने मन में वृन्दावन वास का दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिए और ऐसा दृढ़ व्रत लेना चाहिए कि यह देह वृन्दावन रज में ही पड़ा रहे (एवं मिल जाए)।
सारद जो सत कोटि मिले
यदि कोटि-कोटि सरस्वती कल्पों तक विचार करें, तब भी श्री वृन्दावन के सुख-सम्पत्ति अर्थात् वृन्दावन रस का पार नहीं पा सकते।
प्यारीजू की मुसकनि, बीजुरी सी कौंधी जाति
श्री प्रिया जू की मुस्कान विद्युत की भांति अत्यंत चमत्कृतपूर्ण है, जो प्रियतम के हृदय में एक रेखा की तरह खिंच जाती है और हटाए नहीं हटती, अर्थात कभी व...
सकल आयु सत कर्म में
यद्यपि किसी व्यक्ति ने जीवनपर्यंत केवल सत्कर्म ही संचित किए हों, तथापि श्रीहरि के अनन्य भक्तों के प्रति किया गया लेशमात्र (सूक्ष्म) अपराध भी उसके समस...
शिव-विधि-उद्धव सबनि कैं
शिव, ब्रह्मा, उद्धव आदि के मन में यही आशा रहती है कि हम श्री वृन्दावन की कोई लता या वृक्ष होकर श्री वृन्दावन रज को नित्य शिरोधार्य कर सकें।
जिनकौ वृन्दाविपिन है
श्रीवृन्दावन धाम जिनका निज स्वरूप और क्रीड़ा-स्थल है (अर्थात् श्रीराधारानी का), केवल उन्हीं की अहैतुकी कृपा से ही कोई जीव यहाँ वास कर सकता है; अन्यथा ...
सकहि तौ वृन्दाविपिन बसी
प्रत्येक क्षण आयु नष्ट हो रही है, यदि कर सकते हो तो वृन्दावनवास करो। अभी अवसर बना है, फिर ऐसा संयोग नहीं बनेगा।
जिनके है यह प्रेम रस
जिनको इस प्रेम-रस का अनुभव है, वे ही इसकी रीति जानते हैं। वे कि प्रेम के क्षेत्र में वही जीतता है जो सम्पूर्ण रूप से अपनी पराजय स्वीकार कर लेता है।
कोटि-कोटि रसना जो रोम
यदि शरीर के प्रत्येक रोम से कोटि-कोटि जिह्वाएँ प्रकट हो जाएँ, तब भी रूप-राशि प्रिया के अनंत सौंदर्य और माधुर्य का सीमित वर्णन करना असंभव ही रहेगा। [1]...
सोभित आज छबीली जोरी
आज श्री लाड़ली लाल की छवि पूरित जोड़ी अनुपम शोभा दे रही है। सुन्दर एवं नित्य नव-नवायमान् रूप लावण्य-धाम रसिक मन-मोहन श्रीलाल जी और रूप विलक्षण नित्य न...
सुनि लै मेरी बात जुगल चरन चित लाइयै
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि मैं अपने हृदय की गुह्यतम बात कहता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो — अपने मन को नित्य श्री श्यामा-श्याम के चरणों में ही लगाओ। यह जो ...
फूलि चले दोउ फूलनि कुंज ते
फूलों की कुञ्ज से निकल कर प्रसन्न मन युगल-किशोर श्रीवन की पुष्प लताओं की शोभा को देखते हुए चले आ रहे हैं। [1] वे ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, मानो छबि के यु...
सहज सुभाव पर्यौ नवल किशोरी जू कौ
श्री राधा रानी के स्वभाव का वर्णन करते हुए श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि हमारी किशोरीजी का स्वभाव अत्यंत ही सरल और मधुर है। ये मृदुता, कृपालुता और दयाल...
सखी सबै उडगन मनौं
श्री वृंदावन नित्य विहार के नित्य नव निभृत निकुञ्ज विलासी चतुर्व्यूह परिकर का संक्षिप्त परिचयात्मक रूपक प्रस्तुत करते हुए श्रीहित ध्रुवदास जी कहते हैं...
रूप की रासि किसोर-किसोरी
रूप और माधुरी की निधि, श्री लाड़िली-लाल वृन्दावन धाम के मधुर निकुंजों में नित्य विहार परायण रस-केली में अनुरक्त हैं। वे प्रेम की समस्त कलाओं में पारंग...
वृन्दावन सत रतन की
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि मैंने श्री वृन्दावन-यशरूपी सौ रत्नों की माला गूंथकर बनाई है। जिसके मस्तक पर इसे धारण करने का सौभाग्य-संयोग लिखा होगा, वही...
छबि सौं छबीली खरी प्रीतम के रसभरी
प्रियतम के प्रेम में डूबी हुई, अद्भुत आभा से युक्त, सौंदर्यमयी लाड़िली ऐसी शोभा धारण किए खड़ी हैं कि उनकी नख-छटा के सामने कोटि-कोटि विद्युत् की चमक भी...
जुगल प्रेम रस मगन जे
जिसे इस रस ने स्पर्श नहीं किया, अर्थात् जो इस रस-मार्ग से अनभिज्ञ हैं, उनके संसर्ग से बचना चाहिए। जिन्हें इस रस में तनिक भी रुचि नहीं, उनसे हमारा कोई...
वृन्दावन आनन्द घन
यह श्री वृन्दावन परमानन्दस्वरूप, सर्वोपरि और सर्वोत्कृष्ट है; और इधर मैं पतितों का सिरमौर—इसे कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?
वृन्दावन सत जो कहै
जो कोई इस वृन्दावन-शत-लीला को भावपूर्वक कहेगा अथवा सुनेगा, उसके हृदय में वृन्दावन का प्रकाश सदा झिलमिलाता रहेगा।
भाँति भली नवकुंज विराजत
आज नव निभृत निकुञ्ज में, रसिक श्री राधिका एवं वल्लभ लाल अति सुन्दर छवि से भली भाँति विराजित हैं। [1] प्रियतम ने नित्य विहारिणि प्रिया को अमूल्य निधि प...
कुंज ते निकसि दोऊ ठाढ़े जमुना के तीर
हे सखि! श्री लाड़ली-लाल दोनों ही अपने कुञ्ज से निकलकर यमुना के तट पर खड़े हुए हैं, और लाड़ली प्रिया आज कुछ विलक्षण छबि-छटा से युक्त हैं। [1] उनके नि...
श्री प्रिया वदन छबि चंद मनौं
श्री प्रिया का मुख मानो चन्द्र के समान है, और प्रियतम श्रीकृष्ण के नयन मानो चकोर पक्षी के समान हैं, जो नित्य ही उस प्रेममयी सुधा-माधुरी का पान करते रह...
प्रगट जगत में जगमगै
संसार में प्रकट रूप से अनुपम वृन्दावन झिलमिला रहा है और सुशोभित हो रहा है; फिर भी जीव उस रस-स्वरूप का अनुभव नहीं कर पाता—यह भी माया का ही रूप है।
हौं निज सखियनि की बलिहारी
श्री ध्रुवदास जी कहते है कि मैं नित्य विहारिणी श्री प्रिया की निज सहचरियों की बलिहारी जाता हूँ, जिनका आस्वादनीय जीवन अमृत है - लाड़िली-लाल युगल के प्...
अब तो ऐसी चित्त धरि
रे मन! तू ऐसा निश्चय कर कि अब मुझे श्री प्रिया-प्रियतम के चरणों के प्रेम में ही रंग जाना है। तत्पश्चात् तू प्रतिपल उन प्रिया-प्रियतम की अतिशय मधुर लील...
राधिका वल्लभ प्यारी, सहजहि सुकुँवारी
प्रियतम श्री लाल जी की प्रिया श्री राधा सहज ही अङ्ग-प्रत्यङ्ग कोमलाङ्गी, गुणों की भण्डार तथा रस एवं रूप की राशि हैं। [1] उनके सुदीर्घ नयन सलज्ज तो है...
रे मन रसिकनि-संग बिनु
वृन्दावन-रस की प्राप्ति का एकमात्र साधन रसिक संतों का संग और उनके चरणों में पूर्ण समर्पण ही है। इसके अतिरिक्त किसी भी अन्य साधन, उपाय या प्रयास से उस ...
मन गज तजि कै विषै मग
हे मन रूपी हाथी! विषयों (संसारिक भोगों) के मार्ग को छोड़कर अब युगल किशोर के रसमय भजन मार्ग पर चल। श्री राधावल्लभ लाल के बिना तेरा इस संसार में कोई भी अ...
वृन्दावन इहि विधि बसे तजि के सब अभिमान
श्री वृन्दावन धाम में वास करने की यही विधि है कि मनुष्य अपने समस्त अहंकार का त्याग कर दे। जो स्वयं को तिनके से भी अधिक नीचा समझता है, वही वास्तव में य...
वृंदावन प्यारो अधिक
श्रीकृष्ण को श्री वृन्दावन अत्यन्त प्रिय है—उनका वृन्दावन से अपार अनुराग है, क्योंकि यहीं उनकी प्राणों से भी अधिक प्रिय लाड़ली श्री राधारानी यहाँ निर...
अंग अंग सब लाल के
श्री श्यामसुन्दर का अंग-अंग श्री प्रिया की ओर झुका रहता है, अर्थात् वे सम्पूर्ण रूप से श्री प्रिया में आसक्त रहते हैं। उनके मन में सहज प्रेम का ढाल ल...
वृन्दावन तो आनंद घन
अरे मन, जीवन क्षणभंगुर है, पशु की भाँति विषय-भोग में इसे खोना छोड़कर, आनंद-घन श्री वृन्दावन का चिंतन क्यों नहीं करता?
नवल किशोरी कुँवरि की सहजहि ऐसी बानि
श्रीराधारानी का यह सहज स्वभाव एवं विरद है कि जो भी एक बार उनकी शरण में अनन्य भाव से आ जाता है, वे उसका साथ कभी नहीं छोड़तीं।
वृंदावन की लता सम कोटि कलप तरु नाहिं
करोड़ों कल्पतरु वृन्दावन की एक लता की तुलना नहीं कर सकते। यहाँ की रज के तुल्य वैकुण्ठ भी नहीं हैं, तो अन्य लोकों की तो चर्चा ही क्या करना।
कुंवरी किशोरी नाम सौं उपज्यो दृढ़ विश्वास
परम उदार श्री राधा के नाम का सुदृढ़ विश्वास मेरे हृदय में उत्पन्न हुआ है और उनकी करुणा एवं हृदय की कोमलता का विश्वास करके मेरे हृदय में आशा बढ़ चली ह...
प्यारी जू की भौंहनि की
अरी सखि! हमारी प्रिया जी की स्वाभाविक बंक भृकुटियों के नर्तन ने सभी का मन तो मोहा ही है, अब तो मनमोहन श्रीकृष्ण का हृदय भी इस नर्तन की मरोड़ में बिंध ...
उपमा वृन्दाविपिन की
स्वयं श्री युगल किशोर जिसकी महिमा का गान कर सुखी होते हैं, ऐसे अतुल्य, अनिर्वचनीय, रसस्वरूप श्री वृन्दावन की समता किससे की जाए।
लोक चतुर्दश ठकुरई
यदि एक ओर चौदह भुवनों का समस्त ऐश्वर्य और असीम सम्पत्ति भी सुलभ हो, तो भी रसिक साधक को उस नश्वर सुख का परित्याग कर देना चाहिए। उसे तो केवल रसिकों के प...
ऐसे रस में दिन मगन
अद्भुत श्रीवृन्दावन-रस में निरंतर निमग्न रहने के कारण, यहाँ के रसिकों को अपने देह-गेह की कोई सुध-बुध नहीं रहती और वे काल (समय) की सीमाओं से सर्वथा परे...
पत्र फूल फल लता प्रति
श्रीवृन्दावन के प्रत्येक पत्र, पुष्प और नव-निकुंज की लताओं को रसिक-शिरोमणि प्रियतम श्रीकृष्ण अपलक निहारते रहते हैं। इसका रहस्य यह है कि इन सभी को किश...
नाते जेते जगत के
जगत के जितने भी सम्बन्धी हैं, वे सब मिथ्या हैं एवं एक अवधि तक ही सीमित हैं। वृन्दावन धाम जो श्रीकृष्ण की भाँति ही सच्चिदानन्दमय है, उसे पहचानो।
वृंदावन के गुनन सुनि
वृन्दावन के गुण श्रवण करो, प्रेम-भावपूर्वक यहाँ की रज में लोटो। इस सुख की बराबरी अनन्त मुक्ति-सुख भी नहीं कर सकते।
बसिबौ वन्दाविपिन कौ
श्री वृन्दावनवास जैसे-तैसे भी दृढ़ हो, निश्चित हो, ऐसा प्रयत्न करना चाहिए। यह अवसर बिल्कुल किसी भी हाल में खोना नहीं चाहिए।
संग सोई जाके मिले भूलै गृह व्यौहार
श्रीध्रुवदासजी का कथन है कि रसोपासना के मार्ग में साधक को केवल उन्हीं का संग करना चाहिए, जिनके सान्निध्य में आते ही समस्त सांसारिक व्यवहार विस्मृत हो...
छण भंगुर तन जात है
क्षणभंगुर यह देह काल के गाल में पड़ी है। अतः जीव को विषयों का लोभ त्यागना चाहिए और विषय-सुखरूपी कौड़ी को छोड़कर श्री वृन्दावन रसरूपी अनमोल रत्न प्राप...
रीति भजन की यहै ध्रुव छाँडो सब की आस
श्रीध्रुवदासजी के अनुसार भजन की वास्तविक पद्धति यही है कि साधक इस नश्वर संसार की समस्त आशाओं का त्याग कर, पूर्ण श्रद्धा और अटूट विश्वास के साथ केवल श्...
भजन रस मई विपिन धर
वृन्दावन की भूमि अत्यन्त भजन-रस सहायक (रसरूपी खेत के समान) एवं रसयुक्त है। ऐसा मानकर जो यहाँ निवास करता है, उसके हृदय में प्रेम-बीज निश्चित रूप से अं...
श्रीराधा वल्लभ-लाड़िली, अति उदार सुकमारि
प्रियतम की लाड़-गहेली उदार शिरोमणि सुकुमारी हे श्री राधे ! आपका यह 'ध्रुवदास' अनादिकाल से ही आपको भूला हुआ है, किन्तु आप इसे मत भुला देना। [1] यदि आप...
जहाँ जहाँ राधा प्यारी धरति चरन पिय
जहाँ जहाँ राधा प्यारी अपने सुकोमल चरणों को स्थापित करती चलती हैं, वहां वहां रसिक प्रियतम श्री कृष्ण अपनी आँखों की पलके बिछाते रहते है।
प्रिया मुख निरखत नवल
श्री प्रिया जी के मुख-मंडल का दर्शन करते नवल-किशोर प्रियतम ऐसे दिखते है, मानों राका-पति चन्द्रमा में निवसित अमृत को प्राप्त करने की लालसा से चकित हुआ...
ऐसी गति ह्वै है कबहुँ
हे स्वामिनी! मेरे जीवन में वह अलौकिक क्षण कब आएगा, जब श्रीवृन्दावन की दिव्य छटा का दर्शन करते-करते मेरे नेत्रों से अविरल प्रेमाश्रुओं की धारा बहने लग...
पलकनि के जैसें अधिक
जिस प्रकार आँखों को पलकों से अनन्य प्रेम होता है और पलकें हर क्षण आँखों को रक्षा प्रदान करती हैं, वैसे ही हमें श्रीयुगल सरकार (लाड़ली-लाल) के कमल-चरणो...
कोटि कोटि हीरा रतन
करोड़ों-करोड़ों रत्नादिक, विविध मणि-रूपी जड़ सम्पत्ति का झूठा लोभ त्यागो, केवल एक श्री वृन्दावन को ग्रहण करो।
अलबेली सुकुमारी नैननिं के आगैं रहै
जब तक प्रिया जी प्यारे श्याम सुन्दर के नैनों के सामने रहती हैं, केवल तभी तक श्याम सुन्दर देह में प्राणों का अनुभव करते हैं।
प्रानहूँ ते प्यारी सुकुमारी जू कौं देखत
अपने प्राणों से भी अधिक प्यारी सुकुमारी प्रिया के मञ्जुल रूप और लावण्य का दर्शन करके प्रियतम अपने रूप-दर्शन की पिपासा को रोकने में असमर्थ हो जाते हैं...
बहुत गई थोरी रही
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि जीवन का बहुत बड़ा भाग तो व्यर्थ ही व्यतीत हो गया और अब बहुत थोड़ा ही शेष बचा है; वह भी बड़ी तीव्रता से बीता जा रहा है। ...
जो वाको देखे है जाई, सोइ रूप वन्त है जाई
"जो वाको देखे है जाई, सोइ रूप वन्त है जाई" - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला जो श्री राधारानी की और निहारता है एवं उनका रूप ध्यान करता है वह रूपवान हो जा...
नौतन वैस किसोर छबि
जिस रसिक भक्त के हृदय में नव किशोर वपु श्री लाडिली-लाल सदैव विराजते हैं, उसके चित्त में तो श्री कृष्ण की पौगण्ड, बाल-लीला आदि की भी विशेष रूचि नहीं रह...
जे सेवत वृन्दाविपिन
जो भक्त वृन्दावन का सेवन करते हैं और युगल श्री श्यामा-श्याम के उपासक हैं एवं युगल रस में लीन हैं, वे वैकुण्ठ के सुखों की ओर आँख भर भी नहीं डालते।
नवल-प्रिया छवि बसत रहौ
मेरे नेत्रों में नवलप्रिया श्री राधा की यह ध्यान-छवि सदैव विराजित रहे कि वे प्रियतम के कण्ठ में अपनी ललित बाहुलता अर्पित किए हुए वृन्दावन की सघन लता-...
ऐसी हैं ललित प्यारी लाल जू की प्रान प्यारी
श्री राधा रानी श्री लालजी अर्थात श्रीकृष्ण की प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। ठाकुरजी जब भी किशोरीजी की ओर दृष्टि डालते हैं, वह स्थिर नहीं रह पाती, फिसल...
अवगुण करे समुद्र सम गिनत न अपनों जान
श्रीराधा महारानी के परम करुणामयी स्वभाव का वर्णन करते हुए श्रीध्रुवदास कहते हैं कि समुद्र के समान अनगिनत अवगुण (दोष) होते हुए भी श्रीराधा अपने जीव को...
वृन्दावन दुतिपत्र की, उपमा कौं कछु नाहिं
श्रीवृन्दावन धाम के किसी भी वृक्ष के एक लघु पत्र (पत्ते) की समता करना भी सर्वथा असम्भव है, क्योंकि करोड़ों वैकुण्ठों का ऐश्वर्य और वैभव भी उस एक पत्ते ...
दुर्लभ दुर्घट सबनि तैं
श्री श्यामा-श्याम का निज महल यह वृन्दावन सबके लिए दुर्लभ और दुसाध्य है। नवल श्री राधा की कृपा के बिना इसे कौन प्राप्त कर सकता है?
तजि के वृन्दाविपिन कों और तीर्थ जे जात
श्री वृंदावन धाम जैसे अद्वितीय स्थल को छोड़कर जो अन्य तीर्थों की ओर स्वार्थवश जाते हैं, वे वास्तव में महान मूर्ख हैं — वे मानो विमल और दुर्लभ चिंतामणि...
वृन्दावन कौ जस अमल
वृन्दावन का पावन यश जिस पुराण में नहीं है, उसकी बात कभी मेरे कानों में न पड़े।
वृन्दावन के बसत ही अंतर जो करै आनि
दृढ़तापूर्वक यह जान लो और मान लो कि वृन्दावनवास (अर्थात् निरन्तर भजन) में जो भी आकर बाधा डाले, उसके समान कोई शत्रु नहीं है।
प्रिया चरन बल जानि कै
प्रिया श्री राधा के चरणों की कृपा एवं सामर्थ्य जानकर मेरे हृदय में हर्षोल्लास बढ़ रहा है और इन्हीं की कृपा से मेरे हृदय में श्री वृन्दावन का रस-रंग प्...
कुँवरि किशोरी लाड़ली
कृपालु किशोरी कुँवरी श्री राधा प्यारी के श्री चरणों का स्मरण करते हुए, श्री वृन्दावन एवं वृन्दावन रस का वर्णन करता हूँ।
महिमा वृन्दा विपिन की
रसिक सिरमौर श्री राधा-माधव युगल सरकार भी जिसकी माधुरी के लोभी हैं, ऐसे विलक्षण वृन्दावन की महिमा कहना कैसे सम्भव है।
फूलि-फूलि रहे सब फूल फुलवारी में के
पुष्प-वाटिका के सभी पुष्प प्रफुल्लित हो रहे हैं, और श्री राधा के अद्भुत सौंदर्य पर मुग्ध होकर मूर्तिमान छवि भी उनके चरणों में विलीन होने लगी है। [1] ...
श्रीपति श्रीमुख कमल कह्मौ
रमाकान्त भगवान नारायण ने श्री नारद जी से स्वयं कहा है कि मैंने श्री वृन्दावन रस सबसे छिपाकर रखा है। यह रस परम रहस्य है।
जीव दशा कछु इक सुनी भाई
प्रायः जीव की दशा ऐसी है कि हरि जो अमृत के समान हैं (आनन्दस्वरूप), उनको त्यागकर वह संसारी जीव/वस्तु जो विष के समान हैं (अर्थात् हर क्षण स्वार्थ-सिद्धि...
तिय सुत नाती नातिनी तिनहीं तन चित दीय
पत्नी, पुत्र, पुत्री, नाती-नातिनों आदि में ही जिनका चित्त आसक्त रहता है, उनके हृदय में श्री राधावल्लभ लाल जी तनिक भी नहीं आ पाते।
वृंदावन तें अनत ही जेतिक द्यौस बिहात
वृंदावन से अन्यत्र जितने भी दिन बीते उन्हें गिनना ही नहीं चाहिए क्योंकि वह तो किसी काम के ही नहीं हैं अर्थात व्यर्थ हैं।
कुँवरि चरन अंकित धरनि
रसिक शेखर श्री श्यामसुन्दर कुँवरि श्री राधा के चरणों के चिन्ह श्री वृन्दावन में जहाँ-जहाँ अंकित देखते हैं, वहाँ प्रिया चरणों की रज जानकर लोटने लगते ह...
और देस के बसत ही अधिक भजन जौ होइ
वृन्दावन का इतना अधिक महत्त्व है कि अन्य देशों में बसने पर चाहे विशाल भजन क्यों न होता हो, परन्तु यह वृन्दावन में सोते रहने के समान भी नहीं है।
अतिहिं लालची लाल पिय
लाल जी (श्री कृष्ण) श्री राधा के रूप का रसास्वादन करने के लिए अत्यंत लालची रहते हैं, वे सदा उनको निरंतर निहारते रहते हैं, फिर भी उन्हें तृप्ति नहीं हो...
प्यार ही की कुंज और प्यार ही की सेज रची
प्रेम-निर्मित कुंज भवन में प्यार की एक शय्या रची है, जिस पर प्यार के साथ विराजित प्यारे प्रियतम लाल जी अपनी प्यारी प्रिया से प्रेम-प्यार की वार्ताएँ क...
सहज विराजत एक रस
श्री राधावल्लभ लाल का निज धाम श्री वृन्दावन अनादि काल से सहज शोभा सहित नित्य विद्यमान है, जहाँ अपनी ललितादिक सखियों सहित युगल सदा केली-परायण रहते हैं।
प्रेम सिंधु वृन्दाविपिन
श्री वृन्दावन दिव्य प्रेम का आगाध सिंधु है, जहाँ अनादि काल से श्री राधावल्लभ युगल किशोर कल्लोलमान हैं।
ऐसैं हिय में बसत रहौ
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि वह छवि मेरे ह्रदय में नित्य प्रतिबिंबित रहे, जब रसनिधि नवल किशोर हास-परिहास परायण होते हैं, उस समय कि उनकी चितवन सरस अनुर...
न्यारौ चौदह लोक तें
युगल का निज धाम यह श्री वृन्दावन चौदह लोकों से विलक्षण है, जिसे महाप्रलय की पवन स्पर्श करने में भी असमर्थ है।
महिमा वृन्दाविपिन की
मेरी जिह्वा तो श्री वृन्दावन की महिमा गाने में सर्वथा असमर्थ है। अरे, दो सहस्त्र जिह्वाओं वाले शेषनाग भी जिसे कहते-कहते थक जाते हैं और अंततः हार मान ल...
श्री राधिकावल्लभ प्यारी फुलवारी माँझ ठाड़ी
श्री कृष्ण की प्रिया श्री राधिका वृंदावन की फुलवारी में खड़ी हैं। उनके तन पर आकर्षक फूलों वाली साड़ी सजी हुई है। [1] श्री राधा के कजरारे, विशाल नयन, ...
मति प्रमान चाहत कह्यौ
अपनी सीमित बुद्धि के साथ मैं दिव्य वृन्दावन की महिमा पर कुछ शब्द कहने का प्रयास कर रहा हूँ; परंतु स्वयं को अत्यंत सीमित अनुभव करता हूँ—मानो कोई अनन्त ...
प्रथम नाम हरिवंश हित
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं—हे जिह्वा! तू सर्वप्रथम प्रेममूल श्री हित हरिवंश नाम का ही सतत जप कर, उसी परम मधुर नाम का ही गान कर; क्योंकि इस नाम की र...
प्यारे जू की जीवनि है नवल किशोरी गोरी
नित्य किशोरी श्री राधा, श्री कृष्ण की प्राण, जीवन, और धन हैं, और इसी प्रकार श्री कृष्ण भी श्री राधा के प्राण, जीवन, और धन हैं। [1] जिससे श्री राधा ...
बार बार तो बनत नहिं
मानव-तन की प्राप्ति, श्री वृन्दावन का निवास, रसिक भक्तों का संग तथा श्री श्यामा-श्याम युगल-रूप की इष्टता—यह अनुपम संयोग जीवन में अथवा अन्य योनियों में...
अति अलबेली भाँति झूलैं अलबेली प्रिये
आज अलबेली प्रिया अलबेले ढंग से हिंडोले में झूल रही हैं, जिनकी सहज छबीली छवि को रंगीले नवल लाल देख-देखकर निहाल हो रहे हैं। [1] उनकी चटकीले रंग की साड़...
वृन्दावन सत करन कौं
मेरे मन में श्री वृन्दावन-शतक (एवं रस) की रचना का उत्साह उत्पन्न हुआ है, किंतु नवल श्री राधिकाजी की कृपा के बिना इसका निर्वाह संभव नहीं है।
खण्ड-खण्ड ह्वै जाइ तन
यदि यह नश्वर शरीर खंड-खंड हो जाए और देह के समस्त अंग सैकड़ों टुकड़ों में विभक्त हो जाएँ, तब भी श्री वृन्दावन को नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि वृन्दावन का...
नवल नवेली अलबेली सुकुमारी जू कौ
नित्य नवल रूप-लावण्य से युक्त, अलबेली अति कोमलांगी प्रिया का रूप ही प्रियतम के प्राणों का पोषक आहार है। [1] उनके इस रूप में भाव-भंगिमाओं की अभिव्यक्त...
परनिंदा के किये तें
परनिंदा से किसी के हाथ कुछ नहीं लगता। हे महामूर्ख! तू व्यर्थ ही पाप का पहाड़ अपने साथ लिए जा रहा है।
वृंदावन के वास कौ
उन माता, मित्र, पुत्र, पत्नी आदि का निश्चित रूप से त्याग कर देना चाहिए, जिनमें वृन्दावन-वास का उत्साह नहीं है।
वृन्दावन झलकनि झमक
श्री वृन्दावन की झलक को प्रेमोत्तफुल्ल नेत्रों से देखना चाहिए। यह झलक इस प्रकार की है कि इस पर सूर्य, चंद्र आदि प्रकाशवान वस्तुएँ न्योछावर की जा सकती...
मंडित जमुना वारि यौं
श्री धाम वृन्दावन में रसमयी नीलकान्ति-युक्त यमुना ऐसी शोभित हैं, जैसे वृन्दावन ने नील-मणियों की माला धारण कर रखी हो।
कुंजनि के आँगन में जहाँ-जहाँ पग धरैं
श्री वृन्दावन के विविध निकुंजों और प्रांगणों में नवल लाडिली जहाँ-जहाँ पदन्यास करती हैं, वहाँ अपनी छवि के आस्तरण से सजाती जाती हैं। [1] रसरंग भरी लाडि...
वृन्दावन वैभव जितौ
श्री वृन्दावन की सम्पत्ति (युगल सरकार) और रस-वैभव को देखकर लक्ष्मी भी ललचाती है; वाणी द्वारा उसे कहना असंभव है।
सकल भजन के माहिं है
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि समस्त भजनों का सार युगल किशोर श्री श्यामा-श्याम का नित्य विहारमय भजन है।
या रस को साधन नहीं कोई, कुंवरि कृपा ते जो कछु होइ
"या रस को साधन नहीं कोई, कुंवरि कृपा ते जो कछु होइ" - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला नित्य विहार रुपी दुर्लभ रस को प्राप्त करने का कोई और साधन नहीं, एक म...
जिनके देखै पुलक तन
जिन रसिक भक्तों के दर्शनमात्र से तन-मन-प्राण प्रफुल्लित हो जाएँ, और जिनकी मधुर वचनावली का श्रवण करते ही नेत्र अश्रुपूरित हो जाएँ—ऐसे रसिकों का ही संग ...
आवै छबि की झलक उर
वृन्दावन में वास करते हुए हृदय में गौर-श्याम बसे हों, नैनों से प्रेमाश्रु झलकते हों, तथा परम प्रेमास्पद श्री राधा-कृष्ण का स्मरण करते-करते तन की भी सु...
अद्भुत युगल विहार कौ
जो रसिक श्री श्यामा–श्याम के अद्भुत युगल-विहार के चिंतन-मनन में मग्न रहते हैं, उनकी चरण-रेणु को बार-बार अपने मस्तक पर धारण करते रहना चाहिए।
जहाँ-जहाँ राधा प्यारी धरति चरन पिय
श्री वृन्दावन की रसमयी भूमि में जहाँ-जहाँ प्रिया श्री राधा अपने सुकोमल चरणों को स्थापित करती हैं, वहीं-वहीं अनुरागी रसिक प्रियतम नेत्रों के पाँवड़े बि...
छिन छिन नई छबि पानिप रही है फबि
जिनके रूप में प्रतिक्षण छवि और लावण्य का नव-नव विकास होता रहता है, ऐसे श्री राधिकावल्लभ पर बरबस प्राण न्यौछावर हो जाते हैं। [1] सखि! उनके श्री अंगों ...
यह आसा धरि चित्त में
श्री राधारानी की कृपा की आशा चित्त में धारण कर, यथामति श्री वृन्दावन की महिमा का वर्णन करता हूँ; क्योंकि श्री वृन्दावन की माधुरी अनन्त है, जिसका आज तक...
कुंज-कुंज अति प्रेम से
वृन्दावन की एक-एक कुंज को, कोटि-कोटि रति एवं कामदेव, महाप्रेम में भरकर, नित्य निरंतर सजाते-सँवारते रहते हैं।
लता लता सब कलपतरु
यहाँ की एक-एक लता कल्पवृक्ष है और एक-एक पुष्प पारिजात है, जो श्री यमुना जी के तट पर सतत एकरस झिलमिलाते रहते हैं; अर्थात् इनकी शोभा कभी मंद नहीं होती।
विपिन राज राजत दिनहिं
सर्वोत्कृष्ट श्री वृन्दावन परमानन्द की वर्षा करता हुआ सर्वोपरि विराजमान है, जहाँ दिव्य सुगंध और पुष्पों के पराग से आकृष्ट भ्रमर मधुर-मधुर गुंजार करते ...
अब तौ करनी है यहै, वृंदावन करि बास
अब तो यही सर्वोत्तम उपाय है कि श्री राधा-कृष्ण के युगल-चरणों की छवि और उनके प्रेम-रंग में अपने मन को रंगकर, संसार से उदासीन होकर, श्री वृन्दावन में सद...
हेममयी अवनी सहज
श्री वृन्दावन की भूमि सहज स्वरूप से ही स्वर्णमयी है, जिसमें नाना रंगों के अद्भुत रत्न जड़े हैं। अद्भुत भाँति से विलक्षण चित्र चित्रित हैं, जिनमें सौंद...
अंस कला औतार जे
भगवान के जितने भी अंशावतार हैं, वे सभी श्री वृन्दावन का सेवन करते रहते हैं; इसलिए मैं कहता हूँ कि ऐसे श्री वृन्दावन का मन और वाणी के द्वारा सेवन करना ...
बाँह जोरी चलत दो
विशाल नयन वाले रसिक युगल ललित लाड़िली–लाल परस्पर गलबहियाँ डाले हुए वृन्दावन की कुंज-वीथियों में विचरण कर रहे हैं—ऐसा ध्यान करना चाहिए।
आदि अन्त जाकौ नहीं
सदा सुख-वर्षण करने वाला यह अनादि-अनन्त श्री वृन्दावन धाम त्रिगुणात्मक प्रपंच—माया—के स्पर्श से भी सर्वथा परे है।
बसिके वृन्दाविपिन में
श्री वृन्दावन में वास करते हुए यह धारणा मन में दृढ़ कर लो कि चाहे कोई लाख प्रलोभन दे, मैं प्राण तो त्याग दूँगा, पर श्री वृन्दावन को कभी नहीं त्यागूँगा...
अरून नील सित कमल कुल
लाल, नीले एवं श्वेत कमलों के समूह तथा नाना प्रकार के पुष्प ऐसे खिले हैं कि उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो श्री वृन्दावन ने नाना रंगों के सुंदर ...
विपिन धाम आंनद कौं
श्री वृन्दावनधाम सच्चिदानन्दमय है, जिसे स्वयं चतुराई ने ही सजाया-संवारा है। श्री प्रियालाल की रस-केलि के अनुरूप एवं अनुकूल सम्पदा वहाँ सदा भरपूर है।
हित सौं त्रिविध समीर बहै
जिस समय श्री प्रिया प्रियतम की जैसी रुचि होती है वैसी ही शीतल मंद सुगंधित पवन श्री वृंदावन में बहती है। कहीं मधुर स्वर में कोयल कूजती है तो कहीं मोर म...
नवल रँगीले दोऊ रस में रसीले अति
नवल रँगीले युगल, जो सदा रस में रँगे रहते हैं, आज प्रेम के सहज एवं नूतन रंग में अनुरक्त हैं। [1] प्रिया-मुखारविन्द की नित्य नूतन छवि-प्रभा का सतत दर्श...
गावत वृंदा विपिन गुन
नित्य-नवल श्री लाड़िली–लाल स्वयं वृन्दावन का गुणगान करते रहते हैं जहाँ की लताएँ, पुष्प, फल और वृक्ष अद्भुत रस-रीति से परम सुखद एवं पूर्ण हैं।
नवल रसिक पिय एक मन एक हीय
नित्य नवीन रसिक प्रिया-प्रियतम अद्वय युगल हैं। उनके तन-मन एक हैं और दोनों की रुचियां एवं प्रियता भी सदैव एक ही रहती है। [1] यह अभिन्न जोरी सदा सम वयस...
और ठौर जो जतन करै
श्री वृन्दावन से अन्यत्र बहुत प्रयत्न करने पर भी भजन सहज नहीं होता; पर यहाँ तो कोई निज स्वार्थवश भी विचरण करे, तो भजन स्वयं उसे पकड़े रहता है।
यघपि सब औगुन भर्यौ
यद्यपि मैं सब अवगुणों का भंडार हूँ, फिर भी हे हितस्वरूप वृन्दावन! आपके स्वभाव को जानते हुए मैं आपका त्याग कैसे कर दूँ? आपको पीठ दिखाकर किसी अन्य स्था...
ललित लतानि तरैं नान्हीं-नान्हीं बूँदै परैं
वृन्दावन की ललित लताओं के नीचे जहाँ पावस की झींनी-झींनी बूँदे बरस रही हैं, रँग-रँगीले प्रिया-प्रियतम (युगल) खड़े भींग रहे हैं। [1] वे गलबहियाँ दिए हुए...
वृन्दावन श्रवनन सुनहि
हे मन! कानों से श्री वृन्दावन की महिमा सुन, जिह्वा से श्री वृन्दावन की महिमा का गान कर और प्रेमपूर्वक श्री वृन्दावन को अपने हृदय में धारण कर।
निसि दिन तौ जाँचत रहौ, वृन्दावन रस-रैन
मैं रात-दिन वृन्दावन की रस-रेणु से यही याचना करता हूँ कि लाड़िली-लाल रूपी रसिक युगल दम्पति की प्रति क्षण नवनवीन छवि-छटा मेरे नेत्रों में सदा के लिए बस...
वृन्दावन कौ नाम रट
श्री वृन्दावन का नाम रट, श्री वृन्दावन का दर्शन कर, उसी वृन्दावन से स्नेह कर और अपने हृदय में श्री वृन्दावन को ही बसा।
खान पान तौ कीजिये
रसोपासना के भजनी को रसिक-मण्डली में ही खान-पान करना चाहिए। जो लोग अन्य उपासना में लगे हुए हैं, उनके साथ खान-पान करना उचित नहीं माना गया है।
रसिक रँगे जे जुगल रँग
जो रसिक भक्त श्री युगल किशोर श्यामा-श्याम के प्रेम-रंग में रँगे हुए हैं, उन्हीं का उच्छिष्ट-प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। मनमुखी रीति से जहाँ-तहाँ खाने-पीन...
वृन्दाविपिन प्रणाम करि
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं—समस्त सुखों की खान श्री वृन्दावन की शरण ग्रहण करो और उसी की वंदना करो। जब श्री वृन्दावन को पहचानोगे, तभी वास्तविक विश्राम प...
लाड़िली-लाल बिलास करैं
श्री लाड़िली लाल जी सुन्दर सुहावनी रँगमगी शय्या पर विलास परायण हैं। [1] अनुराग पूरित रसोन्मत्त युगल, मन्द मधुर हास परिहास करते हुए अपूर्व शोभा को प्रा...
प्रीतम किसोरी गोरी रसिक रँगीली जोरी
गौरांगी नवल किशोरी एवं नीलघन सुंदर प्रियतम युगल की प्रेम रंग में सराबोर रसिक रँगीली जोड़ी की शोभा का भी कोई वर्णन हो सकता है? अर्थात् नहीं। उनकी शोभा...
चरन सरन हरिवंश की
जब तक प्रकट प्रेमस्वरूप श्री हरिवंश के श्रीचरणों की शरण नहीं ली जाती, तब तक नित्य निकुंज की नित्य नवायमान रस-माधुरी को मन स्पर्श भी कैसे कर सकता है; अ...
अति सुरूप सुकुवाँर तन
जहाँ परमसुन्दर, अनन्त सुख, रूप और रस की निधि सुकुमार युगल अपनी मृदु, मनोहर मुस्कान से समस्त सखियों को मोहित करते हैं।
बहुत मिले तो संग नहीं
संसार में अपनी उपासना से भिन्न प्रकार के उपासक अधिक मिलते हैं, किन्तु उनका संग करना उचित नहीं है। वास्तव में अपनी जाति के वे ही सच्चे उपासक हैं, जो यु...
इत बौना अकाश फल
बौना आदमी यदि आकाश-फल को (वृन्दावन को) प्राप्त करना चाहे तो एक मात्र कृपा के बिना इसका अन्य कोई उपाय नहीं।
हँसनि में फुलनि की चाहनि में अमृत की
श्री प्रिया जी का हास्य कुसुम निर्झर के समान है, और उनका अवलोकन सरस सुधा-प्रवाह के समान है। उनके सर्वांग स्वरूप से रूप-सौंदर्य की वर्षा होती रहती है। ...
माधुरी की कुंज तामैं मोद की लै सेज रची
समस्त ब्रह्मांड की मधुरता को लिए कुंज भवन है, जिसमें स्वयं आनंद ही शय्या की प्रकट रचना है, और उस पर विराजमान अलबेले श्री सुकुमारी-सुकुमार जी सुशोभित ह...
रंगीली करत रंगीली बात
आज रँग रँगीली प्रिया अपने प्रियतम से उमग-उमग कर रस-मरी वार्ता कर रही हैं। जिसे पुनः पुनः श्रवण करके श्री नवल रसिक मन-मोहन प्रियतम उस वार्ता को सुनते ह...
और देस के बसत ही
अन्य देशों में वास करने से भजन क्रमशः क्षीण होता जाता है, किन्तु श्री वृन्दावन में तो स्वार्थ-पूर्ति की चेष्टा भी भजन का ही रूप धारण कर लेती है।
सोउ कृपा अति सुगम नहिं
परन्तु उन श्री किशोरी जी की कृपा प्राप्त करने का उपाय क्या है? क्योंकि वह कृपा भी सहज सुलभ नहीं है। श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि श्री हरिवंश के श...
वृन्दावन को चिन्तवन
यदि हृदय में श्री वृन्दावन का चिन्तन-रूपी दीपक सदा प्रकाशित रहे, तो वह करोड़ों जन्मों के पाप-रूपी अन्धकार को नष्ट कर सर्वत्र प्रकाश फैला देता है।
हेम कौ सुमेर दान
यदि कोई इस विश्वास से सुमेरु पर्वत के समान स्वर्ण-राशि का दान करे, मणि-माणिक्य, रत्न, गज-दान, अन्नदान और भूमिदान करे कि इससे पुण्य मिलेगा और पाप मुक्...
अलबेली सुकुमारी नैननिं के आगैं रहै
जब तक अलबेली कोमलांगिनी प्रिया प्रियतम के सम्मुख रहती हैं, तभी तक ही प्रियतम अपनी देह में प्राणों का अनुभव करते हैं। [1] इस बात को समझने वाली प्रिया...
वृन्दावन में जो कबहूँ
श्री वृन्दावन में वास करते हुए यदि कुछ भी भजन न हो, तो भी देव-मुनियों के लिए दुर्लभ श्री वृन्दावन की रज तो उड़कर देह को लगेगी ही। पीने को परम-पावन श्र...
छवि ठाड़ी कर जोरे, रूप कला चौर ढोरैं
छवि मूर्तिमान होकर श्री राधारानी के समक्ष हाथ जोड़े खड़ी है, और रूप एवं कला उनके लिए चँवर ढुला रहे हैं। घन-दामिनी श्री राधा के अंग को प्रकाशित कर सेवा...
भक्तनि निंदा अति बुरी
भक्तों की निंदा सबसे बुरी है, और भूलकर भी उसे नहीं करनी चाहिए। उसके द्वारा अनेक जन्मों में किए हुए पुण्य एक क्षण में नष्ट हो जाते हैं।
स्यामा जू के चरननि की बलिहारी
नव-किशोर श्री लाल जी के प्राणों में सदैव बसने वाले, श्री श्यामा जू के चरणों की मैं बलिहारी जाता हूँ। [1] जब श्री प्रिया जी अपने सुकोमल चरणों से श्री...
मुख छबि कान्ति सोहै उपमा चंद को है
जिस मुखछवि की कान्ति का दर्शन कर नवल रसिकराज कृतकृत्य हो जाते हैं, उसके लिए चंद्रमा की उपमा देना भी अपर्याप्त है। [1] प्रिया के शीश पर सजे फूलों की श...
छाँड़ि स्वाद सुख देह के
साधक को चाहिए कि वह लोक-लाज तथा देह के सुख-स्वादादि का त्याग कर तन-मन से दीन होकर वृन्दावन में निर्भय भाव से निवास करे।
जिनकै जुगल बिहार की
जो भक्त अहर्निश युगल-विहार की चर्चा करते रहते हैं, उन्हीं का संग करना चाहिए तथा अन्य सभी मार्गों को त्याग देना चाहिए।
हरिवंश चरण उर धरनि धरि
अतः पूरी श्रद्धा और दृढ़ संकल्प के साथ श्री हित हरिवंश के चरण-कमलों को अपने हृदय में धारण करने पर निश्चित रूप से किशोरीजी हम पर कृपा करेंगी और श्री वृ...
कुँवरि किशोरी लाड़ली
कृपालु किशोरी कुँवरी श्री राधा प्यारी के श्री चरणों का स्मरण करते हुए, श्री वृन्दावन एवं वृन्दावन रस का वर्णन करता हूँ।
पत्र फूल फल लता प्रति
वृन्दावन के पत्र, पुष्प, लता आदि को रसिक सिरमौर प्रियतम श्रीकृष्ण निहारते ही रहते हैं क्योंकि इन्हें किशोरी राधिका ने अपने स्नेह-जल पूरित दृष्टि से सी...
प्यारीजू की मुसकनि, बीजुरी सी कौंधी जाति
श्री प्रिया जू की मुस्कान विद्युत की भांति अत्यंत चमत्कृतपूर्ण है, जो प्रियतम के हृदय में एक रेखा की तरह खिंच जाती है और हटाए नहीं हटती, अर्थात कभी वि...
अंग अंग सब लाल के
श्री श्यामसुन्दर का अंग-अंग श्री प्रिया की ओर झुका रहता है, अर्थात् वे सम्पूर्ण रूप से श्री प्रिया में आसक्त रहते हैं। उनके मन में सहज प्रेम का ढाल लग...
नवल नवेली अलबेली सुकुमारी जू कौ
नित्य नवल रूप-लावण्य से युक्त, अलबेली अति कोमलांगी प्रिया का रूप ही प्रियतम के प्राणों का पोषक आहार है। [1] उनके इस रूप में भाव-भंगिमाओं की अभिव्यक्ति...
जो वाको देखे है जाई, सोइ रूप वन्त है जाई
जो श्री राधारानी की और निहारता है एवं उनका रूप ध्यान करता है वह रूपवान हो जाता है।
ऐसी सुकुमारी प्यारे लालजु की प्राण प्यारी
श्री राधारानी श्री कृष्ण की आत्मा हैं और उनके भक्त धन्य, भव्य और समृद्ध हैं।
सकल आयु सत कर्म में
यदि किसी ने जीवन भर सुकर्म ही किये हैं, फिर भी भक्तों के प्रति किया हुआ छोटा सा अपराध उसके समस्त पुण्यकर्म एक क्षण में विनष्ट कर देता है।
प्रानहूँ ते प्यारी सुकुमारी जू कौं देखत
अपने प्राणों से भी अधिक प्यारी सुकुमारी प्रिया के मञ्जुल रूप और लावण्य का दर्शन करके प्रियतम अपने रूप-दर्शन की पिपासा को रोकने में असमर्थ हो जाते हैं।...
आज सखि निरख रूप भरि नैन
हे सखि! आज तू इन दिव्य युगल के रूप को अपने नेत्र भर कर निहार। लताओं के कुंज रूपी भवन में रसिक नरेश युगल ने अपनी शय्या रची है और वे परस्पर अत्यंत कोमल ...
गौर-स्याम तन मन रँगे
सर्व रसों के सारस्वरूप प्रेम के आस्वादन में ही जिनके तन-मन सदा रंगे रहते हैं, ऐसे गौर-श्याम किसी अद्भुत प्रेम-खेल को निरंतर खेलते हुए श्रीवृन्दावन से ...
वृन्दाविपिन सुहावनौं
यह मनभावन श्रीवृन्दावन अखण्ड आनन्दमय है, जहाँ अनुराग-रंग में रंगे एक प्राण दो मित्र सदा प्रेम-क्रीड़ा में परायण रहते हैं।
रूप की नौलासी प्यारी नाना रंग के सुभाइ
रूप की फूल-छड़ी जैसी तन्वंगी प्रिया, ललित हाव-भावों से भरपूर हैं, और उनकी अद्भुत भाव-भंगिमाएँ एवं मृदुता भी अनिर्वचनीय हैं। [1] प्रियतम श्री लाल उन्...
कहौ दान कबही भयौ
श्री ललिता जी श्री कृष्ण से कहती हैं— यह तो बताइये कि इस नित्य वृन्दावन में दान का विधान पहले कब हुआ? आपको यह कहते लज्जा नहीं आती? ध्यान रखिए! यह श्री...
जीव दशा कछु इक सुनी भाई
प्रायः जीव की दशा ऐसी है कि हरि जो अमृत के समान हैं (आनन्दस्वरूप), उनको त्यागकर वह संसारी जीव/वस्तु जो विष के समान हैं (अर्थात् हर क्षण स्वार्थ-सिद्धि...
जिनकौ वृन्दाविपिन है
श्री वृन्दावन जिनका धाम है (अर्थात् श्री राधारानी का), उन्हीं की कृपा-बल से ही कोई यहाँ वास कर सकता है, अन्यथा नहीं।
अदभुत युगल विहार को जिनके रहे विचार
जो रसिक श्री श्यामा श्याम अदभुत युगल विहार के चिंतन मनन में मगन रहते हैं, उनकी चरण रेणु को बार बार अपने मस्तक पर धारण करते रहना चाहिए।
या रस को साधन नहीं कोई, कुंवरि कृपा ते जो कछु होइ
नित्य विहार रुपी दुर्लभ रस को प्राप्त करने का कोई और साधन नहीं, एक मात्र कुंवरी श्री राधा की कृपा से ही सुलभ है ।
सकहि तौ वृन्दाविपिन बसी
प्रत्येक क्षण आयु नष्ट हो रही है, यदि कर सकते हो तो वृन्दावनवास करो। अभी अवसर बना है, फिर ऐसा संयोग नहीं बनेगा।
लोक चतुर्दश ठकुरई
यदि एक ओर चौदह भुवनों का वैभव, सम्पत्ति आदि प्राप्त होता हो तो भी उसे त्यागकर रसिकों के रस-क्षेत्र श्री वृन्दावन में ही बसना चाहिए।
कोटि कोटि रसना जो रोम प्रति प्रति होइ
यदि मेरे रोम रोम में अनंत कोटि रसना हो, तब भी श्री राधारानी की सुंदरता का वर्णन करना असंभव है।
बहुत गई थोरी रही
हे मन, तुमने अपना अधिकांश जीवन बर्बाद कर दिया है, और समय तेजी से बीत रहा है, इसलिए बिना देरी के वृन्दावन में रहने के विषय में शीघ्र विचार करो और दिन-र...
शिव
शिव, ब्रह्मा, उद्धव आदि के मन में यही आशा रहती है कि हम श्री वृन्दावन की कोई लता या वृक्ष होकर श्री वृन्दावन रज को नित्य शिरोधार्य कर सकें।
बसिबौ वन्दाविपिन कौ
श्री वृन्दावनवास जैसे-तैसे भी दृढ़ हो, निश्चित हो, ऐसा प्रयत्न करना चाहिए। यह अवसर बिल्कुल किसी भी हाल में खोना नहीं चाहिए।
श्रीपति श्रीमुख कमल कह्मौ
रमाकान्त भगवान नारायण ने श्री नारद जी से स्वयं कहा है कि मैंने श्री वृन्दावन रस सबसे छिपाकर रखा है। यह रस परम रहस्य है।
वृन्दावन तो आनंद घन
अरे मन, जीवन क्षणभंगुर है, पशु की भाँति विषय-भोग में इसे खोना छोड़कर, आनंद-घन श्री वृन्दावन का चिंतन क्यों नहीं करता?
छण भंगुर तन जात है
क्षणभंगुर यह देह काल के गाल में पड़ी है। अतः जीव को विषयों का लोभ त्यागना चाहिए और विषय-सुखरूपी कौड़ी को छोड़कर श्री वृन्दावन रसरूपी अनमोल रत्न प्राप्...
नाते जेते जगत के
जगत के जितने भी सम्बन्धी हैं, वे सब मिथ्या हैं एवं एक अवधि तक ही सीमित हैं। वृन्दावन धाम जो श्रीकृष्ण की भाँति ही सच्चिदानन्दमय है, उसे पहचानो।
माधुरी की कुंज तामैं मोद की लै सेज रची
समस्त ब्रह्मांड की मधुरता को लिए कुंज भवन है, जिसमें स्वयं आनंद ही शय्या की प्रकट रचना है, और उस पर विराजमान अलबेले श्री सुकुमारी-सुकुमार जी सुशोभित ह...
वृंदावन के गुनन सुनि
वृन्दावन के गुण श्रवण करो, प्रेम-भावपूर्वक यहाँ की रज में लोटो। इस सुख की बराबरी अनन्त मुक्ति-सुख भी नहीं कर सकते।
पलकनि के जैसें अधिक
जिस प्रकार आँखों को पलकों से अनन्य प्रेम होता है और आँखें हर क्षण पलकों को रक्षा प्रदान करती हैं, वैसे ही हमें श्री युगल सरकार (लाडली लाल) के कमल-चरणो...
नवल किशोरी कुँवरि की सहजहि ऐसी बानि
श्री राधा रानी की सहज स्वभाव ही इतनी करुणामयी है कि जो भी एक बार उनकी शरण में आ जाता है, वे उसका साथ कभी नहीं छोड़तीं — न एक क्षण के लिए, न किसी भी का...
भजन रस मई विपिन धर
वृन्दावन की भूमि अत्यन्त भजन-रस सहायक (रसरूपी खेत के समान) एवं रसयुक्त है। ऐसा मानकर जो यहाँ निवास करता है, उसके हृदय में प्रेम-बीज निश्चित रूप से अंक...
अलबेली सुकुमारी नैननिं के आगैं रहै
जब तक अलबेली कोमलांगिनी प्रिया प्रियतम के सम्मुख रहती हैं, तभी तक ही प्रियतम अपनी देह में प्राणों का अनुभव करते हैं। [1] इस बात को समझने वाली प्रिया उ...
और देस के बसत ही अधिक भजन जौ होइ
वृन्दावन का इतना अधिक महत्त्व है कि अन्य देशों में बसने पर चाहे विशाल भजन क्यों न होता हो, परन्तु यह वृन्दावन में सोते रहने के समान भी नहीं है।
प्रिया चरन बल जानि कै
प्रिया श्री राधा के चरणों की कृपा एवं सामर्थ्य जानकर मेरे हृदय में हर्षोल्लास बढ़ रहा है और इन्हीं की कृपा से मेरे हृदय में श्री वृन्दावन का रस-रंग प्...
महिमा वृन्दा विपिन की
रसिक सिरमौर श्री राधा-माधव युगल सरकार भी जिसकी माधुरी के लोभी हैं, ऐसे विलक्षण वृन्दावन की महिमा कहना कैसे सम्भव है।
श्रीराधा वल्लभ
प्रियतम की लाड़-गहेली उदार शिरोमणि सुकुमारी हे श्री राधे ! आपका यह 'ध्रुवदास' अनादिकाल से ही आपको भूला हुआ है, किन्तु आप इसे मत भुला देना। [1] यदि आप ...
Pritam Hu Kain Pran Ihai
Pritam Hu Kain Pran Ihai, Preeti Ke Bas Hwai Jaahin.Koti Dharma Kin Karau Kou, Tin Tan Chitavat Naahin.- Shri Dhruvdas Ji, Bayalees Leela, Mana Shiksh...
रस भरे लाल रस भरी राधे
(राग विहागरौ) रस भरे लाल रस भरी राधे, रस भरी सखी अवलोकत रंगहि। मदन हुलास बाढ़यौ प्रीतम मन, अतिहि चाव सौं भरत उछंगहि। [1] अद्भुत कोक-कलनि की उमगनि,...
केलि करैं सुकुमारी-बिहारी, बढ़ी छबि भारी कही नहिं जाई
आज सुकुमारी गौरांगी प्रिया एवं रसिक शेखर श्री बिहारी सरस विहार परायण हैं। उनकी वर्तमान् छबि वाणी - अगोचर है। [1] श्री धुवदास जी कहते हैं कि रस - लम्पट...
प्रेम के खिलौना दोउ खेलत है प्रेम-खेल
ये श्यामा-श्याम प्रेम के खिलौने हैं, जो निरंतर प्रेम-क्रीड़ा में मग्न रहते हैं। सखियों ने इनकी प्रेम-क्रीड़ा के लिए उत्साहपूर्वक शय्या की रचना की है। ...
मदन सुधा के रस भरे
ये रूप और रंग के मूर्तिमान दो पुष्प (श्री श्यामा-श्याम) प्रेम-सुधा-रस से भरे दिन-रैन सदा प्रफुल्लित रहते हैं, और सखियों के नयन-रूपी भ्रमर इन पर निरंतर...
वृंदाविपिन निमित्त गहि
यदि कोई अल्पज्ञ नित्य विहारमय श्री वृन्दावन के दिव्य स्वरूप को न पहचान कर उसे निमित्त-धर्मों में सम्मिलित करता है अथवा अन्यान्य तिथि विधियों को महत्त्...
भाँति रँगीली छबीली के संग
भावार्थ : हे सखि ! अनुराग - रंजीता छबि आगरी प्रिया का सङ्ग प्राप्त कर आज छबीले लाल छबि - रत्नाकर बन गये हैं। [1] अति सुन्दर सहाने तल्प पर वे तत्सुख रत...
परम सच्चिदानंद घन
यह सुन्दरता की सीमा श्री वृन्दावन परम सच्चिदानन्दघन स्वरूप है, जिसमें कभी माया और काल का प्रवेश नहीं होता।
जीरन पट अति दीन लट
चाहे तन पर फटे-पुराने वस्त्र हों, देह क्षीण हो और सर्वथा दीन दशा हो; परन्तु हृदय युगल-प्रेमरस से सरोबार हो और उसी प्रेमाधिक्यवश वह वृन्दावन की करील-कु...
रसमय देखत फिरै बन
रसिक उपासक श्री वृन्दावन को रसस्वरूप मानकर विचरण करता है; उसके नयनों में वन की छवि बसी रहती है। कभी-कभी प्रेमावेशवश वह पृथ्वी पर गिर पड़ता है।
वृन्दावन तरु-तरु तरे
श्री वृन्दावन के वृक्षों की छाया तले प्राणधन, जीवन-सर्वस्व गौर-श्याम का चिंतन करता फिरूँ और मेरे नयनों से प्रेमाश्रु निरंतर झरते रहें।
कोटि कोटि हीरा रतन
करोड़ों-करोड़ों रत्नादिक, विविध मणि-रूपी जड़ सम्पत्ति का झूठा लोभ त्यागो, केवल एक श्री वृन्दावन को ग्रहण करो।
युगल प्रेम रस मगन जे, तेइ आपने मानि
श्री ध्रुवदास भक्त को कुछ सलाह देते हैं, वह कहते हैं कि ब्रज रस मार्ग जो कि भक्ति का मार्ग है बहुत ही सूक्ष्म, गहरा और विशेष है| आपको इस बारे में किसी...
ऐसी हैं ललित प्यारी लाल जू की प्रान प्यारी
श्री राधा रानी श्री लालजी अर्थात श्रीकृष्ण की प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। ठाकुरजी जब भी किशोरीजी की ओर दृष्टि डालते हैं, वह स्थिर नहीं रह पाती, फिसल...
जिनके है यह प्रेम रस
जिनको (श्री राधा-कृष्ण को) इस प्रेम-रस का अनुभव है, वे ही इसकी रीति जानते हैं। उनको मालूम है कि प्रेम के क्षेत्र में वही जीतता है जो सम्पूर्ण रूप से अ...
जहाँ जहाँ राधा प्यारी धरति चरन पिय
जहाँ जहाँ राधा प्यारी अपने सुकोमल चरणों को स्थापित करती चलती हैं, वहां वहां रसिक प्रियतम श्री कृष्ण अपनी आँखों की पलके बिछाते रहते है।
संग सोई जाके मिले भूलै गृह व्यौहार
ध्रुवदास जी यह बताना चाहते हैं कि रसोपासना में साधक को किसका संग करना चाहिए। संग ऐसा हो, जिसे प्राप्त करके जागतिक व्यवहार विस्मृत हो जाए तथा उपासक के ...
नौतन वैस किसोर छबि
जिस रसिक भक्त के हृदय में नव किशोर वपु श्री लाडिली-लाल सदैव विराजते हैं, उसके चित्त में तो श्री कृष्ण की पौगण्ड, बाल-लीला आदि की भी विशेष रूचि नहीं रह...
वृंदावन तें अनत ही जेतिक द्यौस बिहात
वृंदावन से अन्यत्र जितने भी दिन बीते उन्हें गिनना ही नहीं चाहिए क्योंकि वह तो किसी काम के ही नहीं हैं अर्थात व्यर्थ हैं।
सहज सुभाव पर्यौ नवल किशोरी जू कौ
श्री राधा रानी के स्वभाव का वर्णन करते हुए श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि हमारी किशोरीजी का स्वभाव अत्यंत ही सरल और मधुर है। ये मृदुता, कृपालुता और दयाल...
रीति भजन की यहै ध्रुव छाँडो सब की आस
श्री ध्रुवदास जी के शब्दों में भजन की रीति ऐसी हो कि संसार से आशा छोड़कर केवल श्यामा-श्याम की शरण में पूर्ण विश्वासपूर्वक जीव चला जाए।
कुंजनि के आँगन में जहाँ
श्री वृन्दावन के विविध निकुंजों और प्रांगणों में नवल लाडिली जहाँ-जहाँ पदन्यास करती हैं, वहाँ अपनी छवि के आस्तरण से सजाती जाती हैं। [1] रसरंग भरी लाडिल...
जिनके देखै पुलक तन, रोमांचित है जाहि
जिन रसिक भक्तों के दर्शनमात्र से तन-मन-प्राण प्रफुल्लित हो जायेँ, जिनकी मधुर वचनावली श्रवण करके नेत्र जल पूरित हो जायँ, ऐसे रसिकों का ही संग करना चाहि...
कुँवरि चरन अंकित धरनि
रसिक शेखर श्री श्यामसुन्दर कुँवरि श्री राधा के चरणों के चिन्ह श्री वृन्दावन में जहाँ-जहाँ अंकित देखते हैं, वहाँ प्रिया चरणों की रज जानकर लोटने लगते है...
अवगुण करे समुद्र सम गिनत न अपनों जान
समुद्र के समान अवगुण होते हुए भी किशोरीजी उन अवगुणों को देखती नहीं और राई के समान भजन करते हुए भी, अर्थात् बहुत ही थोड़ा, उस भजन को भी किशोरी जी सुमेर...
कैसौ फव्यौ है नीलांबर सुंदर
हे सखी! श्री प्रिया के गौर अंग पर नील निचोल की शोभा कैसी अद्भुत लग रही है, जिसने स्वयं मनमोहन श्री लाल जी के मन को भी मोहित कर लिया है। [1] उनके श्री ...
फूलि
पुष्प-वाटिका के सभी पुष्प प्रफुल्लित हो रहे हैं, और श्री राधा के अद्भुत सौंदर्य पर मुग्ध होकर मूर्तिमान छवि भी उनके चरणों में विलीन होने लगी है। [1] न...
बहुत मिले तो संग नहीं
संसार में अपनी उपासना से भिन्न प्रकार के उपासक ही अधिक मिलते है, किन्तु उनका संग करना उचित नहीं है। अपनी जाति के तो वे ही उपासक है जो युगल श्रीश्यामाश...
ऐसी गति ह्वै है कबहुँ
ऐसी अदभुत दशा मेरी कब होगी कि श्री वृन्दावन की शोभा देख देख नैनों से प्रेमाश्रु प्रवाहित हो रहे हों, युगल सरकार की प्रेम लीला चिंतन युक्त होने के कारण...
ऐसे रस में दिन मगन
अद्भुत वृन्दावन रस में निमग्न रहने के कारण, वृन्दावन के रसिकों को अपनी सुध-बुध ही नहीं है और काल की सीमा से परे रहते हैं। ऐसा लगता है मानो वृन्दावन मे...
हँसनि में फुलनि की चाहनि में अमृत की
श्री प्रिया जी का हास्य कुसुम निर्झर के समान है, और उनका अवलोकन सरस सुधा-प्रवाह के समान है। उनके सर्वांग स्वरूप से रूप-सौंदर्य की वर्षा होती रहती है। ...
उपमा वृन्दाविपिन की
स्वयं श्री युगल किशोर जिसकी महिमा का गान कर सुखी होते हैं, ऐसे अतुल्य, अनिर्वचनीय, रसस्वरूप श्री वृन्दावन की समता किससे की जाए।
Khelat Basant Hori Naval Chabili Jori
(Kavitt)Khelat Basant Hori Naval Chabili Jori,Udat Gulal Anurag Kau Surang Ree. [1]Mridu Muskani Ur Phool Aayi Phool Bhaye,Haav-Bhaav Saundhe Bhinje S...
Preetam Ke Praan Pyari
(Raag Eman)Preetam Ke Praan Pyari, Pyari Ji Ke Praan Piy.Prem Rasi Ek Ras, Doo Chhavi Dekhihin. [1]Tripit Na Hot Kyon Hoon, Badhat Adhik Ruchi,Chhin-C...
Pran Diyai Yah Prem Na Paiyai
(Raag Kanharau)Pran Diyai Yah Prem Na Paiyai,Aisau Mahangau Ahi Sakhi Ree, Kahi Dhoon So Kaisai Kain Laiyai.Laal-Laadilee Kau Yah Sarvasu, Tihin Ras K...
Aiso Aura Sanehi Kaun
(Raga Kanharo)Aiso Aura Sanehi Kaun.Range Ekahi Ramga Rangilau, Taji Kaim Vibhau Chaturadasa Bhaumna. [1]China-China Charana-Kamala Saharavata, Kabahu...
Nakh-Sikh Mohani Sohani
Nakh-Sikh Mohani Sohani, Baari Rati Shri Koti.Jaddapi Piy Mohan Hute, Rahe Charan Tar Loti.- Shri Hita Dhruvdas, Bayalees Leela, Rang Hulas (19)Ever-n...
Garjani Ghan Aru Damini
(Raag Malar)Garjani Ghan Aru Damini, Chaatik Pik Suk Bolati Morani.Syam Ghata Kaajar Hoon Ten Kaari, Umadi-Umadi Aayi Chahun Orani. [1]Naanhi-Naanhi B...
Yah Sukh Samujhan Ko Kachhu
Yah Sukh Samujhan Kaun Kachhu, Nahin Aan Upai.Prem Dareechi Jau Kabhun, Sahaj Kripa Khuli Jaai.- Shri Dhruvdas, Bayalees Leela, Premavali (49)The expe...
Aaj Sakhi Nirakh Roop Bhari Nain
(Raag Vihagrau)Aaj Sakhi Nirakha Rupa Bhari Naina, Lata Aimna Raci Saimna Mithuna Vara, Bolata Ati Mridu Baina. [1] Hamsata Jabahi Dou Lasata Dasana-D...
Kahau Daan Kabhi Bhayo
Kahau Daan Kabhi Bhayo, Kahat Na Aavat Laaj.Yah Ban Radha Kunwari Kau, Ik-Chhat Rajat-Raaj.- Shri Dhruvdas, Bayalees Leela, Daan Lila (06)Śrī Lalitā J...
Atihin Lalachi Lal Piya
Atihin Lalachi Lal Piya, Nirakhat Hun Na Aghat. Priya-Rup Tan-Vipin Men, Rahe Nain Urajhat.- Shri Dhruvdas, Bayalees Leela, Prem Lata (34)Lāl Jī (Śrī ...
Man Vach Kaik Ek Ras Dhare Maha Vrat Prem
Man Vach Kaik Ek Ras, Dhare Maha Vrat Prem.Pran Priyahim Sevat Kunwar, Yahi Sukh Kau Nem.- Shri Dhruvdas, Bayalees Leela, Premavali (28)With mind, spe...
Avadhi Prem Ki Dou Pyare
(Raag Vihagarau)Avadhi Prem Ki Dou Pyare.Tan-Man-Nain Rahe Ekai Hai, Kabahoo Hot Na Nyaare. [1]Ruchi-Ruchi Saun Rachi Rahe Dou Jan, Jyaun Nainani Ke T...
Suni Lai Meri Baat Jugal Charan Chitt Laaiye
Suni Lai Meri Baat, Jugal Charan Chitt Laaiye.Jo Chuukyau Yah Ghaat, Phiri Paachhein Pachhitai.- Shri Dhruvdas, Bayalees Leela, Khyal Hullas (23)Shri ...
Roop Ki Rasi Kishor Kishori
(Sawaiya)Roop Ki Rasi Kishor-Kishori, Range Ras-Keli Nikunj Bihara.Mate Anang Praveen Sabai Ang, Phool Sirishahu Te Sukumara. [1]Basau Ur-Nainani Mein...
Koti-Koti Rasana Jo Rom
Roop Priya Ko Kahan Ko, Kitaki Budhi Hai Mor.Tei Kunwar Charanani Luthat, Nirakhi Nain Ki Kor.- Shri Hita Dhruvdas, Bayalees Leela, Shringar Sabha Man...
विपिन अलौकिक लोक में
इस लोक में प्रकट होते हुए भी वृन्दावन अलौकिक, परमाद्भुत और सरस है, जिसमें नवल किशोर दो ऐसे समवयस वृक्षों की भाँति सुफलित हैं, जिनकी फूलनियाँ सतत वर्ध...